राजनीति विज्ञान

रूसो की जीवनी | प्राकृतिक अवस्था, प्रभुसत्ता एवं विधि पर रूसो के विचार

रूसो की जीवनी

रूसो की जीवनी | प्राकृतिक अवस्था, प्रभुसत्ता एवं विधि पर रूसो के विचार | रूसो के सामाजिक समझौते के सिद्धान्त की विवेचना | प्राकृतिक अवस्था और प्रसंविदा पर रूसो के विचारों का विवरण | रूसो द्वारा प्राकृतिक अवस्था का वर्णन का | रूसा का प्राकृतिक अवस्था का सिद्धान्त

रूसो की जीवनी-

फ्रेन्च राज्यक्रान्ति को जन्म देने वाले विचारों के प्रबल प्रसारक, राजनीतिशास्त्र, शिक्षा, धर्म और साहित्य के क्षेत्रों में आधुनिक युग पर गहरा प्रभाव डालने वाले, सामाजिक समझौते के सिद्धान्त के प्रबल पोषक, जीन जैक्स रूसो (Jean Jacques Rousseau) का जन्म स्विट्जरलैण्ड के जेनेवा नामक नगर में 28 जून 1712 ई० को हुआ था। उसने अपना अधिकांश जीवन आवारागर्दी में बिताया, किसी पेशे या धंधों को सीखने में सफलता नहीं पायी और न ही वह किसी एक स्थान पर टिका। उसकी प्रारम्भिक शिक्षा अनियमित रूप से हुई और 10 वर्ष की अवस्था में ही उसे नौकरी करनी पड़ी। उसने 16 वर्ष की आयु तक कई छोटी-मोटी नौकरियाँ की परन्तु वह टिका किसी पर नहीं।

16 वर्ष की अवस्था में वह अपने घर से भाग गया। इसके बाद 20 वर्ष तक मुख्य रूप से वह फ्रांस के विभिन्न स्थानों में निरुद्देश्य घूमता-फिरता रहा किन्तु उसके जीवन का यह समय महत्वपूर्ण था। वह इसी काल में फ्रांस की निर्धन जनता के सम्पर्क में आया। उसे उनके विचारों और भावनाओं को जानने का अवसर मिला। 1741 ई० में वह पेरिस में बस गया। यहाँ पर वह दिदरो आदि अनेक प्रसिद्ध विद्वानों के सम्पर्क में आया। 1746 ई में उसने गीतिनाट्य (Opera) लिखा। 1747 ई० में फ्रांस की डिजोन अकादमी द्वारा घोषित निबन्ध- प्रतियोगिता में उसने एक स्वर्ण पदक तथा 300 फ्रैंक का पुरस्कार प्राप्त किया। इससे उसे असाधारण प्रसिद्धि मिली। उसके निबन्ध का विषय था-“विज्ञान की उन्नति नैतिक जीवन को उन्नत किया है या उसे भ्रष्ट किया है ?”

अपने इस निबन्ध में रूसो ने यह सिद्ध किया कि मानव समाज की प्रारम्भिक अवस्था में सब लोग सरल और निष्पाप जीवन व्यतीत करते हुये आनन्दपूर्वक रहते थे । वर्तमान समाज की सब बुराइयों का मूल आधुनिक सभ्यता की उन्नति और सभ्य समाज का कृत्रिम जीवन है। 1754 ई० में उसने एक दूसरी निबन्ध प्रतियोगिता के लिये इस विषय पर लेख लिखा कि मनुष्यों में विषमता उत्पन्न होने का क्या कारण है ? क्या प्राकृतिक कानून इसका समर्थन करता है। इसमें उसने समानता और सामंजस्य की स्थिति में रहने वाले आदि मानव समाज का प्रतिपादन अधिक विस्तार से करते हुये उसमें व्यक्तिगत सम्पत्ति तथा आर्थिक विषमता उत्पन्न होने की प्रक्रिया तथा कारणों पर प्रकाश डाला।

इस समय तक उसकी स्थायी आजीविका का कोई साधन नहीं था। वह केवल चित्रों द्वारा दी गयी आर्थिक सहायता से जीवन निर्वाह कर रहा था। 1756 ई० में फ्रेंच लेखिका मदाम एपीने ने उसके निवास एवं भोजन आदि की व्यवस्था कर दी। इसके बाद उसने 1762 ई० में अपना ग्रन्थ ‘सामाजिक समझौता’ तथा शिक्षा विषयक ग्रन्थ ‘Emile’लिखा।

