इतिहास

नंदवंश की उत्पत्ति | नन्दवंश की उपलब्धियाँ | Origin of Nanda Dynasty in Hindi | Achievements of Nanda Dynasty in Hindi

नंदवंश की उत्पत्ति | नन्दवंश की उपलब्धियाँ | Origin of Nanda Dynasty in Hindi | Achievements of Nanda Dynasty in Hindi

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नंदवंश की उत्पत्ति

चौथी शताब्दी ई०पू० के मध्यकाल में मगध साम्राज्य में तृतीय राजवंश का उदय हुआ। यह नन्दवंश था। पुराणों के अनुसार नन्दवंश का प्रथम शासक महापद्मनन्द था। उसे ‘शूद्रागर्भोद्भव’ (शूद्र माता के गर्भ से उत्पन्न) कहा गया है। जैन ग्रन्थ परिशिष्टपर्वन के अनुसार उसका पिता नाई तथा माता वेश्या थी।

कर्टियस के अनुसार, “उसका पिता वस्तुतः नाई था तथा अपनी दैनिक आय से कठिनतापूर्वक भोजन पाता था। वह सुन्दर था इसलिए रानी का प्रेमपात्र बन गया।….बाद में विश्वासघात करके उसने राजा की हत्या कर दी…..तथा बाद में राजपुत्रों को मारकर वर्तमान राजा बन बैठा।’ इस वर्णन से हमें विश्वास होता है कि जिस राजा की हत्या की गई थी वह काकवर्ण था, जिन राजपुत्रों को मारा गया था वे काकवर्ण के ही दस पुत्र । इस प्रकार नन्दवंश की हीन उत्पत्ति के समर्थन में अनेक प्रमाण मिलते हैं।

अपनी निम्न उत्पत्ति के बावजूद, नन्दवंश को भारतीय इतिहास में महान् गौरव का स्थान प्राप्त है। जन्म से नहीं, अपितु कर्म द्वारा नन्दवंश ने मगध साम्राज्य को अतीव गतिशीलता प्रदान की।

महापद्मनन्द- पुराणों के अनुसार महापद्मनन्द ने वंश की स्थापना की। पुराण उसे महान् योद्धा मानते हैं जो ‘परशुराम की तरह इस पृथ्वी के समस्त क्षत्रियों का विनाश करेगा और उन पर एकच्छत्र शासन करेगा।” इसमें सन्देह नहीं है कि महापदानन्द एक प्रबल विजेता था। भागवत पुराण की टीका के अनुसार नन्दराज की दस पद्म सेना के कारण ही उसका नाम महापद्म पड़ा था। कर्टियस एवं डायोड्रस के अनुसार उसकी सेना में 20,000 घुड़सवार, 3000 हाथी, 2000 रथ तथा दो लाख पैदल सैनिक थे। नन्दों के अतुल धन के विषय में चीनी यात्री युवान च्वांग का कथन है कि “नन्दराज के पास सात प्रकार से रत्नों की पाँच निधियाँ हैं।” कथासरित्सागर के अनुसार नन्द सम्राट के पास 99 करोड़ स्वर्ण मुद्रायें थीं।

मगध के पूर्व-राजाओं ने मगध-विस्तार के जिस कार्य को अधूरा छोड़ा था, महापद्म नन्द ने उसे पूरा किया। पुराणों में उसे ‘एकच्छत्र पृथ्वी का राजा’ ‘अनुल्लंधितशासन’ ‘परशुराम के समान’, ‘सर्वक्षत्रान्तक’ तथा ‘एकराट्’ संज्ञाओं से विभूषित किया गया है। महापद्म नन्द ने अपने समकालीन उत्तरी भारत के सभी राजाओं को पराजित किया, इनमें कुरु, पंचाल, काशी, इक्ष्वाकु, मैथिल, हैहय, कलिंग, अस्मक, सूरसेन, बीतिहोत्र तथा शैशुनाग प्रमुख हैं। हाथीगुम्फा अभिलेख से पता चलता है कि नन्दराज ने कलिंग पर आक्रमण करके, वहाँ एक नहर अथवा बाँध बनवाया था। डॉ० राय चौधरी के अनुसार दक्षिणापथ का कुछ भाग नन्द- साम्राज्य के अन्तर्गत रहा होगा क्योंकि गोदावरी के तट पर ‘नवनन्द देहरा’ नामक नगर का उल्लेख मिलता है। ‘स्थविरावलिचरित’ नन्द राजा के मन्त्री कल्पक का नाम मिलता है। यह बड़ी कुशाग्रबुद्धिवाला व्यक्ति था तथा अपनी प्रवंचनाओं एवं कूटनीति द्वारा उसने मगध विस्तार में काफी सहायता दी होगी।

