इतिहास

लियोपोल्ड वान रेंक | लियोपोल्ड वान रेंक का जीवन परिचय | Leopold Von Ranke in Hindi | आधुनिक आलोचनात्मक इतिहास लेखन का जन्मदाता किसे माना जाता है

लियोपोल्ड वान रेंक | लियोपोल्ड वान रेंक का जीवन परिचय | Leopold Von Ranke in Hindi | आधुनिक आलोचनात्मक इतिहास लेखन का जन्मदाता किसे माना जाता है

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लियोपोल्ड वान रेंक (Leopold Von Ranke)- 

रेंक आधुनिक आलोचनात्मक इतिहास-लेखन का जन्मदाता माना जाता है। उसने आधुनिक इतिहास में उन सिद्धान्तों को अपनाया जिन्हें नाइबर (Niebhur) ने प्राचीन इतिहास में अपनाया था। उसने इस सिद्धान्त को अपनाया कि ऐतिहासिक घटनाओं के सर्वोत्तम स्रोत अभिनेताओं के साक्ष्य हैं न कि इतिहासकारों के उपाख्यान (Anecdotes) हैं। उसने यह भी बतलाया कि प्रत्येक लिखित दस्तावेज के महत्त्व का मूल्यांकन करना चाहिए। इसके लिए लेखक के व्यक्तित्व का अध्ययन करना चाहिए और यह देखना चाहिए कि उसने किन स्रोतों के आधार पर लिखा है। इन सिद्धान्तों का प्रयोग कर रेंक ने यह प्रमाणित किया है कि अनेक स्रोत जो पहले अति प्रामाणिक समझे जाते थे, वे बिल्कुल विश्वसनीय नहीं थे।

रेंक का जन्म 1795 में एक संपन्न मध्यवर्ग परिवार में हुआ था। उसके पिता एक वकील थे। रेंक का पालन-पोषण शानदार ढंग से हुआ। 1814 में वह लिपजीग (Leipzig) विश्वविद्यालय में शामिल हुआ। वह भाषा विज्ञान और धर्मशास्त्र में काफी अभिरुचि दिखलाने लगा। वह कांट की कृति (Critique of Pure Reason) और फिक्टे (Fichte) की कृति (Address to the German Nation) से काफी प्रभावित हुआ। रेंक गोथे (Goethe) का प्रशंसक और लूथर की कृतियों का पाठक था।

पी-एच0 डी0 की उपाधि प्राप्त करने के पश्चात् रेंक को फ्रेंकफर्ट (Frankfurt) में नौकरी लग गई जहाँ वह लैंटिन और ग्रीक (classics) पढ़ाता था। शीघ्र ही उसने यह अनुभव किया कि पाठ्य पुस्तकों के ज्ञान से उसकी आत्म-पिपासा शान्त नहीं हो सकती। वह अतीत का गहन अध्ययन करना चाहता था। कभी-कभी वह लेखकों को इतना विवादग्रस्त पाता था कि वह उनके विचारों से सहमत नहीं हो सकता था। अतः वह अपने युग के केवल अधिकारियों की रचनाओं का अध्ययन करने लगा और अपने युग का विवरण लिखने लगा। अतः उसने आम लोगों के लिए नहीं बल्कि अपने लिए रम्याख्यान और जर्मन जन का इतिहास (Histories of Romance and Teutonic)लिखा। किन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि यह पुस्तक यूरोपीय इतिहास पर रचित अन्य ग्रन्थों से काफी अच्छी थी। इसका वस्तुपरक दृष्टिगोचर अनुकरणीय बन गया। यह एक संकलन था।

यद्यपि रेंक की पुस्तक में काफी अपूर्णताएँ थीं तथापि इसने उसे बर्लिन विश्वविद्यालय में उसे प्राध्यापक बनने में बड़ी मदद की। अब वह अपना अधिकांश समय अभिलेखागार (Archives) में बिताने लगा। वहाँ उसे अनेक प्रामाणिक ऐतिहासिक स्रोतों को देखने का मौका मिला। वह इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि इन नए स्रोतों के आधार पर यूरोपीय इतिहास की संरचना होनी चाहिए।

यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि रेंक की संगोष्ठी में केवल वे लोग ही दाखिल किए गए जो इतिहास-अध्ययन को अपना पेशा बनाना चाहते थे। इन्हें इतिहास-लेखन का उचित प्रशिक्षण दिया गया। इसके लिए उसने एक विशेष ऐतिहासिक अभ्यास पाठ्यक्रम तैयार किया जिससे उसके शिष्य उसकी रचना से आलोचनात्मक प्रणाली का ज्ञान प्राप्त करने लगे। वह अपने शिष्यों को विषय-चयन की पूरी स्वतन्त्रता देता था, लेकिन अपने अगाध ज्ञान के कारण वह उनकी मदद करने के लिए सदा तैयार रहता था। आलोचनात्मक पद्धति से थोड़ा भी हटने पर शिष्यों को डाँट सुननी पड़ती थी।

