राजनीति विज्ञान

संविधान का अर्थ | सांविधानिक सरकार का अर्थ | संविधानवाद का अर्थ | संविधानवाद की विशेषताएँ

संविधान का अर्थ | सांविधानिक सरकार का अर्थ | संविधानवाद का अर्थ | संविधानवाद की विशेषताएँ

संविधान का अर्थ

(Meaning of Constitutionalism)

वर्तमान विचारधारा के अनुसार “संविधानिक राज्य वही है जो समकालीन लोकतन्त्रात्मक प्रतिनिधित्व की ऐसी प्रणाली पर आधारित हो जिससे जनता की सम्प्रभुता निश्चित हो जाये।” सामान्य रूप से संविधानवाद ऐसी राजनीतिक व्यवस्था है जिसका संचालन कानून एवं नियमों द्वारा होता है। इसमें शक्तियों के केन्द्रीयकरण तथा निरंकुश सम्प्रभुता को कोई स्थान नहीं होता और यह प्रजातान्त्रिक भावना और व्यवस्था पर आधारित होता है।

संविधानवाद का अर्थ समझने के लिए पहले संविधान और संविधान सरकार का अर्थ समझना आवश्यक है।

संविधान का अर्थ (Meaning of Constitution)- फ्रेड्रिक के अनुसार रूप से नियमित किया हुआ नियन्त्रण’ है। फाइनर ने संविधान को ‘शक्ति-सम्बन्धों की आत्मकथा’ कहा है। गार्नर के अनुसार संविधान के तीन मुख्य तत्व हैं- स्वतन्त्रता, सरकार तथा प्रभुसत्ता का गठन।

संविधान का पूर्णरूप से लिखित होना आवश्यक नहीं है। संविधान तो समस्त लिखित- अलिखित कानूनों और नियमों का संग्रह है जिनके आधार पर किसी देश की शासन-व्यवस्था संगठित की जाती है तथा शासन के बहुत से अंगों के मध्य शक्तियों का वितरण करते हुए शक्तियों का प्रयोग करने के लिए सिद्धान्तों को निधारित किया जाता है।

संविधान का अर्थ समझने के लिए यह भी ध्यान में रखना आवश्यक है कि औपचारिक ढांचा क्या व्यवस्था करता है तथा इसे व्यावहारिक रूप में किस प्रकार प्रयोग में लाया जाता है। संविधान के अनुरूप राजनीतिक शक्तियों का प्रयोग न होने पर उसे एक ‘औपचारिक संविधान’ कहा जायगा । शक्तियों का प्रयोग होने वाले राजनीतिक आचरण को ‘प्रभावी संविधान’ कहा जाएगा।

सांविधानिक सरकार का अर्थ

(Meaning of Constitutional Government)-

सांविधानिक सरकार का अर्थ सीमित दृष्टिगोचर होता है। प्रत्येक राज्य में किसी भी तरह का संविधान होना आवश्यक है परन्तु सांविधानिक सरकार हो यह आवश्यक नहीं है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि संविधान की उपस्थिति मात्र से सरकार संवैधानिक नही हो जाती, नयोंकि संवैधानिक सरकार उसे ही कहा जा सकता है जो किसी व्यक्ति अथवा दल की विधि के अनुसार संचालित होती और संविधान द्वारा सीमित एवं नियंत्रित होती है।

संविधानवाद का अर्थ

(Meaning of Constitutionalism)-

कार्ल जे० फ्रेड्रिक का कथन है कि “शक्ति-विभाजन सभ्य शासन अथवा सरकार का आधार है और यही संविधानवाद का अभिप्राय है।” इस कथन को कहने का अभिप्राय यह है कि शक्तियों के विभाजन से सरकार के कार्यों पर प्रभावशाली नियंत्रण स्थापित हो जाता है तथा संविधानवाद का अस्तित्व इसी स्थिति में सम्भव है। अधिकारीतंत्र संविधानवाद के कारण निरपेक्ष नहीं हो पाता । संविधान शक्तियों के पृथक्करण के लिए आवश्यक होता है। जे० एस० राऊसैक ने उक्त मत की पुष्टि करते हुए कहा है-“धारणा के रूप में संविधानवाद का आशय है कि यह अनिवार्य रूप में सीमित सरकार और शासित तथा शासन पर नियंत्रण की एक व्यवस्था है।”

