इतिहास

राज्य के विभिन्न स्रोत | प्राचीन भारत की राज्य सम्बन्धी अवधारणा की विशेषता

राज्य के विभिन्न स्रोत | प्राचीन भारत की राज्य सम्बन्धी अवधारणा की विशेषता

राज्य के विभिन्न स्रोत

भारत में राजनीतिक चिन्तन की परम्परा बड़ी पुरानी है। वैदिक युग से हमारे ऋषि, मुनि, आचार्य और विचारक राजनीति सम्बन्धी प्रश्नों पर विचार करते रहे हैं और इन प्रश्नों के उत्तर देने का प्रयास करते रहे हैं कि राज्य क्या है ? राज्य की उत्पत्ति किस प्रकार हुई ? इसके उद्देश्य क्या है? इसके आदेशों का पालन मनुष्य का क्यों और कहाँ तक करना चाहिये ? राज्य का स्वरूप और आकार क्या होना चाहिए ? राज्य विषयक इन प्रश्नों का चिन्तन प्राचीन भारत में वैदिक युग से आरम्भ हुआ तथा मध्य युग में और वर्तमान काल तक चलता रहा।

प्राचीन भारत में राज्य को विभिन्न नामों से जाना जाता था। इसे कहीं राजधर्म तो कहीं दण्डनीति, कहीं नीतिशास्त्र तो कहीं अर्थशास्त्र और कहीं राजशास्त्र आदि शब्दों से अभिप्रेत किया गया है। वैदिक कालीन ग्रन्थों, उपलब्ध शिलालेखों, मुद्राओं तथा अन्य अवशेषों से भी इस पर काफी प्रकाश पड़ता है।

वैदिक कालीन ग्रन्थ एवं अन्य साहित्य-

वर्तमान समय में हमें प्राचीन भारत के राज्यों की अवधारणा सम्बन्धी चिन्तन का बहुत कम साहित्य उपलब्ध होता है। इसका कारण यह है कि अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थ लुप्त हो चुके हैं। फिर भी वेद, पुराण, महाभारत, अर्थशास्त्र, धर्मशास्त्र एवं धर्मसूत्र, जैन तथा बौद्ध साहित्य आदि ग्रंथों से यथेष्ठ सामग्री प्राप्त होती है। ऋग्वेद में जन, पंचजन, दिशा, राष्ट्र आदि शब्दों का उल्लेख हुआ है। वास्तव में दिश का समूह भिलकर ‘जन’ का रूप धारण करता है। दिश के प्रधान को दिशपति और जन के प्रधान को गोप कहते थे। ऋग्वेद में अनेक स्थलों पर राष्ट्र राजा, सभा-समिति आदि का प्रयोग हुआ है। अथर्ववेद में राजा के लिए राजाधिराज, एकराट आदि उपाधियों का प्रयोग हुआ है। शतपथ ब्राह्मण में राज्याभिषेक और उस समय होने वाले यज्ञों का नाम आया है। अथर्ववेद राजा का नियमन का भी विस्तार से विवेचन किया गया है। ऐतरेय ब्राह्मण में साम्राज्य, स्वराज्य, वैराज्य, राज्य एवं भोज्य आदि पाँच प्रकार की शासन पद्धतियों की चर्चा की गई है। इन सब तथ्यों से ज्ञात होता है कि वैदिक ग्रंथ एवं साहित्य में राज्य सम्बन्धी जानकारी सुलभ है जो शैली का सुन्दर नमूना प्रस्तुत करता है। इस मन्दिर को देखकर बड़े-बड़े विशेषज्ञ भी चकित रह जाते है और इसके निर्माण की कल्पना में खो जाते हैं। कोणार्क के सूर्य मन्दिर का निर्माण राजा नरसिंह देव के शासन काल में हुआ था। जिसकी तिथि 1238 से 64 ई० के मध्य निर्धारित की जाती है।

इस प्रकार इन समस्त विशेशताओं को देखते हुये यह मंदिर भारत के मन्दिरों में बेजोड़ और अनुपम कहा जाता है। यही कारण है कि इसे देखने के लिये कुशल कलाकार भी आते हैं।

