शिक्षाशास्त्र

प्रयोजनवाद और आदर्शवाद में अन्तर | प्रयोजनवाद और प्रकृतिवाद में अन्तर | प्रयोजनवाद आदर्शवाद तथा प्रकृतिवाद का मुख्य मार्ग

प्रयोजनवाद और आदर्शवाद में अन्तर | प्रयोजनवाद और प्रकृतिवाद में अन्तर | प्रयोजनवाद आदर्शवाद तथा प्रकृतिवाद का मुख्य मार्ग

प्रयोजनवाद और आदर्शवाद में अन्तर

(i) विचारकों एवं आलोचकों की दृष्टि में प्रयोजनवाद तथा आदर्शवाद में कुछ अन्तर दिखाई दिए हैं। उन्हें भी जान लेने से इसके बारे में अच्छी तरह ज्ञान मिलेगा। नीचे दोनों के बीच पाये जाने वाले अन्तर दिए जा रहे हैं।

दार्शनिक अंतर

प्रयोजनवाद आदर्शवाद
बहुतत्ववादी दर्शन। एकतत्ववादी दर्शन।
ईश्वर या परमसत्ता सभी का स्रोत, सर्वोपरि और  सर्वशक्तिमान नहीं। ईश्वर अथवा परमसत्ता ही सर्वोपरि, सर्वशक्तिमान, सभी का मूल स्रोत।
कोई भी नियम सार्वभौमिक, सर्व-मान्य नहीं, सभी परिवर्तनशील हैं। आध्यात्मिक नियम, सिद्धांत सद्गुण सार्वभौमिक, शाश्वत, सर्वमान्य और  अपरिवर्तनशील हैं।
सत्य की कसौटी प्रयोग, निरीक्षण एवं पुनः परीक्षण है। सत्य की अनुभूति होती है, कोई परीक्षण की आवश्यकता नहीं, शाश्वत विचार सत्य हैं।
व्यक्ति, देश, काल, परिस्थिति के अनुकूल मूल्य बनते और निर्धारित होते हैं। मूल्य पूर्वनिर्धारित हैं, स्वनिर्मित हैं।
व्यक्ति में ही संपूर्ण विश्वास होता है। ईश्वर में संपूर्ण विश्वास होता है।
प्रयोजनवादी दृष्टिकोण स्थूल, मानवीय, मनोवैज्ञानिक, जनतांत्रिक, वैज्ञानिक होता है। आदर्शवादी दृष्टिकोण सूक्ष्म, आध्यात्मिक, एक तंत्र वाली और अंर्तदृष्टि अंतर्दृष्टि युक्त होता है।
जगत वास्तविक है न कि केवल विचार जन्य। जगत का वास्तविक है और एक-मात्र विचार जन्य है। विचार से अलग इसका अस्तित्व नहीं है।

