शिक्षाशास्त्र

प्राचीन काल में प्रचलित गुरुकुल प्रणाली | वैदिक कालीन मुख्य शिक्षा केन्द्र

प्राचीन काल में प्रचलित गुरुकुल प्रणाली | वैदिक कालीन मुख्य शिक्षा केन्द्र

प्राचीन काल में प्रचलित गुरुकुल प्रणाली (Gurukul System of Education in Ancient India)

वैदिक काल में प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था परिवारों और उच्च शिक्षा की व्यवस्था मुख्य रूप से गुरुकुलों में होती थी। यहाँ वैदिक कालीन गुरुकुलों का वर्णन संक्षेप में प्रस्तुत है-

(1) गुरुकुलों की स्थिति और स्वरूप-

प्रारम्भिक वैदिक काल में गुरुकुल जन कोलाहल से दूर प्रकृति की सुरम्य गोद में किसी नदी अथवा झरने के किनारे स्थित होते थे, परन्तु उत्तर वैदिक काल में ये बड़े-बड़े गाँवों और तीर्थ स्थानों के निकट स्थापित होने लगे। उस काल में गुरुकुल आवासीय होते थे, इनके अपने नियम और अपनी कार्य पद्धति होती थी।

वैदिक काल में अनेक प्रकार के गुरुकुल होने का उल्लेख मिलता है। जिन गुरुकुलों में केवल भाषा और साहित्य की उच्च शिक्षा दी जाती थी उन्हें टोल कहते थे, जिनमें भाषा, साहित्य, धर्म, दर्शन और नीतिशास्त्र का विशेष ज्ञान कराया जाता था उन्हें घटिका कहते थे, जिनमें किसी वेद के किसी अंग विशेष का विशिष्ट ज्ञान कराया जाता था उन्हें चरण कहते थे और जिनमें चारों शास्त्रों (दर्शन, पुराण, व्याकरण और राजनियमों) की शिक्षा दी जाती थी उन्हें चतुत्पथी कहते थे ।

(2) गुरुकुलों में छात्रों का प्रवेश और उपनयन संस्कार

वैदिक काल में गुरुकुलों में भिन्न-भिन्न वर्ण के बच्चों का प्रवेश भिन्न-भिन्न आयु पर होता था ब्राह्मण वर्ण के बच्चों का 8 वर्ष की आयु पर, क्षत्रिय वर्ण के बच्चों का 10 वर्ष की आयु पर और वैश्य वर्ण के बच्चों का 12 वर्ष की आयु पर । प्रवेश के समय सभी बच्चों का उपनयन संस्कार होता था। उपनयन का अर्थ है समीप लाना अर्थात् बच्चे को गुरु के सम्मुख उपस्थित करना। सर्वप्रथम बच्चे को घर के वस्त्र उतारकर ब्रह्मचारी के वस्त्र पहनाए जाते थे, उसे मेखला धारण कराई जाती थी, उसके हाथ में समिधा दी जाती थी और गुरु के सम्मुख उपस्थित किया जाता था। गुरु बच्चे से प्रश्न करता था-‘कस्य ब्रह्मचारी असि’ अर्थात् तुम किसके शिष्य हो । बच्चा उत्तर देता था—’भवतः अर्थात् आपका। इसके बाद बच्चे को यज्ञवेदी के सामने आसन पर बैठाया जाता था, वेद मन्त्रों से देव आराधना की जाती थी और बच्चे को यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण कराया जाता था। इसके उपरान्त बच्चा गुरुकुल के नियमों और ब्रह्मचर्य व्रत के पालन का वचन देता था और गुरु उसे गुरुकुल के शिष्य के रूप में स्वीकार करता था और उसके आवास, भोजन एवं वस्त्रादि की व्यवस्था करने और उसका सर्वांगीण विकास करने का उत्तरदायित्व स्वीकार करता था।

(3) गुरुकुलों की दिनचर्या एवं शिक्षण कार्य-

वैदिक काल में गुरुकुलों की दिनचर्या बड़ी नियमित एवं कठोर होती थी। गुरु और शिष्य दोनों प्रायः ब्रह्ममुहूर्त में उठते थे, शिष्य नित्यकर्म (शौच, दातुन, स्नान) से निवृत्त हो कार्य विभाजन के अनुसार गुरु के स्नानादि एवं पूजा-पाठ की व्यवस्था करते थे, गुरुगृह और गुरुकुल की व्यवस्था करते थे, भिक्षा के लिए जाते थे, जंगल से लकड़ी लाते थे, जल स्रोतों से जल लाते थे और अन्य कार्य करते थे। इसके बाद शिक्षण कार्य चलता था जो मध्यान्ह तक होता था।

