इतिहास

राज्य की उत्पत्ति के विभिन्न सिद्धान्त | राज्य की उत्पत्ति का दैवी सिद्धान्त | राज्य की उत्पत्ति का विकासवादी सिद्धान्त | राज्य की उत्पत्ति का समझौता सिद्धान्त | युद्ध के लिये राज्य की उत्पत्ति

राज्य की उत्पत्ति के विभिन्न सिद्धान्त | राज्य की उत्पत्ति का दैवी सिद्धान्त | राज्य की उत्पत्ति का विकासवादी सिद्धान्त | राज्य की उत्पत्ति का समझौता सिद्धान्त | युद्ध के लिये राज्य की उत्पत्ति

राज्य की उत्पत्ति के विषय में प्रचलित विभिन्न सिद्धान्त

राज्यशास्त्र के प्राचीन एवं आधुनिक ग्रन्थों में राज्य की उत्पत्ति के विषय में बड़े विस्तार से विचार किया गया है। लोगों ने भिन्न भिन्न युगों में अपने राज्य की स्थापना किस प्रकार की इसके विषय में अनेक ग्रन्थ प्रकाश डालते हैं। साथ ही विभिन्न कालों के अभिलेख और मुलायें भी हमें बहुत कुछ जानकारी प्रदान करते हैं। इस सम्बन्ध में दैवी सिद्धांत सर्वप्रमुख हमारे समक्ष आता है।

(1) राज्य की उत्पत्ति का दैवी सिद्धान्त-

राज्य की उत्पत्ति के दैवी सिद्धांत के विषय में हमें प्राचीन ग्रंथ के शांतिपर्व, अर्थशास्त्र, मत्स्य पुराणा तथा मनुस्मृति से जानकारी प्राप्त होती है। रामायण, तैतरीय ब्राह्मण आदि ग्रंथ भी इस दिशा में प्रकाश डालते है। महाभारत और दीर्धनिकाय का कथन है कि मनुष्य समाज की सृष्टि के बाद बहुत दिनों तक सतयुग सुख और शांति का स्वर्णकाल रहा। लोग स्वभावतः धार्मिक होते थे और सरकार तथा कानून अथवा विधि नियमों के बिना ही शांति एवं सदाचार पूर्वक रहते थे। भारत में ही नहीं, वरन् पश्चिम में भी सृष्टि के आदिकाल में स्वर्ण युग की कल्पना की गई है।

महाभारत में लिखा है कि बहुत समय तक बिना राजा व न्यायाधीश के ही समाज सतपथ पर चलता रहा, परन्तु बाद में किसी प्रकार अधःपतन आरम्भ हो गया। लोग सदाचार से भ्रष्ट होकर स्वार्थ, लोभ और वासना के वश में हो गये और वह स्वर्गीय व्यवस्था नरक बन गई। इसके बाद मत्स्य न्याय अर्थात् जिसकी लाठी उसकी भैंस का बोलबाला हुआ। बलवान निर्बलों को दुःख देने लगे। देवताओं ने यह सब देखकर दुओं का अन्त करने का निश्चय किया। लोग ब्रह्मा की शरण में गये। ब्रह्माजी ने मनुष्य जाति रक्षा हेतु आचार्यशास्त्र बनाया जिसे राजा के द्वारा कार्यान्वित किया। उन्होंने एक विधान बनाया और मानस पुत्र बिरजस की सृष्टि करके उसे राजा बनाया। जनता ने भी उसके अनुशासन में रहना स्वीकार किया। इस विवरण से ज्ञात होता है कि राज्य की उत्पत्ति दैवीय मानी जाती थी। राजा के राज्याधिकार का आधा उसकी दिव्य उत्पत्ति भी थी और इस कष्टमय जीवन का अन्त करने के निमित्त ही प्रजा राजा की आज्ञा मानने के लिये सहमत हुई।