इन ग्रन्थों से रूसो को बहुत ख्याति मिली, पर साथ ही उसे असाधारण कष्ट भी भोगने पड़े। उसे अपनी प्राण रक्षा के लिये फ्रांस से भागना पड़ा और जर्मनी में शरण लेनी पड़ी। किन्तु तीन वर्ष बाद उसे वहाँ से भी भागना पड़ा और इंगलैंड के सुप्रसिद्ध दार्शनिक ह्यूम ने उसे शरण दी। इस समय तक रूसो विभिन्न राज्यों तथा व्यक्तियों द्वारा तिरस्कृत और पीड़ित हो चुका था; अतः उसे यह शंका हो गई कि दुनिया के सब व्यक्ति उस पर अत्याचार करने का प्रयत्न और उसे मारने का षड्यंत्र कर रहे हैं। इंगलैंड में अपने मित्र ह्यूम से भी उसे इसी प्रकार की आशंका हुई और वह पागल सा होकर फ्रांस लौट आया। जीवन के अन्तिम 11 वर्ष उसने अर्धपागलपन की दशा में बिताये। इस अवस्था में भी उसने अपनी आत्मकथा (Confessions) लिखी और पोलेण्ड तथा कोर्सिका के लिये संविधानों की रचना की। 2 जुलाई 1778 ई० को 66 वर्ष की आयु में इस विलक्षण, प्रतिभाशाली विचारक की मृत्यु हो गई।

सामाजिक संविदा

(1) मानव-स्वभाव- रूसो हॉब्स की इस बात को नहीं मानता था कि मनुष्य स्वभाव से दुष्ट है। रूसो ने मानव स्वभाव को भलाई चाहने वाला माना है। वह यह मानता है कि मनुष्य कभी-कभी बुराई का शिकार हो जाता है किन्तु यह कहना भूल है कि वह सुधारा नहीं जा सकता । रूसो का विश्वास है कि मनुष्य स्वभाव से सामाजिक है। वह स्वभावतः नम्र, परोपकारी और दूसरों की सेवा करने वाला है। रूसो ने आदिम मानव को पशुतुल्य, निष्पाप, निर्दोष और स्वाभाविक रूप से अच्छा माना है। वह सहज भावना से काम करने वाला, बुद्धिहीन, नैतिकता के विचारों से रहित और सम्पत्ति शून्य था ।

(2) प्राकृतिक अवस्था (State of Nature)- रूसो के मानव स्वभाव की कल्पना हॉब्स और लॉक की कल्पना से भिन्न थी; अतः उसकी प्राकृतिक दशा की धारणा भी स्वाभविक रूप से उन दोनों की धारणा से मौलिक भेद रखती है। रूसो के मतानुसार, प्राकृतिक अवस्था में मनुष्य एकाकी, स्वतन्त्र, नैतिक तथा अनैतिक भावनाओं से रहित निःस्वार्थ, सम्पत्ति और परिवार से रहित, आदिम स्वर्णयुग की स्वर्गीय दशा में रहता था। उस समय उसमें मेरे तेरे की भावना नहीं थी, उसका जीवन जंगलों में घूमने-फिरने वाले वनचर (Noble savages) जैसा था। वह सुखी और सन्तुष्ट था।

परन्तु यह स्वर्गीय स्थिति बहुत अधिक समय तक नहीं रही। सम्पत्तिरूपी साँप ने इसमें प्रवेश किया। मनुष्यों में परिवार और व्यक्तिगत सम्पत्ति बनाने की इच्छा हुई। एक मनुष्य ने भूमि एक टुकड़े को घेर लिया। वह उसे अपना कहने लगा। अन्य मनुष्यों ने भी इसी तरह भूमि के टुकड़े को घेर लिया, उसे अपना कहने लगे। इस प्रकार सभी ने भूमि पर अपना-अपना अधिकार स्थापित कर लिया। इससे उदात्त वनचर (Noble Savage) की स्वाभाविक समानता, स्वतन्त्रता, समाप्त हो गयी, दास प्रथा की तथा सभ्यता की अन्य बुराइयों की उत्पत्ति हुई। परिवार, व्यक्तिगत सम्पत्ति, समाज, कानून और सरकार आदि संस्थाओं का जन्म हुआ।