शैक्षिक अंतर

प्रयोजनवाद आदर्शवाद
शिक्षा का अर्थ सामाजिक कुशलता प्राप्त करने की प्रक्रिया है। शिक्षा का अर्थ व्यक्ति में सद्गुणों का विकास करना है, व्यक्ति को ऊंचा उठाने की प्रक्रिया है।
शिक्षा का उद्देश्य सामाजिक, व्यावहारिक तथा भौतिक जीवन के लिए आवश्यक गुणों को प्राप्त करना है जो वर्तमान जीवन की परिस्थितियों के संदर्भ में होता है। शिक्षा का उद्देश्य शाश्वत सत्य, मूल्य, आदर्श और मुक्ति प्राप्त करना है। आध्यात्मिक व्यक्तित्व का विकास करना, पूर्णता की अनुभूति करना है।
पाठ्यक्रम में व्यावहारिक जीवन में काम आने वाले विषय तथा क्रियाओं को महत्व देना, जैसे विज्ञान,  गृहकला, तकनीकी विषय, भाषा आदि। पाठ्यक्रम में आदर्श एवं मूल्यों से युक्त विषय-दर्शन धर्म, साहित्य, संगीत, कला, आदि-पर ध्यान दिया जाना।
शिक्षा विधियों में अनुभववादी, क्रियात्मक, कौशल-प्रवीणता संबंधी विधियों को प्रयोग करने का समर्थन होना। योजना विधि का आविष्कार करना। मौखिक विधियों-प्रश्नोत्तर, विवेचन, व्याख्यान, वाद विवाद, तर्कविधियों-के प्रयोग पर जोर देना। गुरु- शिष्य प्रणाली का समर्थन।
शिक्षक को गौण स्थान देना, सलाह वाला, सहायक, मित्र, पथप्रदर्शक मात्र समझना। शिक्षक शिक्षा का केंद्र होता है, देने संपूर्ण जिम्मेदारी रखता है, स्वयं शिक्षार्थी का सुंदर स्वरूप सजाता है।
शिक्षार्थी को केंद्र बिंदु मानना, अपने आप सीखने वाला समझना, सक्रिय होने पर जोड़ देना। शिक्षार्थी को केंद्र ना मानना, अध्यापक द्वारा शिक्षा दिया जाना, विनयी और शांत श्रोता एवं अनुपालन समझना।
कुछ मुक्तिवादी, कुछ प्रभाववादी  अनुशासन स्वीकार करना, समाज के नियंत्रण में रहकर कार्य संपादन करना। अधिक प्रभावकारी, कुछ दमनवादी अनुशासन पर बल देना, आत्म-नियंत्रण, संयम एवं ब्रम्हचर्य पर जोर देना।
विद्यालय सामाजिक जीवन की क्रियाओं का स्थल, समाज का लघुरूप, समाज का प्रतिनिधि होता है। विद्यालय व्यक्ति की क्रियाओं का आदर्श स्थल होता है, समाज से दूर होता है।
शिक्षा का आधार बालक की मूल प्रवृत्ति भाव, आवश्यकता, इच्छा, रुचि को बनाना। शिक्षा का आधार मनोविज्ञान नहीं दर्शन होता है जो आदर्शात्मक विधान प्रस्तुत करता है।
शिक्षा में गतिशीलता, परिवर्तन-शीलता, लोच और नवीनता होती है, स्थायित्व  नहीं होता। शिक्षा में दृढ़ता, स्थायित्व, प्राचीनता, शैद्धान्तिकता होती है, परिवर्तन शीलता का विरोध पाया जाता है।

प्रयोजनवाद और प्रकृतिवाद में अन्तर-

प्रयोजनवाद और प्रकृतिवाद के बीच कुछ अन्तर मिलते हैं और इनके कारण दोनों विचारधाराओं के अन्तर्गत पाई जाने वाली शिक्षा में भी अन्तर पाया जाता है। इसे यहाँ प्रकट कर देने से प्रयोजनवाद के बारे में और भी स्पष्ट जानकारी हो सकेगी।   

दार्शनिक अंतर

प्रयोजनवाद प्रकृतिवाद
बहुतत्ववादी विचारधारा है। बहुत से तत्वों से जगत की रचना हुई है। एकतत्ववादी विचारधारा है। केवल पुद्गल या पदार्थ से ही जगत का निर्माण होता है।
कोई मूल्य आदर्श पूर्व निर्धारित नहीं, मनुष्य अपने परिस्थितिवश इन्हें बना लेता है। मूल्य और आदर्श गौण  रूप में पाए जाते हैं, इनका अस्तित्व होता है।
कोई भी नियम व सिद्धांत सार्वभौमिक और शाश्वत नहीं हैं। प्रकृति के नियम और सिद्धांत सर्वभौमिक, शाश्वत, और वस्तुनिष्ठ होते हैं। ये अपरिवर्तनशील हैं।
सत्य की कसौटी परीक्षण, प्रयोग, निरीक्षण है। सत्य की कसौटी समानता है।
प्रयोग की कसौटी पर खरा उतरने वाला मूल्य एवं आदर्श शिकार किया जाता है। पूर्ण रूप से कोई भी आदर्श एवं मूल्य स्वीकार नहीं होता है।
जगत के प्रति यांत्रिक दृष्टिकोण नहीं होता है बल्कि  भावनात्मक होता है, मानवीय होता है। जगत के प्रति आंतरिक दृष्टिकोण होता है; मानवीय व्यवहार भी मशीन की तरह होता है।
ईश्वर का अस्तित्व वही तक स्वीकार होता है जहां वह मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। किसी भी हालत में ईश्वर का अस्तित्व नहीं मानता है।
केवल विज्ञान ही नहीं बल्कि मानवीय निर्णय एवं प्रयत्न ज्ञान प्रदान करते हैं। केवल प्राकृतिक विज्ञान तथा प्रकृति ज्ञान देते हैं।
साधन की अपेक्षा साध्य अधिक महत्वपूर्ण होता है। साधन को साध्य की अपेक्षा अधिक महत्व देता है। विश्व एक यंत्र सदृश्य ऐसा साधन है।
भौतिक होते हुए भी मानवीय विचार-धारा है। ठेठ भौतिकवादी  विचारधारा है।

