अर्थशास्त्र

राजकोषीय नीति का अर्थ | राजकोषीय नीति का उद्देश्य | रोजगार बढ़ाने में राजकोषीय नीति का योगदान | राजकोषीय नीति की सफलता को प्रभावित करने वाले घटक

राजकोषीय नीति का अर्थ | राजकोषीय नीति का उद्देश्य | रोजगार बढ़ाने में राजकोषीय नीति का योगदान | राजकोषीय नीति की सफलता को प्रभावित करने वाले घटक

राजकोषीय नीति का अर्थ

प्रत्येक देश की सरकार का प्रमुख कर्तव्य धन प्राप्त करना तथा इसका उचित रूप से व्यय करना है। सरकार प्रायः विभिन्न करों के माध्यम से धन प्राप्त करती है और आवश्यकता पड़ने पर ऋण भी लेती है। इसका प्रमुख उद्देश्य देश का विकास तथा सुरक्षा कार्यों में धन खर्च करना है। सरकार संतुलित बजट बनाने का प्रयास करती है। परन्तु विकासशील देशों में कभी-कभी ऐसा भी होता है कि व्यय आय से अधिक होता है। ऐसी परिस्थिति में सरकार को या तो अपने दे से या वाह्य देशों से ऋण लेना पड़ता है या नये नोट छापने पड़ते हैं जिसे घाटे की वित्त व्यवस्था कहते हैं। आन्तरिक तथा वाह्य ऋण तथा घाट की वित्त व्यवस्था करने की नीतियों को सामूहिक रूप से राजकोषीय नीति कहते हैं। राजकोषीय नीति करारोपण नीति तथा व्यय नीति से सम्बन्धित है। वर्तमान समय में अविकसित देश आर्थिक विकास के दृष्टिकोण से ऋण नीति अपना रहे हैं जिससे ऋण नीति भी राजकोषीय नीति का प्रमुख अंग माना जाने लगा है।

राजकोषीय नीति का उद्देश्य-

राजकोषीय नीति के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित है-

  1. देश की सुरक्षा तथा आन्तरिक शान्ति बनाये रखना।
  2. बेरोजगारी को दूर करना तथा पूर्ण रोजगार की स्थिति स्थापित करना।
  3. आर्थिक स्थिरता स्थापित करना।
  4. देश के आर्थिक विकास में योगदान देना।
  5. आय का न्यायोचित वितरण करना।

रोजगार बढ़ाने में राजकोषीय नीति का योगदान-

राजकोषीय नीति का प्रमुख उद्देश्य विकासशील देशों में रोजगार की वृद्धि करना है। रोजगार बढ़ाने तथा पूर्ण रोजगार की स्थिति प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित प्रयास किए जाते हैं-

राजकीय विनियोग- राजकीय विनियोग से शिक्षा संस्थाओं की स्थापना, नई सड़कों का निर्माण तथा पुरानी की मरम्मत तथा इसी प्रकार के अन्य अनुत्पादक कार्य करके जनता की आय में वृद्धि करती है जिससे उपभोग की प्रवृत्ति में वृद्धि होती है। इस क्रिया-कलाप को घाटे का व्यय कहा जाता है। इसमें सरकार ऋण लेकर विनियोग करती है ताकि जनता की प्रभावी माँग में वृद्धि हो। प्रभावी माँग में वृद्धि से उपभोग में वृद्धि होगी जिससे उत्पादन तथा रोजगार में वृद्धि होगी।

निजी विनियोगों को प्रोत्साहन- विकासशील देश में रोजगार में वृद्धि निजी विनियोगों के द्वारा भी की जा सकती है। निजी विनियोग का प्रोत्साहन उन बिन्दु तक होना चाहिए जहाँ तक प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से उत्पन्न होने वाली प्रभावी माँग रोजगार में वृद्धि कर सके।

आय का पुनर्वितरण- देश में रोजगार की वृद्धि के लिए आय का पुनर्वितरण एक आवश्यक तरीका है। यदि अमीरों की आधिक्य धनराशि को सरकार किसी प्रकार से लेकर निर्धनों में इस प्रकार वितरित करे कि निर्धनों की प्रभावी माँग में वृद्धि हो तथा अमीरों की प्रभावी माँग में कोई कमी न आये तो उत्पादन के क्षेत्र में वृद्धि होगी तथा रोजगार भी बढ़ेगा। अमीरों पर आयकर या पूँजीकर लगाकर निर्धनों की मदद करनी चाहिए। इसी प्रकार निर्धनों के लिए नियंत्रित मूल्य पर सामग्री उपलब्ध कराना भी रोजगार में वृद्धि करेगी क्योंकि इससे उनकी मजदूरी बढ़ेगी जिससे उपभोग प्रवृत्ति बढ़ेगी।

