इतिहास

नेपोलियन के पतन के कारण | Due to the fall of Napoleon in Hindi

नेपोलियन के पतन के कारण | Due to the fall of Napoleon in Hindi

नेपोलियन के पतन के कारण

(Causes of the Downfall of Nepoleon)

सन् 1810 में नेपोलियन ने अपनी शक्ति को बहुत अधिक बढ़ा लिया था। उसका सामाज्य पूर्व में रूस तक विस्तृत हो चुका था। उसने जर्मनी तथा इटली के कुछ भागों पर अधिकार कर लिया था। ‘राइन संघ’ का वह संरक्षक भी हो गया था। स्पेन का शासन उसके भाई जौसेफ के पास था। उसका बहनोई मुरा (Murar) नेपल्स का नरेश था। रूस्, आस्ट्रिया तथा प्रशा से उसके मैत्री सम्बन्ध थे। केवल इंगलैण्ड से उसके सम्बन्ध अच्छे नहीं थे।

परन्तु नेपोलियन का यह विशाल साम्राज्य अगले पाँच वर्षों में (1815 तक) छिन्न-भिन्न होकर समाप्त हो गया। इससे स्पष्ट है कि शासन में स्थायित्व तथा सुदृढ़ता नहीं थी। नेपोलियन ने उचित प्रकार से व्यवस्था नहीं की। इसी कारण उसका पतन हो गया। उसके पतन के प्रमुख कारण निम्नलिखित हो सकते हैं-

(1) साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षा-

नेपोलियन ने शुरू से ही साम्राज्यवादी नीति का पोषण किया। इसी नीति के कारण उसने अपनी महत्वाकांक्षा को बढ़ाये ही रखा । वस्तुतः महत्वकांक्षा के बल पर ही वह साधारण व्यक्ति से सम्राट बना था। टिलसिट की सन्धि के समय वह अपनी सफलता के चर्मोत्कर्ष पर पहुंच गया, सारे यूरोप में उनका नाम गूंजने लगा। ऐसी दशा में भी यदि वह उदारतापूर्वक शासकों तथा जनता को शासन करने की छूट देता तो उसका पतन कभी नहीं होता। परन्तु युद्धों को जीतने के पश्चात् भी उसने अपनी महत्वाकांक्षाओं पर अंकुश नहीं लगाया और इस प्रकार उसका पतन हो गया।

(2) नेपोलियन पर आश्रित साम्राज्य-

प्रो० हेजेन ने नेपोलियन साम्राज्य की दुर्बलता का चित्र इन शब्दों में खींचा है, “यह केवल पराक्रम तथा निरंकुशता के आधार पर टिका हुआ था। उसका निर्माण युद्ध तथा विजय के द्वारा हुआ था। विजित लोग उसके अधीन अवश्य थे, परन्तु वे उससे घृणा करते थे और उसके चंगुल से छुटकारा पाने के लिए अवसर की ताक में रहते थे। ऐसे साम्राज्य को केवल शक्ति के बल पर ही बनाया रखा जा सकता था।” नेपोलियन ने स्वयं भी कहा था, “वंश परम्परागत राजा बीस बार पराजित हो जाने पर भी फिर अपनी गद्दी पा सकते हैं। परन्तु मेरे लिए यह सम्भव नहीं है, क्योंकि मैंने सेना के बल से सत्ता प्राप्त की है।” शक्ति के क्षीण होते ही वह औंधे मुंह पतन के गर्त में गिर पड़ा।

डा० सत्यकेतु विद्यालंकार ने इस सम्बन्ध में लिखा है, “यह साम्राज्य नेपोलियन की प्रतिभा द्वारा बना था। यह एक व्यक्ति की रचना थी। अतः इसकी सत्ता तथा दशा उस एक आदमी के जीवन और शक्ति पर निर्भर थी।”