वे सब व्यवस्थायें समाज में विषमता को स्थायी बनाने में, गरीबों पर अमीरों के अत्याचार बढ़ाने में सहायक हुई। सभ्यता की वृद्धि के साथ दरिद्रता, शोषण, हत्या और बीमारी बढ़ती चली गई। इस प्रसंग में रूसो ने तत्कालीन फ्रांस की निर्धन जनता के सम्पन्न वर्गों द्वारा निर्धन वर्ग के शोषण का, इन पर होने वाले अत्याचारों का जनता के दुःखों और कष्टों का बड़ी सजीव, हृदयद्रावक, मर्मभेदी तथा प्रभावशाली चित्रण किया है। उसने अपनी सुप्रसिद्ध पुस्तक, ‘सामाजिक समझौता’ (Social Contract) के प्रथम वाक्य में यह घोषणा की है-“मनुष्य स्वतन्त्र रूप से पैदा हुआ है, किन्तु सर्वत्र वह बेड़ियों में जकड़ा हुआ है।” “(Man is born free, but everywhere he is in chains)।” उसके अनुसार मनुष्य को स्वतन्त्र एवं स्वाधीन होना चाहिये । यही उसके लिए सर्वोत्तम दशा है। किन्तु समाज के नियम, रूढ़ियाँ तथा प्रतिबन्ध उसे दास बना रहे हैं। उसकी विशुद्ध प्राकृतिक दशा के जन्मसिद्ध स्वाभाविक अधिकार से उसे वंचित कर रहे हैं। वह अपनी स्वतन्त्रता का उपयोग करने के लिये इन बन्धनों से किस प्रकार मुक्त हो, यह रूसो के राजनीतिक चिन्तन की मूल समस्या है। रूसों इसका समाधान ऐसा संगठन बनाकर करना चाहता है जिसमें सब व्यक्ति एक दूसरे के साथ संयुक्त होने पर भी प्राकृतिक दशा की स्वतन्त्रता के अधिकार को अक्षुण्ण बनाये रखें। यह सामाजिक समझौते से तथा राजनीतिक समाज के निर्माण द्वारा संभव हो सकता है।

प्राकृतिक अवस्था की आलोचना

रूसो की प्राकृतिक दशा का चित्रण मानव स्वभाव की गलत धारणा पर आधारित है। वह मानव जाति के अतीतकाल को अत्यन्त स्वर्णिम युग के रूप में प्रतिपादित करता है। वह प्रगति शके सिद्धान्त का विरोध करते हुए कहता है कि मानव समाज का निरन्तर ह्रास हो रहा है। परन्तु सत्य यह है कि मानव जाति का इतिहास प्रगति का इतिहास है, अवनति का नहीं। रूसो के मतानुसार मानव आरम्भ में सद्भावना पूर्ण, भला, सुखी, सीधा और शान्तिप्रिय था। वह मनुष्य में केवल उत्कृष्ट और भली प्रवृत्तियाँ देखता है। परन्तु यह धारणा गलत है। मनुष्य में भली और बुरी, उत्कृष्ट और निकृष्ट, देवी तथा आसुरी दोनों प्रकार की प्रवृत्तियों का सम्मिश्रण तथा समावेश है। मिल, काण्ट, ग्रीन आदि कितने ही विचारकों ने ऐसा मत प्रकट किया है।

(3) सामाजिक समझौता (Social Contract)-  रूसो व्यक्ति की स्वतंत्रता और समाज की सुव्यवस्था में समन्वय स्थापित करने के लिये एक सामाजिक समझौते (Social Contracl) की कल्पना करता है। हॉब्स की भाँति रूसो व्यक्तियों द्वारा सम्पूर्ण अधिकारों का समर्पण आवश्यक मानता है न कि लॉक की तरह कुछ अधिकारों का सौंपना । उसने लॉक की भाँति ये अधिकार ऐसे संघ को दिये हैं जो सब व्यक्तियों का समूह है। यह समझौता सब सदस्यों की स्वीकृति पर आधारित है। मानव समाज के उस काल में समाज का संगठन बनाने की इच्छा रखने वाले व्यक्ति एकत्रित होकर यह कहते हैं, “हममें से प्रत्येक व्यक्ति अपने शरीर को और पूरी शक्ति को अन्य सबके साथ संयुक्त सामान्य इच्छा (General will) के सर्वोच्च में रखता है और हम सामूहिक रूप में प्रत्येक व्यक्ति को समष्टि के अविभाज्य अंश के रूप में ग्रहण करते हैं।”

इससे व्यक्ति अपने विभिन्न व्यक्तित्वों को पूर्ण रूप से समाज में सम्मिलित करके एक ऐसी नैतिक और सामूहिक संस्था का निर्माण करते हैं जो इसके सब सदस्यों से मिलकर बनती है। इस संस्था की इसके सदस्यों से अलग अपनी विशिष्ट एकता, जीवन और इच्छा होती है। इसके सदस्य निष्क्रिय होने पर इसे राज्य (State) कहते हैं तथा क्रियाशील होने पर सर्वोच्च प्रभु तथा अन्य सदस्यों की तुलना में शक्ति (Power) कहते हैं। इसके निर्माण करने वाले व्यक्तियों का सामूहिक नाम जानता है जिन्हें नागरिक कहा जाता है।

