इतिहास

नेपोलियन की महाद्वीपीय व्यवस्था | नेपोलियन की महाद्वीपीय व्यवस्था संबंधी साम्राज्यीय नीति

नेपोलियन की महाद्वीपीय व्यवस्था | नेपोलियन की महाद्वीपीय व्यवस्था संबंधी साम्राज्यीय नीति

नेपोलियन की महाद्वीपीय व्यवस्था

(Continental System or Blockade)

सन् 1808 तक ब्रिटेन (इंगलैण्ड) सागर सम्राट हो गया था। समद्र पर उसका एकछत्र शासन सा हो गया था। दूसरी ओर नेपोलियन यूरोप महाद्वीप का निरंकुश अधिष्ठाता (स्वामी) था। नीलनदी, कोपेन हेगन और ट्रेफलगर के नौ-सैनिक युद्धों में अंग्रेजी सेना ने फ्रांसीसी नौ सैनिक बेड़े को बुरी तरह हरा दिया था, परन्तु मैरैगो, आस्टलिजिज जेना और फ्रीडलैण्ड के युद्धों में फ्रांसिसियों ने आसाधारण विज्य प्राप्त की थी। नेपोलियन के पास उच्च कोटि का नौसैनिक बेड़ा नहीं था, अतः समुद्र में मार खा जाता था। हां, अंग्रेजों की स्थल सेना इतनी शक्तिशाली नहीं थी कि नेपोलियन को परास्त कर सकते। दोनों अपने को शक्तिशाली समझते थे और एक-दूसरे को नीचा दिखाने की घात में लगे रहते थे।

(1) महाद्वीपीय व्यवस्था के उद्देश्य

(Aims of Continental system)-

महाद्वीपीय व्यवस्था को लागू करने में नेपोलियन के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित थे-

(1) इंगलैण्ड की शक्ति का आधार उसके विशाल तथा सुविस्तृत बाजार थे जिन पर अधिकार कर लेने से यह सम्भव हो सकता था कि इंग्लैण्ड फ्रांस के सामने सर झुका दे। यदि इंगलैण्ड के विदेशी व्यापार को चौपट कर दिया जाता तो इंगलैण्ड में विदेशी धन का प्रवाह यकायक रुक जाता। ऐसी दशा में इंगलैण्ड को फ्रांस से संधि करने के लिए विवश होना पड़ेगा।

(2) फ्रांस एक कृषिप्रधान देश था। अतः इंगलैण्ड यदि किसी भी प्रकार की विरोधी कार्यवाही करेगा तो फ्रांस के सामने वैसी मुसीबत खड़ी नहीं होगी जैसी कि इंगलैण्ड के सामने आ सकती थी।

(3) इंगलैण्ड को अपनी आन्तरिक अर्थ व्यवस्था को सुधारने के लिए स्वर्ण की आवश्यकता थी। अतः यदि उसके विदेशी व्यापार को चोट पहुंचाई जाती तो घोर संकट में फंसकर इंगलैण्ड के फ्रांस से सन्धि करने के लिए विवश होना पड़ेगा।

(4) नेपोलियन को यह विश्वास था कि इंगलैण्ड में राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक व्यवस्था की कमी थी जबकि फ्रांस राजनीतिक दृष्टि से स्थिरता प्राप्त कर चुका था।

उपर्युक्त उद्दश्यों को ध्यान में रखकर नेपोलियन ने महाद्वीपीय व्यवस्था को प्रचलित किया। परन्तु वह स्वयं एक ऐसी उलझन में उलझ गया जिससे निकलना उसके लिए आसान नहीं रहा। जो महाद्वीपीय व्यवस्था इंगलैण्ड् का सर्वनाश करने के लिए बनायी गई थी, उसी ने फ्रांस के सपाट नेपोलियन) को पतन के गर्त में औंधे मुहं डाल दिया।