(3) राष्ट्रीयता की भावना का उदय-

फ्रांस की क्रान्ति के कारण यूरोप के देशों में राष्ट्रीयता की भावना उत्पन्न हो गयी। इस भावना के कारण फ्रांस एक शक्तिशाली राष्ट्र बनता चला गया। अतः 1793 में उसने शक्तिशाली विरोधी देशों को हराया। राष्ट्रीयता की यही लहर यूरोप के अन्य देशों, जैसे स्पेन, प्रशिया, आस्ट्रिया तथा इटली में भी पहुंच गई थी। इस कारण अब यूरोप के देश पराधीनता की बेड़ियों को काट कर फेंक देना चाहते थे। नेपोलियन ने इस गहराई को समझने में बड़ी भूल की। जेना के युद्ध में हार जाने के बाद शिया में राष्ट्रीय पुनरुत्थान के लिए प्रयास किया जाने लगा। इस कार्य में दार्शनिकों, लेखकों तथा प्राध्यापर्को ने बड़ा योगदान दिया। जब स्पेन में राष्ट्रीयता की भावना ने विकराल रूप धारण कर लिया तो उसने नेपोलियन को छापामार युद्ध में छठी का दूध स्मरण करा दिया। वास्तविकता यह थी कि पराधीनता किसी भी देश को स्वीकार नहीं थी।

(4) फ्रांस में क्रान्ति की भावना की समप्ति-

नेपोलियन् के राज्यारोहण के पश्चात् फ्रांस में क्रान्ति की भावना का अन्त हो गया। सन् 1793 ई० में फ्रांसीसी जनता ने विदेशी हमले का सामना करने के लिए जो जोश दिखाया था वह समाप्त हो गया। अब तो फ्रांस में नेपोलियन अपनी महत्वाकांक्षा को बढ़ाता जा रहा था। फ्रांस की जनता युद्ध की विभीषिकाओं से बचना चाहती थी उसे शान्ति चाहिये थी-ऐसी शान्ति जिसमें पगकर वह स्वतन्त्रतापूर्वक जी सके। अतः जब मार्च 1814 में मिश्रित देशों ने पेरिस पर आक्रमण किया तो फ्रांसीसी जनता ने प्राणपण से अपने सम्राट नेपोलियन की सहायता नहीं की।

(5) ईसाइयों का विरोध-

नेपोलियन को पोप से झगड़ा नहीं करना चाहिये था। उसने ऐसा करके यूरोप में अनेक शत्रु बना लिए। नेपोलियन ने पोप से भी कहा कि वह अपने राज्यों में महाद्वीप व्यवस्था को लागू करे तथा इंगलैंड के माल को अपने देश में न आने दे। पोप ने उसकी बात को मानने से इन्कार कर दिया, अतएव नेपोलियन ने उसके देश पर अधिकार कर लिया। पोप ने नेपोलियन को ईसाई धर्म से बहिष्कृत कर दिया। नेपोलियन ने पोप को कैद कर लिया और नौ वर्ष तक उसे पेरिस में नजरबन्द रखा। इससे रोमन कैथोलिक धर्म को मानने वाली जनता नेपोलियन की विरोधी हो गई। इस कारण भी नेपोलियन को पतन का मुंह देखना पड़ा।

(6) नेपोलियन द्वारा विश्वास की सीमा-

नेपोलियन अपने ऊपर बहुत विश्वास करता था। वह कहा करता था, “असम्भव शब्द, मेरी डिक्शनरी (Dictionary) में है ही नहीं।”

निःसंदेह आत्मविश्वास के बल पर उसने अनेक युद्ध जीते। उन विजयों से उसका आत्मबल बहुत् बढ़ गया। परन्तु यही अन्त में उसके लिए हानिकारक सिद्ध हुआ। वह अपनी शक्ति के सामने दूसरे की शक्ति को गिनता ही नहीं था। उसने अपने एक सेनापति सोल से इसी सम्बन्ध में कहा था, “इन स्पेनी सामन्तों तथा कायरों जैसे व्यक्ति मैने कहीं नहीं देखे।” परन्तु उसका घमण्ड उसको ले डूबा ।