शैक्षिक अंत

प्रयोजनवाद प्रकृतिवाद
(1‍)शिक्षा का तात्पर्य मानव के सामाजिक विकास से लिया जाता है। (1) शिक्षा का तात्पर्य मनुष्य की जन्मजात प्रवृत्तियों के स्वाभाविक, समरूप और प्रगतिशील विकास से लिया जाता है।
(2) शिक्षा एक सामाजिक प्रक्रिया है। (2) शिक्षा एक व्यक्तिगत प्रक्रिया है।
(3) शिक्षा का उद्देश्य निश्चित नहीं है। फिर भी शिक्षा का उद्देश्य सामाजिक जीवन व्यतीत करने की योग्यता, कुशलता एवं क्षमता प्रदान करता है। सामाजिक दृष्टिकोण पर बल दिया जाता है। (3) शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को आत्मानुभूति, आत्माभिव्यक्ति और आत्म संघर्ष की तैयारी की क्षमता प्रदान करता है। व्यक्तित्व दृष्टिकोण पर है।
(4) शिक्षार्थी में कार्य करने की आदत का निर्माण किया जावे। स्वतंत्र ढंग से विकास हो। (4) किसी प्रकार की आदत का निर्माण करें, सर्वभौमिक प्रवृत्तियों का पूर्णप्रकाशन हो।
(5) पाठ्यक्रम में समाज की प्रगति लाने वाले विषय, व्यवसायिक एवं जीवनोपयोगी विषय तथा क्रियाओं को महत्व दिया जाता है। (5) प्राकृतिक विज्ञान तथा आत्म-कपासन में सहायक विषयों तथा क्रियाओं को महत्व दिया है जो व्यक्तिगत विकास में सहायक देवें।
(6) शिक्षा का स्थान महत्वपूर्ण है यद्यपि केवल सहायक, मित्र, सलाहकार बिना हस्तक्षेप करने वाले निरीक्षक के रूप में।   (6) शिक्षक परिपार्श्व मैं रहने    वाले नाटक के लोगों के समान शिक्षक, को गौण स्थान देना, उपयोगी करना, प्रकृति को ही सबसे बड़ा शिक्षक मानना।
(7) मनुष्य के द्वारा बने यंत्रों एवं सहायक सामग्री, साज- सज्जा के द्वारा शिक्षण आवश्यक होना। (7)  प्रकृति की गोद में वन, पर्वत, निर्झर, पौधों, पशु शिक्षा के साधन माना जाता है।
(8) सीखने की क्रिया में सहसम्बन्ध एवं एकीकरण पर बल देना। योजना विधि प्रमुख शिक्षा विधि है। (8) क्रिया, खेल तथा स्वानुभव पर बल देना पूर्णविराम इन पर आधारित किंडर गार्टन, मांटेसरी, ह्यूरिस्टिक प्रणालियां मुख्य विधि होना।
(9) शिक्षार्थी को स्वतंत्रता के साथ कार्य करने का अवसर देना तथा समाज के हित को ध्यान में रखना। (9) व्रत के समान स्वतंत्र क्रिया के लिए छोड़ देना, निषेधात्मक शिक्षा अपने आप सीखने के लिए पूर्ण मुक्त करना।
(10) शिक्षालय समाज का लघु रूप होता है। समुदाय के जीवन की क्रियाओं को वहां कराया जाता है, जीवनोपयोगी व्यवसाय बताए जाते हैं। (10) शिक्षालय प्रकृति का प्रांगण है। जो जनतंत्र की भावनाओं से भरा हो। वह स्वतंत्र क्रिया के अवसर देता है।
(11) प्राकृतिक परिणामों पर आधारित अनुशासन मान्य नहीं है। समाज के नियमों के द्वारा बालक की सुरक्षा की जाती है। सामाजिक अनुशासन का समर्थन एवं पालन होता है। सामाजिक दृष्टिकोण होता है। (11) प्राकृतिक परिणामों के द्वारा अनुशासन स्थापित होता है जिससे कभी-कभी भयंकर घटनाएं घटती हैं। मुक्ति वादी अनुशासन का समर्थन एवं पालन होता है। व्यक्तित्क दृष्टिकोण होता है।
(12) प्रयोजनवाद शिक्षा स्वीकारात्मक विचारधारा पर आधारित की गई है, उसमें सुधार, परिवर्तन, अच्छाई के लिए प्रयत्न होता है। बालकों को बुराई से दूर रखा जाता है। समाज कल्याण की भावना से उन्हें अभीप्रेरित किया जाता है। (12) प्रगतिवादी शिक्षा नकारात्मक विचारधारा पर आधारित की गई है। बालक की बुराइयों को वैसे ही छोड़ दिया जाता है, कोई सुधार और परिवर्तन नहीं होता है। आत्म कल्याण की भावना अपने आप विकसित हो यही ध्यान रखा जाता है।
(13) मनुष्य को सभी चीजों का मापदंड माना जाता है और मनुष्य द्वारा निर्मित चीजों को महत्वपूर्ण समझा जाता है। इसीलिए विभिन्न आविष्कार, सृजन एवं रचनाएं होती है। (13) रचित की चीजें ही शुद्ध होती मनुष्य के हाथ में पढ़ने से वे गंदी हो जाती है। मनुष्य के द्वारा बनाई गई चीजें कृत्रिम, अस्वाभाविक और अनुपयोगी भी होती हैं।
(14) शिक्षा की व्यवस्था समाज के हित के लिए आवश्यक समझी जाती है। (14) शिक्षा की व्यवस्था यदि कोई होती है तो वह केवल व्यक्ति के हित के लिए होती है।

