अर्थशास्त्र

प्रशुल्क | प्रशुल्कों का वर्गीकरण | सीमा प्रशुल्कों के भेद | सीमा प्रशुल्क दरों के प्रकार

प्रशुल्क | प्रशुल्कों का वर्गीकरण | सीमा प्रशुल्कों के भेद | सीमा प्रशुल्क दरों के प्रकार

प्रशुल्क

(Tariff)

सीमा प्रशुल्क नीति से आशय उस नीति से है जिसके अन्तर्गत देश की सीमा के बाहर-भीतर आने जाने वाली वस्तुओं पर कर लगाये जाते हैं अर्थात् किसी देश के आयातों तथा निर्यातों पर लगाये जाने वाले करों की नीति को सीमा प्रशुल्क नीति कहते हैं। इस नीति का उद्देश्य देश के आयातों तथा निर्यातों पर अप्रत्यक्ष रूप से प्रतिबन्ध लगाना है। इस नीति में आयात करों की प्रधानता होने के कारण एल्सवर्थ ने कहा है कि प्रशुल्क करों की वे मात्रायें हैं जो कि किसी राष्ट्र द्वारा विदेशी आयातों पर लागाई जाती हैं।

प्रशुल्कों का वर्गीकरण

(Classification of Tariff)

राष्ट्रीय सीमाओं को पार करने वाले माल की स्थिति एवं जन्मानुसार सीमा प्रशुल्क को सामान्यतया तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-

(1) आयात कर (Import Duties). (2) निर्यात कर (export Duties), (3) मार्गवर्ती व्यापार कर (Transit Duties) |

प्रत्येक राष्ट्र इन तीनों ही प्रकार की सीमा-प्रशुल्कों को लगाकर अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के क्षेत्र में अपनी नीति को सन्तुलित बनाये रख सकता है।

(1) आयात कर (Import Duties)- यह प्रशुल्कों के तीनों वर्गों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण एवं प्राचीनतम है। यदि सीमा प्रशुल्क का उद्देश्य आय प्राप्त करना मात्र है तो इसे इस प्रकार लगाया जाना चाहिए कि विदेशी व्यापार की दिशा एवं मात्रा पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। उदाहरणार्थ यदि किसी ऐसी वस्तु पर आयात कर लगाया जाता है जिसकी मांग की लोच अधिक है तो इससे उस वस्तु की मांग घट जायेगी तथा उससे प्राप्त आय भी कम हो जायेगी। इसलिये ऐसी स्थिति में ऐसी वस्तु पर आयात कर अधिक लगाना चाहिए जिसकी माँग अपेक्षाकृत बेलोचदार है। आयातित वस्तुओं का उत्पादन देश में ही हो रहा है तो निर्यात वस्तु पर दोनों ही वस्तुओं पर समान कर लगाने चाहिये जिससे कि प्रतिस्पर्धा की शर्ते (Terms of Competition) बराबर हो सके तथा सरकारी आय में भी वृद्धि हो सके।

(2) निर्यात कर (Export Duties)- 19 वीं शताब्दी के प्रारम्भिक काल में निर्यात करों का प्रयोग सामान्तया किया जाता था। उस समय यह समझा जाता था कि निर्यात करों का भार आयात करने वाले देशों के उपभोक्ताओं पर पड़ता है। परन्तु बाद में इस विचार में परिवर्तन आया। अब यह समझा जाता है कि निर्यात कर वास्तव में देश के हित में नहीं है क्योंकि इससे निर्यात वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि होने से विदेशी बाजार में इनकी मांग कम होने में हमारे निर्यात व्यापार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

निर्यात कर लगाने का उद्देश्य भी आय प्राप्त करना है। ये कर उन देशों द्वारा लगाये जाते हैं जो कि कच्चे माल का निर्यात करते हैं। इसका प्रमुख कारण यह है कि अधिकांश कच्चे माल का निर्यात निर्धन देश करते हैं तथा इस कर से प्राप्त राशि का आहरण कार्य भी सरल होता है।

(3) मार्गवर्ती कर (Transit Duties)-  इस. प्रकार के करारोपण 19 वीं शताब्दी के प्रारम्भ में वाणिकवाद के समय सामान्य रूप से प्रचलित थे। यातायात एवं संदेश वाहन के सस्ते साधन सुलभ नहीं थे। ऐसी स्थिति में छोटे मार्गों का होना आवश्यक था। ऐसी स्थिति में अनकूल भौगोलिक स्थिति होने वाले देशों ने अपने क्षेत्र से होकर जाने वाले व्यापारियों से कर वसूल करना शुरू कर दिया था। लेकिन यातायात के साधनों के विकास के साथ-साथ इस प्रकार के कर का महत्व कम होता जा रहा है। इसके साथ ही अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक सहयोग की भावना के कारण भी इस प्रकार के कर समाप्त हो गये हैं। इस प्रकार के करों का भार आयातकर्ता देश के उपभोक्ताओं अथवा निर्यातक देशों के उत्पादकों पर पड़ता है। कितना भार दोनों पक्षों पर पड़ेगा, यह दोनों देशों में माँग और पूर्ति की दशाओं द्वारा निर्धारित होता है।