(7) महाद्वीपीय व्यवस्था के दुष्परिणाम-

नेपोलियन की इंगलैंड से शत्रुता थी। स्थल में नेपोलियन ने अपनी शक्ति को अत्यधिक बढ़ा लिया था तो समुद्र में इंगलैंड की शक्ति बहुत बढ़ी-चढ़ी थी। सच्चाई तो यह है कि एडमिरल नेल्सन ने नील नदी के अभियान में तथा ट्रैफल्गर के युद्धों में फ्रांसीसी सेना को एक प्रकार से नष्ट ही कर दिया था। अतएव नेपोलियन ने अपनी कूटनीतिक योजना द्वारा इंगलैंड को नीचा दिखाना चाहा। यह एक ऐसी योजना थी जो चालाकी से पूर्ण थी और इतिहास में महाद्वीपीय व्यवस्था (Continental System) के नाम से प्रसिद्ध है। इसका उद्देश्य इंगलैंड के व्यापार को चौपट करना था। परन्तु नेपोलियन इस योजना द्वारा पतन की ओर बढ़ता चला गया। प्रो० हेजेन के शब्दों में, “इस व्यवस्था ने ही उसे एक के बाद एक आक्रमण करने तथा एक के बाद एक देश हस्तगत करने के लिए बाध्य किया।” इस व्यवस्था के कारण यूरोप के अन्य देशों के साथ-साथ फ्रांस में भी असन्तोष की भावना भड़क उठी, क्योंकि इंगलैंड से आने वाली चाय, कपास, चीनी आदि काफी महंगी हो गई। यह महाद्वीपीय व्यवस्था इंगलैंड के लिए कम तथा नेपोलियन के लिए अधिक विनाशकारी सिद्ध हुई।

(8) अकुशल सम्बन्धी-

नेपोलियन ने अपने भाइयों तथा अन्य सगे-सम्बन्धियों को जीते हुए देशों का शासक बना दिया था फ्रांस में भी इसी प्रकार उच्च पद् दे दिए गए थे। परन्तु ये लोग अकुशल शासक सिद्ध हुए। नेपोलियन ने एक बार उसके सम्बन्ध में कहा था “मैंने उनका जितना भला किया, उतना ही उन्होंने मेरा बुरा किया।” इस प्रकार सम्बन्धियों पर विश्वास करके उन्हें शासन देना उसके लिए लाभदायक नहीं रहा।

(9) सशक्त ब्रिटिश सेना-

ब्रिटिश सेना सारे यूरोप की सेना से शक्तिशाली निकली। इसी कारण नेपोलियन को हारना पड़ा। अपनी शक्ति के दम्भ में वह सब कुछ भूल गया था। इस सम्बन्ध में फौच ने लिखा है, “वह (नेपोलियन ) यह भूल गया था कि मनुष्य कभी ईश्वर नहीं हो सकता, व्यक्ति के ऊपर राष्ट्र है और मनुष्य जाति के ऊपर नैतिक विधान है, वह भूल गया था कि युद्ध ही सर्वोच्च उद्देश्य नहीं है, क्योंकि शान्ति युद्ध के ऊपर है।”

ब्रिटिश बेड़ा फ्रांस नहीं टाल सका। नेपोलियन ने जब अन्य देशों से संधि करली तब भी इंगलैंड फ्रांस के विरुद्ध डटा रहा । वह महाद्वीप में फ्रांस-विरोधी शक्तियों को बराबर सहायता देता रहा और इसी कारण नेपोलियन का पतन हो गया। एमिरल नेल्सन ने नील नदी की लड़ाई और ट्रैफल्गर की लड़ाई में फ्रांस ने नौसैनिक बेड़े को समाप्त कर दिया था।

(10) स्पेन तथा रूस के युद्धों में भारी हानि-

स्पेन और रूस से युद्ध नेपोलियन की कमर तोड़ गए। इन देशों के युद्धों में उसे राष्ट्रीयतावादी जनता से सामना करना पड़ा जिसने उसे टिकने ही नहीं दिया। इन देशों की समस्त जनता नेपोलियन के विरुद्ध अस्त्र-शस्त्र लेकर मैदान में उतर आयी। नेपोलियन की सेना ने उन लोगों को बार-बार हराया, परन्तु वे डटे ही रहे। उनका साहस नहीं टूटा । इस लम्बे युद्ध में नेपोलियन को धन-जन दोनों से हानि उठानी पड़ी। हेजेन ने लिखा है, “स्पेन की जागृति स्वाभाविक रूप से प्रेरित राष्ट्रीय आन्दोलन की कड़ी में पहली थी जिसने नेपोलियन का नाश कर दिया। स्पेन में नेपोलियन को 3 लाख तथा रूस में 5 लाख सैनिकों से हाथ धोना पड़ा। फ्रांस इतनी हानि न सहने के कारण लड़खड़ा कर गिर पड़ा।

