शिक्षाशास्त्र

मूल्य और सदगुण | मूल्यों में स्थानक्रम

मूल्य और सदगुण | मूल्यों में स्थानक्रम

मूल्य और सदगुण (Values and Virtues)

मूल्य और सद्गुण में भी घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। प्रो० जे० एस० बूबेकर ने लिखा है कि सद्गुण नैतिक गुण है। आगे भी उन्होंने कहा है कि “वास्तव में सद्गुण एक अच्छे की अपेक्षा एक योग्य संकल्प के चिह्न होते हैं।”

इस कथन से स्पष्ट है कि जो चीज अच्छी है, जिसका सम्बन्ध योग्यता और संकल्प से है उसका मूल्य अवश्य ही होगा। सद्गुण (सद्+गुण) का सही अर्थ “अच्छे चिह्न (Good marks) से ही होता है जो मनुष्य के आचरण में मिलता है।

मूल्य और सद्गुण के सबन्ध में जो विचार प्रो० जी० डब्ल्यू० कनिंघम ने ‘प्रॉब्लेम्स ऑफ फिलॉसफी’ में दिये हैं उनसे दोनों के बारे में हमें ज्ञात होता है। इन्होंने ‘मनुष्य‘ और ‘सद्गुण’ के सन्दर्भ में मूल्यों की कल्पना की है-

उद्धरण से हमें मनुष्य (जीवन), सद्गुण और मूल्य में एक घनिष्ठ सम्बन्ध मिलता है। मनुष्य में शरीर और आत्मा है जिसका मूल्य तो होता ही है। शरीर तथा आत्मा का मूल्य सद्गुणों की प्राप्ति, उसके विकास एवं व्यवहार में पाया जाता है। शरीर के विचार से भौतिक मूल्य होता है और शरीर सभी कामों को करता है, उससे जो सन्तुष्टि मनुष्य की होती है वह उसकी आत्मा की अनुभूति होती है। अतएव सद्गुण का मूल्य मनुष्य के शरीर और आत्सा दोनों के लिये होता है। अस्तु मानव जीवन में सद्गुण एवं मूल्य का स्थान भी निश्चित हो जाता है। दोनों अविच्छेद्य ही नहीं है बल्कि सद्गुण मूल्य का कारण है।

मूल्यों में स्थानक्रम (Hierarchy of Values)

दार्शनिकों के चिन्तन के परिणामस्वरूप विभिन्न मूल्यों का स्थानक्रम निर्धारित किया जाता है। शिक्षा की दृष्टि से भी इन मूल्यों का स्थानक्रम आवश्यक माना जाता है क्योंकि इन्हीं के आधार पर ज्ञान एवं अनुभव को विषय के रूप में महत्व दिया जाता है और शिक्षा के मानक, आदर्श और उद्देश्य भी निश्चित किये जा सकते हैं। शिक्षा के स्तर निश्चित करना भी सरल होता है। मूल्यों का स्थानक्रम जिसे अंग्रेजी में Hierarchy कहा जाता है मूल्यों को उच्च या निम्न बताने में पाया जाता है। यह स्थानक्रम कैसे निश्चित होता है इस सम्बन्ध में प्रो० जे० एस० डूबेकर ने लिखा है कि “वे मूल्य जो अधिक समय तक रहते हैं, सम्पूर्णतया उत्कृष्ट होते हैं और जिनकी विशेषता कम समय तक पाई जाती है वे निम्न होते हैं। इसी प्रकार से वे मूल्य जो अधिक व्यापक होते हैं या बहुमुखी होते हैं वे उन मूल्यों की अपेक्षा जो अधिक सीमित और कम विभिन्न होते हैं प्राथमिकता रखते हैं। अधिक उत्पादकता, अधिक सृजनात्मकता की विशेषता रखने वाले मूल्यों के बारे में भी करीब-करीब यही कहा जा सकता है।”

मूल्यों को स्थानक्रम तत्वमीमांसा (Metaphysics) के अनुसार दिया गया है। अपने देश एवं विदेश में भी इस विचार से तत्वमीमांसा या आध्यात्मशास्त्र के आधार पर उच्च एवं निम्न स्थान मूल्यों को प्रदान किया जाता है। इस आधार पर उदाहरणार्थ मनुष्य एक मानवीय प्राणी के रूप में अधिक उच्च मूल्य रखता है यदि वह अपनी आत्मा की या अपने आपकी अधिकाधिक अनुभूति करता है क्योंकि पशु इस मूल्य से वंचित होता है, उसमें यह क्षमता नहीं होती है। अतएंव सभी प्राणियों या जीवों में मानव प्राणी सर्वोच्च मूल्य रखता है और सर्वोच्च मूल्य उस व्यक्ति में होता है जिसे आत्मा की अनुभूति होती है। इस प्रकार के स्थानक्रम बताने में हमें मनुष्य की शक्तियों की ओर भी ध्यान देना पड़ता है। मनुष्य में भौतिक या शारीरिक तथा अभौतिक या आध्यात्मिक शक्ति होती है। मनुष्य में बुद्धि और मेधा की अद्वितीय शक्ति होती है अतएव ज्ञान को सर्वोच्च स्थान दिया जाता है और ज्ञानप्रद विषयों जैसे गणित, विज्ञान, दर्शन, मानविकी को शारीरिक या श्रम-क्रिया सम्बन्धी विषयों की अपेक्षा ऊँचा स्थान दिया जाता है। नीचे हम मूल्यों का स्थानक्रम आरोही ढंग से प्रकट करते हैं-

आध्यात्मिक मूल्य जो मनुष्य की आत्मानुभूति में मिलता है।

दार्शनिक मूल्य जो मनुष्य के ज्ञान और चिन्तन-मनन में मिलता है।

मनोवैज्ञानिक मूल्य जो मनुष्य के व्यवहारों-क्रियाओं में पाया जाता है।

सामाजिक मूल्य जो मनुष्य द्वारा बनाई गई संस्थाओं में पाया जाता है।

शारीरिक मूल्य जो पशु, मनुष्य आदि जीवों में मिलता है।

भौतिक मूल्य जो विभिन्न पदार्थों में मिलता है।

यह स्थानक्रम लोगों को कहाँ तक स्वीकार्य है यह उनके दार्शनिक दृष्टिकोण एवं उनकी विचारधारा और अनुभूति पर निर्भर करता है। ऐसा स्थानक्रम एक आदर्शवादी को मान्य होगा परन्तु एक पदार्थवादी अथवा वस्तुवादी या प्रयोगवादी को मान्य नहीं हो सकता है, वे अपना-अपना स्थानक्रम अलग-अलग निश्चित करेंगे। इससे इतना निश्चित हो जाता है कि सभी विचारधाराओं में मूल्यों का स्थानक्रम (Hierarchy of values) होता है। इसकी मान्यता भी होती है।

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Pankaja Singh

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