(संविधानवाद के विषय में यह भी कहा गया है कि उन विचारों और सिद्धान्तों की ओर संकेत करता है जो उस संविधान का विवरण और समर्थन प्रस्तुत करते हैं जिनके द्वारा राजनीतिक शक्ति पर प्रभावपूर्ण नियन्त्रण स्थापित किया जा सकता है । संविधानवाद के अनुसार शासन संविधान के अनुसार संचालित होना चाहिए तथा उस पर प्रभावशाली नियंत्रण होना चाहिए जिससे उनके मूल्यों और राजनीतिक आदर्श सुरक्षित रहें। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि संविधान के नियमों के अनुसार शासन-संचालन संविधानवाद समझा जाए। वास्तव में संविधानवाद ‘विधिसम्मत शासन’ में निहित होता है जिसमें मनुष्य की आधारभूत मान्यताएँ आस्थाएँ तथा मूल्यों की व्यावहारिक उपलब्धियाँ सम्भव हो सकें।

विद्व ने विभिन्न प्रकार से संविधानवाद के आशय को स्पष्ट किया है। संक्षेप में इसका तात्पर्य है कि शासन संविधान या नियमों के अनुसार होना चाहिए तथा शासन सत्ता मनमाने रूप में शक्ति का प्रयोग न करे । जोरी और अद्राहम के अनुसार-“स्थापित संविधान के निर्देशों के अनुरूप शासन को संविधानवाद माना जाता है!” के० सी० बीयर ने संविधानवाद का अर्थ अधिक स्पष्ट करते हुए कहा है कि निरंकुश शासन के विपरीत नियमानुकूल शासन केवल अधिकार का उपयोग करने वालों की इच्छा या क्षमतानुसार चलने वाला शासन नहीं वरन संविधान के नियमों के अनुसार चलने वाला शासन होता है। इस प्रकार संविधानवाद को ‘उत्तरदायी सरकार’ भी कहा जा सकता है जिसे व्यवस्थापिका कहा जाता है और जो या तो स्वयं जनता के प्रति या जनता के प्रतिनिधियों के प्रति उत्तरदायी होती है।

संविधानवाद को प्रजातन्त्र या प्रजातंत्र के समरूप समझा जा सकता है। संविधानवाद स्वतन्त्रता का रक्षक है तथा यह रक्षा न्यायालय माध्यम से होती है।

संविधानवाद में शासन सत्ता के परिवर्तन के लिए हिंसात्मक तथा निरंकुश साधनों को अपनाये जाने की सहमति नहीं होती। यह एक जटिल पद्धति है तथा इसका मुख्य लक्ष्य शान्तिपूर्ण या सुव्यवस्थित एवं अहिंसात्मक परिवर्तन करना है।

स्पष्ट रूप से संविधानवाद को निश्चित सीमा या परिभाषा में नहीं बांधा जा सकता।

संविधानवाद की विशेषताएँ

(Characteristics of constitutionalism)

संविधानवाद की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित प्रकार हैं:-

