अर्थशास्त्र

प्रशुल्क एवं कोटा में अंतर | अभ्यंश का अर्थ | अभ्यंश के उद्देश्य | अभ्यंश (कोटा) के प्रभाव | आंशिक साम्य दृष्टिकोण के अन्तर्गत प्रशुल्क प्रभावों की व्याख्या

प्रशुल्क एवं कोटा में अंतर | अभ्यंश का अर्थ | अभ्यंश के उद्देश्य | अभ्यंश (कोटा) के प्रभाव | आंशिक साम्य दृष्टिकोण के अन्तर्गत प्रशुल्क प्रभावों की व्याख्या | Difference between tariff and quota in Hindi | Meaning of Quota Objectives of Quota in Hindi | Effect of Quota in Hindi | Explanation of Tariff Effects under Partial Equilibrium Approach in Hindi

प्रशुल्क एवं कोटा में अंतर

(Differentiate between tariff and quota)

काफी हद तक समानता होते हुए भी प्रशुल्क और कोटा में कुछ महत्वपूर्ण अन्तर होते हैं-

(1) प्रशुल्क लगाने की दशा में सरकार केवल प्रशुल्क की दर निर्धारित करती है। व्यापार कहीं से कितना ही माल आयात करने के लिए स्वतन्त्र होता है। अतः प्रशुल्क को मूल्य बाजार तन्त्र से हस्तक्षेप नहीं समझा जाता। प्रशल्क देने के अतिरिक्त बाजार पर कोई प्रतिबन्ध नहीं होता है, जबकि अभ्यंश बाजार की कार्य प्रणाली पर प्रत्यक्ष रोक लगाता है। प्रो० ऐल्सवर्क इसे ‘पूर्ण निषेध की ओर आधी मंजिल’ कहते हैं।

(2) प्रशुल्क के अन्तर्गत सरकार किसी देश या किसी व्यक्ति के साथ भेदभाव नहीं करती।  न किसी से द्वेष करती है न किसी को विशेष रियायत देती है किन्तु अभ्यंश प्रणाली के अन्दर देशों के बीच भेद किया जाता है और आयात अनुमति पत्र देकर विशेष व्यापारियों को लाभ पहुँचाया जाता है। अनुमति पत्र की नीलामी द्वारा यह दूसरे प्रकार का भेद समाप्त किया जाता है, जबकि विश्व अभ्यंश लागू करने पर पहले प्रकार का भेद नहीं होता।

(3) प्रशुल्क की अपेक्षा अभ्यंश का संरक्षण प्रभाव अधिक निश्चित होता है। यह ज्ञात किया जा सकता है कि आयात कितने कम होंगे और देशी माल उत्पादन कितना बढ़ाया जाये।

(4) प्रशुल्क प्रणाली में विदेशी प्रतिक्रिया द्वारा व्यापार शर्तों में सुधार होता है, जबकि कोटा के अन्तर्गत विदेशों को मूल्य कम करके निर्यात को पूर्ववत् रखने का अवसर नहीं मिलता। फलस्वरूप अभ्यंश के अन्तर्गत उपभोक्ता को अधिक मूल्य देना पड़ता है।

(5) प्रशुल्क प्रणाली के अन्तर्गत कुशल उत्पादन वाले देशों से निर्यात होता है, जबकि अकुशल उत्पादक बाजार से हट जाते हैं। अभ्यंश प्रणाली के अन्तर्गत महँगे देशों से भी आयात हो सकता है यदि राजनैतिक कारणों अथवा भुगतान की सुविधा के कारण अभ्यंश उन देशों के पक्ष में दिये जायें।

(6) प्रशुल्क की दर का निर्धारण देश की संसद करती है अतएव इसमें बार-बार परिवर्तन करना सम्भव नहीं होता। अभ्यंश का निर्धारण विदेशी व्यापार निदेशालय द्वारा किया जाता है, अतएव आवश्यकतानुसार अनुमति पत्र दिये जा सकते हैं।

(7) देशों के बीच भेदभाव तथा बाजार मूल्य प्रणाली के साथ हस्तक्षेप के कारण अभ्यंश अधिक बदनाम है। गैट का सन्धि-पत्र सदस्य राष्ट्रों द्वारा अभ्यंश के प्रयोग को प्रतिबन्धित करता है किन्तु प्रशल्क लगाने की स्वतन्त्रता देता है।

अभ्यंश

(Quota)

अभ्यंश का अर्थ है-

आयातों के कुल मूल्य अथवा मात्रा पर सीधा नियन्त्रण इस विधि के अन्तर्गत देश यह निश्चय करता है कि किसी वस्तु की कितनी मात्रा का आयात एक निश्चित अवधि (प्रायः एक वर्ष) में किया जायेगा। इसे प्रत्यक्ष अभ्यंश कहते हैं। कभी-कभी मात्रा निर्धारण करने के बदले आयात का कुछ मूल्य सीमित कर दिया जाता है, इसे अप्रत्यक्ष अभ्यंश कहते हैं। यदि मूल्य अथवा मात्रा सम्पूर्ण विश्व के लिए निर्धारित की जाती है तब यह मात्रा अभ्यंश कहलाता है। जब यह मात्रा पृथक् देशों के लिए अलग-अलग निर्धारित की जाती है, इसे देशवार अभ्यंश कहते हैं।