वैदिक काल में गुरुकुलों में आज की भाँति शिक्षण कक्ष उपलब्ध नहीं थे। शिक्षण कार्य खुले मैदानों में पेड़ों की छाया में होता था। मध्याह्न भोजन के बाद गुरु-शिष्य दोनों विश्राम करते थे। विश्राम के बाद पुनः शिक्षण कार्य होता था। इसके बाद शिष्य पुनः भोजन की तैयारी और दूध दोहन आदि कार्यों में लग जाते थे। सूरज डूबने से पहले संध्या भोजन होता था। रात्रि में शिष्य बारी-बारी से गुरुओं के पैर दबाते थे और उनके सोने के बाद स्वयं सोते थे।

(4) ऋषिआश्रम

वैदिक काल में आध्यात्मिक ज्ञान के विशेषज्ञों को ऋषि कहा जाता था। ये प्रायः निर्जन स्थानों में कुटिया बनाकर रहते थे। इनके इन आवास स्थानों को ऋषिआश्रम कहा जाता था। कुछ ऋषिआश्रमों में तो गुरुकुलों की भाँति उच्च शिक्षा की व्यवस्था होती थी, कुछ में दर्शन के गूढ तत्वों का ज्ञान कराया जाता था और ऐसे ऋषिआश्रम थे जिनमें केवल उच्च आध्यात्मिक ज्ञान ही दिया जाता था। कुछ ऋषियों के पास तो उच्च कोटि के विद्वान् भी अपनी शंकाओं का समाधान प्राप्त करने जाते थे।

(5) सम्मेलन-

वैदिक काल में कुछ राजाओं द्वारा देश के मूर्धन्य विद्वानों के सम्मेलन भी बुलाए जाते थे। इन सम्मेलनों में प्रायः धार्मिक विषयों पर शास्त्रार्थ होता था, शंका-समाधान होता था। उच्च शिक्षा के केन्द्र गुरुकुलों के गुरु और शिष्य इन सम्मेलनों में उपस्थित होते थे। इन सम्मेलनों में उनका ज्ञानवर्द्धन होता था, उनकी शंकाओं का समाधान होता था। इस अर्थ में ये भी उच्च शिक्षा के अभिकरण माने जाते हैं।

(6) परिषद-

वैदिक काल में कुछ स्थानों पर विद्वानों की स्थानीय परिषदों का गठन भी किया जाता था। प्रत्येक परिषद में प्राय: दस सदस्य होते थे। इनमें चार सदस्य एक-एक वेद के ज्ञाता, तीन सदस्य एक-ए शास्त्र के ज्ञाता, एक ब्रह्मचारी, एक गृहस्थ और एक वाणप्रस्थी होता था। इन परिषदों की बैठक निश्चित समय पर होती थी। इन बैठकों में सामाजिक, राजनैतिक और धार्मिक समस्याओं पर विचार होता था और उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों की समस्याओं का समाधान होता था। उच्च शिक्षा के छात्र इन परिषदों में अपनी समस्याओं का समाधान प्राप्त करते थे। डॉ. राधाकृष्ण मुखर्जी के अनुसार वैदिक काल में उच्च शिक्षा के प्रचार एवं प्रसार कार्य में इन परिषदों का बड़ा योगदान रहा था।

(7) परिब्राजाचार्य-

वैदिक काल में कुछ आचार्य परिभ्रमण करते थे और एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर लोगों को सामान्यतः धर्म और नीति की शिक्षा देते थे। इन्हें परिबाजाचार्य (भ्रमण करने वाले आचार्य) कहते थे। ये अपने में उच्च शिक्षा की चलती-फिरती संस्था थे। ये सामान्य शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों को उच्च शिक्षा देते थे और उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों की शंकाओं का समाधान करते थे। इनके माध्यम से उच्च शिक्षा शिक्षार्थियों के द्वार पर पहुँचती थी।

(8) परीक्षाएँ एवं उपाधियाँ-

वैदिक काल में आज की तरह की परीक्षाएँ नहीं होती थीं। सर्वप्रथम तो गुरु ही मौखिक रूप से प्रश्न पूछकर यह निर्णय करते थे कि किसी शिष्य ने यथा ज्ञान प्राप्त कर लिया है अथवा नहीं। इसके बाद उन्हें विद्वानों की सभा में उपस्थित किया जाता था। ये विद्वान इन छात्रों से प्रश्न पूछते थे और सन्तुष्ट होने पर उन्हें सफल घोषित करते थे।