जहाँ तक उसकी व्यक्तिगत उपलब्धियों का संबंध है रेंक दक्षिण यूरोप के राजकुमारों और जनों (Princes and Peoples of Southern Europe) के बारे में अनेक पुस्तक मालाओं की रचना करना चाहता था। इस कोटि में उसकी पहली पुस्तक Ottoman and the Spanish Monarchy of the Sixteenth and Seventeenth Centuriesहै। इसमें उसने स्पेनी साम्राज्य के संविधान, व्यापार और वित्तीय प्रशासन पर विस्तार से लिखा।

ऐतिहासिक अध्ययन में रेंक का एक अन्य योगदान ऐतिहासिक पत्रिका (Historische Zeitschrift) का प्रकाशन है। इसमें ऐतिहासिक शोध प्रणाली और इसके विचलन पर प्रकाश डाला गया है। इस पत्रिका द्वारा 1830 की फ्रांसीसी क्रांति के प्रभावों को कम करने का प्रयास किया गया। यद्यपि इस पत्रिका का प्रभाव प्रशा के बाहर नगण्य था, तथापि इसने इतिहासकारों को काफी प्रभावित किया है

रेंक का वियना दौरा काफी फलदायक साबित हुआ। उसने वहाँ गेंट (Gentz) से भेंट की जिससे उसे गत शताब्दी के गोपनीय ऐतिहासिक विकास के बारे में ज्ञान प्राप्त हुआ। उसे यूरोपीय व्यवस्था की मौलिक एकता की भी जानकारी हुई। रेंक ने रोम और फ्लोरेंस के पुस्तकालयों से ऐतिहासिक सामग्रियाँ भी इकट्ठी की। इन्हीं सामग्रियों के आधार पर उसने 16वीं शताब्दी के अंत में वेनिस (Venice at the end of Sixteenth Century) नामक पुस्तक की रचना की।

रेंक की पुस्तक पोपों का इतिहास (The History of the Popes) काफी महत्त्वपूर्ण है। इसकी प्रथम जिल्द 1834ई० में प्रकाशित हुई। उसने यह बतलाया कि यूरोप के विकास और कायाकल्प में पोप का बड़ा योगदान है। इस पुस्तक का महत्त्व न केवल इसकी विषय-सामग्रियों के कारण बल्कि इसके वस्तुपरक प्रस्तुतीकरण के कारण भी है। रेंक ने मध्ययुग में पोपवाद (Papacy) के विकास पर प्रकाश डाला है और इसे यूरोपीय सभ्यता का एक महान् एकता सूत्र माना है। उसने पोप के राज्यों का आन्तरिक जीवन, उनके प्रशासन, वित्त, कला के संरक्षण आदि पर प्रकाश डाला है। उसने यह भी बतलाया है कि किस तरह 17वीं शताब्दी में पोप का प्रभाव कम हो गया। पोपों का इतिहास (The History of the Popes) ऐतिहासिक शोध का एक पूर्ण रूप है।

रेंक की एक अन्य कृति धर्म सुधार आन्दोलन काल में जर्मनी के इतिहास है। यह पांडुलिपियों की सामग्रियों पर आधारित है। यह 15वीं और 16वीं शताब्दियों में सार्वजनिक जीवन का अध्ययन है। इससे धर्मसुधार काल में यूरोपीय और जर्मनी की राजनीति जानने में बड़ी मदद मिलती है, यद्यपि रेंक की यह पुस्तक यूरोप में पोपों के इतिहास से अधिक लोकप्रिय नहीं थी तथापि ट्रेटस्के (Treitschke) ने इसे एक सर्वोत्कृष्ट कृति बतलाई है। यह देश-प्रेम की भावना से परिपूरित है।

1847-48 में रेंक ने प्रशा के इतिहास (Prussian History) पर नव ग्रन्थ प्रकाशित किए। इनमें उसने महाशक्ति के उदय के कारण विशेषकर फ्रेडरिक विलियम प्रथम के बारे में बतलाया। पुस्तक में कोई गति या जान नहीं थी लेकिन राजकीय पत्रों पर आधारित यह पहली पुस्तक थी। जैसा कि कोजर (Koser) ने कहा है, “इसके पूर्व किसी पुस्तक ने अठारहवीं शताब्दी में ज्ञान का विस्तार नहीं किया था।”