राजकोषीय नीति की सफलता को प्रभावित करने वाले घटक-

राजकोषीय नीति की सफलता निम्नलिखित घटकों से प्रभावित होती है-

(1) राजकोषीय तथा मौद्रिक नीति में सहयोग- राजकोषीय तथा मौद्रिक नीति में सहयोग तथा समन्वय होने से दोनों ही नीतियाँ अपने समान उद्देश्यों को प्राप्त करने में सफल होंगी। यदि समन्वय नहीं होगा तो वांछित परिणाम अच्छे नहीं होंगे। जैसे मौद्रिक नीति स्फीतिक नीति अपनायेगी तथा राजकोषीय नीति लोक व्यय में कमी तथा करारोपण से मांग जनित स्फीति को रोकने का प्रयास करेंगी तो राजकोषीय नीति सफल न होगी।

(2) राजकोषीय नीति तथा अन्य आर्थिक नीतियों में सहयोग- उत्पादन शुल्क तथा आयात-निर्यात करारोपण की नीतियाँ अपने लक्ष्य को तभी प्राप्त कर सकेंगी जब देश की विदेशी व्यापार नीति उत्पादन तथा वितरण आदि की नीतियों में उपयुक्त ताल-मेल होगा।

(3) राजकोषीय नीति के विभिन्न उपकरणों में समन्वय- यदि एक ओर करारोपण की मात्रा में वृद्धि करके अतिरिक्त आय की मात्रा को कम किया जायेगा तथा दूसरी ओर अनुत्पादक लोक व्यय में वृद्धि करके आय प्रवाह में वृद्धि की जायेगी तो इस विरोधात्मक कार्यवाही से राजकोषीय नीति का सम्पूर्ण प्रभाव निष्फल हो जायेगा।

(4) कार्यान्वयन का कुशल होना- राजकोषीय नीति का कार्यान्वयन प्रभावपूर्ण हो तथा कार्यान्वयन के लिए जो उत्तरदायी अधिकारी एवं कर्मचारी हो वह प्रशिक्षित, कर्तव्यनिष्ठ एवं योग्य हों जिससे वह प्रशासनिक दायित्व का सही निर्वाह कर सकें ताकि राजकोषीय नीति के जो लाभ समाज को प्राप्त होने चाहिए उससे वह वंचित न रह जाये।

(5) भ्रष्टाचार तथा कर प्रवंचन की मात्रा- यदि देश में ईमानदारी, निष्ठा का वातावरण होगा और करों की चोरी नहीं होगी तो निश्चय ही राजकोषीय नीति अपने उद्देश्यों को प्राप्त होगी। यदि इसके विपरीत स्थिति होगी तो राजकोषीय नीति विफल होगी।

(6) जन जागृति एवं जन सहयोग- यदि जनता सरकार को उसकी राजकोषीय नीतियों को अपना समर्थन देगी तथा उसके कर प्रावधानों का सही ढंग से अनुपालन करेगी तथा कर भुगतान के रूप में देश के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त करेगी तो राजकोषीय नीति सफल होगी या नहीं।

(7) सरकार की निष्ठा तथा प्रतिबद्धता- राजकोषीय नीति की सफलता का आधार सरकार का उस नीति के प्रति अपनी स्वयं की निष्ठा तथा प्रतिबद्धता होती है। जैसे- यदि सरकार को अनुत्पादक लोक व्यय में कमी करनी है तो सरकार को दृढ़ता से मितव्ययिता का पालन करना पड़ेगा। इसी प्रकार करारोपण में यदि बड़ी मात्रा में चोरी हो रही है तो सरकार को कठोर कदम उठाकर दोषी व्यक्तियों को दण्ड देने में व्यवस्था करनी चाहिए।

राजकोषीय नीति तथा आर्थिक स्थिरता-

देश में आर्थिक स्थिरता प्राप्त करने के लिए आवश्यक है कि राजकोषीय नीति प्रगति चक्रीय हो। देश में घाटे का बजट मुद्रा संकुचन की स्थिति में जब बनाया जाता है तो आर्थिक स्थिरता के लिए लाभदायक होता है। मुद्रा स्फीति के समय घाटे के बजट की नीति आर्थिक स्थिरता के लिए हानिकारक होती है। इसलिए (i) रोजगार तथा आय की स्थितियों में उतार-चढ़ाव के समय में सरकार असंतुलित बजट बनावे, (ii) बजट नीति लचीली होनी चाहिए, (iii) सरकार में स्वयं स्थिरता प्राप्त करने का गुण होना चाहिए जिससे करों तथा व्ययों में आवश्यकतानुसार परिवर्तन लाये जा सके, (iv) व्यापार चक्र की समस्त अवधि में बजट संतुलित होना चाहिए, (v) आर्थिक समृद्धि काल में देशी बजट तथा मंदी काल में घाटे का बजट तथा पूर्ण रोजगार की स्थिति में संतुलित बजट बनाना चाहिए।

