अर्थशास्त्र

ऋण भार का अर्थ | ऋण भार का भुगतान | ऋणभार का पुनर्भुगतान एवं प्रबन्ध | ऋण-‘भार के भुगतान की रीतियाँ

ऋण भार का अर्थ | ऋण भार का भुगतान | ऋणभार का पुनर्भुगतान एवं प्रबन्ध | ऋण-‘भार के भुगतान की रीतियाँ

ऋण भार का अर्थ

(Meaning of Debt-burden)-

साधारण भाषा में ऋण भार का तात्पर्य ऋण बोझ या कर्ज के बोझ से लगाया जाता है, क्योंकि जब सरकार आन्तरिक या बाह्य स्रोतों से ऋण प्राप्त करती है तो उसे ऋण-भार कहते हैं।

ऋण भार का भुगतान

(Payment of debt-Burden)–

ऋण भार का दायित्व शोधन या भुगतान या पुनर्भुगतान के रूप में होता है, इसलिए ऋण भार के भुगतान से तात्पर्य यह है कि सरकार के द्वारा सार्वजनिक ऋण को चुकाना। अब ऋण भार के भुगतान पर विचार करें तो यह कथन अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं है। ऋण भार के भुगतान से सरकार की वित्तीय क्षमता ज्ञात होती है। यदि सरकार ऋण भार का भुगतान समय सीमा में ब्याज सहित कर देती है तो सरकार के प्रति जनता का विश्वास बढ़ता है और मुद्रा बाजार में सरकार की साख में वृद्धि होती है। परिणामस्वरूप सरकार को अगले ऋण तुलनात्मक रूप में कम ब्याज दर पर सरलता से प्राप्त होने में सहायता मिलती है। इतना ही नहीं, सरकार दिवालिया होने से बचती है और समय सीमा में ऋण भार का भुगतान देशवासियों को भावी कर बोझ से सुरक्षित करता है। इसीलिए वर्तमान युग की सरकारें ऋण भार का भुगतान उच्च प्राथमिकता पर करने की प्रवृत्ति रखती हैं।

ऋणभार का पुनर्भुगतान एवं प्रबन्ध

(Repayment and management of Debit burden)-

ऋण भार के अंतर्गत पुनर्भुगतान एवं सरकार उसके लिए कौन-कौन से प्रबन्ध करती है, यह तथ्य अत्यन्त सामयिक है। ध्यान रहे, राजस्व में ऋण भार की वापसी के या पुनर्भु एक शुद्ध शब्द है, क्योंकि साधारण भाषा इसे भुगतान या वापसी से लगाते हैं, चूँकि बाजार से वस्तु क्रय करने पर उसके बदले भुगतान किया जाता है, लेकिन ऋण लेकर उसे ब्याज सहित देने को पुनर्भुगतान कहते हैं। ऋणों का पुनर्भुगतान (Repayment) सरकार विभिन्न रीतियों से करती है। अब यह प्रश्न उठता है कि सरकार ऋण भार के दायित्व निर्वाह के लिये क्या प्रबन्ध करती है, यह पूर्णतया अर्थव्यवस्था की आर्थिक क्षमता पर निर्भर होता है। यहाँ पर यह समझ लेना आवश्यक है कि समृद्ध देशों के लिए ऋणों का पुनर्भुगतान कोई समस्या नहीं है, ऐसा कदापि नहीं है। क्योंकि ऐसे देश बाह्य ऋणों को अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा ऊंची मात्रा में लेते हैं, चूंकि उनकी उत्पादकता ऊँची होती है, जिससे आर्थिक संसाधन सम्पन्न होते हैं, किन्तु ऋणों की ऊँची मात्रा का भुगतान सरल कार्य नहीं है अतः ऐसे देशों को ऋण के पुनर्भुगतान का प्रबन्ध करना अपेक्षाकृत अर्द्ध विकसित व विकासशील देशों के सरल होता है। क्योंकि आंकड़ों से विदित होता है कि अर्द्धविकसित एवं विकासशील राष्ट्रों को सार्वजनिक ऋण के 40 प्रतिशत अनुत्पादक व्यय अपरिहार्य हैं। ऐसी दशा में करमार का पुनर्भुगतान सम्बन्धी प्रबन्ध असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है। कतिपय देश तो सार्वजनिक ऋण का भुगतान करने के लिए ब्याज मात्र भुगतान करते रहते हैं और मूलधन यथावत रखते हैं। ऐसी विषम परिस्थिति से ग्रसित राष्ट्रों को वाह्य ऋण अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं से मिलने कठिन हो जाते है।