प्रयोजनवाद आदर्शवाद तथा प्रकृतिवाद का मुख्य मार्ग

प्रो० रॉस ने लिखा है कि “प्रयोजनवाद सार रूप से मन की एक मध्यस्थ अभिवृत्ति है”। इसे अक्सर आदर्शवाद और प्रकृतिवाद के बीच का मध्य मार्ग बताया गया है।”

इसी प्रकार से प्रो० जेम्स ने भी कहा है कि “प्रयोजनवाद एक मध्यस्थ और संयोजक है।”

प्रो० ररक ने कहा है कि “प्रयोजनवाद प्रकृतिवाद एवं हीगेल के निरपेक्ष आदर्शवाद दोनों का एक विरोध है।”

कुछ अन्य विचारकों ने प्रयोजनवाद में कोई नई चीज नहीं पाई और यह कह कर शान्त हो गये कि यह एक प्रकार की अनुभववादी अभिवृत्ति मात्र है। इसी तरह से कुछ अन्य विचारकों के मतानुसार प्रकृतिवाद का भौतिक तत्व और आदर्शवाद का मनःतत्व दोनों एक साथ मिलने का प्रयल है। यह सत्य कयन है कि इसकी पुष्टि प्रो० रॉस के शब्दों में मिलती है कि यह आदर्शवाद तथा प्रकृतिवाद के बीच का एक मध्य मार्ग अर्थात् आदर्शवाद एवं प्रकृतिवाद की कठोरता को छोड़ कर मनुष्य और उसके द्वारा बनाये गये समाज के हित में दोनों विचारधाराओं के मध्यस्थ तत्वों व तथ्वों को स्वीकार किया है। इसमें कोई सन्देह नहीं है। उदाहरण के लिए शिक्षा का उद्देश्य है। इसके अनुसार शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को सामाजिक कुशलता प्रदान करके सामाजिक प्रगति करना है। प्रगति समाज के वातावरण के अनुकूल होगी। इसमें आदर्शवाद एवं प्रकृतिवाद के बीच का रास्ता रखा गया है। आदर्शवाद व्यक्ति को सभी गुणों एवं आदर्शों से युक्त बनाना शिक्षा का उद्देश्य होता है। प्रकृतिवाद भी व्यक्ति को जन्मजात शक्तियों का स्वतन्त्र एवं सम्यक् विकास करने का उद्देश्य बताता है। परन्तु यह विकास किस काम का यदि वह दूसरों के हित में न हो। इसलिए प्रयोजनवाद ने समाज को बीच में रख कर शिक्षा का उद्देश्य समाज-कल्याण, सामाजिक-प्रगति एवं विकास बताया है।

(i) आदर्शवाद व्यक्तित्व के विकास पर जोर देता है तथा प्रकृतिवाद यंत्रवादी दृष्टिकोण रखता है परन्तु प्रयोजनवाद समाज में रहने वालों का वातावरण एवं परिस्थिति के अनुकूल विकास करना चाहता है। दोनों छोरों के बीच में प्रयोजनवाद है।

(ii) आत्मा और शरीर दो तत्व हैं। आदर्शवाद आत्मा को और प्रकृतिवाद भौतिक शरीर को सत्य मानता है। प्रयोगवार ने आत्मा को शरीर में स्थित मन का रूप देकर उसे और उसके द्वारा प्राप्त होने वाले अनुभव को सत्य कहा। यहाँ भी वह मध्यस्थ होकर कार्य करता है।

