अर्थशास्त्र

मुक्त व्यापार सन्धि | Free trade agreement in Hindi (FTA)  

मुक्त व्यापार सन्धि | Free trade agreement in Hindi (FTA)  

मुक्त व्यापार सन्धि-

मुक्त व्यापार संधि के सम्बन्ध में प्रायः कहा जाता है कि यह सभी के लिए लाभदायक है, लेकिन यदि इसके इतिहास से कुछ सबक लें तो हम यह पाते हैं कि मुक्त व्यापार संधियाँ भी हाथी के दाँत की तरह दिखाने के और खाने के कुछ और जैसी ही हैं। आज अमेरिका मुक्त व्यापार संधियों से स्वयं को मुक्त कर रहा, जो कभी मुक्त बाजारों का झंडाबरदार माना जाता था। हाल के घटनाक्रमों से यह जाहिर है कि भारत आरसीईपी पर वार्ता को आगे बढ़ाने को लेकर प्रतिबद्ध नजर आ रहा है। ऐसे में यह उपयुक्त समय है मुक्त व्यापार संधि के सिद्धान्तों और उनकी वास्तविकता में अन्तर करने का।

क्या है मुक्त व्यापार संधि (Free trade agreement-FTA)-

  1. मुक्त व्यापार संधि का प्रयोग व्यापार को सरल बनाने के लिए किया जाता है। एफटीए के तहत दो देशों के बीच आयात-निर्यात के तहत उत्पादों पर सीमा शुल्क, नियामक कानून,सब्सिडी और कोटा आदि को सरल बनाया जाता है।
  2. इसका एक बड़ा लाभ यह होता है कि जिन दो देशों के बीच में यह संधि की जाती है, उनकी उत्पादन लागत बाकी देशों के मुकाबले सस्ती हो जाती है। इसके लाभ को देखते हुए दुनिया भर के बहुत से देश आपस में मुक्त व्यापार संधि कर रहे हैं।
  3. इससे व्यापार को बढ़ाने में मदद मिलती है और अर्थव्यवस्था को गति मिलती है। इससे वैश्विक व्यापार को बढ़ाने में भी मदद मिलती रही है। हालांकि कुछ कारणों के चलते इस मुक्त व्यापार का विरोध भी किया जाता रहा है।

एफटीए से सम्बन्धित वैश्विक अनुभव-

  1. ऐसे देश जो वस्तु एवं सेवाओं के क्षेत्र में विशेषज्ञ हैं, वे एफटीए के जरिये तुलनात्मक रूप से अधिक लाभ कमा सकते हैं। फिर भी एफटीए के माध्यम से हर कोई लाभ कमाता है, लेकिन आज एफटीए की प्रचलित अवधारणा और वास्तविकता के बीच टकराव देखने को मिल रहा है।
  2. विदित हो कि उत्तर अमेरिकी मुक्त व्यापार समझौता, जिसे 1994 में लागू किया गया था, मैक्सिको को निर्यात के कारण 200,000 नई नौकरियाँ पैदा करने वाला था, लेकिन 2010 तक अमेरिका की मैक्सिको के साथ व्यापार घाटे में बढ़ोत्तरी हुई और लगभग 700,000 रोजगार समाप्त हो गए।
  3. 2010 में अमल में लाये गए यूएस कोरिया मुक्त व्यापार समझौते का उद्देश्य अमेरिकी निर्यात और नौकरियों में वृद्धि करना था, लेकिन तीन साल बाद व्यापार घाटा और बढ़ गया।
  4. उल्लेखनीय है कि वैश्वीकरण, आउटसोर्सिंग, भारत एवं चीन के उदय और कम लागत वाले श्रम बाजारों को इन परिस्थितियों का जिम्मेदार ठहराया गया।

