इतिहास

प्राचीन भारत में राजतंत्र | प्राचीन भारत में राजत्व की विशेषतायें | प्राचीन भारतीय राजतन्त्रात्मक प्रणाली | राजतंत्र की उत्पत्ति | राजतंत्र प्रणाली

प्राचीन भारत में राजतंत्र | प्राचीन भारत में राजत्व की विशेषतायें | प्राचीन भारतीय राजतन्त्रात्मक प्रणाली | राजतंत्र की उत्पत्ति | राजतंत्र प्रणाली

प्राचीन भारत में राजतंत्र

भारत की प्राचीन शासन संस्थाओं ने अपने-अपने समय बिचारकों को प्रभावित किया। इसी कारण कौटिल्यीय अर्थशास्त्र, महाभारत, स्मृति ग्रन्थों आदि में विविध प्रकार के राजत्व तथा राजतन्त्र के सिद्धान्त प्रतिपादित हैं। जहाँ कतिपय विचारक को इन्द्र, मित्र, वरुण, यम आदि देवताओं के अंश लेकर निर्मित मानते हैं और यह प्रतिपादित करते हैं कि यदि राजा बालक हो तो भी उसे महती देवता’ समझना चाहिए। वहाँ ऐसे विचारक भी प्राचीन भारत में विद्यमान थे कि जो राजा के ‘ध्वज मात्र मानते थे। और यह कहने में भी संकोच नहीं करते थे कि यदि कुत्ते को अच्छे वस्त्र आभूषण पहनाकर राजकीय सवारी पर बैठा दिया जाय तो क्या उसकी कभी शोभा नहीं होगी। यह विविध प्रकार के राजनीतिक विचार उन परिस्थितियों के ही परिणाम थे, जिसमें कि ये विविध विचारक अपने मन्तव्यों का निरूपण कर रहे थे। कहने का तात्पर्य यह है कि राजस्व तथा राजतन्त्र ने प्राचीन भारतीय राजनैतिक विचारों को अत्यधिक प्रभावित किया। इसी संदर्भ में हम राजस्व तथा राजतन्त्र के विषय में विचार करेंगे।

राजतंत्र की उत्पत्ति-

राजत्व तथा राजतन्त्र की उत्पत्ति के विषय में ऐतरेय ब्राह्मण से स्पष्ट होता है कि किस प्रकार देवताओं तथा दानवों में युद्ध हुआ था तथा देवता अपने शत्रुओं के हाथों बड़ी बुरी तरह पीड़ित थे। अतः वे सब एकत्र हुये और उन्होंने निश्चय किया कि उनको युद्ध में नेतृत्व प्रदान करने के लिये तथा विजय प्राप्त करने के लिये एक राजा की आवश्यकता थी। अतः उन्होंने इन्द्र को अपने राजा के रूप में नियुक्त किया। ऐसा करने से परिस्थितियाँ शीघ्र ही उनके अनुकूल हो गयीं। इससे यह संकेत मिलता है कि प्राचीन में राजत्व मानवीय आवश्यकताओं और सैनिक भागों पर आश्रित माना गया था। राजा का प्रार्दुभाव सैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये हुआ था। इस समय में भी बौद्ध काल से पूर्व राजा जनसाधारण से राज यज्ञों की शक्ति को कहीं अधिक उच्च समझा जाता था। राजसूय यज्ञ के क्रम रहते थे और जिसके पूर्ण करने में एक वर्ष से अधिक का समय लगता था, राजा को दैवी शक्ति से सम्पन्न कर देते थे। उत्सवों की अवधि में राजा इन्द्र और देवता प्रजापति के तुल्य समझा जाता था, क्योंकि वह एक क्षत्रिय और यज्ञकर्ता होता था।

