अर्थशास्त्र

प्रकृतिवादी सिद्धान्तों का केन्द्र बिन्दु भूमि | विशुद्ध उत्पत्ति का विचार | विशुद्ध उत्पत्ति से आशय | विशुद्ध उत्पत्ति का स्रोत केवल भूमि | उद्योग एवं वाणिज्य अनुत्पादक हैं | विशुद्ध उत्पत्ति का आलोचनात्मक मूल्यांकन | विशुद्ध उत्पत्ति सम्बन्धी धारणा का महत्व

प्रकृतिवादी सिद्धान्तों का केन्द्र बिन्दु भूमि | विशुद्ध उत्पत्ति का विचार | विशुद्ध उत्पत्ति से आशय | विशुद्ध उत्पत्ति का स्रोत केवल भूमि | उद्योग एवं वाणिज्य अनुत्पादक हैं | विशुद्ध उत्पत्ति का आलोचनात्मक मूल्यांकन | विशुद्ध उत्पत्ति सम्बन्धी धारणा का महत्व

प्रकृतिवादी सिद्धान्तों का केन्द्र बिन्दु भूमि या विशुद्ध उत्पत्ति का विचार

(Land or Net Product as Pivot of Physiocratic Doctrines

निर्बाधाचादियों का एक महत्वपूर्ण आर्थिक विचार विशुद्ध उत्पत्ति’ है, जो कि भूमि से प्रात होती है और इसलिए भूमि को भी निर्बाधावादी सिद्धान्तों के एक केन्द्र-बिन्दु के रूप में महत्वपूर्ण स्थान मिला। इस सम्बन्ध में जीड एवं रिस्ट (Gide and Rist) ने लिखा है, “प्रत्येक सामाजिक तथ्य को निर्वाधावादियों को प्राकृतिक व्यवस्था में स्थान प्राप्त था। ऐसे व्यापक सामान्य दर्शन के कारण उनको अर्थशास्त्र को अपेक्षा समाजशास्त्र का संस्थापक कहलाने का अधिकार मिल सकता था। किन्तु एक विशुद्ध आर्थिक तत्व भी इसमें सम्मिलित था, जिसने बहुत आरम्भ से हो उनका ध्यान आकर्षित किया था और उनको कल्पनाओं को इतना वशीभूत कर लिया कि वे एक भ्रमपूर्ण खोज में लग गये। इस खोज के द्वारा उन्होंने एक उत्पत्ति साधन के रूप में भूमि को सर्वप्रमुख स्थान दिया। यह सम्पूर्ण निर्बाधावादी प्रणाली में सबसे भ्रमपूर्ण, किन्तु साथ हो सबसे विशिष्ट सिद्धान्त है।”

विशुद्ध उत्पत्ति से आशय

भूमि को दिये गये महत्व को समझने से पूर्व यह जानना आवश्यक है कि ‘विशुद्ध उत्पत्ति’ क्या है? निर्वाधावादियों के मतानुसार प्रत्येक नाई सम्पत्ति का उत्पादन करने में कुछ मौजूदा सम्पत्ति खर्च होती है. आत: नाबान उत्पादन को मात्रामसे इसके लागत-खर्च को घटाने पर जो कुछ शेष रहता है वही सम्पत्ति की वृद्धि अथवा विशुद्ध उत्पत्ति है।

उल्लेखनीय है कि निर्बाधावादियों ने अपनी विशुद्ध उत्पत्ति सम्बन्धी धारणा में ‘उपयोगिता’ तत्त्व को महत्व नहीं दिया था, क्योंकि उनके मतानुसार किसी वस्तु की उपयोगिता बढ़ जाने से विशुद्ध उत्पत्ति का सृजन नहीं होता। विशुद्ध सम्पत्ति का सृजन वस्तुओं का परिणाम बढ़ने पर ही सम्भव है।