सीमा प्रशुल्कों के भेद

(Kinds of Tariffs)

सीमा प्रशुल्कों को विभिन्न वर्गों में विभाजित किया जा सकता है। इस विभाजन के दो प्रमुख दृष्टिकोण हैं-

(1) उद्देश्य के आधार पर, (2) प्रशुल्कों की प्रकृति के आधार पर।

(1) उद्देश्य के आधार पर-सीमा शुल्क लगानक उहशयों के आधार पर इसको दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-

(i) राजस्व सीमा शुल्क (Revenue Tariffs)-  इस प्रकार का प्रशुल्क लगाने का एक मात्र उद्देश्य सरकार के लिए आय प्राप्ति है। सरकारी कोष को आय प्राप्त हो, के विचार से विदेशों से आयात किये जाने वाले माल पर चुंगी ली जाने लगी है। इसकी दर अधिक ऊँची नहीं रखी जाती है क्योंकि इससे आयों की मात्रा कम होने का भय रहता है। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु प्रशुल्क दरें इस प्रकार तय की जाती हैं कि अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के प्रवाह पर किसी प्रकार का प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़े। माँग और पूर्ति की दशाओं पर पूर्ण ध्यान रखा जाता है। साधारणतया यह कर उन वस्तुओं पर लगाया जाता है जिनका देश में आयात होता है, तथा देश में उत्पादन मांग की तुलना में कम होता है। यदि देश में ऐसी वस्तुओं का उत्पादन हो रहा है तो उस पर लगाये गये उत्पादन कर की दर के अनुसार ही इन आयातित वस्तुओं पर भी कर लगाया जाता है। 19 वीं शताब्दी में सीमा प्रशुल्कों का सरकारी आय के स्रोत के रूप में काफी महत्व था, लेकिन अब इस उद्देश्य की पूर्ति बहुत कम की जाती है।

(ii) संरक्षण सीमा प्रशुल्क (Protective Tariffs)-  इस आधार पर सीमा प्रशुल्क सरकारी आय प्राप्त करने के उद्देश्य से नहीं लगाकर घरेलू उद्योग को संरक्षण तथा प्रोत्साहन देने के लिए लगाई जाती है। देश के अन्दर विदेशी वस्तुओं के आगमन पर रोक लगाने के लिए लगाए जाते हैं। इनकी दरें इतनी ऊँची होती हैं कि आयातित वस्तुओं की कीमतें अधिक बढ़ने से देशी बाजार में इनकी मांग घट जाती है। कभी-कभी इस प्रकार की संरक्षण सीमा प्रशुल्क घरेलू माल का मूल्य बढ़ाने के विचार से भी लगाई जाती है ताकि उस माल का देश में ही उत्पादन प्रोत्साहित किया जा सके।

अन्य उद्देश्यों के आधार पर- सीमा प्रशुल्कों का सरकारी आय प्राप्त करने तथा संरक्षण की नीति अपनाने के अतिरिक्त निम्न उद्देश्यों की पूर्ति के लिए भी उपयोग किया जाता है-

(i) सौदाकारी सीमा शुल्क (Tariffs for Bargaining)-  दो देशों के बीच व्यापार होता है और व्यापार का आधार लाभ प्राप्त करना होता है। यह लेन-देन सौदे के रूप में तय किया जाता है। द्वितीय महायुद्ध के पश्चात् से व्यापारिक जगत में द्विपक्षीय समझौतों का चलन अत्यन्त बढ़ गया है। इन सौदों में प्रत्येक देश अपनी सीमा प्रशुल्क दरों में वृद्धि अथवा छूट देकर व्यापार करता है। यह देना एवं लेना के सिद्धान्त’ (Give and Take Principle) पर आधारित है। एक देश अपनी सीमा प्रशुल्क छूट देता है, उसी को मद्दे नजर रखते हुए दूसरा देश भी इस प्रकार के व्यापारिक सौदे करते हैं।

(ii) पसंदगी सीमा प्रशुल्क (Preferential Tariffs)- वर्तमान अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में विभिन्न देशों ने अपने-अपने आर्थिक गुट अथवा समुदाय बना लिये हैं। सदस्य राष्ट्रों से आयात व निर्यात होने पर कम दर से सीमा प्रशुल्क लगाये जाते हैं जबकि इन समुदायों से बाहर के राष्ट्रों से होने वाले व्यापार पर सीमा प्रशुल्क की दरें अधिक लगाई गई हैं। योरोपीय साझा मण्डी (European Common Market) इसका एक ज्वलन्त उदाहरण है। ब्रिटिश शासकों ने भी विभिन्न अधीनस्थ राष्ट्रों में पसंदगी व्यापार के सिद्धान्त (Theory of Preferential Trade) को काफी प्रोत्साहन दिया था।