(2) महाद्वीपीय व्यवस्था को शुरू करना-

नेपोलियन ने सन् 1805 में आस्ट्रिया तथा सन् 1806 में प्रशा को हराया था। अब उसने उसी वर्ष 1806 में नवम्बर के महीने में बर्लिन से राजकीय आज्ञप्ति (Decree) जारी करके ब्रिटिश द्वीप समूह के विरुद्ध आर्थिक नाकेबंदी की घोषणा कर दी। ब्रिटेन अथवा उसके बंदरगाहों से जो पोत आते थे, उनको फ्रांस और उसके मित्र राष्ट्रों के बदरगाहों में प्रवेश निषिद्ध कर दिया गया। इसके बाद जनवरी 1807 में वार्सा दिसम्बर 1807 में मिलान और अक्टूबर 1810 में फौन्तेनब्ली की आज्ञप्तियाँ जारी की गई। यह प्रबन्ध किया गया कि ब्रिटिश द्वीपों से या ब्रिटेन के आधीन या शासित बंदरगाहों से चलने वाले पोतों को फ्रांसीसी नौसेना द्वारा घेरा जा सकता है। फौन्तेनुब्ली की आज्ञप्ति में यह आज़ा दी गई कि फ्रांस के आधीन राज्यों में यदि विटेन द्वारा तैयार किया गया माल जाता है तो उसे तुरन्त अधिकृत कर लिया जाये।

इसके उत्तर में ब्रिटेन ने भी नई-नई आज्ञायें जारी की। उसने 1807 में कई मंत्रिमंडलीय आज्ञायें (Orders in Council) घोषित की जिनके द्वारा यह घोषणा की गई फ्रांस या उसके मित्र राष्ट्रों द्वारा किए जाने वाले व्यापार के माल को ब्रिटिश नौ सेना द्वारा पकड़ा जा सकता है। इस प्रकार दोनों ओर मनमुटाव का वातावरण व्याप्त हो गया। नेपोलियन यूरोप में ब्रिटेन को भूखों मरते देखना चाहता था। इसके विपरित ब्रिटेन् चाहता था कि वह यूरोप की नाकेबंदी करके फ्रांस तथा उसके मित्र देशों का शेष संसार के साथ व्यापार बंद कर दे। दोनों ही अपनी जोड़-तोड़ में लग गए। परन्तु सफलता भविष्य के हाथों में थी।

(3) महाद्वीपीय व्यवस्था के संकट-

प्रो० हेजेन के कथनानुसार इस महाद्वीप व्यवस्था के कई महत्वपूर्ण परिणाम हुए। सन् 1807 से 1814 तक अर्थात् 7 वर्ष तक यूरोप में घोर आर्थिक संकट छाया रहा । ब्रिटेन की शक्ति को नष्ट करने के लिए यह अनिवार्य था कि इस महाद्वीपीय व्यवस्था को सम्पूर्ण यूरोप पर निरन्तर व्यवस्थित किया जाए, कोई ऐसी गली न रह जहाँ से होकर ब्रिटेन अपना माल पहुंचा सके। यदि स्पेन, इटली या पुर्तगाल के किसी भी गलियारे में होकर इंगलैण्ड को मार्ग मिल जाता जहाँ से वह अपने माल को चोरी-छिपे यूरोप के देशों में पहुंचा सकता तो निश्चय ही फ्रांस इंगलैण्ड का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता था। अतः उसने अपनी ओर से पूर्ण नाकेबंदी की व्यवस्था की। इसके लिए उसे बहुत से युद्धों को भी अपनाना पड़ा, जिनका परिणाम उसके लिए सुखद नहीं रहा। इन युद्धों ने उसका सर्वनाश कर दिया।

(4) महाद्वीपीय व्यवस्था के लिए आक्रामक संग्राम-

प्रशिया तथा आस्ट्रिया को नेपोलियन ने परास्त किया था और तिलस्टि की विख्यात सन्धि द्वारा रूस को उसने अपना मित्र राष्ट्र बना लिया था। अतः वे ब्रिटेन के माल का बहिष्कार करने के लिए तैयार हो गए। डेनमार्क ने अपनी निर्बलता की ओर दृष्टिपात करके चुपचाप नेपोलियन की महाद्वीपीय व्यवस्था को स्वीकार कर लिया।