ऋण-‘भार के भुगतान (उन्मोचन) की रीतियाँ

(Methods of Debt Redemption)-

सरकार ऋण भार के पुनर्भुगतान एवं उनके प्रबन्ध के लिए नैतिक एवं अनैतिक रीतियाँ अपनाती है। संक्षेप में, ऋण भार को चुकाने के ढंग निम्न हैं।

  1. ऋण निषेध रीति (Method of Debt Repudiation)-

ऋण भार का पुनर्भुगतान की प्रमुख रीति ऋण-निषेध है, जिसे सरकार का अनैतिक कार्य समझा जाता है। चूंकि व्यक्ति की भाँति सरकार भी ऋण बोझ से त्रस्त रहती है, सरकार के पास ऋण भार से मुक्ति के दो मार्ग होते हैं-(1) ऋण की वापसी, (2) ऋण के पुनर्भुगतान से इन्कार । इसमें दूसरा मार्ग ऋण निषेध कहलाता है। जब सरकार ऋण भार की वापसी से इन्कार कर देती है तो आन्तरिक ऋण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ते हैं। फलतः जनता सरकार की प्रतिभूतियों या बॉण्डस (Bonds) को क्रय न करने का मन बना लेती है। इतना ही नहीं, केन्द्रीय बैंक के निर्देश पर राष्ट्रीयकृत व अराष्ट्रीयकृत (निजी) बैंक जो प्रतिभूतियाँ या बॉड्स क्रय करती हैं, उनको भी हानि का मय उत्पन्न हो जाता है इससे सरकार की साख घटती है । जनता में अशान्ति उत्पन्न हो जाती है। इसके विपरीत विदेशी ऋणों को निषिद्ध घोषित करने पर अत्यन्त घातक परिणाम होते हैं। ऐसे ऋणी देश से युद्ध की शंकाएँ प्रबल हो जाती हैं, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर साख गिरती है, यह तय है कि भविष्य में ऐसे देश को सार्वजनिक ऋण प्राप्त होने की आशायें क्षीण हो जाती हैं। विश्वव्यापी मन्दी 1930 ई. में विश्व के कई देशो ने ऋण भार से निपटने हेतु ऋण निषेध रीति का प्रयोग किया था परिणाम स्वरूप द्वितीय विश्व युद्ध की परिणति हुई। सरकारों ने ऋण चुकाने का दूसरा प्रबन्ध ऋण की अवधि आगे बढ़ाकर एवं ब्या की दर घटाकर भी ऋण भार से मुक्ति का मार्ग अपनाया था।

  1. ऋण परिवर्तन रीति (Method of Debt Conversion)-

ऋण भार के भुगतान की दूसरी विधि ऋण परिवर्तन है। ऋण परिवर्तन से तात्पर्य जब सरकार पुराने ऋणों को भुगतान न करके नवीन ऋण में समायोजित करके उसके रूप बदल लेती हों तो उसे ऋण परिवर्तन कहते हैं।

इस विधि में ऋण शर्ते एवं ब्याज दर आदि में परिवर्तन हो जाता है। ऐसे ऋणों को दीर्घकाल में परिवर्तित कर लिया जाता है और ब्याज की दर कम कर ली जाती है।

ऐसी ऋण भुगतान व्यवस्था में ऋणी देशों को लाभ होता है। यदि सरकार के ऋण-भार चुकाने सम्बन्धी ऐसे प्रबन्ध पर विचार करें तो बाह्य ऋणों (विदेशी ऋणों) के मामले में उभयपक्षी सहमति आवश्यक है। किन्तु आन्तरिक ऋणों के परिप्रेक्ष्य में ऋणों की ब्याज दर कम करने पर जन निक्षेप अल्प रह जाते हैं। इसलिए ऋण परिवर्तन रीति अत्यन्त विवेक एवं सतर्कता पर निर्भर होती है।