जीड एवं रिस्ट ने निर्बाधावादियों के विशुद्ध उत्पत्ति सम्बन्धी विचार को निम्न शब्दों में व्यक्त किया है, “हर एक उत्पादन कार्य में अनिवार्य रूप से कुछ न कुछ व्यय या हानि निहित होती है। अन्य शब्दों में, नई सम्पत्ति के उत्पादन में सम्पत्ति की कुछ मात्रा नष्ट हो जाती है और यह मात्रा नई उत्पादित सम्पत्ति में से घटाई जानी चाहिए। यह अन्तर, जो कि एक के ऊपर दूसरे के आधिक्य का माप है, सम्पत्ति की वृद्धि को प्रगट करता है और निर्बाधावादियों के समय से विशुद्ध उत्पत्ति के नाम से जाना गया है।”

विशुद्ध उत्पत्ति का स्रोत केवल भूमि

निर्बाधावादियों का मत था कि विशुद्ध उत्पत्ति केवल उन्हीं क्षेत्रों से प्राप्त होती है, जिनमें मनुष्य और प्रकृति मिलकर काम करते हैं। मनुष्य न तो किसी पदार्थ का सृजन कर सकता है और न उसका नाश ही कर सकता है। यह कार्य केवल प्रकृति ही कर सकती है। कृषि में, जो कि भूमि पर प्रकृति के सहयोग से की जाती है, सम्पत्ति का निर्माण हो सकता है। अन्य शब्दों में, निर्बाधावादियों के अनुसार, केवल कृषि ही विशुद्ध उत्पादन का एकमात्र क्षेत्र है, क्योंकि केवल कृषि में ही, प्रकृति की उदारता व सहयोग के कारण कुल नई सम्पत्ति लगायी गयी सम्पत्ति की अपेक्षा अधिक होती है।

प्रो० हैने ने लिखा है कि “निर्बाधावादियों के विशुद्ध उत्पादन सम्बन्धी विचार के दो तत्व हैं-प्रथम तो यह है कि अन्य उत्पादन क्षेत्रों की अपेक्षा भूमि का उत्पादन क्षेत्र भिन्न प्रकार का होता है, और दूसरे यह कि भूमि का उत्पादन ‘लाभ’ को सम्मिलित करते हुए लागत व्यय से अधिक होता है। इस तरह निर्बाधावादियों के मतानुसार, भूमि ही विशुद्ध उत्पत्ति का एकमात्र क्षेत्र है।”

ली ट्रोजन (Le Trosne) के शब्दों में, “यह सत्य है कि भूमि ही समस्त वस्तुओं की उत्पत्ति का एकमात्र साधन है, इतना स्पष्ट है कि इसमें से कोई भी इस पर संदेह नहीं कर सकता।”

रॉबर्ट तरगो (Robert Turgot) के अनुसार, “भूमि का उत्पादन दो भागों में विभाजित किया जा सकता है। जो कुछ ऊपर रहता है वह स्वतन्त्र और प्रयोज्य है। यह कृषक को उसके लागत व्यय और श्रम के पारितोषिक के अतिरिक्त दिया गया विशुद्ध उपहार है।”

उद्योग एवं वाणिज्य अनुत्पादक हैं

निर्वाधावादियों ने भूमि के अतिरिक्त परिवहन, वाणिज्य, व्यापर, उद्योग आदि को अनुत्पादक ठहराया है। ली ट्रोजन ने लिखा है, “भूमि के अतिरिक्त अन्य कहीं भी लगा श्रम पूर्णतया अनुत्पादक है, क्योंकि मनुष्य सृजनकर्ता नहीं है।”

डा० केनें के अनुसार, “यह कृषि ही है जो उद्योग और वाणिज्य को आवश्यक सामग्री देती है और जो दोनों की अदायगी करती है किन्तु ये दोनों अपना लाभ कृषि को लौटा देते हैं, जो फिर सम्पत्ति का जिसे प्रतिवर्ष खर्च और उपभोग किया जाता है, नवीनीकरण करती रहती है।” इस प्रकार डा० केने ने उद्योग और वाणिज्य को कृषि के अधीन ठहराया है। उसके मतानुसार उद्योग और वाणिज्य कृषि की ही शाखायें हैं।