वैदिक काल में सफल छात्रों को कोई प्रमाणपत्र नहीं दिए जाते थे, उनकी योग्यता ही उनका प्रमाणपत्र होती थी। परन्तु जो छात्र गुरुकुलों का 12 वर्षीय सामान्य पाठ्यक्रम अथवा किसी एक वेद का अध्ययन पूरा कर लेते थे उन्हें स्नातक, जो 24 वर्षीय पाठ्यक्रम (किन्हीं दो वेदों का अध्ययन) पूरा कर लेते थे उन्हें वसु, जो 36 वर्षीय पाठ्यक्रम (किन्हीं तीन वेदों का अध्ययन) पूरा कर लेते थे उन्हें रूद्र और जो 48 वर्षीय पाठयक्रम (चारों वेदों का अध्ययन) पूरा कर लेते थे उन्हें आदित्य कहा जाता था।

(9) समावर्तन समारोह-

वैदिक काल में शिष्यों की गुरुकुलीय शिक्षा पूरी होने पर समावर्तन समारोह होता था। समावर्तन का शाब्दिक अर्थ है-घर लौटना । समावर्तन समारोह में सर्वप्रथम छात्रों को ब्रह्मचारी वस्त्र उतार कर गृहस्थ वस्त्र पहनाए जाते थे। इसके बाद गुरु उन्हें यज्ञ वेदी के सामने बैठाते थे। वेद मन्त्रों से देवताओं की आराधना होती थी। इसके बाद गुरु शिष्यों को उपदेश (दीक्षान्त भाषण) देते थे। वे उन्हें गृहस्थ जीवन के कर्त्तव्य पालन, समाज सेवा और के प्रति कर्त्तव्य पालन का उपदेश देते थे और अध्ययन में कभी प्रमाद (आलस्यो न करने का उपदेश देते थे। वे उन्हें पितृऋण, गुरुऋण और देवऋण से उऋण होने का उपदेश देते थे। तैत्तिरीय उपनिषद में इस प्रकार के दीक्षान्त भाषण का उल्लेख है। आज के अधिकतर भारती विश्वविद्यालयों में दीक्षान्त समारोहों में तैत्तिरीय उपनिषदीय दीक्षान्त उपदेश ही दिए जाते हैं। उस काल में दीक्षान्त उपदेश देने के बाद गुरु शिष्यों को गृहस्थ जीवन में प्रवेश की आज्ञा प्रदान करते थे और उन्हें आशीर्वाद देकर गुरुकुल से घर के लिए विदा करते थे।

वैदिक कालीन मुख्य शिक्षा केन्द्र (Main Education Centre of Vedic Period)

वैदिक काल में तीर्थ स्थान धर्म प्रचार के केन्द्र होने के साथ-साथ उच्च शिक्षा के केन्द्रों के रूप में विकसित हुए। बड़े-बड़े नगरों में तक्षशिला, पाटलिपुत्र, मिथिला, धार, कन्नौज, केकय, कल्याणी, तन्जौर और मालखण्ड और तीर्थ स्थानों में प्रयाग, काशी, अयोध्या, उज्जैनी, नासिक, कर्नाटक और काँची उस समय के मुख्य शिक्षा केन्द्र थे। यहाँ इनमें से मुख्य शिक्षा केन्द्रों का वर्णन संक्षेप में प्रस्तुत है-

(1) काशी-

भारत के पूर्वी भाग में स्थित काशी (वाराणसी) भी प्रारम्भ से ही ऋषियों की तपोभूमि और विद्वानों के बीच शास्त्रार्थ का मुख्य केन्द्र रहा है। यहाँ के गंगातटवर्ती क्षेत्रों में अनेक ऋषि आश्रम थे । ऐसा उल्लेख मिलता है कि काशी नरेश अजातशत्रु उपनिषदीय ज्ञान (ब्रह्म विद्या) के पंडित थे। उन्होंने अपने शासनकाल में यहाँ विद्वानों को आमन्त्रित किया था और आत्मा-परमात्मा और ब्रह्म के स्वरूप के विषय में शास्त्रार्थ कराया था। तभी से यह विभिन्न मतों की शिक्षा और शास्त्रार्थ के केन्द्र के रूप में विकसित हुआ।

