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मीराबाई के पद्यांशों की व्याख्या | मीराबाई के निम्नलिखित पद्यांशों की संसदर्भ व्याख्या

मीराबाई के पद्यांशों की व्याख्या | मीराबाई के निम्नलिखित पद्यांशों की संसदर्भ व्याख्या

मीराबाई के पद्यांशों की व्याख्या

  1. फागुन के दिन चार रे, होरी खेल मना रे।

बिनि करताल पखाबज बाजै, अणहद की झणकार रे।

बिन सुर राग छतीसूं गावै, रोम रोम रंग सार रे।

सील संतोख की केसर घोली, प्रेम प्रीति पिचकार रे।

उड़त गुलाल लाल भयो अंबर, बरसत रंग अपार रे।

घट के पट खोल दिये हैं, लोक लाज सब डार रे।

होरी खेल पीव घर आये, सोई प्यारी प्रिय प्यार रे।

मीरा के प्रभु गिरधर नागर, चरण कंवल बलिहार रे॥

सन्दर्भ- मीराबाई समाधि की अवस्था का वर्णन होली खेलने के रूप में कर रही हैं।

वव्याख्य- फागुन मास मे होली खेलने का समय अति-अल्प होता है। अतः हे मन। तू मन भरकर होली खेल ले। अभिप्राय यह है कि जीवन अस्थायी है, इसलिए भगवान से प्रेम कर ले। होली के उत्सव में संगीत आदि का आयोजन होता है। इसी प्रकार ध्यानावस्था में मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि करताल, पखावन आदि बाये बज रहे हों और अनहद (ब्रह्म-शब्द) नाद सुनाई दे रहा है। मेरा हृदय बिना स्वर और राग के अनेक राग गाता रहता है और रोम-रोम भगवान के प्रेम में डूबा रहता है। मैंने प्रियतम से होली खेलने के लिए शील और सन्तोष की केसर का रंग बनाया है और रंग डालने के लिए प्रेम की पिचकारी बनाई है। पिचकारी द्वारा रंग फेंकने से सारा आकाश लाल हो गया है अर्थात् मेरा हृदय अनुराग के रंग से सराबोर हो गया है। सन्तोष और शील को अपनाकार मैंने भगवान से प्रेम करना प्रारम्भ कर दिया है और उसमें निरन्तर मग्न रहती हूँ। मैंने भगवान को समस्त अर्पण कर दिया है। अब मुझे लोक-लज्जा का कोई भय नहीं है। जिसका प्रियतम घर ही स्वयं होली खेलने आवे वह स्त्री अपने प्रेमी की सच्ची प्रेयसी है। मेरे स्वामी गिरधरनागर हैं। उनके चरण कमलों में मैंने अपना बलिदान कर दिया है।

  1. दरस बिन दूखण लागै नैण।

जब के तुम बिछुरे प्रभु मेरे, कबहूँ न पायो बैण।

सबद सुणत मैरी छतियाँ कौपै, मीठे-मीठे बैण।

बिरह बिथा कासूं कहूँ सजनी, बह गई करवत ऐण।

कल न परत पल हरि मग जोवत, भई छमासी रैण।

मीरा के प्रभु कब रे मिलोगे, दुख मेटण सुख दैण।

सन्दर्भ- प्रस्तुत पद मे विरहिणी मीरा अपनी विरहानुभूति अभिव्यक्त कर रही है। अन्तमें वह अभिलाषा करती हैं कि दुःख दूर करके सुख देने के लिए उसके प्रियतम कब मिलेंगे

व्याख्या- हे प्राण-प्रभु! जब से तुमसे बिछुड़ गई हूँ, तब से मुझे कभी भी चैन नहीं मिला। तुम्हारे दर्शन के लिए प्यासे नैन अब प्रतीक्षा करते-करते दुखने लगे हैं। तुम्हारी मीठी-मीठी बातें याद कर मेरा हृदय कांप उठता है। तुम्हारी प्रतीक्षा करते हुए मुझे एक क्षण भी चैन नहीं पड़ता। एक पल का समय भी छः मास की रात्रि के समान लम्बा हो रहा है। मैं अपनी विरह दशा किससे कहूँ, वह तो काशी- करवट लेकर स्वयं ही नष्ट हो रही है। प्रभु दुःख मेटकर सुख देने के लिये तुम मुझे कब मिलोगे ?