बोदों के मतानुसार, “कला माल शिल्पकार द्वारा सुन्दर और उपयोगी वस्तुओं में परिणित किया जाता है किन्तु इससे पूर्व कि वह काम शुरू कर सके यह आवश्यक होता है कि अन्य लोग उसे कच्चा माल तथा अन्य जरूरी चीजें प्रदान करें। जब उसका योगदान पूर्ण हो जाये, तब दूसरों को उसको पुनः क्षतिपूर्ति करनी पड़ती है तथा उसकी कठिनाई के लिए भुगतान करना पड़ता है। दूसरी ओर, कृषक अपना कच्चा माल स्वयं उत्पन्न करते हैं चाहे प्रयोग के लिए हो अथवा उपभोग के लिए। वहीं दूसरों के उपभोग आने वाली चीजें भी उत्पन्न करते हैं । उत्पादक और अनुत्पादक वर्गों के बीच यही अन्तर है।”

रिवेरी (Rivierie) का कहना था कि “उद्योग तो मूल्य का अध्यारोपण मात्र करते हैं, किन्तु ऐसी चीज उत्पन्न नहीं करते जो कि पहले से विद्यमान नहीं रही।”

निर्बाधावादियों ने व्यवसायों का जो वर्गीकरण किया उसमें कृषि को सबसे अधिक महत्व दिया गया है क्योंकि यह जीवन का अनिवार्य स्रोत है। व्यापार, वाणिज्य, परिवहन व उद्योग को द्वितीय श्रेणी का माना गया है, क्योंकि इनसे सम्पत्ति का उत्पादन नहीं होता, केवल उस सम्पत्ति का जो कृषि ने उत्पन्न की है प्रतिस्थापन, हस्तान्तरण अथवा परिवर्तन मात्र होता है। दयूपों दि नेमोर्स (Dupont De Nemours) के शब्दों में, “यह आवश्यक प्रतीत होता है और साथ ही सरल एवं स्वाभाविक भी कि जो लोग दूसरों को पुरस्कार देते हैं और अपनी सम्पत्ति प्रत्यक्ष रूप में प्रकृति से प्राप्त करते हैं उनको उन लोगों से भिन्न रखा जाय जो कि दूसरों से पुरस्कार पाते हैं और इसलिए पाते हैं कि उन्होंने प्रथम वर्ग के प्रति उपयोगी सेवायें प्रदान की थीं।” तरगो ने कारीगरों और निर्माताओं की ‘कृषकों का भाड़े का सेवक’ (hirelings of agriculturist) कहा है, क्योंकि ये अपनी आय कृषकों से द्वितीयात्मक रूप में प्राप्त करते हैं।

किन्तु उक्त विवरण से यह भूल होगी कि निर्बाधावादी उद्योग और वाणिज्य को समाप्त करना चाहते थे। यथार्थ में निर्बाधावादी केवल यह कहना चाहते थे कि उद्योग और वाणिज्य की अपेक्षा कृषि को अधिक महत्व दिया जाय। बोदों (Boudean) के अनुसार, “अनुपयोगी होना तो दूर की बात, ये ऐसी कलायें हैं, जो जीवन की विलासितायें एवं अनिवार्यतायें (वस्तुयें) दोनों ही प्रदान करती हैं और इन पर मानव जाति अपनी समृद्धि एवं रक्षा के लिए निर्भर हैं। ये (उद्योग आदि) केवल इस अर्थ में अनुत्पादक हैं कि इनसे किसी अतिरिक्त सम्पत्ति (surplus) का सृजन नहीं होता।

विशुद्ध उत्पत्ति का आलोचनात्मक मूल्यांकन

(Critical Evaluation)

आधुनिक दृष्टिकोण से निर्बाधावादियों का विशुद्ध उत्पत्ति या भूमि सम्बन्धी विचार निरर्थक है। इसकी प्रमुख आलोचनायें निम्नांकित हैं (1)केवल कृषि को उत्पादक बताना- उन्होंने कृषि को ‘उत्पादक’ बताया क्योंकि भूमि से नई (या विशुद्ध) सम्पत्ति (अर्थात भूमि पर लगायी गयी सम्पत्ति से अधिक मात्रा में सम्पत्ति) का सृजन होता है और उद्योग आदि को अनुत्पादक’ बताया, क्योंकि इनसे नई या विशुद्ध सम्पत्ति सृजित नहीं होती केवल लगायी गयी सम्पत्ति का प्रतिस्थापन या हस्तान्तरण मात्र होता है। इस विचार के पीछे निर्बाधावादियों का उत्पादन के सही अर्थ के विषय में अज्ञान और भ्रम छुपा है। वे नई वस्तु के सृजन को हो, न कि उपयोगिता वृद्धि को, उत्पादन समझते थे।