(1) मूल्य सम्बद्ध विचारधारा (Value based Concepts)-  संविधानवाद एक मूल्य सम्बद्ध विचारधारा है तथा यह राष्ट्र के जीवन-दर्शन से सम्बन्धित है। इसमें राष्ट्र के जीवन-दर्शन में पूर्व विद्यमान सभी तत्वों का समावेश होता है। संविधानवाद में राष्ट्र के निवासियों को प्रिय या राष्ट्र के जीवन आधार के सभी मूल्यों, विश्वासों तथा राजनीतिक आदर्शों का दर्शन होता है। सांविधानिक दर्शन का उदय देश के कुछ बुद्धिजीवियों द्वारा होन पर भी इसका तेजी से प्रसार होता है तथा यह मध्यम वर्ग को प्रभावित करते हुए सम्पूर्ण वर्ग को प्रभावित करते हुए सम्पूर्ण जनता में फैल जाता है। इस प्रकार सामाजिक स्वीकृति मिल जाने पर संविधानवाद दृढ़ हो जाता है। संविधानवाद का दर्शन बुद्धिजीवियों द्वारा प्रसारित होने पर भी इस पर देश की परम्पराओं, परिस्थितियों, समस्याओं की स्पष्ट छाप होती है। वास्तव में संविधानवाद विभिन्न केन्द्रों अथवा स्थानों से निर्मित मूल्यों से धारण होती है तथा मूल्यों का सम्बन्ध राष्ट्र के जीवन दर्शन से होता है; अतः ये समाज को बहुत प्रिय होते हैं तथा इनकी रक्षा, उपलब्धि तथा प्रगति के लिए समाज बड़े से बड़ा बलिदान करने के लिए तैयार रहता है। समाज द्वारा अमान्य मूल्य संविधानवाद में स्थान नहीं पा सकते । पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार संविधानवाद के दो पहलू हैं-साधन और साध्य । इन दोनों पहलुओं का संविधानवाद में उपस्थित होना आवश्यक है।

(2) गतिशील विचारधारा (Dynamic Concept)- संविधानवाद एक गतिशील विचारधारा है, परन्तु इसमें स्थायित्व भी होता है। स्थायित्व के साथ गतिशीलता ही इसकी विशेषता है। संविधानवाद में गतिशीलता होना आवश्यक है, नहीं तो इसका विकास परिवर्तन के अनुसार नहीं हो सकेगा तथा लोचशीलता भी नहीं होगी। उसमें लम्बे समय तक सजीवता भी नहीं रह सकेगी। संविधानवाद लोगों में प्रिय सामाजिक मूल्यों एवं आस्थाओं का प्रतीक मात्र नहीं है वरन् नये मूल्यों की स्थापना तथा प्राप्ति का माध्यम भी है। संविधानवाद वर्तमान के प्रिय मूल्यों तथा आदर्शों के साथ ही भविष्य की आकांक्षाओं का प्रतीक है। गतिशीलता होने के कारण इसे विकास की प्रक्रिया भी कहा गया है।

(3) संस्कृति-सम्बद्ध विचारधारा (Culture based Concept)-  संविधानवाद के संस्कृति से सम्बद्ध होने से इसमें वास्तविकता आती है। प्रत्येक देश के मूल्य अपने समाज की संस्कृति से जुड़े होते हैं। देश के आदर्श मूल्य तथा विचारधाराएँ संस्कृति की उपज होते हैं। वे आदर्श मूल्य, सिद्धान्त, समय, स्थान तथा जनता से सम्बद्ध रहते हैं। इन्हीं आदर्शों, मूल्यों तथा सिद्धान्तों पर संविधानवाद आधारित होता है। देश की संस्कृति विविध होने पर भी संविधानवाद वहाँ समन्वय का सूचक होता है। इस समन्वयकारी शक्ति के कारण ही इसका निरन्तर विकास होता है तथा इसी शक्ति द्वारा वह देश या समाज में व्याप्त संघर्षों तथा विरोधों पर विजय प्राप्त कर सामंजस्य तथा सहयोग का निर्माण करता है।