(i)  स्वीडन- स्वीडन नेपोलियन की व्यवस्था को मानने के लिए तैयार नहीं हुआ। उसने विटेन से मैत्री सम्बन्ध बनाये रखे। अत: नेपोलियन ने रूस से कहा कि वह स्वीडन के फिनलैण्ड वाले क्षेत्र पर सैनिक कार्यवाही करके उस पर अधिकार कर ले। रूस ने नेपोलियन का आग्रह स्वीकार करके स्वीडन के कई अच्छे बन्दरगाहों पर अधिकार कर लिया।

(ii) पुर्तगाल- सन् 1807 में रूस के साथ तिलसिट की सन्धि हो जाने के पश्चात् नेपोलियन पूर्वीय यूरोप की ओर से निश्चिन्त हो गया। अब उसने पुर्तगाल की ओर ध्यान दौड़ाया। पुर्तगाल सन् 1803 से ब्रिटेन का मित्र देश था। उसने नेपोलियन की महाद्वीपीय व्यवस्था को पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं किया। इस कारण नेपोलियन ने पुर्तगाल पर आक्रमण कर दिया। पुर्तगाल का राजा अपने परिवार सहित भाग खड़ा हुआ। उसने अमेरिकी उपनिवेश ब्राजील में शरण ली।

(iii) हालैण्ड- हालैण्ड का राजा लुई बोनापार्ट था जो नेपोलियन का लघु भ्राता था। परन्तु उसने अपने बड़े भाई के आग्रह को प्रत्यक्ष रूप से स्वीकार नहीं किया, क्योंकि नाकेबन्दी करने से हालैंड को अनेक आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता। इससे नेपोलियन क्रुद्ध हो उठा। उसने लुई बोनापार्ट को सिंहासन से उतार दिया और हालैण्ड को फ्रांस-राज्य में सम्मिलित कर लिया।

(iv) पोप से संघर्ष- इस समय ईसाइयों का धर्मगुरु पोप था। वह फ्रांस तथा इंगलैण्ड के इस संघर्ष से दूर रहना चाहता था। परन्तु इस समय इंगलैण्ड तथा फ्रांस के सामने ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई थी कि वे किसी को भी तटस्थ नहीं रहने देना चाहते थे। जब पोप ने महाद्वीपीय व्यवस्था को अपने देश में लागू करना स्वीकार नहीं किया, तब नेपोलियन ने अपने कोप का भाजन उसे भी बनाया। उसने उसके द्वारा शासित राज्य के कुछ भाग को इटली तथा कुछ भाग को फ्रांस में सम्मिलित कर लिया। इटली का राजा स्वयं नेपोलियन ही था। अब पोप ने नेपोलियन को ईसाई धर्म से पृथक् कर दिया । नेपोलियन ने पोप को गिरफ्तार कर लिया। बेचारे पोप को नौ साल तक फ्रांस में बन्दी जीवन बिताना पड़ा। नेपोलियन का यह कार्य रोमन कैथोलिक ईसाई समाज को नापसन्द रहा। वे उसके विरुद्ध आवाजें कसने लगे!

(5) स्पेन का नासूर अथवा स्पेन से युद्ध-

उस समय स्पेन की गद्दी पर चार्ल्स चतुर्थ (सन् 1788-1808) का शासन था। प्रो० हेज़ के शब्दो में, “राजा बुधू था, उसकी रानी गंवार, इन्द्रियलोलुप स्त्री थी, जिसको बोली बड़ी कर्कश थी। उसका उत्तराधिकारी राजकुमार फार्डिनेंड बीस-बाईस वर्ष का एक घमण्डी लड़का था। उनका कृपापात्र इंगलैण्ड सेन का असली शासक् (यदि उस समय किसी को स्पेन का असली शासक कहा जा सकता हो, तो) गौडेय था, जिससे रानी प्रेम करती थी और राजा जिसकी रक्षा करता था और जिससे राजकुमार ईर्ष्या करता था।”

