इतिहास

पूर्वी समस्या में रूस की रुचि | पूर्वी समस्या की रूप रेखा | पूर्वी समस्या को प्रधान घटनायें

पूर्वी समस्या में रूस की रुचि | पूर्वी समस्या की रूप रेखा | पूर्वी समस्या को प्रधान घटनायें

पूर्वी समस्या में रूस की रुचि

(Interest. of Russia in Eastern Question)-

बलकान प्रायद्वीप में निवास करने वाली ईसाई जनता का धर्म, भाषा और संस्कृति पर्याप्त मात्रा में रूसी जनता के समान थी। अतः रूस की सहानुभूति का उनके साथ होना स्वाभाविक ही था। रूस का जार इसीलिये बलकान् निवासी स्लाव (Slav) जनता का स्वयं को संरक्षक मानता था तथा इस बात की वह घोषणा भी कर चुका था। 19वीं शताब्दी में यूरोपीय जनता पर जो राष्ट्रीयता के पुनीत सिद्धान्तों अर्थात स्वतन्त्रता  समानता और भातूल भावना (freedom, Equality and Fraternity) का प्रभाव पड़ा था, उससे बलकान पायः द्वीप की ईसाई जनता भी बची न रह सकी। इन सिद्धांतों के प्रभाव से प्रभावित स्लाव जाति तुकों की दासता से स्वयं को मुक्त करने के लिये प्रयास करने लगी। 1857 ई० के पश्चात् की पूर्वी समस्या का इतिहास बलकान प्रदेश की ईसाई जनता के स्वतन्त्रता संपाम की घटनाओं को इतिहास है।

रूस का जार, अलेक्जेण्डर द्वितीय (Alexander II) उन्हें स्वतन्त्र कराने के लिये उनकी सहायता करने का इच्छुक था। परन्तु पेरिस सन्धि (Treaty of Paris) ने उसके इस कार्य में अवरोध उत्पन्न कर दिया था। फिर भी उसने 1861 ई० में रूमानिया (Rumania) और माण्टेनोमो (Montenegro) प्रान्तों की ईसाई जनता को तुर्क सुल्तान को अधीनता से मुक्त होने के लिये सहायता प्रदान की। इस सहायता में उसका स्वार्थ निहित था। वह विभिन्न स्लाव जातियों में राष्ट्रीयता की भावना जागृत करके उनसे तुर्क सुल्तान (Pore) के विदेशी शासन के विरूद्ध विद्रोह कराना चाहता था। अतः बालकान प्राय: द्वीप के मॉण्टीनीयप्रो (Montenegro), सर्बिला (Serbia), बलगारिया (Bulgaria), रूमानिया (Rumania) और बोसनिया (Bosania) आदि छोटे-छोटे राज्य तुर्क शासन के विरूद्ध विद्रोह का झण्डा ऊंचा करने लगे। रूस इन विद्रोहियों की हर प्रकार से सहायता करने लगा, क्योंकि वह तुर्क साम्राज्य के खण्डहरों पर अपने साम्राज्य का महल बनाना चाहता था। अत: 1867 ई० में मास्को (Moscow) में एक बड़ी अखिल स्लाव जातीय कांग्रेस (A Great Panslavist Congress) का अधिवेशन किया गया जिसमें पोलैण्ड (Poland) की पोल जाति के अतिरिक्त सभी स्लाव जातियों के प्रतिनिधि सम्मिलित हुए। इस कांग्रेस द्वारा मास्को में अपने प्रधान कार्यालय की स्थापना की। प्रायः सभी बलकान राज्यों में तुर्क शासन के विरुद्ध गुप्त समितियों का जाल सा बिछ गया जो तुर्कों के अत्याचारी शासन की समाप्ति के लिये प्रयत्नशील हुई।