मत्य पुराण के अनुसार महापद्मनन्द ने 88 वर्ष तक राज्य किया, वायु पुराण के अनुसार 28 वर्प, सिंहली गाथाओं के आधार पर 22 वर्ष तक, तारानाथ के अनुसार 29 वर्ष तक राज्य किया।

(1) नन्दवंश की उपलब्धियाँ

नन्दवंश के शासकों का साम्राज्य-विस्तार- मगध के नन्द शासकों ने मगध राज्य के गौरव को बढ़ाया। अपने साम्राज्य का विस्तार करके इन्होंने बिम्बिसार और अजातशत्रु के कार्य को पूरा किया। कहा जाता है कि कश्मीर, पंजाब और सिन्धु को छोड़कर सम्पूर्ण उत्तरी भारत में इनका साम्राज्य फैला हुआ था।

कुछ वर्णनों के अनुसार, शिशुनाग के पुत्र एवं उत्तराधिकारी कालाशोक की एक नीच जाति के व्यक्ति ने हत्या कर दी। यह व्यक्ति, जिसका नाम महापद्मनन्द था, एक नाई का पुत्र था। पुराणों के अनुसार यह एक शूद्र स्त्री के गर्भ से उत्पन्न हुआ था। जैन धर्म के एक ग्रन्थ के अनुसार यह एक गणिका तथा नाई का पुत्र था। पुराणों में उल्लेख है कि नन्दवंश के नौ राजाओं ने एक सौ वर्ष तक शासन किया। ‘महाबोधिवंश’ में नन्दों के पहलिए राजा को उग्रसेन कहा गया है, परन्तु पुराणों में उसे ‘महापद्म’ कहा गया है। भागवत पुराण के अनुसार  महापद्म के पास दस पड़ा सेना थी। इसी से उसका नाम महापदा पडा तथा नन्दवंश का होने के कारण महापदानन्द कहलाया।

नन्दवंश के सभी राजाओं में महापद्मनन्द की सफलताओं का उल्लेख सबसे अधिक मिलता है। महापद्म एक प्रतापी विजेता था तथा उसने अपने साम्राज्य की सीमाओं को अभूतपूर्व रुप में बढ़ाया। उसने अपने समय के सभी प्रभावशाली एवं महत्वपूर्ण क्षत्रिय राजवंशों को समाप्त कर दिया। डॉ० राय चौधरी का अनुमान है कि उत्तरी भारत के अतिरिक्त दक्षिणी भारत का कुछ भाग भी नन्द साम्राज्य में सम्मिलित था। नन्द राजा के एक मन्त्री कल्पक ने अपने बुद्धि तथा दल प्रपंच के बल पर मगध साम्राज्य के विस्तार में काफी योगदान दिया। महापदानन्द के पास अपार एवं अतुल धनराशि थी, जो उसने प्रजा पर भारी कर लगाकर एकत्र की थी, उसके इस कार्य से जनता में वह बहुत अलोकप्रिय हो गया। कुछ भी हो, नन्दवंश के कुछ शासकों और विशेष रूप से महापानन्द ने मगध साम्राज्य के गौरव को विस्तार एवं समृद्धि की दृष्टि से बढ़ाया। यह नन्दवंश के शासकों की ओर विशेष रूप से महापद्मनंद की सफलतायें कही जा सकती हैं। डॉ० आर०एस० नाहर ने ठीक ही कहा है, महापद्मनन्द को ही हम भारत का प्रथम महान ऐतिहासिक सम्राट मान सकते हैं।”

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Pankaja Singh

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