राजा शब्द की व्युत्पत्ति राजन शब्द से हुई। ऋग्वेद में राजा को अग्नि, वरुण, इन्द्र एवं यम से अतुलनीय बताया गया है और यजुर्वेद में उसे वैषणवान तथा अथर्ववेद में प्रजा का रंजन करने के कारण उसे राजा कहा गया है। महाभारत में भी एक स्थान पर उल्लेख आया है कि पृथु ने धर्म द्वारा प्रजा का मनोरंजन किया तो उसी समय से पृथ्वी पर राजा का आविर्भाव हुआ। इसी प्रकार अर्थशास्त्र में राजा को परमदेव और मनुस्मृति में उसे देवताओं से भी सर्वोच्च स्थान प्रदान किया है। विष्णु पुराण से पता चलता है कि राजा के अन्दर ब्रह्मा, विष्णु, महेश, इन्द्र, वायु सूर्य, पूषा, पृथ्वी एवं चन्द्र का वास होता है।

इसी प्रकार महाभारत, नारद स्मृति, शुक्रनीति, मत्स्य, मार्कण्डेय, अग्नि और वृहद्धर्म पुराणों में कहा गया है कि राजा अपने तेज से दुष्टों को गरम कर देता है। अतः वह अग्नि के समान है। वह अपने गुप्तचरों द्वारा सब कुछ देख लेता है अतः सूर्य के तुल्य है। वह अपराधियों को उचित दण्ड देता है अतः वह यम के समान है और योग्य व्यक्तियों को प्रचुर पुरुस्कार देता है अतः वह कुबेर के तुल्य है। परन्तु इन सभी ने राजा को स्वयं देवता नहीं माना है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि हिन्दू ग्रन्थकारों ने राजपद को दैवीय बताया है न कि किसी राज व्यक्ति को। राजपद को दैवी मानने से राजा की प्रतिष्ठा बढ़ने की सम्भावना थी। उसकी आज्ञाओं का पालन अच्छी तरह से हो सकता था। किन्तु राजा यदि अधर्मशील हो तो देवत्व के सहारे से वह अपने दुराचार का समर्थन नहीं कर सकता था। ऐसे राजा को धर्मशास्त्र ने राक्षस का अवतार माना है। योरोप में राजा के देवत्व का सिद्धान्त मुख्यतः निरंकुश राजसत्ता के समर्थन के लिये ही प्रतिपादित किया गया था। प्राचीन भारत में एक मात्र नारद ही ऐसा ग्रथंकार है जिन्होंने यह कहने का साहस किया कि दुष्ट राजा पर प्रहार करना भी पाप है क्योंकि उसमें देवता का अंश होता है। परन्तु किसी दूसरे ग्रन्थकार ने इस बात का समर्थन नहीं किया। यह उल्लेखनीय बात है कि प्राचीन भारत में केवल अच्छे और धार्मिक राजा ही देवतुल्य माने जाते थे, दुष्ट और दुराचारी राजा राक्षसावतार माने जाते थे। राजा के देवत्व के पूर्ण समर्थक मनु भी कहते हैं कि धर्म से विचलित होने पर राजा का नाश हो जाता है।

ऐतिहासिक पृष्टों में देखने पर यह पता चलता है कि वैदिक युग में राजा साक्षात् अवतार नहीं माना जाता था। अशोक के अभिलेख और प्रयाग प्रशस्ति भी राज पद को देवतुल्य मानते हैं। कुषाण शासकों ने अपनी मुद्राओं में अपने को देव पुत्र लिखवाया है। मध्यकालीन शिलालेखों में राजा को दैवीय पद प्रदान किया गया है।

महाभारत के अनुसार हमने यह देखा कि राजा का आविर्भाव सुरक्षा और शान्ति प्रदान करने के समझौते के द्वारा हुआ और उसी के पश्चात् राजतंत्र प्रकाश में आया। आगे चलकर राजतंत्र की उत्पत्ति में आनुवंशिकता का भी योगदान होता रहा। लेकिन इस बात को ध्यान में सदैव रखा गया कि राजा में वीरता, गम्भीरता, धैर्यता, सुन्दरता, सत्यवादिता एवं क्षमाशीलता आदि गुण हों तथा वह काम, क्रोध, लोभ, मोह से अलग रह कर हर प्रकार से प्रजा के पालन और कल्याण का ध्यान रखे।