पूर्वी समस्या की रूप रेखा

(Outlines of the Eastern Question)-

पूर्वी समस्या के उस समय चार प्रमुख रूप थे-

(1) स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिये प्रयास (Efforts for Freedom)- बालकान जातियाँ यूरोपीय शक्तियों के सहयोग से स्वयं को तुर्क सुल्तान की पराधीनता से मुक्त करना चाहती थी। यह कार्य असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य था।

(2) प्रत्येक बलकान राज्य अपनी राजनीतिक, प्रशासनिक और आर्थिक समस्याओं, को सुलझाना चाहता था, जिसके कारण उनमें आपस में भी संघर्ष होते रहते थे।

(3) वे अपने राज्यों की सीमाओं को आगे बढ़ाना चाहते थे, जो एक-दूसरे के क्षेत्रों को छीनकर अथवा तुर्क साम्राज्य के मूल्य पर ही सम्भव था।

(4) यूरोप की प्रायः सभी बड़ी-बड़ी शक्तियाँ तुर्क साम्राज्य की निलुता तथा बलकान राज्यों को अपरिपक्वता (Immaturity) से लाभ उठाकर अपने स्वार्थों को पूर्ण करना चाहती थीं। रूस (Russia) और आस्ट्रिया हंगरी (Austria Hungary) की महत्वाकांक्षाएँ अन्य सभी राष्ट्रों से अधिक थीं।

पूर्वी समस्या को प्रधान घटनायें

(Main Events of Eastern Problem)

(1) रूमानिया के नवीन राज्य की स्थापना (Formation of a new state Rumania)-  डेन्यूब नदी के उत्तरी तट पर माल्डेविया (Moldevia) और वैलेशिया (Whllachia) नामक दो छोटे राज्य स्थित थे। इन दोनों राज्यों के निवासी भाषा, धर्म और नस्ल के आधार पर एक ही जाति के थे। अतः दोनों ने आपस में मिलकर एक हो जाने तथा अपनी शक्ति में वृद्धि करके तुर्क साम्राज्य के विदेशी शासन से मुक्त होने का निश्चय किया। 1859 ई० में दोनों राज्यों की राष्ट्रीय सभाओं (National Assembly) में सर्वसम्मति से एक ही व्यक्ति कर्नल अलेक्जेण्डर कूजा (Col Alexander Couza) को अपना शासक  बनाने का निर्णय किया। उनके इस निर्णय से 23 दिसम्बर, 1861 ई० को दोनों राज्यों का एकीकरण करके रूमानिया (Rumania) के नवीन राज्य की स्थापना की गई।

(2) माण्टीनीपो का विद्रोह(Revolt of Montenegro)- 1857 ई. में माण्टीनीग्रो के स्लावों ने विद्रोह का झण्डा ऊंचा किया। माहोवो (Grahovo) के युद्ध में मॉण्टीनीग्रो की उत्साह से परिपूर्ण सेना द्वारा सुल्तान की तुर्क सेना को पराजित कर दिया गया। परन्तु शीघ्र ही एक अन्य शक्तिशाली तुर्क सेना के आ जाने से मॉण्टीनीपो की विजय पराजय में बदलने की सम्भावना उत्पन्न हो गई। परन्तु जार ने रूसी सेना भेज कर उसकी स्वतन्त्रता की रक्षा की।

(3) सर्बिया की स्वतन्त्रता (Freedom of Serbia)- 1867 ई० में सर्विया (Serbia) में तुकों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। सर्बिया के अनेक दुर्गों पर तुर्क सेना का अधिकार था। इस प्रकार के द्गों में बेल्पेड का दुर्ग (Fort of Belgradc) विशेष रूप से उल्लेखनीय है। जार की रूसी सेना ने बल देकर सर्बिया के दुर्गों से तुर्क सेना को हट जाने के लिये विवश किया। तुर्क सेना को सभी दुर्ग खाली करने पड़े, जिन पर सर्व सेना ने अधिकार जमा लिया। रूस की इस सैनिक सहायता ने सर्बिया को तुर्को की गुलामी से मुक्त कराकर स्वतन्त्र किया जिससे सबिया रूस का समर्थक बन गया।

