अर्थशास्त्र

शक्ति तथा ऊर्जा प्राप्ति के विभिन्न स्त्रोत | शक्ति तथा ऊर्जा संसाधनों का सापेक्षिक महत्व | ऊर्जा के परम्परागत तथा गैर परम्परागत स्रोतों में अंतर

शक्ति तथा ऊर्जा प्राप्ति के विभिन्न स्त्रोत | शक्ति तथा ऊर्जा संसाधनों का सापेक्षिक महत्व | ऊर्जा के परम्परागत तथा गैर परम्परागत स्रोतों में अंतर | Various sources of power and energy in Hindi | Relative importance of power and energy resources in Hindi | difference between conventional and non-conventional sources of energy in Hindi

शक्ति तथा ऊर्जा प्राप्ति के विभिन्न स्त्रोत

ऊर्जा को विभिन्न स्रोतों से प्राप्ति और उपयोग के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है। यात्रिंक ऊर्जा, उष्मीय ऊर्जा, प्रकाश ऊर्जा, रासायनिक ऊर्जा, विद्युत ऊर्जा से इसके अनेक रूप हैं। मानव अपनी आवश्यकताओं-उत्पादन, वितरण और परिवहन के लिए विभिन्न प्रकार से शक्ति तथा ऊर्जा प्राप्त करता है। ये दो प्रकार की होती है- जीवों से प्राप्त (Animate) ऊर्जा और  निर्जीवों से प्राप्त (Inanimate) ऊर्जा इन्हें चेतन अथवा अचेतन की संज्ञा भी दे सकते हैं।

शक्ति

  1. प्राणिज-चेतन अथवा जीवन्त
  • मनुष्य
  • पशु
  1. अप्राणित अचेतन अथवा निर्जीव
  • कोयला
  • खनिज तेल
  • प्राकृतिक गैस
  • अणु
  • पवन
  • जल
  • ज्वार
  • सूर्य ताप
  • पृथ्वी का आंतरिक ताप

ऊर्जा प्राप्त करने का सबसे प्राचीनतम स्रोत प्राणिज ऊर्जा है। मानवीय क्रियाओं के विकास के साथ पशु-पालन और उनकी शक्ति का उपयोग करना प्रारंभ हुआ। प्राणिज-शक्ति का स्रोत पशु, बोझा ढोने, गाड़ी खींचने और खेत जोतने वाले हैं। कुछ अप्राणिज ऊर्जा जैसे वायु की मदद से नावें और पवन चक्कियां चलायी गयी हैं। अप्राणिज ऊर्जा के रूप में ही क्रमशः कोयला, खनिज तेल, गैस और अणु इत्यादि हैं जो विशिष्ट संसाधन के के रूप में उपयोग में आते हैं। धीरे-धीरे मानव शरीर की अपेक्षा उसके मस्तिष्क का प्रयोग शक्ति की प्रापित एवं उसके उत्पादन में अधिक होने लगा। अप्राणित-शक्ति का मुख्यतः प्रारंभ भापशक्ति के आविष्कार से हुआ। जेम्स वाट ने सन् 1769-73 में भाप चालित इंजन का सफल प्रयोग किया। इससे पहले लकड़ी और फिर कोयले का प्रयोग किया गया। इसी सिलसिले में कोयला, खनिज तेल, प्राकृतिक गैस और बहते जल का उपयोग तथा बाद में अणु एवं सौर-शक्ति प्रधान स्रोत बन गये हैं।

अप्राणिज संसाधन मुख्यतः दो प्रकार के हैं- (1) समाप्त होने वाले संसाधन, और (2) समाप्त न होने वाले संसाधन। पहले प्रकार में कोयला, खनिज तेल, प्राकृतिक गैस और आणविक ईंधन हैं। कोयले के जलने पर ही इंजन को शक्ति मिलती है। न समाप्त होने वाले स्रोतों में बहता जल, पवन, सूर्य ताप, ज्वार, पृथ्वी का आन्तरिक ताप, बायोगैस आदि हैं जो प्रकृति द्वारा निरंतर पूर्ति किये जाने वाले स्रोत हैं।

शक्ति तथा ऊर्जा संसाधनों का सापेक्षिक महत्व:

शक्ति-ऊर्जा और ऊष्मा प्रदान करने में कोयला, तेल, प्राकृतिक गैस, लकड़ी और विद्युत का बड़ा महत्व है। आज कोयले की एक बड़ी राशि विद्युत उत्पादन में खर्च होती है। लकड़ी कोयले और पेट्रोल का उपयोग है।

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Pankaja Singh

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