भारत और एफटीए-

  1. यद्यपि भारत 1947 से ही गेट (टैरिफ और व्यापार पर सामान्य समझौता) का एक संस्थापक सदस्य था, जो अंततः 1995 में विश्व व्यापार संगठन में बदल गया था, लेकिन भारत 1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद एफटीए को लेकर गम्भीर नजर आया। इसका प्रभाव यह हुआ कि भारत का व्यापार-जीडीपी अनुपात उल्लेखनीय स्तर पर पहुंचा।
  2. दरअसल, दोहा दौर की वार्ताओं में अन्तहीन देरी के कारण ऐसी परिस्थितियाँ बनी कि भारत द्वविपक्षीय और क्षेत्रीय मुक्त व्यापार समझौतों के सम्बन्ध में स्वयं के स्तर से आगे बढ़ने की कोशिश करने लगा।
  3. इसी क्रम में यह एक मेगा मुक्त व्यापार समझौता क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदार (Regional Comprehensive Economic Partnership-RCEP) को लेकर गम्भीर नजर आ रहा है। यह तकनीकी स्तर पर आरसीईपी व्यापार वार्ता समिति की बैठक का 19वाँ दौर है।
  4. विदित हो कि आरसीईपी में एशिया-प्रशांत क्षेत्र के 16 देश शामिल हैं। इसका उद्देश्य व्यापार और निवेश को बढ़ावा देने के लिए इसके सदस्य देशों के बीच व्यापार नियमों को उदार एवं सरल बनाना है।

किन बातों का रखना होगा ध्यान?

  1. भारत ने हमेशा व्यापार को उदार बनाने के लिए बहुपक्षीय दृष्टिकोण का समर्थन किया है, लेकिन यहाँ कुछ बातें ध्यान देने योग्य हैं।
  2. पिछले 10 वर्षों में जिन देशों का भारत के साथ क्षेत्रीय व्यापारिक संधि यानी आरटीए थी और जिनके साथ यह संधि नहीं थी, दोनों ही परिस्थितियों में भारत का निर्यात समान दर से बढ़ा है।
  3. दरअसल, यह तथ्य सामने आया है कि आरटीए के अन्तर्गत टैरिफ में कमी लाने से निर्यात में उतनी वृद्धि नहीं होती है, जितनी कि गंतव्य देशों की आय में वृद्धि से होती है।
  4. विदित हो कि पाँच में से केवल एक निर्यातक ही आरटीए मार्ग का उपयोग करता है, लेकिन इससे भी बड़ी बात यह है कि सम्बन्धित आसियान देशों, कोरिया और जापान के साथ भारत का व्यापार घाटा सम्बन्धित एफटीए पर हस्ताक्षर करने के बाद से दोगुना हो गया है।

क्या हो आगे का रास्ता?

  1. दरअसल, इसमें कोई शक नहीं है कि एफटीए, सिद्धान्त की दृष्टि से एक उद्देश्यपूर्ण आर्थिक नीति है, लेकिन क्या यह व्यवहार में भी उतनी ही लाभदायक है? इस पर बहस की जा सकती है। इसलिए भारत को सोच समझकर आगे कदम बढ़ाना चाहिए।
  2. ध्यातव्य है कि आरसीईपी को लेकर हैदराबाद में जारी वार्ता का देश भर के कई समूहों द्वारा विरोध किया जा रहा है। हालांकि, वार्ता में शामिल भारतीय टीम भारत के हितों की रक्षा कर सकती है और यह सुनिश्चित कर सकती है कि यह एफटीए भारत के लिये अनुचित न हो।

निष्कर्ष-

यह दिलचस्प है कि वर्ष 2004 में प्रमुख अर्थशास्त्री पॉल सैमुअलसन ने कहा था कि ‘मुक्त व्यापार वास्तव में श्रमिकों के लिये बदतर हालत पैदाकर सकता है। लेकिन मुक्त व्यापार के आक्रामक तरफ तारों ने इस पर ठंडी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि बूढ़े आदमी ने अपना विवेक खो दिया है। लेकिन,आज उस बूढ़े व्यक्ति की चेतावनी के प्रति दुनिया सचेत नजर आ रही है।

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Pankaja Singh

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