(4) जार की घोषणा (Declaration of Crar)- 1870 ई. में फ्रांस के सम्राट नेपोलियन तृतीय (Napoleon III) के सेना सहित सीडान (Sedan) के युद्ध में जर्मनी द्वारा बन्दी बना लिये जाने पर रूस के जार ने अपनी घोषणा की कि “वह 1856 ई० को पेरिस की सन्धि को काले सागर (Black sea) और सीवास्टोपोल (Sebastopole) सम्बन्धी धाराओं को मानने के लिये बाध्य नहीं है।” जार की इस घोषणा ने सम्पूर्ण बलकान प्रदेश में तुर्क शासन के विरुद्ध विद्रोह की अग्नि धधका दी। उधर जार् ने काले सागर के किनारे स्थित सेवास्टोपोल एवं अन्य दुर्गों की किलेबन्दी कर डाली जिससे वहाँ तुर्की शासन की जड़ें हिल गई।

(5) स्लाव चर्च की स्थापना (Establishment of Slav Church)-उस समय तक बलकान प्रदेश की ईसाई जनता पर कुस्तुनतुनिया (Constantinople) में स्थित यूनानी धर्म पिता (Greek Patriarch) का नियन्त्रण था। जार ने उसके प्रभाव को नष्ट करने के अभिप्राय से 1870 ई० में स्लाव चर्च (Slav Church) एवं बलगार धर्म पिता की स्थापना के लिये तुर्क सुल्तान को विवश किया अतः 10 मार्च 1870 ई. के दिन तुर्क सुल्तान को घोषित करना पड़ा कि-“अब से सम्पूर्ण स्लाव जातियाँ यूनानियों से पृथक् एक धार्मिक जाति मानी जायेंगी तथा उनका धर्म पिता (Patriarch) भी बलगार ही बनाया जायेगा जो यूनानी धर्म पिता के नियन्त्रण के बाहर स्वतन्त्रतापूर्ण व्यवहार करने का अधिकारी रहेगा।” इस प्रकार दो चर्चा की स्थापना ने बलगारियों (Bulgarians) और यूनानियों (Greeks) में संघर्ष उत्पन्न किये, जिनके कारण समस्त बालकान प्रदेश युद्ध का अखाड़ा बन गया। तुर्क सुल्तान को ईसाइयों में फूट उत्पन्न हो जाने से बड़ी प्रसन्नता हुई।

(6) बोसनिया और हार्जेगोविना के विद्रोह (Revolts of Bosania and Herzegovina)- 1874 ई० में इन दोनों राज्यों में वर्षा न होने से फसले सूख गई और कृषकों की दशा दयनीय बन गई। तुर्क सुल्तान के कर्मचारियों ने दोनों राज्यों को ईसाई प्रजा पर भीषण अत्याचार आरम्भ किये । अतः जनता भड़क उठी और उसने तुर्क कर्मचारियों की पिटाई करके उन्हें अपने यहाँ से खदेड़ दिया। इनके विद्रोह को सफल होते देख सर्बिया और माण्टीनीग्रो ने भी तुर्क सेना के विरूद्ध विद्रोह कर दिया। इस प्रकार बलकान प्रदेश के चारों राज्यों में विद्रोह की ज्वाला बड़ी तीव्रता के साथ प्रज्जवलित हुई, जिसके कारण युरोपीय राष्ट्रों में उत्तेजना का प्रसार होने लगा।

