शिक्षाशास्त्र

पर्यावरण शिक्षा के सार्वभौमिक उद्देश्य | भारत में पर्यावरण शिक्षा की आवश्यकता

पर्यावरण शिक्षा के सार्वभौमिक उद्देश्य | भारत में पर्यावरण शिक्षा की आवश्यकता

पर्यावरणीय शिक्षा के सार्वभौमिक उद्देश्य

(Universal Aims of Environmental Education)

बेलग्रेड में जो अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई थी उसमें पर्यावरणीय शिक्षा के उद्देश्य, विषयवस्तु, शिक्षक प्रशिक्षण, शिक्षण विधि आदि सभी पर विस्तार से चर्चा की गई। इसमें यही निर्णय लिया गया कि विश्व के सभी देशों के लिये पर्यावरणीय शिक्षा के समान और व्यापक उद्देश्य स्वीकृत किये जायें। वह सर्वमान्य उद्देश्य इस प्रकार हैं-

(1) पर्यावरण के प्रति जागरूकता (Environmental Awareness)- सभी व्यक्तियों और समूहों में पर्यावरण और उसकी समस्याओं के प्रति जागरूकता उत्पन्न करने में सहायता देना। इसी भाँति का एक लक्ष्य है समुदाय में विभिन्न सदस्यों के साथ सम्बन्ध स्थापित करना तथा पर्यावरण में प्रत्येक की भूमिका और महत्व को समझना। यहाँ समुदाय से तात्पर्य पर्यावरण के विभिन्न कारकों से है।

(2) कौशल का विकास करना (Development of Skills)-  सामान्यतया पर्यावरणीय शिक्षा को सूचना संग्रह सम्बन्धी कौशल विकसित करने का माध्यम समझा जाता है । इसमें यह लक्ष्य निहित है कि बालक अपने प्राकृतिक और भौतिक वातावरण का निरीक्षण करे, वहाँ होने वाली घटनाओं की सूचना एकत्रित करे,उन पर कुछ प्रयोग करे तथा फिर इसी ज्ञान के आधार पर दूसरे वातावरण को भी समझ सकता है। इस उद्देश्य प्राप्ति को किसी विशेष कौशल का नाम नहीं दिया गया है। परन्तुं पर्यावरण विज्ञान योजना में इन कौशलों की सूची दी गई है-

निरीक्षण – Observing

संग्रहण – Collecting

पता करना – Sorting

तुलना करना – Comparing

आदेश देना – Ordering

मापन करना – Measuring

गणना करना – Calculating

रेखा चित्र बनाना – Graphing

नक्शे पर अंकित करना – Maping

सामान्यीकृत करना – Simplifying

बोलना – Speaking

लिखना – Writing

वर्णन करना – Describing

रिकार्ड करना – Recording

प्रस्तुत करना – Displaying

चित्र बनाना – Drawing

इसमें एक समस्या आती है कि ये समस्त कौशल पूर्णतः स्वतंत्र नहीं हैं। पूरी तरह इनकी अलग-अलग पहचान करना कठिन है। इन कौशलों के विकास पर इसलिये बल दिया गया है कि ये बालकों के भावी जीवन में सहायक हो सकते हैं।

(3) समस्या समाधान व मूल्य निर्धारण (Problem Solving and Value Clarification)- कुछ विचारक इन उद्देश्यों को पर्यावरण शिक्षा का एक महत्वपूर्ण अंग मानते हैं। ये उद्देश्य अथवा प्रक्रियायें आलोचनात्मक चित्रण, नियोजित सामाजिक परिवर्तन व संप्रेषण कौशल विकसित करने में सहायता करते हैं। समस्या समाधान क्रियात्मक उद्देश्य है। इसका उद्देश्य है व्यक्तियों को समस्याओं के प्रति जागरूक करना तथा समस्या का समाधान ढूंढने का प्रयत्न करना । समस्या पर्यावरण के किसी भी विषय से सम्बन्धित हो सकती है। इसमें बालक सक्रिय रूप से भाग लेते हैं।समस्या समाधान के लिए छानबीन की जाती है तथा प्राप्त सूचनाओं के आधार पर ही निर्णय लिया जाता है तथा इसी से उसका मूल्यांकन भी होता है।

(4) अभिवृत्ति का विकास (Development of Attitudes)- शिक्षा का एक अन्य उद्देश्य पर्यावरण के प्रति सकारात्मक अभिवृत्ति का विकास करना है । यह शिक्षा का अन्तिम लक्ष्य भी हो सकता है तथा इसके विकास के माध्यम से सामाजिक कार्यों में योगदान देना भी उद्देश्य हो सकता है । इसका तात्पर्य ऐसी अभिवृत्तियों का विकास करना है जिससे पर्यावरण का विकास हो सके तथा अनुपयोगी तत्वों को हटाया जा सके।