जब फ्रांस ने 1807 के अक्टूबर में पुर्तगाल पर आक्रमण किया, तब स्पेन ने फ्रांसीसी सेना को अपने यहाँ से होकर जाने की अनुमति दे दी। नेपोलियन ने इस पर वचन दिया था कि वह पुर्तगाल का कुछ क्षेत्र सेन को दे देगा। परन्तु पुर्तगाल पर अधिकार करने के पश्चात् भी फ्रांसीसी सेनाओं ने स्पेन की भूमि को नहीं छोड़ा। उनकी संख्या बढ़ती रही। इससे जनता स्पेन के राजा गौड़ेय के विरुद्ध हो गई । राजकुमार फर्डिनेन्ड जनता को नेता बन बैठा। राजा चार्ल्स ने यह स्थिति देखकर सिंहासन छोड़ दिया और फ़र्डिनेन्ड को अपना उत्तराधिकारी (सन् 1808 के मार्च माह में) घोषित कर दिया । नेपोलियन ने कूटनीति से काम लिया। उसने तीनों दलों में समझौता कराने के लिए चार्ल्स चतुर्थ फर्डिनेन्ड तथा गौडें को फ्रांसीसी सीमा बायोन (Bayone) नामक स्थान पर निमन्त्रित किया। उन तीनों को भुलावे में डालकर कैद कर लिया गया। उन सबको उसने विवश किया कि वे स्पेन के सिंहासन से अपना आधिपत्य छोड़ने की घोषणा कर दें। इसके पश्चात् नेपोलियन ने अपने भाई जोसेफ बोनापार्ट को स्पेन का राजा बना दिया।

अब पेन पर नेपोलियन का अधिकार तो सरलतापूर्वक गया, परन्तु स्पेन के निवासियों ने इसे मन से स्वीकार नहीं किया। यद्यपि नेपोलियन ने स्पेन में सुधारों का जाल बिछा दिया तथापि स्पेन की जनता उसका विरोध ही करती रही, वह नेपोलियन को धोखेबाज और ठग कहती थी। उसे नेपोलियन के भुले-बुरे दोनों प्रकार के कार्यों से घृणा थी।

स्पेन के पास सुसंगठित सेना का अभाव था, जिससे वह अपनी भूमि से फ्रांसीसिया को निकाल सकता परन्तु उसने साहस और धैर्य का परिचय दिया। स्पेनसी छापामार युद्ध की ओर अग्रसर हुए। नेपोलियन को विश्वास था कि पेन के साथ युद्ध करने में फ्रांस के अधिक से अधिक दस-बारह हज़ार सैनिक काम आयेंगे और विजयश्री झोली में आ जायेगी। परन्तु युद्ध की अग्नि 5 वर्ष तक प्रज्वलित होती रही। लगभग तीन लाख सैनिकों को जीवन से हाथ धोना पड़ा, परन्तु सफलता फिर भी नहीं मिली

स्पेन का युट जनता का युद्ध वन गया। इतिहासकार फिशर के शब्दों में, “स्पेन के विरुद्ध नेपोलियन के साहस के साथ-साथ ही फ्रेन्च साम्राज्य के निर्माण में प्रथम दरार पैदा हो गई।

स्पेन में राष्ट्रीयता की भावना जाग्रत हो उठी थी। स्पेनवासियों ने घोषणा कर दी कि वे अपनी भूमि पर फ्रांसीसियों को किसी भी दशा में टिकने नहीं देंगे। स्पेन के छापामारों को अपने देश का चप्पा-चप्पा स्मरण था। वे फ्रांस की सेना को बार-बार नष्ट कर छिप जाते थे। ईसाई पादरियों ने भी नेपोलियन के विरुद्ध प्रचार करना आरम्भ कर दिया था। अत: स्पेन में नेपोलियन के सामने आपत्तियों का अम्बार लग गया। जुलाई सन् 1808 ई० में फ्रांसीसी सेनापति जनरल दयुपा (Dupont) को 29,000 सेना के साथ स्पेनी छापामारों के सामने हथियार डालने पड़े। इससे नेपोलियन के सम्मान को बट्टा लगा। अब यूरोप के अन्य अधीनस्थ देश भी फ्रांस की अधीनता से छुटकारा पाने योजनायें बनाने लगे।