  1. सखी री लाज बैरन भई।

श्री लाल गुपाल ने संग, काहे नाहिं गई।

काठिन क्रूर अक्रूर आयो, साजि रथ कैंह नई।

रथ चढ़ाय गोपाल लैगो, हाथ मीजत रही।।

कठिन छाती स्याम बिछुरत, बिरह में तन तई।

दास मीरा लाल गिरधर, बिखर क्यो ना गई।।

सन्दर्भ- प्रस्तुत पद मे विरह-व्याकुल मीरा का कथन सखी के प्रति है।

व्याख्या- हे सखी ! मेरे लिए तो लाज बैरिन हो गयो। मैं श्रीकृष्ण के मथुरा चले जाने के समय उनके साथ क्यों न लग गयी ? क्रूर हृदय अक्रूर उनको रथ पर चढ़ाकर ले गया और मैं देखती हुई पछताती रही। मेरा हृदय बहुत कठोर है, जो श्याम के विरह में संतप्त होते हुए भी फट नहीं जाता। मैं गिरधरलाल के वियोग में बिखर क्यों नहीं गयी?

विशेष- विप्रलंभ शृंगार-ग्लानि विरहावस्था।

  1. नैणा लोभी रे बहुरि सके नहिं आइ।

रूम रूम नखसिख सब निरखत ललाके रहे ललचाइ।

मैं ठाड़ी ग्रिह आपणे री, मोहन निकसे आइ।

बदन चंद परकासत हेली, मंद मंद मुसकाइ।

लोक कुटुम्बी बरजि बरजहीं, बतिया कहत बनाइ।

चंचल निपट अटक नहिं मानत, पर हथ गये बिकाइ।

भली कहौ कोई बुरी कहौ मैं; सब ताई सीस चढ़ाइ।

मीरा कहै प्रभु गिरधर के बिन, पल भरि रहयौ न जाइ।।

सन्दर्भ- कृष्ण के प्रेम में दीवानी हुई मीरा का कथन सखी के प्रति है

व्याख्या- हे सखी ! कुष्ण के रूप के लोभी मेरे नेत्रों ने कृष्ण की छवि को एक बार देखा और देखकर उन्हीं के पास रह गये। फिर लौट कर नहीं आये। वे कृष्ण के नख-शिख सौन्दर्य को ललककर और ललचाकर देखते रह गये। हे सखी ! मैं अपने घर पर खड़ी हुई थी। उधर से श्रीकृष्ण आ निकले। उन्होंने मन्द-मन्द मुस्कराकर अपने चन्द्रमुख का प्रकाश कर दिया। संसार के लोग तथा कुटुम्बी जन नाना प्रकार की बातें बनाकर मुझे प्रेम करने से मना करते हैं। लेकिन मेरे निपट चंचल बने हुए नेत्र मना करना नहीं मानते। वे दूसरे के हाथ बिक गये हैं। मुझे चाहे कोई बुरा कहे और चाहे कोई भला कहे, मैंने तो कृष्ण के प्रेम में पड़कर सभी कुछ शीश चढ़ा दिया है। मीरा कहती है कि प्रभु गिरधर नागर के बिना अब पलभर भी नहीं रहा जाता।

अलंकार- (1) ‘रूंम-रूम’ और ‘मन्द-मन्त्र’ में पुनरुक्तिप्रकाश।

(2) ‘बदन चन्द’ में रूपक।

  1. म्हारो ओलगिया घर आज्यो जी।

तणरी ताप मिट्याँ सुख पास्याँ, हिलमिल मंगेल गाज्यो जी।

धणरी धुण सुण मोर मगण भयाँ, म्हारे आँगण आज्यो जी।

चन्दा देख कमोदण फूलां, हरख भयाँ म्हारे छाज्यो जी।

रूम रूम हारो तीतल सजणी, मोहन आँगण आज्यो जी।

सब भगताँरा कारज साधाँ, म्हारा परण निभाज्यो जी।

मीरा विरहण गिरधर नागर, मिल दुख दंदा छाज्यो जी॥

सन्दर्भ- प्रस्तुत पद में मीरा प्रियजन-मिलन का आनन्द वर्णन कर रही हैं

व्याख्या- हमारा प्रवासी प्रियतम लौटकर घर आ गया है। प्रियतम के मिलन से शरीर की पतन दूर हो गयी व मुझे अति आन्नद मिला। मैंने प्रियतम से हिल-मिलकर मंगल-गान किया। जिस प्रकार बादलो की ध्वनि सुनकर मोर मग्न हो जाता है, उसी प्रकार प्रियतम से मिलकर मैं आँगन में नाच उठी। मैं अपने प्रियतम-प्रभु से मिलकर आनन्द-मग्न हो गयी। मेरी सारी पीक्ष दूर हो गयी। जिस प्रकार चन्द्रमा को देखकर कुमुदिनी खिल जाती है, उसी प्रकार प्रियतम के दर्शन से मेरा हृदय आनन्द से खिल उठा। हे सखी ! भगवान मेरे राज-भवन में आये हैं। उनके आने से मेरे शरीर की रग-रग शीतल हो गयी है। जिन प्रभु ने समस्त भक्तों के कार्य किये हैं, उन्हीं प्रभु को मैंने पा लिया है। यह विरहिणी मीरा प्रियतम के मिलन से शान्त और शीतल हो गयी है और सारा दुःख-द्वन्द्व दूर हो गया।