(7) एंड्रेसी  नोट तथा बर्लिन मेमोरण्डम (Andressey Note and Berlin andmemorandom)-यूरोपीय राष्ट्रों ने विद्रोह को सीमित रखने के लिये आस्ट्रिया के चांसलर काउण्ट एंड्रेसी (Count Andressey) द्वारा तैयार किया गया नोट अर्थात् चेतावनी पत्र तुर्क सुल्तान के पास भेजा गया। उसमें तुर्क सुल्तान को सुधार करने के लिये चेतावनी दी गई थी। तुर्क सुल्तान ने चारों राज्यों में सुधार लागू करने के लिये प्रतिज्ञा की, परन्तु हजेंगोविना और बोसनिया की ईसाई प्रजा ने उसकी प्रतिज्ञा पर विश्वास नहीं किया। इससे स्थिति और भी अधिक बिगड़ गई तथा मई 1876 ई० में बलगारिया में लगभग सौ तुर्क कर्मचारियों को मौत के घाट उतार दिया गया। विद्रोह की अग्नि प्रचण्ड होते देख जर्मनी, आस्ट्रिया और रूस आदि ने तुर्क सुल्तान को पहली चेतावनी से कहीं अधिक आवश्यक चेतावनी दी जो इतिहास में बर्लिन मेमोरेन्डम (Berlin Memorandum) के नाम से प्रसिद्ध है। इसके अनुसार तुर्क सुल्तान को तुरन्त अपनी ईसाई प्रजा को सुविधायें देने के लिये कठोर आदेश दिये गये तथा प्रकट किया गया कि सुल्तान द्वारा आदेश का उल्लंघन किये जाने पर उसे यूरोपीय राष्ट्रों का सशस्त्र हस्तक्षेप सहन करना पड़ेगा।

(8) बलगारिया का हत्याकाण्ड (Bulgarian Massacar)-  इंगलैण्ड ने स्पष्ट रूस से प्रकट कर दिया था कि वह सशस्त्र हस्तक्षेप के समय यूरोपीय शक्तियों का साथ नहीं देगा। तुर्क सुल्तान ने यह समझा कि हस्तक्षेप के समय इंगलैण्ड उसकी सहायता करेगा जिसके कारण यूरोपीय शक्तियाँ उसके विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं कर सकेगी। अतः सुल्तान ने निडरता के साथ बलंगारिया दमन आरम्भ किया। उसने 18 सहस्त्र तुर्क सैनिकों को बलगारिया भेज दिया। तुर्क सेना ने निरपराध बलगार स्त्री, पुरूष और बालकों को बहुत बड़ी संख्या में हत्या कर डाली। एक इतिहासकार के अनुसार बलगारिया में लगभग 12 हजार ईसाइयों का तुर्क सेना द्वारा वध किया गया था परन्तु वास्तविकता यह है कि बलगारिया में 30 सहल से भी अधिक निरीह जनता को मौत के घाट उतार कर वहाँ रक्त की नदियाँ बहा दी गयी थीं। यूरोप में इन नृशंसताओं ने कोहराम मचा दिया । इंगलैण्ड के प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ और संसद सदस्य ग्लेडस्टन (Gladstone) ने भाषण देते हुए कहा कि “अब तुर्कों को अपने दुष्कर्मों को साथ लेकर यहां से चला जाना चाहिये। उनके विभिन्न अधिकारियों जैसे जैपिथ्स, मुदिर, बम्बासी, युजबाजी कैमाकस और पाशाओं अपना बिस्तर बोरिया बांधकर उन राज्यों से, जिन्हें उन्होंने उजाड़कर दिया है भाग जाना चाहिये।” उनके इस दृष्टिकोण से बिटिश मंत्रीमण्डल के लगभग सभी सदस्य सहमत थे। उस समय इंगलैण्ड के प्रधानमन्त्री का कार्य डिजरायली (Disraeli) के हाथों में था जो भारतीय साम्राज्य को बलगारिया की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण मानता था । उधर रूस अंग्रेजों के भारतीय साम्राज्य की दिशा में द्रुतगति से आगे बढ़ रहा था तथा उसकी सेनायें अफगानिस्तान (Afghanistan) की सीमा पर अपने शिविर डाल चुकी थी । इस प्रकार भारत के अंग्रेजी साम्राज्य के लिये रूस द्वारा संकट उत्पन्न किया जा रहा था तथा टकी का इस संकट को उत्पन्न करने में कोई हाथ नहीं था। अत: डिजरायली (Disraeli) ने बलगारिया के हत्याकाण्ड पर ध्यान न देते हुए रूस के भारत की ओर बढ़ने का विरोध करना अधिक आवयक समझा।

