मानव संसाधन प्रबंधन

मध्यस्थता का आशय | सुलह का आशय | पंचनिर्णय की पद्धति की व्याख्या | मध्यस्थता एवं पंचनिर्णय में अन्तर

मध्यस्थता का आशय | सुलह का आशय | पंचनिर्णय की पद्धति की व्याख्या | मध्यस्थता एवं पंचनिर्णय में अन्तर | Meaning of mediation in Hindi | Meaning of Conciliation in Hindi | Explanation of the method Arbitration in Hindi | difference between arbitration and arbitration in Hindi

मध्यस्थता या सुलह का आशय (Meaning of Mediation or Conciliation):

औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के अन्तर्गत, मध्यस्थता औद्योगिक विवादों को किसी बाहरी व्यक्ति द्वारा या व्यक्तियों के एक बोर्ड द्वारा जो सम्बन्धित पक्षों को उनके वार्तालाप में सहायता प्रदान करता है, निपटाने का पूर्ण प्रयत्न करती है। एक मध्यस्थ का कार्य सम्बन्धित पक्षों के लिए सन्देशवाहक के रूप में होता है। यह अपना फैसला या दृष्टिकोण किसी पक्ष पर थोप नहीं सकता है। वास्तव में मध्यस्थता का उद्देश्य यह होता है कि वह एक ऐच्छिक समझौता बनाकर मतभेदों का निपटारा कर दे क्योंकि किसी मध्यस्थ की उपस्थिति में कभी न समर्पण करने की भावना या अभिमान की भावना समाप्त हो जाती है कि समन्वय या समझौता किसी मित्र को कृतज्ञ करने के उद्देश्य से किया जा रहा है न कि किसी शत्रु के प्रति रियायत के रूप में। मध्यस्थ तीन प्रकार के हो सकते हैं –

(i) कोई प्रसिद्ध बाहरी व्यक्ति, (ii) गैर सरकारीं बोर्ड तथा (iii) कोई ऐसा बोर्ड जो देश की शासन व्यवस्था से सम्बन्धित हो।

इन सभी मध्यस्थों का प्रयोग एक-दूसरे के पूरक के रूप में किया जा सकता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि यदि मध्यस्थता की भूमिका उचित हो तो औद्योगिक विवादों को आसानी से निपटाया जा सकता है।

मध्यस्थता अथवा सुलह (समझौता) विवादों के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मध्यस्थता में विवाद के पक्षकार तीसरे तटस्थ व्यक्ति की सेवायें प्राप्त करता है। मध्यस्थ द्वारा पक्षकारों को वाद-विवादों को मधुरतापूर्वक कम करने या समाधान करने हेतु प्रेरित किया जाता है। मध्यस्थता ऐसी प्रक्रिया होती है जिसके अधीन विवाद के पक्षकार अपने विवादों पर विचार- विमर्श करते हैं तथा अपने विवादों को व्यवस्थित एवं विवेकजन्य रूप में मध्यस्थ के मार्गदर्शन में हल करते हैं।

औद्योगिक विवाद रोकने की यह एक आसान व्यवस्था है। इस व्यवस्था के अन्तर्गत सेवायोजकों तथा श्रमिकों के मध्य एक ऐसा व्यक्ति उपस्थित होता है जिससे दोनों पक्षों द्वारा मान्यता प्रदान की जाती है। जब इन पक्षों के मध्य किसी प्रकार का विवाद उत्पन्न होता है तो यह व्यक्ति दोनों पक्षों पर विचार करने के पश्चात् अपना निर्णय प्रस्तुत करता है। इसके द्वारा दिया गया निर्णय मान्य अथवा अमान्य हो सकता है क्योंकि सुलह अनिवार्य सुलह भी हो सकती है तथा ऐच्छिक सुलह भी हो सकती है।

पंचनिर्णय की पद्धति की व्याख्या

औद्योगिक विवादों को निपटाने की एक यह भी उत्तम व्यवस्था है। इसके माध्यम से औद्योगिक सम्बन्धों को निपटाया जा सकता है तथा बहुत से मामले पंचनिर्णय द्वारा निपटाये भी गये हैं। इस व्यवस्था के अन्तर्गत दोनों पक्ष पंचनिर्णय के समक्ष अपने तकों को प्रस्तुत करते हैं और पंचनिर्णय उस पर अपना निर्णय देते हैं। पंचनिर्णय ऐच्छिक व अनिवार्य हो सकता है। देश के विभिन्न राज्यों में राष्ट्रीय पंचनिर्णय प्रोत्साहन बोर्ड बनाए गये हैं। अनिवार्य पंचनिर्णय से उत्पादन में वृद्धि एवं औद्योगिक शान्ति की स्थापना होती है तथा श्रमिकों का शोषण नहीं होता है एवं सरकार द्वारा श्रम कल्याणकारी कार्य अधिक होता है। इसका समर्थन समाज के हित में किया जाता है तथा इसका प्रयोग उस समय किया जाता है जब ऐच्छिक ढंग से किसी समस्या के हल को प्राप्त करने में सफलता नहीं मिलती है। इस व्यवस्था को उस समय उपयुक्त माना जाता है जब राष्ट्रीय संकट होता है।