कोई देश बिना दूसरे देशों के परामर्श एवं समझौता किये केवल अपनी ओर से आयात कोटा निर्धारित करता है तब यह एकपक्षीय कोटा कहलाता है। यदि सम्बन्धित देश से समझौता करके कोटा निर्धारित किया जाता है तब वह द्विपक्षीय कोटा कहलाता है।

अभ्यंश के उद्देश्य

(Aims of quota)

जब कभी किसी देश का भुगतान शेष प्रतिकूल हो जाता है और किसी प्रतिकूलता को अन्य कारणों से समाप्त किया जा सके तब आयात कोटे की प्रणाली का सहारा लिया जाता है। इसका प्रयोग आयात की जाने वाली वस्तु से प्रतियोगिता करने वाले घरेलू उद्योगों को संरक्षण देने के लिए भी किया जाता है। देश में आयातों के अन्तर्गमन को सीमित करके आन्तरिक मूल्य स्थिर करने  हेतु भी इसका प्रयोग किया जाता है। देश की सौदेबाजी की शक्ति को बढ़ाने के उद्देश्य से भी आयात कोटे का प्रयोग किया जाता है।

अभ्यंश (कोटा) के प्रभाव

(Effects of quota)

अभ्यंश के आर्थिक प्रभाव प्रशुल्क के समान ही होते हैं, केवल इस अन्तर के साथ कि प्रशुल्क लगाने पर पहले आयात वस्तु के मूल्य पर प्रभाव पड़ता है, शेष प्रभाव अनुकरण करते हैं, जबकि कोटा निर्धारित होने पर पहले आयात की मात्रा घटती है, शेष प्रभाव अनुकरण करते हैं। (प्रभावों की विस्तृत व्याख्या प्रशुल्क के सन्दर्भ में की जा चुकी है।) दूसरा अन्तर यह होता है। कि प्रशुल्क लगाने पर उपभोक्ताओं को हुई हानि का एक भाग राज्य को राजस्व के रूप में प्राप्त हो जाता है जबकि कोटा में यह आय उन व्यापारियों को प्राप्त होती है, जिन्हें आयात करने का अनुमति पत्र’ मिलता है। अमेरिका में, सरकार अनुमति पत्र नीलाम करके इस आय के एक अंश को हस्तगत कर लेती है।

यदि किसी वस्तु की घरेलू माँग एवं पूर्ति बेलोचदार न हो तो प्रशुल्क और अभ्यंश में कोई विशेष अन्तर नहीं होता क्योंकि आयात कोटे की मात्रा के दिये होने पर आयात प्रशुल्क की प्रभावशाली दर से कोटे की मात्रा के बराबर ही वस्तु के कुल आयातों में कमी होती है। यदि आयात  कोटे की मात्रा, दिये हुए आयात शुल्क लगाने के पश्चात् आयातों की मात्रा के बराबर निश्चित की जाती है तो उपभोग तथा पुनर्वितरण प्रभाव दोनों ही स्थितियों में समान होंगे। इसे अग्रांकित चित्र द्वारा आसानी से समझा जा सकता है-

चित्र में DD एवं SS क्रमशः घरेलू मांग एवं पूर्ति वक्र हैं। OP कीमत पर विदेशी वस्तु की पूर्ति पूर्णतया लोचदार है। इस स्थिति में घरेलू माँग OQ4 है तथा पूर्ति केवल OQ1 है। इस प्रकार इस कीमत पर घरेलू माँग पूर्ति से अधिक है। अप्रतिबन्धित व्यापार की स्थिति में अतिरिक्त माँग QQ1 की पूर्ति विदेश से आयात करने पर सम्भव होगी। मान लीजिये सरकार Q2Q3 कोटा निश्चित कर देती है तो वस्तु की इस मात्रा का आयात कोटा की अनुपस्थिति में तब किया जायेगा जबकि सरकार ने आयात कोटा निश्चित करने के लिए PP2 के बराबर प्रशुल्क लगाया हो। इस स्थिति में कोटा एवं प्रशुल्क में कोई अन्तर नहीं है, क्योंकि दोनों स्थितियों में संरक्षण प्रभाव Q1 Q2 CA तथा उपभोग प्रभाव Q3Q4 BH तथा पुनर्वितरण प्रभाव PACP1 के बराबर है, किन्तु जहाँ आय प्रभाव का सम्बन्ध है, दोनों प्रणालियों में अन्तर है। जब सरकार PP1 आयात प्रशुल्क लगाती है।