(4) समभागी विचारधारा (Culture based Concept)-संविधानवाद एक समभागी विचारधारा है। कुछ दूसरे देश भी एक राष्ट्र के मूल्यों, विश्वासों, राजनीतिक आदर्शों तथा संस्कृति के प्रति अपनी निष्ठा रख सकते हैं। इस प्रकार के देशों में संविधानवाद में आधारभूत समानताएँ पायी जाती हैं। इस प्रकार यह हमारे सम्मुख अपना समभागी व्यक्तित्व प्रस्तुत करता है। इस प्रकार की समानता में केवल मात्रा का अन्तर पाया जाता है। यह अन्तर साम्यवादी देशों में भी पाया जाता है। विकासशील देशों में अधिक असमानताएँ पायी जाती हैं, अपना अहं होता है तथा वह अपने मौलिक जीवन-दर्शन की स्थापना का प्रयास करता है। इसके बाद भी इन देशों की संस्कृति में मैत्री अधिक पायी जाती है। इन देशों के संविधानवाद में भी समानता पायी जाती है। इस प्रकार संक्षेप में कहा जा सकता है कि संविधानवाद एक समभागी विचारधारा है।

(5) संविधान पर आधारित विचारधारा (Constitution based Concept)-  प्रायः सभी देशों में आधारभूत आस्थाएँ पायी जाती हैं तथा देश का संविधान इन्हीं आस्थाओं का प्रतिनिधित्व करता है। संविधानवाद में भी इसी संविधान की छाप दिखाई देती है, लेकिन सदैव ऐसा होना आवश्यक नहीं है। कई बार संविधानवाद के आदर्श संविधान में नहीं पाये जाते। यह स्थिति खतरनाक होती है क्योंकि यह स्थिति देश में शासकों तथा शासितों की राजनीतिक मान्यताओं में विरोध एवं तीव्र मतभेद को दर्शाती है। इस स्थिति में देश में राजनीतिक उथल-पुथल उत्पन्न हो सकती है। वास्तव में यह आस्था एक निश्चित संकट की सूचना देती है, परन्तु सामान्य परिस्थितियों में संविधानवाद के आदर्श संविधान में निहित रहते हैं। किसी भी लोकतांत्रिक समाज के आदर्शों का स्पष्ट उल्लेख उसके संविधान में मिलता है। संविधानवाद की नींव को स्थायित्व इसी प्रकार के संविधान से प्राप्त होता है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि संविधान द्वारा प्रस्तुत आधारशिला पर ही संविधानवाद की नींव टिकी होती है। इसके अस्त-व्यस्त होने पर संविधानवाद भी अस्त-व्यस्त हो जाता है। परन्तु यह स्थिति असामान्य स्थिति में ही उत्पन्न होती है।

(6) प्रधानतः साध्यमूलक अवधारणा (Predominately Ends Concept)- संविधानवाद मुख्य रूप से साध्यों से सम्बन्धित विचार होते हुए भी साधनों की पूर्ण उपेक्षा नहीं कर सकता। साधन प्रधान विचार भी साध्यों अथवा लक्ष्यों के प्रति पूर्ण उदासीन नहीं रह सकते । साधन और साध्य का घनिष्ठ सम्बन्ध होता है तथा इसमें मुख्य रूप से मात्रा का ही अन्तर होता है। फिर भी संविधानवाद का मुख्य संकेत साध्यों अथवा लक्ष्यों की ओर होता है। क्योंकि सम्बन्ध उन आदर्शों से अधिक होता है जिनको नागरिक प्राप्त करना चाहते हैं। इस प्रकार संविधानवाद का महत्वपूर्ण लगाव साध्यों अथवा लक्ष्यों से होता है।

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट होता है कि संविधानवाद का आधार कुछ विशेष विचारधाराएँ है। ये विशेषताएँ प्रत्येक देश में कम या अधिक संविधान के आधार के रूप में पायी जाती हैं। इनमें मुख्य रूप से मात्रा का अन्तर होता है। क्योंकि किसी भी देश का अपना पूर्ण रूप से  पृथक मौलिक संविधानवाद नहीं होता वरन् अनेक विविधताओं के पश्चात् भी अधिकांश देशों के संविधानवाद परस्पर समानता रखते हैं।

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Pankaja Singh

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