पंचनिर्णय प्रक्रिया में एक विवाचक या पंच निर्णायक होता है। औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 10A के अन्तर्गत पंचनिर्णय की प्रक्रिया को बताया गया है जोकि संक्षेप में निम्नलिखित है –

  1. यदि मामले को श्रम न्यायालय, न्यायाधिकरण या राष्ट्रीय न्यायाधिकरण को संदर्भित नहीं किया गया है तो सेवायोजक एवं श्रमिक विवाद को लिखित ठहराव द्वारा निर्दिष्ट विवाचक को संदर्भित कर सकते हैं।
  2. विवाचन ठहराव निर्धारित प्रारूप में होना चाहिए तथा पक्षकारों द्वारा हस्ताक्षरित होना चाहिए।
  3. विवाचन ठहराब की एक प्रति उचित सरकार एवं समझौता अधिकारी को दी जायेगी। उचित सरकार एक माह में इसे राजपत्र में प्रकाशित करेगी।
  4. विवाद की विवाचक या विचाचकों द्वारा जांच-पड़ताल करके उचित सरकार के पास हस्ताक्षरित विवाचन पंचाट जमा किया जायेगा।
  5. विवाद को पंचनिर्णय को संदर्भित किये जाने पर उचित सरकार हड़ताल या तालाबन्दी को रोक सकती है।

मध्यस्थता एवं पंचनिर्णय में अन्तर

(Difference between Mediation and Arbitration)

मध्यस्थता (Mediation)

पंचनिर्णय (Arbitration)

1. मध्यस्थ अपना निर्णय नहीं देता है। वह पक्षकारों को विवाद का समझौता करने हेतु प्रेरित करता है।

1.पंचनिर्णय में पंच अपना निर्णय देता है परन्तु उसे मानना या न मानना पक्षकारों पर निर्भर करता है।

2. यह विभिन्न प्रकार का नहीं होता है।

2. पंचनिर्णय दो प्रकार का होता है। एक प्रकार के पंचनिर्णय में विवाद को अनिवार्य रूप से पंच को भेजा जाता है परन्तु पक्षकार निर्णय से बाध्य नहीं होते हैं तथा अन्य प्रकार के पंचनिर्णय में वाद को पंच को निर्देशित किया जाता है तथा निर्णय पक्षकारों को बाध्य करता है।

3. इसे व्यापक रूप से अपनाया जाता है।

3. यह बहुत अधिक लोकप्रिय नहीं है।

4. मध्यस्थता में निर्णय का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता है।

4. पंच द्वारा दिया गया निर्णय पंचाट (Award) कहलाता है।

5. यह वादों के समाधान को प्रेरित करता है।

5. यह कानूनी कार्यवाही को प्रेरित करता है।

औद्योगिक विवादों की रोकथाम एवं निपटारे हेतु मध्यस्थता एवं पंचनिर्णय विधियों में से किसे बेहतर मानते हैं और क्यों?

दोनों विधियों अर्थात मध्यस्थता एवं पंचनिर्णय में से मध्यस्थता बेहतर है, इसके निम्नलिखित कारण हैं-

  1. सामूहिक सौदेबाजी का एक रूप (A form of Collective Bargaining) – मध्यस्थता सामूहिक सौदेबाजी का एक रूप है। पक्षकारों के पास अपने विवादों को स्वयं हल करने का अवसर होता है। सुलह विवाद के पक्षकरों की सहमति से किया जाता है। समझौता अधिकारी पक्षकारों को विवाद को सुलझाने हेतु प्रेरित करता है।
  2. समझौते की आसान प्रवर्तनीयता (Easy Enforceability of Settlement)- सामान्य रूप से सुलह के दौरान किया गया समझौता सभी कर्मचारियों पर लागू किया जाता है। इसे सरलतापूर्वक लागू किया जा सकता है।
  3. तटस्थ व्यक्ति (Neutral Person) – सुलह अधिकारी तटस्थ व्यक्ति होता है। वह पक्षकारों को सही रास्ते पर चलने एवं सही व्यवहार करने का सुझाव देता है। सुलह अधिकारी को श्रम विधियों एवं श्रम नीतियों की जानकारी होती है। वह विवाद के उचित समाधान हेतु प्रयास करता है।
  4. उचित वातावरण (Proper Atmosphere) – कई वादों में पक्षकार अपने विवादों का समाधान करना चाहते हैं परन्तु वे आमने-सामने आने से बचते रहते हैं। सुलह अधिकारी उन्हें पास-पास लाता है।
  5. महत्वपूर्ण शक्तियाँ (Important Powers) – कुछ देशों में सुलह अधिकारी के पास महत्वपूर्ण शक्तियाँ हैं तथा सुलह अधिकारी की सिफारिश पर सरकार विवाद को अधिनिर्णयन अधिकारी को सौंप सकती है। स्वयं को विवाद का पक्षकार बनने से बचाने के लिए पक्षकार मध्यस्थता या सुलह को स्वीकार कर सकते हैं।
  6. उदार एवं सरल विधि (Liberal and Easy Method) – मध्यस्थता की विधि सरल एवं उदार होती है। यह पक्षकारों को अपने विवादों को अनौचारिक वातावरण में सुलझाने का अवसर देती है। सुलह परिवर्तित परिस्थितियों के अनुरूप हो सकती है। यह विवादों को निपटाने का अत्यन्त मितव्ययी तरीका है।
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Pankaja Singh

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