(2) तक्षशिला-

तक्षशिला उस काल में उत्तरी भारत के तत्कालीन गांधार राज्य की राजधानी था। ऐसा उल्लेख मिलता है कि इस नगर को तत्कालीन गांधार नरेश भरत ने अपने पुत्र तक्ष के नाम से बसाया था। आगे चलकर उसने इसे अपने राज्य की राजधानी बनाया और साथ ही यहाँ देश के विभिन्न भागों से विद्वानों को बुलाकर बसाया। इस प्रकार यह नगर उस समय राज्य की राजधानी के साथ-साथ एक शिक्षा नगर के रूप में विकसित हुआ। ऐसा उल्लेख मिलता है कि यहाँ संस्कृत भाषा और साहित्य, व्याकरण, चारों वेदों और धर्म तथा दर्शन के प्रकाण्ड विद्वान निवास करते थे। कोई संस्कृत भाषा, साहित्य और व्याकरण की शिक्षा के लिए प्रसिद्ध थे, कोई किसी वेद की शिक्षा के लिए प्रसिद्ध थे और कोई धर्म एवं दर्शन की शिक्षा के लिए प्रसिद्ध थे। ऐसा भी उल्लेख मिलता है कि कुछ विद्वान आयुर्विज्ञान के विशेषज्ञ थे। परिणामतः उस काल में तक्षशिला वैदिक साहित्य, धर्म, दर्शन और आयुर्विज्ञान की शिक्षा के मुख्य केन्द्र के रूप में विकसित हुआ । ई. पू. 7वीं शताब्दी तक यह वैदिक और ब्राह्मणीय शिक्षा का मुख्य केन्द्र रहा।

(3) प्रयाग-

भारत के पूर्वी भाग में स्थित प्रयाग (इलाहाबाद) प्रारम्भ से ही ऋषियों की तपोभूमि रहा है। वैदिक काल में इस क्षेत्र के गंगातटवर्ती क्षेत्रों में अनेक ऋषि आश्रम थे। ये आश्रम धर्म और दर्शन की शिक्षा के मुख्य केन्द्र थे । यहाँ बड़े-बड़े विद्वान भी अपनी शंकाओं का समाधान करने आया करते थे।

(4) केकय-

केकय मध्य भारत के तत्कालीन केकय राज्य की राजधानी था। उपनिषद काल में यह शिक्षा का मुख्य केन्द्र था। यहाँ संस्कृत भाषा, व्याकरण, साहित्य, वेद, धर्म और दर्शन की शिक्षा का उत्तम प्रबन्ध था। प्राचीन ग्रन्थों में ऐसा उल्लेख मिलता है कि केकय नरेश अश्वपति स्वयं बड़े विद्वान थे, वे विद्वानों का आदर करते थे। उन्होंने अपनी राजधानी में बड़े-बड़े विद्वानों को बसाया था। वे समय-समय पर राजधानी में विद्वत् सम्मेलन भी करते थे। यहाँ कला-कौशलों, व्यवसायों और सैनिक शिक्षा की भी उत्तम व्यवस्था थी।

(5) काँची–

काँची दक्षिण भारत का एक तीर्थ स्थान है। धार्मिक लोग इसे दक्षिण काशी कहते हैं। भारत के नक्शे में यह आज काँजीवरम है। उत्तर वैदिक काल में यहाँ वेदों के विद्वान पहुँच गए थे और उन्होंने वैदिक‌ धर्म और दर्शन की शिक्षा देना शुरू कर दिया था। पर ये ब्राह्मण थे, पुरोहित थे, कर्मकाण्डी थे इसलिए इन्होंने यहाँ कर्मकाण्ड प्रधान शिक्षा का ही विकास किया। तब से लेकर आज तक यह ब्राह्मणीय शिक्षा का मुख्य केन्द्र चला आ रहा है।

(6) मिथिला-

मिथिला मध्य भारत के तत्कालीन मिथिला राज्य की राजधानी था। यहाँ धर्म और दर्शन के विद्वानों के सम्मेलन होते थे परन्तु उपनिषद काल में तो यह वैदिक शिक्षा के मुख्य केन्द्र के रूप में विकसित हुआ। इस नगर में धर्म और दर्शन के प्रकाण्ड विद्वान निवास करते थे। दूर-दूर से लोग धर्म और दर्शन की शिक्षा प्राप्त करने यहाँ आते थे। ऐसा भी उल्लेख मिलता है कि इस नगर में प्रतिद्वन्दी राज्यों से भी लोग धर्म और दर्शन की शिक्षा प्राप्त करने आते थे और उन्हें बिना किसी भेद-भाव के यह शिक्षा दी जाती थी। उत्तर वैदिक काल में यहाँ कला-कौशल एवं सैनिक शिक्षा की व्यवस्था हुई।

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Pankaja Singh

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