राजकोषीय नीति तथा मूल्य उतार-चढ़ाव-

देश में मूल्य स्थायित्व लाने में राजकोषीय नीति का विशेष योगदान है। विकासशील देशों में मूल्यों में उतार-चढ़ाव एक प्रमुख समस्या है। मूल्यों में वृद्धि को अधिक उत्पादन करके, प्रभावपूर्ण माँग में कमी लाकर जनता की क्रयशक्ति में, आधिक करारोपण के द्वारा, कमी लाकर रोका जा सकता है। मूल्यों में कमी होने पर उत्पादन की मात्रा घटाकर करों की मात्रा में कमी करके इसे बढ़ाया जा सकता है।

राजकोषीय नीति तथा उत्पादन-

उत्पादन में साधनों को राजकोषीय नीति से गतिशील बनाया जा सकता है। जो क्षेत्र अविकसित हैं तथा जहाँ पर उत्पादन में कमी है और निजी उत्पादक उत्पादन करने में उदासीन हैं, ऐसे स्थानों पर सरकार को उद्योगों की स्थापना करनी चाहिए और ‘उत्पादन की मात्रा में वृद्धि करनी चाहिए। सरकार को आयात प्रतिस्थापन तथा निर्यात प्रधान उद्योगों के विकास के लिए करों में विशेष राहत देनी चाहिए।

जहाँ लाभ के दृष्टिकोण से निजी उत्पादक उत्साहित हो रहे हों वहाँ सरकार को विनियोग नहीं करना चाहिए।

राजकोषीय नीति तथा वितरण-

देश के उचित आर्थिक विकास के लिए उत्पादन में न्यायोचित वितरण की विशेष आवश्यकता होती है। असमान वितरण देश के लिए अभिशाप है। अमीरों पर अधिक करारोपण करके प्राप्त आय को निर्धनों में वितरित करके आर्थिक समानता लायी जा सकती है। सरकार अनुत्पादक व्यय करके निर्धनों की आय में वृद्धि कर सकती है। निर्धनो को विभिन्न प्रकार की सुविधाओं को देकर उसकी वास्तविक आय में वृद्धि करके उनके जीवन स्तर को ऊँचा उठाया जा सकता है।

भारतीय राजकोषीय नीति-

भारत में राजकोषीय नीति, व्यापक आर्थिक नीति तथा नियोजन प्रक्रिया का प्रमुख अंग है। भारतीय राजकोषीय नीति नियोजन की सफलता का एक महत्वपूर्ण उपकरण है। नियोजन के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए राजकोषीय नीति वित्तीय संसाधनों को जुटाती है और इन साधनों का आवंटन करती है।

भारतीय राजकोषीय नीति के उद्देश्य-

विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की राजकोषीय नीति के जो मूल उद्देश्य हैं वही भारतीय राजकोषीय नीति के उद्देश्य हैं। ये उद्देश्य हैं- भारत में आर्थिक विकास की गति को बढ़ाना, आर्थिक समानता को प्राप्त करना, क्षेत्रीय विषमताओं को समाप्त करना, गरीबी तथा बेरोजगारी उन्मूलन करना, मुद्रा स्फीति को नियन्त्रित करना तथा सामाजिक न्याय की स्थापना करना। पंचवर्षीय योजनाओं में यही लक्ष्य मूल रूप से स्वीकार किये गये हैं। लेकिन इनके लक्ष्यों में अन्तर होते हैं। प्रारम्भ में आर्थिक समृद्धि की दर को महत्व दिया गया। समाजवाद के लक्ष्य को पूरा करने के लिए सामाजिक व्यय तथा क्षेत्रीय विषमता उन्मूलन को महत्व दिया गया। पिछले वर्षों में बेरोजगारी तथा गरीबी उन्मूलन को विशेष महत्व दिया गया। स्फीति प्रभाव को रोकने तथा हीनार्थ प्रबन्ध को सीमित करने के प्रयास किये गये हैं।

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Pankaja Singh

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