(2) नये पदार्थ का उत्पादन नहीं- यदि कुछ देर के लिए निर्बाधावादियों की उत्पादन सम्बन्धी धारणा को स्वीकार कर लिया जाय, तो प्रश्न उठता है कि कृषि में भी तो किसी नये पदार्थ का सृजन नहीं होता वहाँ अल्प मात्रा में बीजों द्वारा प्राप्त अनाज की अधिक मात्रा में भूमि से लिए गये खनिज एवं पौधे द्वारा वायु मण्डल से ग्रहण की गयी नाइट्रोजन सम्मिलित होती है। इस प्रकार खेती करना उसी प्रकार से रूप बदलने का कार्य है जिस प्रकार कि लकड़ी या लोहे से कोई चीज बनाना । जब खेती को उत्पादक कहा तो शिल्पकारी को अनुत्पादक कहना अनुचित है।

(3) समुद्र व खाने- यह स्पष्ट है कि निर्बाधावादी केवल कृषि को विशुद्ध उत्पादन का क्षेत्र मानते हैं अथवा खान और मछली व्यवसाय को भी ऐसा मानते हैं। इस सम्बन्ध में निर्बाधावादियों के संकोच का कारण यह है कि समुद्र व खानें उनके विचारानुसार नई सम्पत्ति तो प्रदान करती हैं, किन्तु समुद्र का खजाना निकालना या खानों से कच्चा माल निकालना भूमि के उपज प्राप्त करने के समान सरल नहीं है और इसलिए इनमें आधिक्य (surplus) नाममात्र ही होता है।

(4) उद्योगों के लिए ‘बाँझ’ शब्द का गलत प्रयोग- उद्योगों के लिए निर्बाधावादियों ने अनुत्पादक या ‘बाँझ’ शब्द का प्रयोग भी गलत किया। इस सम्बन्ध में जीड एवं रिस्ट ने लिखा है-“यदि यह सत्य हो कि औद्योगिक कारखानों में जितने धन का क्षय होता है उतना ही धन वे प्रदान करते हैं, तो भी यह बाँझ (sterile) शब्द के प्रयोग को सही प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त नहीं है, जब तक कि (जैसा कि एडम स्मिथ ने कहा था) हम यही उपमा न मान लें कि ऐसा प्रत्येक विवाह बाँझ है, जिससे दो बच्चों से अधिक पैदा न हों।”

(5) भूमि से विशुद्ध उत्पादन की प्राप्ति सदैव नहीं- निर्बाधावादियों का यह कथन कि भूमि से सदैव ही विशुद्ध उत्पादन प्राप्त होता है, सत्य नहीं है; क्योंकि यदि भूमि की उपज का मूल्य गिर जाये, तो स्थिति विपरीत भी हो सकती है, अर्थात् हानि उठानी पड़ सकती है। सच तो यह है कि इस तथ्य का ज्ञान निर्बाधावादियों को भी था। वह इस बात को जानते थे कि गल्ले सहित सब प्राकृतिक पदार्थों पर बाजार की दशा का प्रभाव पड़ता है। यदि मूल्य गिर जाये, तो विशुद्ध उत्पत्ति बिल्कुल समाप्त हो जायेगी और यदि बाजार मूल्य बढ़ जाये, तो विशुद्ध उत्पत्ति बढ़ जायेगी। किन्तु निर्बाधावादियों के मतानुसार, एक ‘अच्छा मूल्य’ (Bon Price) वह होता है, जिससे सदा ‘आधिक्य मिलता है और यह ‘अच्छा मूल्य’ प्राकृतिक व्यवस्था का स्वाभाविक फल है। यदि कभी अच्छा मूल्य’ कम होकर उत्पादन लागत के बराबर हो जाय, तो समझना चाहिए कि प्राकृतिक व्यवस्था नष्ट हो गई है।

