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मुक्त विश्वविद्यालयों की सीमाएँ | मुक्त शिक्षा में कमियों के कारण

मुक्त विश्वविद्यालयों की सीमाएँ | मुक्त शिक्षा में कमियों के कारण | Limitations of Open Universities in Hindi | Reasons for shortcomings in open education in Hindi

मुक्त विश्वविद्यालयों की सीमाएँ-

भारत जैसे विकासशील देश में मुक्त विश्वविद्यालयों की निम्नलिखित सीमाएँ हैं-

  1. उपयुक्त प्रचार (publicity) की कमी के कारण बहुत से वास्तव में जरूरतमन्द अधिगमकर्ताओं को मुक्त विश्वविद्यालयों या दूरस्थ शिक्षा संस्थाओं के विषय में जानकारी नहीं होती कि हमारे देश में कहाँ-कहाँ पर और किस प्रकार का पाठ्यक्रम प्रदान करने वाले मुक्त विश्वविद्यालय हैं।
  2. रजिस्ट्रेशन और प्रवेश की प्रक्रिया समय और शक्ति खर्च करने वाली है।
  3. मुक्त शिक्षा के व्यावसायिक पाठ्यक्रमों का खर्च अधिक है।
  4. अधिगम सामग्री इतनी विस्तृत नहीं होती कि वह पूरे पाठ्यक्रम को समाहित (Cover) कर सके।
  5. अधिगम सामग्री का मुद्रण अच्छे स्तर का नहीं होता।
  6. शिक्षण सामग्री के लिए प्रयोग में आने वाला कागज अच्छा न होने के कारण लिखित सामग्री का जीवन बहुत कम होता है, जो अधिगमकर्ताओं को अधिगम के प्रति उदासीन कर देता है।
  7. शिक्षण माध्यम/भाषा पर विकल्प के प्रति ध्यान नहीं दिया जाता।
  8. अधिगम सामग्री विद्यार्थियों तक समय से नहीं पहुँचती।
  9. सम्पर्क कक्षाएं बहुत प्रभावशाली और उपयोगी नहीं होती।
  10. मूल्यांकन प्रणाली बहुत विश्वसनीय और उपयोगी नहीं होती।
  11. अनेक व्यावसायिक पाठ्यक्रम बिना किसी भौतिक संसाधनों (Infrastructure) के चलाए जाते हैं जिससे विद्यार्थियों को उपयुक्त साक्षात् अनुभव (Exposure) नहीं मिल पाते।
  12. भारतवर्ष में सूचना तकनीकी (Information Technology) का प्रयोग मुक्त शिक्षा में बहुत कम है और यदि है भी तो प्रभावशाली नहीं है।

मुक्त शिक्षा में कमियों के निम्नलिखित कारण हैं

(The following are the Reasons for the Limitations of Open Education)-

  1. आर्थिक कारणों से व्यक्तिगत मित्रता, आवश्यकताओं व परिस्थितियों के अनुकूल विषय वस्तु और अधिगम सामग्री उपलब्ध कराना प्रायः संभव नहीं होता।
  2. विषयवस्तु का शीघ्र परिवर्तन नहीं हो पाता क्योंकि इस कार्य में बहुत अधिक धन और मानव शक्ति (Man-power) की आवश्यकता होती है।
  3. राज्य स्तरीय मुक्त विश्वविद्यालयों की अनेक कमियों जैसे कि मुद्रित सामग्री का निम्नस्तरीय होना आदि उनकी आर्थिक विपन्नता के कारण ही है।
  4. संपर्क कार्यक्रमों का आयोजन करने वाले लोगों को संपर्क कक्षाओं की कार्य प्रणाली का ज्ञान ही नहीं होता अतः ये कक्षाएँ सामान्य औपचारिक कक्षाओं जैसी हो (Modus Operandi) जाती हैं, जिनमें व्याख्यानों (Lectures) का प्रयोग होता है, फलस्वरूप दूरस्थ अधिगमकर्ता (Distance Learners) इस प्रकार के कार्यक्रमों से लाभान्वित नहीं होते।
  5. सम्पर्क कार्यक्रमों व शैक्षिक निर्देशनों के लिए निपुण व सक्षम व्यक्ति उपलब्ध इसलिए नहीं होते क्योंकि उन्हें उचित पारिश्रमिक नहीं मिलता है।
  6. मूल्यांकन पद्धति बहुत विश्वसनीय नहीं है, क्योंकि मूल्यांकनकर्ता या परीक्षक इन विद्यार्थियों की उत्तरपुस्तिकाओं का मूल्यांकन गम्भीरता से नहीं करते हैं। उत्तर पुस्तिकाओं को ध्यान मेंसे न देखने के कारण ये लोग टिप्पणियाँ (Comments) लिखने में असमर्थ होते हैं, जबकि टिप्पणियाँ या प्रतिपुष्टि (Feedback) दूरस्थ विधि का केन्द्रीय हिस्सा है।
  7. जहाँ तक मुक्त विश्वविद्यालयों द्वारा आधुनिक सूचना तकनीकी के प्रभावशाली प्रयोग का प्रश्न है, वास्तविक कारण तो यही है कि हमारी जनसंख्या के सीमित वर्ग के पास ही कम्प्यूटर की सुविधाएँ उपलब्ध है अतः अधिगम कर्ताओं का एक विशाल समूह कम्प्यूटर सुविधा से वंचित है, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि भारत की जनसंख्या के एक वर्ग ने टेलीफोन की डायल टोन तक नहीं सुनी है ऐसी स्थिति में आधुनिक संचार तकनीकी का उपयुक्त या अपेक्षित सीमा तक प्रयोग एक कल्पना मात्र है।
  8. मुक्त शिक्षा के अधिगमकर्ताओं तक पाठ्य सामग्री का समय पर उपलब्ध न होने का कारण, डाक विभाग (Postal Department) की लापरवाही तथा बिजली की कटौती है जिससे कि पत्राचार के साथ-साथ रेडियो, दूरदर्शन आदि के शैक्षिक कार्यक्रम भी अपनी समय-सारिणी के अनुरूप उन तक नहीं पहुंच पाते।
  9. मुक्त शिक्षा में भी पंजीकरण बढ़ने के कारण विज्ञान, तकनीकी तथा व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के लिए प्रयोगशाला आदि की सुविधा उपलब्ध कराना असंभव है।
  10. मुक्त शिक्षा में सभी छात्रों को शिक्षा, मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा में उपलब्ध कराने के लिए पाठ्यक्रम और अधिगम सामग्री उपलब्ध कराना एक अत्यन्त कठिन कार्य है। विशेष रूप से बहुभाषी देश भारत में।
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Pankaja Singh

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