(6) ब्रिटेन द्वारा पुर्तगाल तथा स्पेन की सहायता-

ब्रिटेन तो फाँस को नीचा दिखाने की ताक में था ही। उसने आर्थर वेलेजली (ड्यूक आफ वेलिंगटन) के नेतृत्व में एक सेना पुर्तगाल तथा स्पेन की सहायता के लिए भेज दी। उसने फ्रांस की सेना को बुरी तरह हराया। सन् 1808 में फ्रांसीसी सेनापति जूनो ने ड्यूक के सामने आत्मसर्पण कर दिया। इससे नेपोलियन धैर्य खो बैठा। अब उसके लिए यह आवश्यक हो गया कि स्पेन में किसी भी दशा में अपनी प्रतिष्ठा को बचाये। वह स्वयं एक विशाल सेना के साथ स्पेन पहुंचा। एक माह के युद्ध के पश्चात् उसने स्पेन पर अधिकार कर लिया। परन्तु सेन की जनता ने अब भी हार नहीं मानी। वह उसके द्वारा किए गए सुधारों को ठुकराने लगी। नेपोलियन अधूरी विजय छोड़कर फ्रांस लौट गया क्योंकि आस्ट्रिया ने नेपोलियन के विरुद्ध युद्ध का डंका बजा दिया था।

इस प्रकार महाद्वीपीय व्यवस्था के कारण नेपोलियन को युद्धों में उलझ जाना पड़ा, जिन्होंने उसकी शक्ति को भारी धक्का पहुँचाया।

(7) महाद्वीपीय व्यवस्था की असफलता-

नेपोलियन अपनी महाद्वीपीय व्यवस्था के कारण असफल रहा।

इस व्यवस्था से नेपोलियन के अधीन देशों ने मुँह उठाना आरम्भ कर दिया। फ्रांस में भी असन्तोष की लहर दौड़ गई। ब्रिटिश उपनिवेश में उत्पन्न होने वाली वस्तुयें, जैसे चीनी, रूई, काफी आदि बहुत महंगी हो गई। व्यापार की दशा खस्ता हो गई, लोग बेरोजगार हो गए, तस्कर व्यापार (Simuggling) को ठिकाना मिलने लगा।

यद्यपि तस्कर व्यापारियों को कठोर दण्ड दिए गए। परन्तु उन लोगों ने साधारण जनता को भड़काकर जनरोप उत्पन्न कर दिया। इन कारणों से सब लोग नेपोलियन को दोष देने लगे।

महाद्वीप-व्यवस्था के कारण सन् 1812 में रूस और फ्रांस के सम्बन्ध खराब हो गए। नेपोलियन ने क्रुद्ध होकर रूस पर आक्रमण कर दिया जिसने उसका सर्वनाश किया।

प्रो० हेजेन के शब्दों में, “सन् 1812 से 1814 के तीन वर्षों में नेपोलियन की राजनीति का ढाँचा बालू की दीवार की तरह गिरकर बिखर गया।”

मार्कहम (Markham) की टिप्पणी भी दृष्टव्य है, “महाद्वीप-व्यवस्था द्वारा नेपोलियन ने अपने साम्राज्य के विरुद्ध केवल यूरोपीय जनता को ही नहीं उभारा वरन उसने फ्रांस के मध्यम वर्ग का भी विश्वास खो दिया। इस व्यवस्था को लागू करने के प्रयास में फ्रांस में आर्थिक साधन छिन्न-भिन्न हो गए और अधिकांश देशों ने उसका साथ देना छोड़ दिया।”

महाद्वीपीय व्यवस्था का ब्रिटेन पर प्रभाव- इस व्यवस्था का ब्रिटिश व्यापार पर कोई गहरा प्रभाव नहीं पड़ा। सन् 1806 से सन् 1810 तक ब्रिटिश व्यापार में बराबर उन्नति होती गयी।

निष्कर्ष (Conclusion)

इससे स्पष्ट है कि महाद्वीपीय व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य अपने वास्तविक लक्ष्य की ओर नहीं बढ़ सका। ब्रिटेन को अपार कष्ट उठाना पड़ा। यह व्यवस्था एक प्रकार से ब्रिटेन के लिए आर्थिक क्षेत्र में विकट परीक्षा सिद्ध हुई। ब्रिटेन उसमें सफल हो गया।

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Pankaja Singh

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