(iii) आदर्शवाद मानवजीवन में परम तत्व की प्राप्ति को सर्वश्रेष्ठ मानता है। प्रकृतिवाद जीवन में सुख-आनन्द की ओर ध्यान देता है। प्रयोजनवाद ने दोनों के बीच में अपनी स्थिति रखी और जीवन की तात्कालिक भौतिक-सामाजिक आवश्यकताओं को सन्तुष्ट करना ही सर्वोत्तम बताया है।

(iv) आदर्शवाद ने वास्तविकता तथा सत्य को आध्यात्मिक तथा विचारात्मक माना है। प्रकृतिवाद ने जड़ प्रकृति के पदार्थों में वास्तविकता तथा सत्य आरोपित किया है। प्रयोजनवाद ने इसके बीच मनुष्य के द्वारा बनाई गई सभी वस्तुओं तथा सभी अनुभवों एवं मनुष्य के परिणामों को सत्य और वास्तविक सिद्ध किया है।

(v) आदर्शवाद शिक्षा का उद्देश्य आत्मा की अनुभूति, मुक्ति को मानता है, प्रकृतिवाद जन्मजात शक्तियों का स्वाभाविक विकास मानता है, जबकि प्रयोजनवाद में मनुष्य में सामाजिक कुशलता का विकास करने को कहता है। आध्यात्मिक एवं भौतिक व्यक्तित्व के बीच सामाजिक व्यक्तित्व का विकास प्रयोजनवादी शिक्षा का लक्ष्य होता है।

(vi) आदर्शवाद पूर्वनिश्चित शाश्वत मूल्यों से सम्बन्धित विषयों को पाठ्यक्रम में रखता है जैसे भाषा, गणित, संगीत, कला आदि। प्रकृतिवाद भौतिक पदार्थों के विज्ञानों को पाठ्यक्रम में स्थान देता है जैसे भौतिक, वनस्पति, जीवजन्तु विज्ञान, स्वास्थ्य विज्ञान | प्रयोजनवाद आवश्यकता और उपयोगिता के आधार पर पाठ्यक्रम के विषयों एवं क्रियाओं को निश्चित करता है। अतएव भाषा साहित्य, कला, विज्ञान, व्यवसाय-उद्योगों सभी को पाठ्यक्रम में शामिल किया है।

(vii) आदर्शवाद पौखिक विधि पर जोर देता है। प्रकृतिवाद क्रियात्मक विधि पर तथा प्रयोजनवाद प्रयोगात्मक विधि पर जोर देता है जिसमें क्रियात्मकता अधिक एवं शाब्दिकता कम होती है।

(viii) आदर्शवाद में अध्यापक को सर्वोच्च स्थान मिला है, प्रकृतिवाद में निम्न स्थान तथा प्रयोजनवाद में समान स्थान दिया गया है। समाज में शिक्षक-शिक्षार्थी मित्रवत्, सहयोगी के रूप में काम करते हैं ऐसा प्रयोजनवाद कहता है।

(ix) आदर्शवाद में चिन्तन-मनन के द्वारा, प्रकृतिवाद में स्वच्छन्द एवं निर्बाध क्रिया के द्वारा तथा प्रयोजनवाद में सीमित दशाओं के भीतर प्रयोग-निरीक्षण के द्वारा समस्या का समाधान होता है। प्रयोग निरीक्षण में चिन्तन, मनन और स्वतन्त्र क्रिया दोनों सीमित रूप में होता है।

(x) आदर्शवाद कठोर आत्म नियंत्रण के द्वारा, प्रकृतिवाद प्राकृतिक दशाओं के द्वारा तथा प्रयोजनवाद समाज की परिस्थितियों के द्वारा व्यवस्था, समायोजन एवं संगठन का प्रयत्न करता है। इस प्रकार प्रयोजनवाद में आत्मनिष्ठा और आत्म-स्वतन्त्रता के बीच एक सन्तुलन होता है।

(xi) आदर्शवाद विद्यालय को गुरू-आश्रम या आदर्श स्थान मानता है जो पारिवारिक रूप में ही पाया जाता है क्योंकि विद्यार्थी एवं शिक्षक के बीच पुत्र और पिता का सम्बन्ध होता है। प्रकृतिवाद सम्पूर्ण प्रकृति को विद्यालय मानता है जहाँ परिवार नहीं होता है। प्रयोजनवाद में विद्यालय समाज और परिवार के बीच में जोड़ने वाली संस्था है जहाँ प्रकृति का सौन्दर्य एवं समाज की परिस्थितियाँ भी होती हैं।

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Pankaja Singh

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