महाभारत एवं अर्थशास्त्र-

महाभारत एवं कौटिल्य अर्थशास्त्र में भी राजा एवं गणतंत्रात्मक व्यवस्था का विस्तार से विवेचन प्राप्त होता है। यहाँ तक कि राज्याभिषेक के समय राजा प्रार्थना करता था कि यह मनसा, वाचा, कर्मणा से धर्म-पूर्वक अपनी प्रजा का पालन करेगा। यह ग्रंथ मन्त्रि-परिषद, सामन्त एवं पुरोहित का भी उल्लेख करता था। साथ ही द्वारपाल, चभूपति, कारागार अधिकारी आदि का नाम भी इसमें आया है। साथ ही राजधर्म के नाम पर राजशास्त्र का वर्णन प्राप्त होता है। इसी प्रकार महाभारत के शान्ति पर्व में राज्य एवं राज्यतन्त्र की उत्पत्ति, सभी पर्व में राज्य- व्यवस्था, वन पर्व में आपद्धर्म तथा आदि पर्व में कूटनीति आदि शासन-व्यवस्था के विभिन्न अंगों की जानकारी प्राप्त होती है।

राज्य के सम्बन्ध में हमें कौटिल्य अर्थशास्त्र, कामन्दक नीतिसार, मुद्राराक्षस, दशकुमारचरित्र तथा मृच्छकटिक आदि ग्रंथों से भी पर्याप्त जानकारी प्राप्त होती है । इन ग्रंथों में राजतन्त्र सम्बन्धी विवेचन, न्याय प्रणाली, गुप्तचर अधिकारियों के कर्तव्य, राज्य के सप्तांग तथा परराष्ट्र नीति आदि विषयों पर यथेष्ठ प्रकाश पड़ता है।

धर्मशास्त्र एवं धर्मसूत्र-

राज्य के विषय में जानकारी देने वाले ग्रन्थों में धर्मशास्त्र एवं धर्मसूत्रों का भी महत्त्व है। धर्मशास्त्र के विभिन्न अंशों में हमें राजधर्म का वर्णन प्राप्त होता है। इसी प्रकार मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, विष्णु एवं नारद स्मृति आदि ग्रंथों में भी राज्य के सम्बन्ध में बहुत कुछ लिखा गया है। धर्मसूत्रों में गौतम, वशिष्ठ, आपस्तम्ब, हरीति आदि राज्य एवं गणराज्य के विषय में काफी प्रकाश डालते हैं। बृहस्पति, गार्ग्य एवं शांतातप धर्मसूत्र भी इस सम्बन्ध में सहायक होते हैं। लेकिन हमें सबसे अधिक सामग्री मनुस्मृति के सातवें एवं आठवें अध्याय से प्राप्त होती है। इन धर्मशास्त्रों एवं सूत्रों से हमे राजा, मन्त्रि-परिषद तथा सदिव आदि के बारे में काफी जानकारी प्राप्त होती है।

पुराण एवं अन्य ग्रन्थ-

यद्यपि पुराणों की संख्या 8 है, लेकिन जो पुराण राजनीतिशास्त्र की दृष्टि से महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है वह अग्नि पुराण है। इस पुराण से हमें कुछ जानकारी प्राप्त होती है। वैसे कामन्दक नीतिसार एवं शुक्रनीतिसार से हमें राजनीतिशास्त्र के बारे में यथेष्ठ जानकारी प्राप्त होती है। राजनीति रत्नाकर तथा राजनीति कल्प तरु भी ऐसे ग्रन्थ हैं जो राजनीतिशास्त्र के विषय में प्रकाश डालते हैं।