(iii) व्यापार सन्तुलन सीमा प्रशुल्क (Balance or Trade Tariffs)- कुछ देश अपने देश के व्यापार को प्रतिकूलता को दूर करने तथा व्यापार सन्तुलन की स्थिति प्राप्त करने हेतु भी इस प्रकार के सीमा प्रशुल्क लगाते हैं। जिन देशों के साथ व्यापार का घाटा अधिक होता है उनके प्रति ऊंची सीमा प्रशुल्क दरें लगाई जाती हैं। इस उपाय द्वारा दो देश के बीच व्यापार सन्तुलन को स्थापित करने का प्रयास किया जाता है।

(2) प्रशुल्कों की प्रकृति के आधार पर- सीमा प्रशुल्कों की प्रकृति के आधार पर भी सीमा प्रशुल्कों को निम्नांकित तीन भागों में विभजित किया जाता है-

(i) परिमन शुल्क (Specific Duties)-  यह प्रशुल्क वस्तु की माप-तौल अथवा संख्या के आधार पर लगाई जाती है। उदाहरणार्थ चाय पर 1 रुपया प्रति पौण्ड, कपड़े पर 50 पैसे प्रति मीटर, स्टील पर 30 रुपये प्रति टन आदि। दूसरे शब्दों में परिमाण प्रशुल्कों का आधार वस्तुओं की भौतिक इकाईयां होती हैं।

(ii) मूल्यानुसार प्रशुल्क (Add Valorem Duties)-  इस प्रकार के प्रशुल्क वस्तु के मूल्य के प्रतिशत के रूप में लगाये जाते हैं उदाहरणार्थ मोटर साईकिल की कीमत पर 10% ।

(iii) मिश्रित शुल्क- इसके अन्तर्गत किसी भी वस्तु पर परिमाण शुल्क तथा मूल्य शुल्क में से जो दर कम हो उसी के आधार पर प्रशुल्क लगा दिया जाता है। उदाहरणार्थ यह निश्चित किया जा सकता है कि विदेशों से आयातित घड़ियों पर प्रति घड़ी 50 रुपये अथवा उसके मूल्यों के 30 प्रतिशत की दर से प्रशुल्क लगेगा। इनमें से जो दर कम ज्ञात होगी उसी के आधार पर व्यापार इस प्रकार की सीमा प्रशुल्क का भुगतान करेगा।

सीमा प्रशुल्क दरों के प्रकार

(Classification of Tariff Rates)

विभिन्न देशों में सीमा प्रशुल्क दरें भिन्न-भिन्न आधारों तथा दरों के रूप में लगाई जाती हैं। सीमा प्रशुल्क दरों को तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-

(1) एकाकी कर की दर- यह सीमा प्रशुल्क लगाने की सरलतम विधि है। इस प्रकार की दरें पूर्ण स्वतन्त्रता से लगाई जाती है। बिना किसी विभेद के सभी आयातित वस्तुओं पर एक ही दर से कर लगा दिया जाता है। इसके अन्तर्गत कर की दर सूची एक ही होती है। इस प्रकार की प्रशुल्क सूचियाँ द्विपक्षीय लेन-देन तथा समझौतों में विशेष उपयोगी नहीं होती हैं। इस प्रकार की सीमा प्रशुल्क दरें लोचहीन होती हैं। लैटिन अमेरिका के देशों में इस प्रकार की प्रशुल्क दरें प्रचलित हैं।

(2) द्वि-स्तम्भी प्रशुल्क दरें- इसके अन्तर्गत कर की अधिकतम एवं न्यूनतम दरों की घोषणा कर दी जाती है। इसके अनुसार कुछ वस्तुओं पर दो दरें लगाई जाती हैं। कभी-कभी सरकार द्वारा एक प्रशुल्क सूची प्रारम्भ में घोषित कर दी जाती है तथा दूसरी व्यापारिक समझौतों के फलस्वरूप तय की जाती है।

(3) बहुस्तम्भी प्रशुल्क दरें- जब कर की दर सूची दो से अधिक होती है तो उसे बहु- स्तम्भी प्रशुल्क दरें कहते हैं। इसके अन्तर्गत तीन प्रकार की शुल्क दरें होती हैं। एक सामान्य शुल्क सूची (General Rate), दूसरी मध्यम शुल्क सूची (Intermediate Rate) तथा तीसरी पसंदगी शुल्क सूची (Preferential Rate)। सामान्य और मध्यम दरें निम्नतम तथा उच्चतम दरों की भांति ही होती हैं परन्तु पसंदगी शुल्क दरें दोनों के बीच की स्थिति में होती है। यह उपनिवेश के देशों पर लागू होती है। ब्रिटिश शासन काल में इस प्रकार की दरें काफी प्रचलित थीं।

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Pankaja Singh

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