इटली के दौरे के दौरान रेंक ने इंग्लैण्ड और फ्रांस का इतिहास लिखने का निर्णय कर लिया था। वह अगले बीस वर्षों तक इसी परियोजना में व्यस्त रहा। 1853 में फ्रांस के इतिहास का एक भाग प्रकाशित हुआ। अपनी सम्पूर्ण कृति में उसने मैत्रीपूर्ण संबंध दिखलाया है। सेविल (Syble) और ट्रेटस्के (Treitschke) की तरह उसने कहीं भी अपमानजनक टिप्पणी नहीं दी है। इस पुस्तक की एक दूसरी विशेषता यह है कि इसकी रचना में रेंक ने न केवल फ्रेंच अभिलेखागार, बल्कि इटली, जर्मनी, बेल्जियम, इंगलैण्ड और स्पेन में उपलब्ध स्रोतों की भी सहायता ली। इससे उसका दृष्टिकोण भी व्यापक हो गया। फ्रांस में फ्रांसीसी इतिहास का बड़ा स्वागत किया गया।

चालीस वर्षों के कठोर परिश्रम के फलस्वरूप रेंक यूरोप की महान् शक्तियों पर काम पूरा कर सका। बाद के वर्षों में उसने अनेक ऐतिहासिक प्रबन्ध (monographs) लिखा और पहले की कृतियों का संशोधन किया। कुछ महत्त्वपूर्ण कृतियों में जर्मन इतिहास का योगदान (Contributions to German History), वालेंस्टिन का इतिहास (History of Wallensstein), सप्तवर्षीय युद्ध (The Seven Years War), क्रांति-युद्धों का उत्पत्ति, इतिहास (The Origin of the Wars of Revalutions) आदि महत्त्वपूर्ण हैं। रेंक आजीवन  क्रियाशील रहा। बयासी वर्ष की उम्र में उसने हार्डेनबर्ग (Hardenberg) पर एक विशाल ग्रन्थ की रचना की। इसमें उसने हार्डेनबर्ग के व्यक्तित्व की पृष्ठभूमि में महानयुद्ध में प्रशा की नीति- निर्माण करने का प्रयास किया। नेपोलियनकालीन युग की यह एक महान् कृति है।

1880 में पचासी वर्ष की उम्र में रेंक ने अपनी पुस्तक विश्वजनीन इतिहास (Universal History) पर दो जिल्दें प्रकाशित की। उसने बतलाया कि मानव जाति का इतिहास विशेष सम्बन्धों और प्रवृत्तियों का नहीं अपितु सम्पूर्णता और समग्रता का होना चाहिए।

यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि मई, 1886 में अपने निधन के पूर्व रेंक विश्वजनीन इतिहास पर 6 जिल्दें प्रकाशित करने में सफल रहा है। उसकी कृति का शेष भाग उसके विद्यार्थियों और अनुयायियों ने तैयार किया। इस कृति के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए प्रो० गूच ने कहा “अस्सी और नब्बे वर्ष की आयु में रचित यह एक अनुपम कृति थी जिस समय आदमी लिखने-पढ़ने के योग्य नहीं रह जाता है। रेंक के समान अन्य किसी ने विश्वजनीन इतिहास के प्रति इस तरह का दृष्टिकोण नहीं अपनाया।”