इसी प्रकार मनुस्मृति का कथन है कि प्रजा की रक्षा हेतु तथा उसके कष्टों को दूर करने के लिये ही भगवान के अनेक देवताओं के अंश लेकर राजा का निर्माण किया और यह बात मान ली गई कि राजा मनुष्य रूप में देवता है। मत्स्य पुराण में भी प्राणियों की रक्षा के लिये तथा दण्ड व्यवस्था की स्थापना के लिए ही स्वयम्भू ने राजा की सृष्टि की। रामायण भी इस सिद्धान्त का समर्थन करता है। लेकिन तैतरीय ब्राह्मण से हमें यह संकेत मिलता है कि इन्द्र ने प्रजापति से राज्यसत्ता प्राप्त की। विष्णु पुराण में भी राजपद को दैवीय माना गया है। अर्थशास्त्र में भी यह बात स्वीकार की गई है कि राजा इन्द्र और यम का स्थानीय रूप है तथा राजा से बड़ा कोई देवता नहीं है, राजा ही अपनी प्रजा को अभयदान प्रदान करता है। नारद स्मृति का कथन है कि यद्यपि राजपद ईश्वर प्रदत्त है परन्तु फिर भी उसके कर्त्तव्य निश्चित रहते थे और वह उन्हीं के दायरे में रहकर कार्य करता था।

इन सिद्धान्तों की विवेचना से यह निश्चित होता है कि राज्य की उत्पत्ति के मूल में ईश्वर ही प्रमुख है तथा राज्य दैवी संरचना का परिणाम है। साथ ही अराजकता की स्थिति बढ़ जाने पर उसका उन्मूलन करने के लिये स्वयं प्रभु ने राज्य एवं राजा की उत्पत्ति की। अतः राजा का कभी अपमान नहीं करना चाहिये, जो राजा का अपमान करता है उसे दैवी दण्ड भी मिलता है।

योरोप में भी विशेषतः मध्य युग में ईसाई मत के प्रभाव से शासन संस्था को दैवीय समझा जाता था। राजा परमेश्वर का साक्षात् प्रतिनिधि है तथा उसे राज्य करने का अधिकार ईश्वर प्रदत्त है। इस्लाम का मत भी इससे मिलता-जुलता है। इस प्रकार बादशाह खुदा का प्रतिनिधि या प्रतिबिम्ब माना जाता था।

भारतीय पद्धति के अनुसार समझौते तथा दैवी उत्पत्ति के उपर्युक्त दोनों सिद्धांतों ने कालान्तर में जो रूप धारण किये उन्हें हम इस प्रकार रख सकते हैं।

(2) राज्य की उत्पत्ति का विकासवादी सिद्धान्त-

इस सिद्धान्त का सबसे प्राचीन निर्देश हमें अथर्ववेद में मिलता है। सभा और समिति सम्बन्धी ऋग्वेद के सूक्त के अनुसार राज्य कृत्रिम विकास का परिणाम है। राज्य संस्था से पूर्व राज्यविहीन तथा अराजक दशा थी। यह दशा विराट तथा भयावह था। अतः सगठन बने। मनुष्यों का सबसे बड़ा संगठन परिवार के रूप में था। पारिवारिक दशा में उन्नति होकर ग्राम संगठन हुआ जिसमें नेता को ग्रामीण कहा गया। उसके पश्चात् दक्षिणाग्नि दशा आई। दक्षिणाग्नि दशा में सभा और समिति संस्थाओं का निर्माण हुआ। इस प्रकार अथर्ववेद के अनुसार राज्य संस्था क्रमिक विकास का परिणाम है। यह सिद्धान्त वर्तमान समय के राजनीतिशास्त्र विशारदों के सिद्धान्त से अनेक अंशों में समता रखता है।

(3) राज्य की उत्पत्ति का समझौता सिद्धान्त-

महाभारत के शांति पर्व के अनुसार राज्य संस्था से पूर्व अराजक दशा थी और बाद में राज्य की उत्पत्ति हुई। महाभारत के इस उल्लेख के अनुसार राज्य के प्रादुर्भाव से पूर्व जो अराजक दशा थी वह आदर्श थी क्योंकि तब सब मनुष्य धर्म  के अनुसार एक दूसरे का पालन किया करते थे। अराजक दशा का यह स्वरूप प्रायः वैसा ही था जैसा रूसो तथा लाक द्वारा प्रतिपादित किया गया है।

इस प्रकार महाभारत के आधार पर जैसा हम देखते हैं उससे यह बात स्पष्ट होती है कि या तो राज्य का निर्माण ब्रह्मा के द्वारा हुआ या उसकी उत्पत्ति भय त्रस्त लोगों ने पारस्परिक अनुबन्धन द्वारा की। जहाँ तक हमारे मत का प्रश्न है, भारतीय परम्परा के अनुसार, जो कि महाभारत, बौद्ध तथा जैन ग्रन्थों द्वारा समर्थित है, हम यह कह सकते हैं कि राज्य की उत्पत्ति पारस्परिक समझौते का ही परिणाम कही जायेगी।