  1. 6. हेरी मैं तो दरद दिवाणी मेरो दरद न जाणे कोय।

घायल की गति घायल जाणे, की जिन लाई होय।

जौहरी की गति जौहरी जाणे, की जिन जौहर होय।

दरद की मारी वन वन डोलूँ, वैंद मिला नहिं कोय।

मीरा के प्रभ पीर मिटैगी, जब वैद साँवलिया होय।।

सन्दर्भ- प्रस्तुत पद में मीरा अपना विरह-वर्णने कर रही हैं।

व्याख्या- मीरा कहते है कि हे सखी ! मैं तो विरह की पीड़ा से उन्मत्त हो रही हूँ। मेरी वेदना कोई नहीं जानता। मेरी सेज शूली पर है। अतः प्रियतम के साथ मेरा किस प्रकार सोना हो सकता है? मेरे प्रियतम की सेज शून्य मण्डल में है। अतः मैं किस प्रकार उनसे मिल सकती हूँ? घायल की गति घायल ही जानता है या वह जानता है कि जिसके हृदय में लगी होती है। जौहरी की गति जौहरी ही जानता है या वह जानता है जिसने जौहर किया हो। मैं व्यथा की मारी हुई वन-वन डोल रही हूँ, किन्तु मेरी व्यथा को दूर करने वाला कोई भी वैद्य नहीं मिला। मीरा कहती है कि मेरी पीड़ा तभी मिट सकती है, जब साँवलिया वैद्य बनकर आवे। अर्थात् स्वयं कृष्ण जब तक मेरी विरह-व्यथा को दूर नहीं करते तब तक इस पीड़ा से छुटकारा असम्भव है।

विशेष- (1) अलंकार – स्वभावोक्ति, दृष्टान्त अलंकार।

(2) रस- विप्रलम्भ शृंगार, करुण रस।

  1. कोई कछु कहे मन लागा।

ऐसी प्रीति लगी मनमोहन सूं, ज्यूँ सोने में सोहागा।

जनम जनम का सोया मनुवाँ, सतगुरु सबद सुण जागा।

मात पिता सुत कुटुम्ब कबीला, टूट गयो ज्यूँ तागा।

मीरा के प्रभु गिरिधर नागर, भाग हमारा जागा॥

सन्दर्भ- पूर्ववत

व्याख्या- चाहे कोई कुछ कहे, मेरा मन तो हरि में लग गया है। जिस प्रकार सोहागा सोने में लगकर उसे निखार देता है, उसी प्रकार मेरी प्रीति मनमोहन से लगी है। सतगुरु ने मेरे जन्म-जन्म के सोये मन को जगा दिया है। प्रभु के रंग में रंगते ही माता-पिता, पुत्र, कुटुम्ब आदि का सम्बन्ध कच्चे धागे की तरह टूट गया। सतगुरु और सतगुरु के बताये मार्ग से हरि को पाकर मीरा कहती है कि मेरे भाग्य जग गये।

  1. म्हारो जनम मरन को साथी, थांने नहिं बिसरु दिन राती।

तुम देख्याँ बिन कल न पड़त है, जानत मेरी छाती॥

ऊँची चढ़ि-चढ़ि पंथ निहारूँ, रोय-रोय अँखियाँ राती।

यो संसार सकल जग झूंठा, झूंठा कुलरा न्याती।।

दोउ कर जोड्याँ अरज करत हूँ, सुण लीज्यो मेरि बाती।

सतगुरु हस्त धर्यो सिर ऊपर, आँकुस दै समझाती।।

पल पल तेरा रूप निहारूँ, निरख-निरख सुख पाती।

मीरा के प्रभु गिरधर नागर, हरि चरणां चित राती॥

सन्दर्भ- मीरा श्रीकृष्ण को सर्वस्व समर्पण करती हुई कहती है-

व्याख्या- हे कृष्ण ! तुम मेरे जन्म-मरण के साथी हो, मैं तुमको नहीं भूलूंगी। तुमको बिना देखे मुझे चैन नहीं पड़ता, इस बात को मेरा हृदय जानता है। मैं ऊंची अटारी पर चढ़कर तुम्हारे आने का रास्ता देखती हूँ। मेरे नेत्र रो-रोकर लाल हो गये हैं। यह सारा संसार असत्य है और कुल परिवार तथा सम्बन्धी झूठे हैं। मैं दोनों हाथ जोड़कर विनय करती हूँ। मेरी बात सुन लीजिए। सद्गुरु ने मेरे सिर पर हाथ रखकर मुझे समझाया। मैं पल-पल में तुम्हारा रूप देखती हूँ और देख-देखकर सुखी होती हूँ। मीरा कहती है कि मैंने प्रभु गिरधरनागर के चरणो में चित्त लगा दिया है।

विशेष- (i) विप्रलंभ शृंगार। (ii) अलंकार -अनुप्रास।

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