रेंक एक महान् और मेधावी लेखक था। राजन्य और राज्य दस्तावेजों के आधार पर उसने पचास इतिहास ग्रन्थों की रचना की। किन्तु, उसकी पहुँच दोषपूर्ण थी। उसने मुख्यतः संधियों, युद्धों और राजवंशों के बारे में लिखा। उसने राज्य, राष्ट्र, धर्म, संस्कृति आदि के सामान्यीकरण पर कोई ध्यान नहीं दिया। प्रो० थॉम्पसन के अनुसार, “रैक के इतिहास का प्रधान दोष इसकी समग्र आदर्शनिकता (Total unphilosophicalness) है। वैज्ञानिक की अपेक्षा रेंक पूर्णरूपेण पूर्वाग्रही था। उसने इतिहास को ईश्वरीय कृति बतलाया और एक विश्वसनीय दर्शन व मनोविज्ञान के सिद्धान्त का प्रतिपादन करने के लिए कोई प्रयास नहीं किया। रेंक स्वयं अपने युग का एक प्रतिनिधि, प्रशा के राजतन्त्र का एक निष्ठायुक्त सेवक तथा चर्च और राज्य का रक्षक था। उसने जो कुछ भी लिखा उसमें उसके राष्ट्रों, पूर्वाग्रह और हितों का प्रतिबिम्ब था।” प्रो० बियर्ड (Beard) ने रेंक को अत्यन्त पक्षपाती इतिहासकार कहा है। उसने इतिहास में सामाजिक और आर्थिक हितों की उपेक्षा की है। प्रो0 गूच के शब्दों में, “रेंक की भूलें स्वीकारात्मक की अपेक्षा निषेधात्मक थीं। उसके समकालीनों को उससे क्या पाया की नहीं बल्कि क्या नहीं पाया कि शिकायत थी। राष्ट्रवादियों को उसकी विश्व-शान्ति, नैतिकतावादियों को उसकी नैतिक निष्पक्षता और भौतिकवादियों को उसके अन्तर्ज्ञानवाद से शिकाय थी।” रेंक की रचनाओं का एक अन्य दोष जनसामान्य और आर्थिक दबावों की उपेक्षा है। पुनः रेंक अपने दृष्टिकोण में न तो वैज्ञानिक और न वस्तुपरक ही था। उसकी प्रणाली, उसका मात्र राजन्य दस्तावेजों का उपयोग, उसका विशुद्ध राजनीतिक दृष्टिकोण ये सभी इतिहास की छाया मात्र हैं, ये इतिहास और निश्चय रूप से सत्य नहीं है। रेंक ने पूरे एक युग को अंधकार में रखा कि वह एक वस्तुपरक इतिहास का रचयिता था।

रेंक की उपलब्धियों पर भी ध्यान आवश्यक है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि उसने इतिहास की स्तुत्य सेवा की है। उसने अतीत का एक वस्तुपरक विवरण देने का प्रयास किया। इसमें सन्देह नहीं कि नाइबर (Neibuhr) ने अपनी पुस्तक रोम के इतिहास (History of Rome) में आधुनिक ऐतिहासिक प्रणाली की शुरुआत की। रेंक ने संस्मरणों, पत्रों, दैनन्दनियों, राजन्य रपटों आदि में इस प्रणाली का उपयोग किया। रेंक ने बल दिया कि इन स्रोतों का उपयोग करना चाहिए। मारविक (Marwick) ने उसे आधुनिक इतिहास का जनक कहा है।

रेंक की एक दूसरी उपलब्धि समकालीन स्रोतों के आधार पर इतिहास की संरचना है। उसने इतिहास-लेखन का सर्वोच्च नियम तथ्यों का प्रस्तुतीकरण बतलाया। यद्यपि वह अभिलेखागार का सदुपयोग करने वाला पहला इतिहासकार नहीं था क्योंकि उसके पहले भी अनेक इतिहासकारों ने इसका उपयोग किया था, तथापि उसने इसका ठीक से उपयोग किया।

रेंक की एक तीसरी विशेषता यह है कि उसने इतिहास को विश्वविद्यालय स्तर तक अध्यापन का विषय बनाया। उसने बर्लिन विश्वविद्यालय में संगोष्ठियों (Seminars) का आयोजन करवाया। इसमें मुख्य शोध-प्रणाली पर विचार-विमर्श किया गया। शीघ्र ही जर्मनी का उदाहरण फ्रांस, ब्रिटेन, और संयुक्त राज्य अमरीका द्वारा अनुकरण किया गया। यहाँ के विभिन्न विश्वविद्यालयों में इतिहास के पद (Chairs in History) सृजित किये गये। अतः रेंक के प्रयत्नों के फलस्वरूप 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में पश्चिमी दुनिया के अनेक विश्वविद्यालयों में इतिहास एक स्वतन्त्र विषय बन गया।

चतुर्थ, रेंक ने ऐतिहासिक पत्रिका (Historische Zeitschrift) का प्रकाशन शुरू किया। इसने ऐतिहासिक खोज का प्रतिनिधित्व किया।

पाँचवाँ, रेंक ने साक्ष्य-विज्ञान (Science of evidence) का विकास किया। उसने समकालीन लेखकों के स्वभाव, उनके सम्बन्धों, ज्ञान के अवसरों का विश्लेषण करने का प्रयास किया तथा अन्य लेखकों से उनकी तुलना की।

इस प्रकार, रेंक आधुनिक युग का एक महान् इतिहासकार था। उसने वस्तुपरक और वैज्ञानिक इतिहास-लेखन की परम्परा शुरू की। उसने यूरोप में जर्मन विद्वता की धाक स्थापित की। ऐतिहासिक संगोष्ठियों का आयोजन और ऐतिहासिक पत्रिकाओं का प्रकाशन उसकी महान् उपलब्धियाँ हैं।

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Pankaja Singh

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