जैन विचारकों के अनुसार मनुष्यों में पहले राज्य का अभाव है वैसे तब किसी वस्तु की कमी नहीं थी, लेकिन यह युग देर तक कायम नहीं रह सका क्योंकि धीरे-धीरे पदार्थों में कमी होने लगी। जिससे मनुष्यों में लोभ, मोह, काम, क्रोध, मद और हर्ष आदि भाव उत्पन्न हुये और मनुष्यों का नैतिक पतन हो गया। नैतिक पतन हो जाने और धर्म का लोप हो जाने से यह आवश्यकता प्रतीत हुई कि राज्य द्वारा मनुष्यों में मर्यादा और नियन्त्रण की स्थापना की जाय। तब स्वयं मनुष्यों ने राज्य की रचना की।

राज्य की उत्पत्ति के सम्बन्ध में इसी प्रकार के विचार बौद्ध साहित्य में भी पाये जाते हैं।

इस प्रकार प्राचीन भारत में समझौता सिद्धान्त का जिस ढंग से प्रतिपादन किया गया उसमें निम्नलिखित विशेषतायें थीं :-

(1) अराजक दशा में किसी भी व्यक्ति का जीवन सुरक्षित नहीं था। (2) इस दशा से परेशान होकर लोगों ने पहले परस्पर समझौता किया कि जो कोई मनुष्य दूसरे की सम्पत्ति व स्वतंत्रता में बाधा डालेगा उसे बहिष्कृत कर दिया जायेगा। (3) पर, सामाजिक शान्ति और व्यवस्था के लिये उन्होंने केवल बहिष्कार के साधन को अपर्याप्त समझा, फिर ब्रह्मा के परामर्श के अनुसार मनु को अपना राजा व शासक बनाना निर्धारित किया। (4) प्रजा ने मनु से यह समझौता किया कि वे उसे अपनी आमदनी का निश्चित भाग के रूप में प्रदान किया करेंगे और उसके आदेशों का पालन करेंगे। इसके बदले में मनु उनकी रक्षा या पालन करेंगे।

(4) युद्ध के लिये राज्य की उत्पत्ति-

एतरेय ब्राह्मण में राज्य एवं राजा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में एक अन्य सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया है। इस सिद्धान्त के अनुसार युद्ध की आवश्यकताओं से विवश होकर राजा का प्रादुर्भाव हुआ था। इस सम्बन्ध में ऐसा कहा जाता है कि देवताओं और असुरों में युद्ध हो रहा था। असुरों ने देवताओं को परास्त कर दिया। इस पर पराजित देवताओं ने आपस में विचार-विमर्श किया और इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि चूँकि हमारा कोई राजा नहीं है, इसी कारण असुर हमें पराजित कर देते हैं। अतः हमें किसी को अपना राजा बनाना चाहिये तभी हम उसके नेतृत्व में विजय प्राप्त कर सकते हैं। यह निर्णय लेने पर सभी देवता सहमत हो गये और फिर उनका राजा चुना गया।

इस सिद्धान्त में इस बात पर जोर दिया गया है कि युद्ध की आवश्यकताओं से विवश होकर ही राज्य की उत्पत्ति हुई। वर्तमान समय के विचारक भी राज्य के विकास में को एक महत्वपूर्ण अंग मानते हैं।

उपर्युक्त सिद्धान्तों का विवेचन करने पर हम इस निर्णय पर पहुँचते हैं कि राज्य की उत्पत्ति संयुक्त परिवार प्रणाली से हुई होगी और यह सम्भव हो सकता है कि विकसित अवस्था में अनुबन्धन का आश्रय भी लिया गया हो। लेकिन राजा को दैवी मानने के मूल में यह तथ्य प्रबल है कि सामाजिक व्यवस्था को सरल बनाने एवं सुदृढ़ रूप में स्थापित करने के लिए ही ऐसा माना गया। वैसे ऐतिहासिक व वैज्ञानिक आधार पर भी संयुक्त परिवार स्तरीयकरण के रूप में आता है। इसलिये राज्य की उत्पत्ति के विषय में यही प्रणाली वैज्ञानिक और युक्तिसंगत प्रतीत होती है।

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Pankaja Singh

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