सारांश में, निर्बाधावादियों की वास्तविक या विशुद्ध उत्पत्ति उत्पादित वस्तु की उत्पादन लागत पर इसके बाजार मूल्य का आधिक्य मात्र है और ऐसा आधिक्य न केवल कृषि में वरन् उद्योग में भी उपलब्ध है। कृषि में, वास्तविक उत्पत्ति को आधुनिक शब्दावली के अन्तर्गत ‘लगान’ (Rent) कहा जाता है। निर्बाधावादियों के अनुसार विशुद्ध उत्पत्ति या आधिक्य प्रकृति की उदारता के कारण प्राप्त होता है किन्तु रिकार्डो इसे प्रकृति की कंजूसी का फल मानते हैं । जबसे रिकार्डो ने लगान के स्वाभाव को स्पष्ट किया है तब से प्राइवेट सम्पत्ति के विरोधी भूमिपतियों का विरोध करने लगे है।

विशुद्ध उत्पत्ति सम्बन्धी धारणा का महत्व

(Importance of the Concept of Net Product)

दोषपूर्ण होते हुए भी निर्बाधावादियों के विशुद्ध उत्पत्ति सम्बन्धी विचार का व्यवहार में काफी प्रभाव पड़ा, जिसे संक्षेप में निम्न प्रकार बताया जा सकता है-

(1) वणिकवादी सिद्धान्तों के लिए एक खुली चुनौती- वणिकवादियों का विचार था कि सम्पत्ति को बढ़ाने का एकमात्र साधन विदेशी व्यापार के क्षेत्र में अनुकूल व्यापार सन्तुलन की नीति अपनाकर पड़ोसी देशों और उपनिवेशों का शोषण करना था किन्तु निर्बाधावादियों ने बताया कि धन के परिमाण में वृद्धि करने का कृषि ही एक सन्तोषजनक तरीका है। इस प्रकार, जिस कृषि को वणिकवाद के अन्तर्गत उपेक्षित कर दिया गया था उसे पुन: महत्व प्राप्त हुआ, जो आज तक बना हुआ है।

(2) तत्कालीन राजनीति के विकास में योगदान– निर्बाधावादियों के विशद्ध उत्पत्ति सम्बन्धी विचार से प्रभावित होकर, फ्रांस के एक मन्त्री सले (Sully) ने कहा था कि “भूमि और श्रम ही राष्ट्रीय सम्पत्ति के साधन हैं।”

(3) आर्थिक विश्लेषण के विकास में योगदान- विशुद्ध उत्पत्ति सम्बन्धी विचार के आधार पर चलकर अनेक परम्परावादी सिद्धान्त प्रतिपादित किये गये। एडम स्मिथ, मार्क्स, रोडबर्ट्स आदि के विचार इससे बहुत प्रभावित हुए थे।

(4) कृषि एवं उद्योग में किया गया भेद भी महत्वपूर्ण- इस सम्बन्ध में जीड एवं रिस्ट ने लिखा है-“यद्यपि कृषि और उद्योग के मध्य निर्बाधावादियों ने जिस तरह भेद किया वह अधिकांशत: काल्पनिक है, तथापि यह सत्य है कि कृषि में कुछ खास विशेषतायें हैं……… कुछ दशाओं में कृषि तुच्छ दिखाई पड़ती है क्योंकि इसके प्रतिफल समय और स्थान की दशाओं से प्रभावित होते हैं, लेकिन यह बहुत उत्तम है, क्योंकि केवल कृषि ही जीवन की आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन कर सकती है।”

प्रश्न यह उठता है कि निर्बाधावादियों ने कृषि को इतना अधिक महत्व क्यों दिया? इसके कई कारण थे, यथा-(i) वह समझते थे कि भूमि से हमें जो कुछ मिलता है वह ईश्वर देता है जबकि उद्योगों से जो कुछ मिलता है वह मनुष्य देता है, जो कोई चीज उत्पन्न करने की ताकत नहीं रखता। (ii) उस समय फ्रांस के सम्पन्न लोग और पादरी उस लगान के सहारे रहते थे जो कि खेत से प्राप्त होता था। यदि खेतों से इतनी उपज न मिले जो किसानों की आवश्यकता से अधिक हो, तो उनका विलासी जीवन कैसे निभता। (iii) निर्बाधावादियों का नेता केने स्वयं एक भूस्वामी था।

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Pankaja Singh

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