  1. नियमित योजनानुसार रीति (Method of Set Plan)-

जब सरकार ऋणभार के पुनर्भुगतान (Repayment) हेतु एक निश्चित योजना प्रारूप पारित कर लेती है और उसी के अनुसार ऋण चुकाने की व्यवस्था करती है तो इसे ऋण भार से मुक्ति की चौथी रीति एक नियमित योजनानुसार ऋण भुगतान कहते हैं। इस प्रक्रिया में जब सरकार ऋण भुगतान का उचित प्रबन्ध कर देती है तो उसे परिपक्वता तिथि के बाद ही भुगतान किया जाता है। नियमित योजनान्तर्गत सरकार ऋण भुगतान के लिए एक ऋण परिशोध कोष (Sinking Fund) स्थापित करती है। सर्वप्रथम इंग्लैण्ड में प्राइस नामक पादरी की सलाह पर सर विलियम पिट ने ऐसे कोष को स्थापित कर उपयोग किया। ऋण परिशोध कोष (Sinking Fund) का निर्माण सरकार की वार्षिक आय में से एक निश्चित प्रतिशत धन निकालकर जमा किया जाता हैं, इसके अलावा सरकार नवीन ऋण लेकर भी ऐसे कोष में जमा कर सकती है। किन्तु डॉ. डाल्टन “परिशोध कोष में आय का एक निश्चित प्रतिशत का हिस्सा जमा करने के ही पक्षधर हैं।” इस प्रकार सरकार ऋण भार का भुगतान जब उसकी पुनर्भुगतान तिथि आ जाती है, तो परिशोध कोष से मूलधन + ब्याज की राशि निकालकर अदा कर देती है। प्रो. डाल्टन ने परिशोध कोष को निश्चित एवं अनिश्चित दो रूपों में बताता है। उनके मतानुसार निश्चित परिशोध कोष (Certain Sinking Fund) में प्रतिवर्ष एक निश्चित राशि नियमित जमा होती है, लेकिन अनिश्चित परिशोथ कोष (Uncertain Sinking fund) में सरकार के वार्षिक बजट में अतिरेक (Surplus) प्राप्त होने पर धन जमा होता है, यदि अतिरेक प्राप्त नहीं होता है तो कोष में कुछ भी जमा नहीं होता है।

  1. वार्षिक वृत्ति रीति (Method of Terminal Annuities)-

सरकार ऋणभार के पुनर्भुगतान हेतु जब वार्षिक वृत्ति के अनुसार सार्वजनिक ऋण को सरल किश्तों में भुगतान करने की व्यवस्था करती है तो परिपक्वता के समय सरकार ऋण चुकाने की चिन्ता से मुक्त हो जाती है। सामान्यतः सरकार का ऋण चुकाने का यह अत्यन्त सरल प्रबन्ध समझा जाता है। लेकिन वार्षिक वृत्ति के अनुसार ऋण चुकाने की व्यवस्था उसी दशा में सम्भव है जब सरकार की आय चालू व्यय की तुलना में अधिक हो। ऐसी रीति समस्याग्रस्त राष्ट्रों या निर्धन राष्ट्रों के लिए दिवास्वप्न है। क्योंकि उनके बजट ऋणराशि पर ही निर्भर होते हैं। इसलिए सामान्यतः यह पहलू अव्यावहारिक है। अध्ययन की सुविधा के लिए इसे त्रैमासिक वृत्ति (Terminal Annuities) भी कहते हैं।

  1. पूँजी कर रीति (Method of Capital Levy)-

ऋण भार के भुगतान के लिए सरकार देशवासियों की सम्पत्ति अथवा पूँजी पर कर लगाकर धनराशि प्राप्त करती है, और ऐसे करों में एक निश्चित पूँजी की मात्रा अथवा सम्पत्ति की मात्रा को कर से छूट दी जाती है अर्थात् सरकार द्वारा घोषित सीमा से अधिक पूँजी या सम्पत्ति पर कर वसूल किये जाते हैं, इस प्रकार पूँजी कर से प्राप्त आगम को सार्वजनिक ऋणों की वापसी में प्रयोग किया जाता है तो इसे पूँजी कर रीति से ऋण का पुनर्भुगतान कहते हैं। यद्यपि पूँजी कर पर विवाद रहा है। प्रो. रिकार्डों के मतानुसार-“सरकार को सार्वजनिक ऋण के बोझ से बचाने के लिए पूँजी कर ही नहीं अपितु सम्पत्ति का भी बलिदान कर देना चाहिए।” लेकिन कुछ अर्थशास्त्री पूँजी कर या सम्पत्ति कर का विरोध करते हुए कहते हैं कि ऐसे करों से लोगों का बचत एवं काम करने की क्षमता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।

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Pankaja Singh

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