(11) नेपोलियन की शिथिलता-

डा० स्लोअन ने लिखा है, “नेपोलियन के पतन का कारण एक ही शब्द थकान (Exhaustation) है।” उसने फ्रांस का नेतृत्व 15 वर्षों तक किया, उसमें सुधार भी किए, परन्तु समय बीतने पर उसकी शक्ति कमजोर होती गई। परन्तु प्रो० हालैंड इस विचार से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि वाटरलू की लड़ाई से पहले तथा उसके बाद भी उसके सारे कार्य एक स्वस्थ मनुष्य के समान थे। कुछ भी हो, मनुष्य की आयु के बढ़ने के साथ-साथ थकान का अनुभव होता ही है।

(12) नेपोलियन का हठी स्वभाव-

नेपोलियन स्वभाव से ही जिद्दी था। इस कारण कभी-कभी वह हानि उठाने के लिए भी तैयार हो जाता था। प्रो० हालैंड ने लिखा है, “नेपोलियन बहुत जिद्दी बना गया था।” वह उसके पतन का मुख्य कारण बन गया था। फ्रांस में उसका कभी विरोध नहीं हुआ, इसलिए वह दम्भी तथा स्वाभिमानी बन गया था। उसका विचार यह था कि वह जो भी काम करता है ठीक ही करता है, उससे गलती कभी नहीं होती है जिस कारण वह अपने सेनापतियों की उचित सलाह को भी टाल देता था। इस कारण उसके सच्चे साथी उससे दूर हटते गए। अपने प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ मन्त्री तालीरां (Talleyrand) को हँसी उड़ाते हुए उसने कहा था, “तुम तो रेशमी जुराब में भरा हुआ गोबर हो।”

(13) मित्रों को संदिग्ध दृष्टि से देखना-

नेपोलियन ने स्पेन के राजा को धोखा दिया था। इस कारण उसके मित्र भी उससे शंका करने लगे। स्पेन के राजा ने नेपोलियन की सेना को अपने राज्य में से होकर पुर्तगाल जाने की अनुमति इस संधि के कारण दे दी थी कि पुर्तगाल को फ्रांस और स्पेन दोनों आपस में बांट लेंगे। परन्तु पुर्तगाल को विजित करने के बाद भी फ्रांस की सेनाएँ स्पेन में डटी रहीं। उन्होंने स्पेन को भी अपने अधिकार में लेने की योजना बनाई। इससे नेपोलियन की प्रतिष्ठा को धक्का लगा। अन्य देशों के शासकों ने उसकी बात को मानने से इन्कार कर दिया।

(14) सेना की दुर्बलता-

नेपोलियन की सेना में पहले जैसी शक्ति नहीं रही थी। यद्यपि वह अपनी सेना में अटूट उत्साह भर देता था परन्तु साधारण रूप से सेना की दशा अच्छी नहीं थी। भोजन तथा वस्त्रों की सदा कमी बनी रहती थी, वेतन समय पर नहीं मिलता था। सेना में जर्मनी, स्पेन, पोलैंड, हालैंड आदि अनेक देशों के सैनिक थे। ऐसी सेना में राष्ट्रीयता की कमी थी।

निष्कर्ष (Conclusion)

उपर्युक्त कारणों के अतिरिक्त अन्य छोटे-छोटे कारण भी हो सकते हैं। उदाहरण के लिय, फ्रांस की जनता नेपोलियन से दुःखी हो उठी। युद्धों की जगह अब वह शान्ति चाहती थी। जिस स्वतन्त्रता को पाने के लिए फ्रांस की जनता ने क्रान्ति का बिगुल बजाया था उसे नेपोलियन ने छीन लिया था। कुछ राष्ट्र ऐसे भी थे जो उसके उत्थान से जल उठे थे, वे उसे नीचा दिखाने के लिए एक ध्वज के नीचे एकत्र हो गए।

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Pankaja Singh

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