(5) पर्यावरण से अन्य विषयों को जोड़ना (Relating Concepts to Environment)- इस शिक्षा का एक उद्देश्य भौतिक विज्ञान, जीव विज्ञान, रसायन विज्ञान की धारणाओं को बालक के पर्यावरण से जोड़ना है। बालक को प्रकृति के समीप जाकर अपने अनुभवों, निरीक्षण के आधार पर विज्ञान की धारणाओं का ज्ञान प्राप्त करना चाहिये।

इन्ही उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुये विभिन्न देशों में पर्यावरणीय शिक्षा के पाठ्यक्रम बनाये गये है जिनमें एक या अधिक उद्देश्यों को प्रमुखता दी गयी है।

भारत में पर्यावरण शिक्षा की आवश्यकता

(Need of Environment Education in India)

सातवीं पंचवर्षीय योजना (1985-90) में कहा गया है कि राष्ट्रीय विकास तथा सामाजिक हित के लिये पर्यावरण के अनेक जीवित व अचेतन तत्व महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। आज पर्यावरण को नष्ट करने में जनंसख्या विकास, गरीबी तथा प्राकृतिक साधनों का दुरुपयोग महत्वपूर्ण कारक बने हुये हैं । बहुत से देशों में पर्यावरण में फैले इन दोषों को तीव्र आर्थिक विकास, सामाजिक न्याय तथा विकसित कार्यक्रमों को बढ़ावा देकर कम या नष्ट कर दिया गया है। भारत में भी इस हेतु एक विस्तृत ‘स्ट्रेटजी’ तैयार की गई है।

सातवीं योजना में कहा गया, “भारत अपने प्राकृतिक साधनों की सम्पन्नता की दृष्टि से भाग्यशाली है इसके जीवित साधनों में प्रचुरता तथा विभिन्नता है। इन तथा अन्य साधनों को पर्याप्त रूप में नियोजित करके इस समय के लिये तथा भविष्य के लिये उच्च स्तरीय भौतिक आवश्यकताओं को प्राप्त किया जा सकता है। किसी भी राष्ट्र की सम्पन्नता की श्रेणी उसके उत्पादन पर निर्भर करती है। यही उसकी (राष्ट्र की) कुशलता का आंकलन है जिसके द्वारा वह मनुष्य की आवश्यकताओं और उसकी अभिलाषाओं को वातावरण के साधनों के उपयोग द्वारा सन्तुष्ट करता है। अर्थात् जो राष्ट्र अपने प्राकृतिक पर्यावरण के साधनों का जिस कुशलता से उपयोग करेगा उतना ही आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न राष्ट्र कहलायेगा।

इस दृष्टि से यह अनुभव किया गया है कि आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न बनाने तथा ऐसे राज्य जो अभी भी अविकसित हैं, उनको विकसित करने हेतु वातावरण सम्बन्धी समस्याओं को दूर करना अति आवश्यक होगा। इसीलिए सरकार ने 20 सूत्री कार्यक्रम के अन्तर्गत पर्यावरण संरक्षण तथा नियन्त्रण को अनेक महत्वपूर्ण विकसित कार्यक्रमों का महत्वपूर्ण बिन्दु स्वीकार करते हुये पर्यावरण नियोजित कार्यक्रम तैयार करने पर जोर दिया है। इसके अन्तर्गत सातवीं योजना में अनेक ऐच्छिक संगठनों द्वारा भौतिक प्रसाधनों का विकास का कार्यक्रम किया जा रहा है।

पर्यावरण नियन्त्रण तथा संरक्षण हेतु विश्वविद्यालयों की 400 अनुसंधान योजनाओं को अनुमति प्रदान की गई। यह कहा गया है कि शिक्षा के द्वारा ही हम अपनी जनता को पर्यावरण के साधनों से अवगत करा सकते हैं। शिक्षा ऐसा स्रोत है जिसके द्वारा पर्यावरण के प्रयोग, महत्व उसकी उपयोगिता को जाना जा सकता है। सातवीं योजना में पर्यावरण शिक्षा के लिये एक विस्तृत कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की गई है। इसके अन्तर्गत पर्यावरण से सम्बन्धित प्रशिक्षण व जागरूकता के लिये राष्ट्रीय स्तर पर “वर्कशाप” स्थापित करने पर जोर दिया गया है।

इसके अन्तर्गत जनता में पर्यावरण के प्रति जागरूकता उत्पन्न करने के लिये राष्ट्रीय स्तर पर विश्व पर्यावरण दिवस तथा वन्य जीवन सप्ताह मनाने पर जोर दिया गया है। इसमें पर्यावरण शैक्षिक जागरूकता कार्यक्रम हेतु एक राष्ट्रीय पर्यावरण कांफ्रेंस तथा पर्यावरण पर विधिवेत्ताओं का प्रथम राष्ट्रीय अधिवेशन भी किया गया। यह अनुभव किया गया कि राष्ट्रीय संग्रहालय प्राकृतिक इतिहास के द्वारा पर्यावरण शिक्षा को अधिक अच्छी प्रकार से बच्चों को प्रदान कर सकते हैं।

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Pankaja Singh

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