वैदिक आर ब्राम्हणकालीन सूत्रों के आधार पर हमें यह भी ज्ञात होता है कि राजा का निर्वाचन भी होता था। ऋग्वेद के अनुसार विशपतियों द्वारा राजा का चयन किया जाता था। रामायण में राम के युवराज बनने का तथ्य आनुवंशिक सिद्धान्त का समर्थन करता है।

उपर्युक्त विवेचन से ज्ञात होता है कि प्रारम्भ में राजा का चयन होता था बाद में आनुवांशिक प्रणाली का जोर धीरे-धीरे होता गया। राजा का अभिषेक या राज्यारोहण भी होता था जिसका विवरण हमें बाहाण साहित्य में प्राप्त होता है। इस समारोह को तीन भाग में विभाजित किया गया है:

(1) प्रारम्भिक समारोह जिसमें राजा को नियंत्रित करके संवैधानिक स्वीकृति दी जाती थी। फिर मुख्य राज्यारोहण समारोह होता था जिसमें राजा को व्याघ्र चर्म के साथ सिंहासन पर आरूढ़ किया जाता था और पुरोहित उच्चारण के साथ उस पर जल छिड़कते थे। तत्पश्चात् उस सभी लोग राजा स्वीकार करते थे और उसकी आज्ञाओं को राजाज्ञा समझकर पालन करना अपना धर्म समझते थे।

राजतंत्र प्रणाली

हिन्दू राज्य का मूल आधार धार्मिक था। धर्म को राजा से भी श्रेष्ठ और सब राजाओं का राजा माना जाता था। इसीलये हिन्दू राजत्व शासन प्रणाली में न्याय विभाग सदैव शासन से पृथक रखा गया था। राजा धर्म का रक्षक माना जाता था और एक पिता के समान अपनी संतान प्रजा का पोषण करता था।

राज्याभिषेक के समय राजा को सम्बोधित करते हुये कहा जाता था कि यह राज्य तुम्हें दिया जाता है, तुम इसके संचालक, नियामक तथा इसके उत्तरदायित्व के दृढ़ वहन कर्ता हो । प्रजा का हर प्रकार से कल्याण करना तुम्हारा धर्म है। प्राचीन भारत के शासक तथा प्रजा के बीच कोई अन्तर्विरोध नहीं होता था। राजा प्रायः वही कार्य करता था जिनमें प्रजा का अधिकतम कल्याण हो।

प्राचीन भारतीय राजतंत्र प्रणाली के अन्तर्गत हम यह देखते हैं कि राजा का पद वंशानुगत था तथा राजा की मृत्यु होने पर उसका जेष्ठ पुत्र सिंहासनारूढ़ होता था। उसे हर प्रकार से योग्य होना आवश्यक था। वह राज्य का सर्वोच्च अधिकारी था। राजा ही विधि निर्माण, कार्यपालिका का सर्वेसर्वा तथा न्याय का सर्वोच्चदाता था। राजकीय मामलों में राजा को परामर्श देने के लिये प्राचीन पारस्परिक आधार पर मंत्रिपरिषद का गठन किया जाता था। मंत्री परिषद का सर्वोच्च स्थान पुरोहित को प्राप्त था। मंत्री के अतिरिक्त महामात्र, दोषमापक आदि राजकीय पदाधिकारी होते थे। राजतंत्रीय व्यवस्था तथा राज्य का उद्देश्य प्रायः सीमा विस्तार से सम्बन्धित होता था। इसलिये सैन्य संगठन तथा शक्ति पर विशेष ध्यान दिया जाता था। सेना का प्रमुख अधिकारी महामंत्री होता था। उस समय पदाति, अश्वारोही, गजारोही तथा रथारोही सेनायें होती थी। राजा स्वयं न्याय का स्रोत था। उसका निर्णय अन्तिम होता था।

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Pankaja Singh

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