(9) बलकान राज्यों का युद्ध में प्रविष्ट होना (Entry in war of Balkan states)-  बलगारिया के हत्याकाण्ड से क्रोधित सर्बिया और मॉर्टीनीयो (Montenegro) के निवासियों ने भी तुर्की के विरुद्ध युद्ध करने का निर्णय किया। अतः इन राज्यों की सरकारों ने क्रमश: 30 जून 1876 ई० तथा 1 जुलाई, 1876 ई० को तुर्की के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर डाली। सर्विया को युद्ध में अधिक सफलता नहीं प्राप्त हो सकी, परन्तु माण्टीनीग्रो की सेना द्वारा तुर्क सेना कई स्थानों पर पराजित कर दी गई। तुर्क सेनाओं द्वारा अक्टूबर में सर्बिया को पराजित कर दिया। गया, तुर्क सेना द्वारा र्विया (Serbia) के दक्षिण भाग पर अधिकार कर लिया गया। सविया के पराजय के रूप में रूस के सामने एक विकट समस्या आई जिसके निराकरण के लिये रूस द्वारा तुर्क सुल्तान की चुनौती (Ultimatum) दिया गया। तुर्क सुल्तान को विवश होकर तुर्की सेना के सर्विया में बढ़ाव को रोक देना पड़ा। इस प्रकार सर्विया को राजधानी बेलग्रेड (Belgrade) पर तुर्क् सेना के अधिकार करने की योजना विफल हो गई। उधर मॉण्टोनीमा (Montenegro) ने दो तीन युद्धों में तुर्क सेना को परजित कर दिया था जिसके कारण मॉण्टीनीमो की सेना का साहस बढ़ा हुआ था।

(10) तुर्क सुल्तान की सुधारों की घोषणा (Declaration of Reforms by Portc)-  यूरोपीय शक्तियों ने बलकान प्रदेश में उत्पन्न पूर्वी समस्या के भीषण बवण्डर को शांत करने के उद्देश्य से तुर्को (Turkey) की राजधानी कुस्तुनतुतिया (Constantinople) में प्रतिनिधियों का एक सम्मेलन कराया। तुर्क सुल्तान अब्दुल हमीद (Abdul Hamid) ने सम्मेलन की बैठक होने से एक दिन पूर्व ही टकी में उदार संविधान की स्थापना की घोषणा की तथा अगले दिन कान्फ्रेन्स के अधिवेशन में तुर्क साम्राज्य की दशा सुधारने के लिये सुधारों की घोषणा की जिससे कान्स बिना किसी निर्णय पर पहुंचे हुए ही भंग हो गई।

इस प्रकार सुल्तान अब्दुल हमीद ने तुर्क साम्राज्य पर आए हुए भीषण संकट को अपनी राजनीतिक कुशलता के द्वारा टाल दिया। इसके पश्चात मई, 1877 ई० में उसने नवीन संविधान (New Constitution) तथा सुधारों को योजना (Reform Scheme) को भविष्य के लिये स्थगित कर दिया।

इतिहास – महत्वपूर्ण लिंक

Disclaimer: e-gyan-vigyan.com केवल शिक्षा के उद्देश्य और शिक्षा क्षेत्र के लिए बनाई गयी है। हम सिर्फ Internet पर पहले से उपलब्ध Link और Material provide करते है। यदि किसी भी तरह यह कानून का उल्लंघन करता है या कोई समस्या है तो Please हमे Mail करे- vigyanegyan@gmail.com

About the author

Pankaja Singh

Leave a Comment

error: Content is protected !!