जैन तथा बौद्ध साहित्य- राजनीतिशास्त्र के विषय में जैन तथा बौद्ध साहित्य में भी पर्याप्त सामग्री प्राप्त होती है। दीर्घ निकाय, आचारांग सूत्र, दिव्यावदान, महावग्ग, चुल्ल वग्ग, विनय पिटक एवं जातक आदि ग्रन्थ इस दिशा में काफी सहायक सिद्ध हुये हैं। दीर्घ निकाय जिसकी रचना तीसरी शताब्दी ई० पू० में हुई थी, उसमें राज्य की उत्पत्ति तथा राजा के विषय में काफी लिखा गया है। इसके अतिरिक्त जातकों एवं जैन पुराणों में भी राज्य के विषय में यथेष्ठ जानकारी प्राप्त होती है। इस प्रकार जैन और बौद्ध साहित्य राज्य एवं राजा के विषय में हमें काफी जानकारी देते हैं।

कुछ अन्य साहित्यिक स्रोत-

राज्य के विषय में वारह मिहिर की वृहत् संहिता एवं पतंजलि का महाभाष्य काफी प्रकाश डालता है। इसी प्रकार पंचतंत्र, हितोपदेश, कादम्बरी, हर्षचरित्र, रघुवंश राजतरंगिणी आदि ग्रन्थों से भी तत्कालीन राजनीतिक विचारधारा एवं शासन पद्धति पर  काफी प्रकाश पड़ता है। मनुस्मृति के टीका की मेधातिथि, विज्ञानेश्वर की मिताक्षरा, याज्ञवल्क्य स्मृति आदि ग्रंथों का राजनीतिशास्त्र के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान है। भोज द्वारा रचित कल्पतरु, राजनीति कांड एवं सोमेश्वर का मनसोल्लास, बाल्मीकि रामायण, मेगास्थनीज की इंडिका तथा अन्य विदेशी यात्रियों, इतिहासकारों आदि के अन्य भी राजनीतिशास्त्र के विषय में हमें काफी जानकारी देते हैं।

पुरातात्विक साक्ष्य-

पुरातात्विक साक्ष्यों से भी राज्य, राजाओं और शासन पद्धतियों के विषय में हमें बहुत कुछ जानकारी प्राप्त होती है। मथुरा, पांचाल कौशाम्बी आदि स्थानों से प्राप्त मुद्रायें इस दिशा में विशेष उल्लेखनीय हैं। इसी प्रकार सातवाहन, कुषाण एवं शक शासकों की मुद्रायें भी बहुत कुछ इस विषय में बोलती है। गुप्त कालीन मुद्रायें तथा हर्ष की मुद्राओं से भी हमें जानकारी प्राप्त होती है।

सातवाहन शासन प्रणाली के विषय में हमें हाथी गुम्फा अभिलेख काफी जानकारी देता है। इसी प्रकार गुप्त कालीन लेखों, प्रयाग प्रशस्ति, जूनागढ़, भीतरी, अफसद एवं मन्दसौर आदि अभिलेख भी इस दिशा में यथेष्ट जानकारी प्राप्त कराते हैं।

इस प्रकार हमे प्रात साहित्यिक साक्ष्यों, मुद्राओं, अभिलेखों आदि से जो सामग्री प्राप्त होती है उनसे राज्य और राज्यधर्म की जानकारी मिलती है। रामायण से हमें अराजक राज्य की सूचना मिलती है। वैसे इन सब में अर्धशास्त्र विशेष महत्वपूर्ण ग्रन्थ कहा जा सकता है। इसी प्रकार मेगास्थनीज की इंडिका भी चन्द्रगुप्त कालीन शासन-व्यवस्था पर काफी प्रकाश डालती है। साथ ही उस काल की मुद्रायें और अभिलेख भी महत्वपूर्ण सामग्री प्रदान करते हैं। आधुनिक कालीन ग्रन्थों में डाक्टर जायसवाल की हिन्दू पालिटी, बेनी प्रसाद की ‘द स्टेट इन ऐसेट इण्डिया तथा अल्तेकर की प्राचीन भारतीय शासन पद्धति’ आदि ऐसे महत्वपूर्ण ग्रन्थ हैं मो राजनीतिशास्त्र के विषय में हमें पर्याप्त जानकारी प्राप्त कराते हैं।

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Pankaja Singh

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