इसमें सब व्यक्तियो के अधिकारों में समानता बनी रहती है। क्योंकि सब व्यक्ति अपने अधिकार सपर्पित करने के बाद अधिकार रहित होने के कारण बराबर हो जाते हैं। इसमे व्यक्ति की स्वतन्त्रता भी सुरिक्षत रहती है। प्रत्येक व्यक्ति को अन्य व्यक्तियों पर वही अधिकार प्राप्त हो जाते हैं जो अन्य व्यक्तियों को उस पर प्राप्त है। यह समझौता इसलिये किया जाता है ताकि विभिन्न व्यक्तियों को परस्पर विरोधी शक्तियों के स्थान पर एक सामान्य शक्ति स्थापित हो जाय।

रूसो के सामाजिक अनुबन्ध से यद्यपि समुदाय या राज्य का निर्माण होता है, परन्तु य समझौते को करने वाला पक्ष बनता है। प्रत्येक व्यक्ति समझौता करते हुए दो प्रकार के सम्बन्ध स्थापित करता है:-

(क) सर्वोच्च प्रभुसत्ता का अंग होने के कारण वह दूसरे व्यक्तियों के प्रति कर्त्तव्यों से बँधा है।

(ख) राज्य का सदस्य होने के नाते वह प्रभु शक्ति के साथ कर्त्तव्यों से बँधा हुआ है।

सामाजिक अनुबन्ध को प्रभावशाली बनाने के लिए यह आवश्यक है कि जो व्यक्ति इच्छा की आज्ञा का पालन करने से इन्कार करता है, उसे नागरिकों के समूचे समाज द्वारा इसका पालन करने के लिए बाध्य किया जाय । यदि ऐसा नहीं किया जाता है और सब व्यक्ति स्वच्छन्द आचरण करने लगते हैं तो समझौता भंग होने से अवांछनीय स्थिति उत्पन्न हो जायेगी। इस स्थिति में विषमता का साम्राज्य स्थापित हो जायेगा तथा व्यक्ति की स्वतंत्रता खतरे में पड़ जायेगी। अतः व्यक्ति को स्वतंत्र बनाये रखने के लिये सामान्य इच्छा (Generalक्षwill) की आज्ञा पालन के लिये बाध्य किया जाना आवश्यक है। जैसे गैलीलियो को अपने समय में समाज में प्रचलित पृथ्वी के चारों ओर सूर्य के घूमने के सिद्धान्त को स्वीकार करने की सामान्य इच्छा (General will) मानने के लिये बाधित होकर अपना यह मत छोड़ना पड़ा कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है।

सामाजिक समझौते की विशेषताएँ

(1) इस समझौते से किसी को कोई भी हानि नहीं होती है वरन् प्रत्येक को लाभ होता है। क्योंकि वह जो देता है वह सबको देता है। किसी एक को नहीं देता। साथ ही वह प्राप्त भी करता है।

(2) यह समझौता जीवन और इच्छा शक्ति रखने वाली एक नैतिक और सामूहिक संस्था की रचना करके प्राकृतिक दशा का अन्त करता है और एक नये सभ्य समाज और राज्य का निर्माण करता है।

(3) इससे व्यक्ति नागरिक का रूप धारण करता है और उसकी प्राकृतिक स्वतन्त्रता नागरिक स्वतन्त्रता में परिणत होती है।

(4) यह समझौता किसी विशेष समय में होने वाली एकाकी घटना मात्र नहीं, परन्तु निरन्तर होने वाली, मनुष्य के स्वभाव की उन्नत, उच्च, उदात्त और नैतिक बनाने वाली प्रक्रिया है, क्योंकि इस समझौते से मनुष्य में बड़ा महत्वपूर्ण परिवर्तन होता है।

(5) प्राकृतिक दशा से सभ्य समाज में परिवर्तन होने की स्थिति में मनुष्य अपने आचरण में सहज भावना (Instinct) का स्थान न्याय (justice) को देता है, अपने कार्यों को नैतिक स्वरूप प्रदान नहीं करता है, यह उससे पहले नहीं था।

(6) शारीरिक प्रेरणाओं का स्थान कर्त्तव्य की भावना ले लेती है; अतः अब तक केवल अपने स्वार्थ की चिन्ता करने वाला मनुष्य पहली बार अपने-आपको अन्य सिद्धान्तों के आधार पर कार्य करने के लिये बाध्य अनुभव करता है।

(7) रूसो के नागरिक राज्य में व्यक्ति अपने को प्राकृतिक दशा के अनेक लाभों से वंचित कर देता है। किन्तु इसके साथ ही वह अनेक लाभ प्राप्त भी करता है, उसकी शक्तियों का प्रशिक्षण और विचारों का विस्तृत विकास होता है, उसकी आत्मा अच्छी हो उठती है।

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Pankaja Singh

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