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रहस्यानुभूति | रहस्यवाद का स्वरूप | रहस्यवाद का विकास | कबीर के रहस्यवाद | कबीर का बौद्धिक या साधनात्मक रहस्यवाद | कबीर का भावनात्मक रहस्यवाद

रहस्यानुभूति | रहस्यवाद का स्वरूप | रहस्यवाद का विकास | कबीर के रहस्यवाद | कबीर का बौद्धिक या साधनात्मक रहस्यवाद | कबीर का भावनात्मक रहस्यवाद

रहस्यानुभूति

रहस्यवाद का स्वरूप –

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में – “चिन्तन के क्षेत्र में जो अद्वैतवाद है, भावना के क्षेत्र में वही रहस्यवाद है।”

रहस्यवाद के मूल में वस्तुतः अज्ञात-शक्ति की जिज्ञासा काम करती हैं उस अज्ञात शक्ति की अनुभूति प्राप्त करके उसका निरूपण करते समय वाणी एवं उक्तियों में अस्एता का समावेश स्वाभाविक है। इस अलौकिक अनुभूति की स्थिति में साधक ‘अनन्त शक्ति के अनन्त वैभव और प्रभुत्व द्वारा ओत-प्रोत हो जाता है। उसकी वाणी रुद्ध हो जाती है और वह वस्तुतः अपने अस्तित्व को भूल जाता है।

रहस्यवाद का विकास-

संसार के कण-कण में उसकी परम सत्ता का अनुभव करना ही रहस्यानुभूति है। ज्ञानियों के निकट ‘सर्वम् खल्विदं ब्रह्म’ वाली बात ही भावुकों के लिए संसार के प्रत्येक कण में मिलने वाली प्रियतम की झलक है।

भारतवर्ष के आर्ष-ग्रन्थ उपनिषदों में रहस्यों की चर्चा मिलती है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् के श्रीमुख द्वारा जो विभूति वर्णन किया गया है, वह बहुत ही रहस्यपूर्ण है।

भारतवर्ष में तो रहस्यवाद ज्ञान-क्षेत्र से निकला और अधिकतर ज्ञान-क्षेत्र में ही रहा, परन्तु फारस आदि देशों में जाकर यह भाव-क्षेत्र के बीच मनोरम रहस्यवाद के रूप में फैला है।

कबीर के रहस्यवाद-

रहस्यवाद को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है

(1) परमबौद्धिक और (2) भावात्मक।

आचार्य शुक्ल ने बौद्धिक रहस्यवाद को साधनात्मक रहस्यवाद कहा है।

रहस्यानुभूति की निम्न तीन स्थितियां मानी जाती हैं –

(1) परम सत्ता के आलोक का दर्शन।

(2) ‘परम सत्ता के सान्निध्य की प्राप्ति।

(3) सिद्धावस्था अर्थात् ‘परम सत्ता के साथ एकीकरण।

इनके आधार पर हम कबीर के ‘रहस्यवाद’ का विवेचन करते हैं.

कबीर का बौद्धिक या साधनात्मक रहस्यवाद-

साधनात्मक रहस्यवाद कथ्य होता है, अकथ्य नहीं होता। इसमें साधक किसी अज्ञात को जनता है और दावा करता है कि मैं इस विशेष तथ्य को जानता हूँ, किन्तु दूसरे उसको नहीं जानते हैं।

साधनात्मक रहस्यवाद की परम्परा अत्यन्त प्राचीन है। यह वस्तुतः वेदमूलक है। अथर्ववेद में शरीर के वर्णन में ‘अष्टचक्रा नवद्वारा पूरयोव्या’ में चक्रों की धारणा का स्पष्ट संकेत है। बौद्धों का ‘अभिधम्म पिटक’ योग की चर्चाओं से भरा पड़ा है। सिद्धों और नाथों ने इसकी पूर्ण प्रतिष्ठा की है। कबीर ने भी इसी परम्परा का निर्वाह किया है।

इस रहस्यवाद को व्यक्त करने के लिए कबीर ने विशेष तथ्यो को व्यक्त करने के लिए अनेक प्रतीकों का प्रयोग किया है और इस प्रकार भाषा की व्यंजना-शक्ति का परिचय दिया है।

उलटबााँसियों एवं प्रतीकात्मक रूपकों में भी अनेक बुद्धिगम्य तथ्यों का समावेश करके कबीर बौद्धिक रहस्यवाद की अभिव्यक्ति करते हुए दिखाई देते हैं।

कबीर का भावनात्मक रहस्यवाद –

दार्शनिक परमात्मा को पुरुष और जगत् को नारी-रूप प्रकृति कहते आये हैं। इसी सम्बन्ध के भावुकतापूर्ण भाव को माधुर्य ‘भाव कहते हैं, जिसमें परमात्मा की भावना प्रियतमा या प्रियतम के रूप की जाती है तथा साधक अपने आपको उस प्रियतम की प्रेयसी अथवा प्रियतमा का प्रेमी मानता है। भारतीय साधना पद्धति में साधना का समस्त भार नारी के ऊपर ही रहता आया है। अतः जीवात्मा-रूपी पत्नी (नारी) अपने परमात्मा-रूपी पुरुष से मिलने के लिए व्याकुल रहती है। उसका वियोग साधक नारी के लिए असह्य होता है। कबीर की वाणी स्पष्टतः उस वियोग को व्यक्त करती है-

यह तन जारौं मसि, करौं, लिखीं राम का नाउँ।

लेखनि करौं करंक की, लिखि-लिखि राम पठाउँ।।

कबीर ने अपने रहस्यवाद की प्रतिष्ठा आत्मा-परमात्मा के मिलन के रूप में की है। इसमें संयोग और वियोग दोनों के लिए पर्याप्त अवकाश है। कबीर के रहस्यवाद का संयोग पक्ष अत्यन्त स्वाभाविक, सरल एवं रसात्मक है।

कबीर का वाणी में हमको अनेक स्थानों पर उपनिषदों की रहस्यवादी विचारधारा के दर्शन होते हैं। उपनिषद् मे चित् सत्ता का निरूपण नेति-नेति कहकर किया गया है और उनको विरोधी बताया गया है। कबीर भी कहते हैं –

संतौ धोका कासूं न कहिये।

गुण मे निरगुण, निरगुण में गुण, बाट छाँड़ि क्यूं बहिये।

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जाके मुँह माथा नहीं, नाहीं रूप कुरूप।

पुहुप दास ते पातला, ऐसा तत्त अनूप॥

उपनिषदों में जिस आनन्दावस्था का वर्णन किया गया है, लगभग उसी का वर्णन कबीर के काव्य में पाया जाता है-

मोतिया बरसे रौरे देसवा कदन-राती।

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मुरली सबद सुनि आनन्द भयो जोति बरै दिन राती॥

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Pankaja Singh

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