तो आयातकर्ता देश को CDEF क्षेत्र के बराबर आय प्राप्त होती है। दूसरी तरफ यदि सरकार Q2Q3 के बराबर आयात कोटा निश्चित करती है तो वस्तु की कीमत बढ़कर OP2 हो जाती है। किन्तु सवाल उठता है कि इस मूल्य वृद्धि का लाभ किसे मिलेगा? इस सम्बन्ध में तीन सम्भावनाएं हैं। प्रथम, सरकार आयात लाइसेन्सों को नीलाम करके अतिरेक लाभ ले ले, ऐसी स्थिति में कोटा एवं प्रशुल्क में भिन्नता नहीं होगी, किन्तु वर्तमान में ऐसा सम्भव नहीं है। द्वितीय, विदेशी निर्यातकर्ता संगठित हो तथा आयातकर्ता असंगठित हो तो अतिरेक लाभ निर्यातकर्ताओं को प्राप्त होगा। तृतीय, यदि आयातकर्ताओं को एकाधिकारिक शक्ति प्राप्त हो जायें। इस स्थिति में व्यापार शर्त अनिर्धारित होगी।

व्यापार शर्तों पर प्रभाव

सामान्यतया परम्परागत आयातकर्ता अधिक संगठित होते हैं अतः नवीन व्यापार शर्त उनके पक्ष में अधिक होती है। किन्तु यह परिस्थिति पर निर्भर करती है जैसा कि निम्न चित्र में स्पष्ट किया गया है। माना A तथा B दो देश हैं जिनके प्रस्ताव वक्र क्रमशः OA तथा OB हैं। माना A कपड़े का आयात करता है तथा B चावल का आयात करता है। साम्यावस्था में व्यापार शर्त चित्र के द्वारा प्रदर्शित की गयी है। माना OP1 तथा OP2 दो नवीन व्यापार शर्त रेखाएँ हैं। यदि देश A कपड़े का OC1 मात्रा का आयात करता है तो कपड़े एवं गेहूँ की व्यापार शर्त OP1 तथा OP2 रेखा के ढाल पर होगी। यदि निर्यातकर्ता देश B के व्यापार में एकाधिकारात्मक शक्ति है तो व्यापार उसके पक्ष में होगा अर्थात् नवीन व्यापार शर्त OP2 होगी। इसके विपरीत निर्यातकर्ता देश A के व्यापार में एकाधिकारात्मक शक्ति है तो व्यापार उसके पक्ष में होगा अर्थात् नवीन व्यापार शर्त OP1 होगी। अतः व्यापार शर्त अनिर्धारणीय होती है।

मूल्य प्रभाव

(Effects of Value)

आयात कोटा आयातित वस्तुओं की भौतिक मात्रा को सीमित करके उन वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि करता है जिन पर कोटा प्रतिबन्ध लगाया जाता है। आयात प्रशुल्क लगाने पर ऐसा ही होता है। परन्तु दोनों में एक प्रमुख भिन्नता है। प्रशुल्क लगाने से आयात वस्तुओं के घरेलू मूल्य में वृद्धि की सीमा को आयात कर में से विदेश में आयात वस्तुओं के मूल्यों के ह्रास की घटाकर ज्ञात किया जा सकता है परन्तु आयात कोटा निश्चित करने के फलस्वरूप मूल्यों में किसी सीमा तक वृद्धि हो सकती है, क्योंकि यह आयात की भौतिक मात्रा की निरपेक्ष सीमा को निर्धारित करता है तथा विदेश में आयात मूल्यों के ह्रास में कोई समायोजन नहीं होता है। परिणामस्वरूप माँग तथा पूर्ति की शक्तियों द्वारा ही मूल्य का निर्धारण होता है।

भुगतान सन्तुलन प्रभाव

(Effect of Balance payment)

वर्तमान काल में सरकार द्वारा आयात कोटे लगाने का मूल उद्देश्य भुगतान शेष के प्रतिकूल प्रभाव को ठीक करना ही होता है। यदि देश के आयात उसके निर्यातों से अधिक हों तो समस्त आयातों पर आयात कोटा लगाया जा सकता है। आयात कोटा लगाने से सीमान्त आयात प्रवृत्ति शून्य हो जाती है इससे विदेश को राष्ट्रीय आय का क्षरण बन्द हो जाता है तथा देश की राष्ट्रीय आय में वृद्धि हो जाती है और परिणामस्वरूप भुगतान शेष में घाटा कम हो जाता है। प्रायः यह  तर्क दिया जाता है कि भुगतान शेष के घाटे का प्रभावशील प्रणाली विस्फीति या अवमूल्यन है। किन्तु इन दोनों की अपेक्षा प्रशासनिक दृष्टिकोण से आयात कोटा श्रेष्ठ होता है। इसके अतिरिक्त कोटा इन दोनों प्रणालियों से कम हानिकारक होता है।

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Pankaja Singh

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