वित्तीय प्रबंधन

लाभांश की असंगति विचारधारा | मोदिगलियानी एवं मिलर मॉडल | Irrelevance Concept of Dividends in Hindi | Modigliani and Miller Model in Hindi

लाभांश की असंगति विचारधारा | मोदिगलियानी एवं मिलर मॉडल | Irrelevance Concept of Dividends in Hindi | Modigliani and Miller Model in Hindi

लाभांश की असंगति विचारधारा

(Irrelevance Concept of Dividends)

लाभांश की असंगति विचारधारा के अनुसार लाभांश निर्णय का उद्यम के मूल्य से कोई सम्बन्ध नहीं होता है। व्यवहार में एक उद्यम की लाभांश नीति वित्तीय निर्णय का एक अंश होती है। इस तरह एक उद्यम के वित्तीय निर्णय के एक भाग के रूप में उद्यम की लाभांश नीति एक अवशिष्ट निर्णय (residual decision) होता है तथा लाभांश एक उदासीन अवशेष है। इस प्रकार की विचारधारा के प्रवर्तक सोलोमन, मिलर, तथा मोदिगलियानी आदि हैं। असंगति विचारधारा के सम्बन्ध में निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किये जाते हैं-

(1) लाभांश नीति एक वित्तीय निर्णय (Dividend Policy is a Financing Decision)- यदि व्यवसाय में पूर्ण विनियोग के अवसर उपलब्ध हैं तो वह आय का प्रतिधारण कर उनका वित्तीयकरण करेगी। लेकिन यदि उसके पास विनियोग अवसर अपर्याप्त हैं तो वह अपनी आय का वितरण लाभांश के रूप में अंशधारियों में करेगी। इस प्रकार स्पष्ट है कि यदि उद्यम के पास लाभकारी विनियोग प्रस्ताव हैं और उनसे प्राप्त होने वाली प्रत्याय दर (r) विनियोग लागत (K) से अधिक है तो अंशधारी आय के प्रतिधारण के लिए अधिक बल देंगे जिससे संचित साधन का पुनर्विनियोग कर अपेक्षाकृत अधिक ऊँची दर से आय अर्जित की जा सके। इस प्रकार लाभांश नीति समग्र विनियोग नीति का एक भाग होती है।

(2) लाभांश एक उदासीन अवशेष (Dividends are a Passive Residual) – यह इस मान्यता पर आधारित है कि अंशधारी लाभांश तथा पूँजीगत लाभ के प्रति उदासीन होते हैं। उनकी मुख्य अभिरुचि पूँजी पर अधिक प्रत्याय प्राप्त करना होता है। जब तक एक उद्यम समता पूँजीकरण दर (ke) से अधिक अर्जित करती रहेगी तक तक विनियोजक उद्यम में आय के प्रतिधारी के प्रति इच्छुक रहेंगे। दूसरे शब्दों में वे लाभांश के प्रति उदासीन रहेंगे। लेकिन यदि प्रत्याय दर (r) पूँजी लागत (ke) से कम है तो विनियोजक आय को लाभांश के रूप में प्राप्त करना पसन्द करेंगे। लाभांश की असंगति विचारधारा के सन्दर्भ में मिलर तथाा मोदिगलियानी का विचार काफी महत्वपूर्ण है जिसका विवरण निम्नलिखित है-

मोदिगलियानी एवं मिलर मॉडल

(Modigliani and Miller Model)

मोदिगलियानी एवं मिलर सिद्धान्त (जिसे संक्षेप में एम०एम० मॉडल के नाम से भी जाना जाता है) वस्तुतः यह मानना है कि लाभांश-निर्णयों का अंशों के मूल्यों एवं फर्म के मूल्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। इसलिए इस सिद्धान्त को लाभांश असंगत मॉडल (Dividend Irrelevant Model) भी कहा जाता है। इसकी मान्यता यह है कि आय का लाभांश एवं प्रतिधारित- आय के रूप में विभाजन फर्म के मूल्यांकन के लिए असंगत होता है। यदि प्रबन्धक समस्त आय को व्यवसाय में ही प्रतिधारित (Retain) करने का निर्णय लेते हैं (और इस प्रकार अंशधारियों को कोई नकद लाभांश नहीं देते हैं) तो ऐसी दशा में अंशधारी प्रतिधारित आय की सीमा तक अंशों में किये हुए अपने निवेश पर पूँजी-अभिवृद्धि (Capital Appreciation) का लाभ प्राप्त करते हैं। इसके विपरीत, यदि प्रबन्धक सम्पूर्ण आय को नकद-लाभांश के रूप में वितरित करने का निर्णय लेते हैं (और इस प्रकार प्रतिधारित अनुपात शून्य रखते हैं) तो भी अंशधारी को इतना मूल्य (Value) प्राप्त हो‌ जाता है; जो उसे उस दशा में प्राप्त होता यदि प्रबन्धक व्यवसाय में ही समस्त आय को प्रतिधारित करने का निर्णय लेते हैं । इस सिद्धान्त के अनुसार अंशधारी इन दोनों विकल्पों के प्रति उदासीन (indifferent) होते हैं। उन्हें इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता है कि उन्हें आय में से नकद लाभांश दिया जाय; अथवा उसे व्यवसाय में प्रतिधारित कर लिया जाय। यह सिद्धान्त अनेक मान्यताओं को लेकर चलता है, जो निम्नलिखित हैं-

मान्यताएँ

(Assumptions)

(1) पूँजी बाजार पूर्ण (Perfect) है उसमें पूर्ण प्रतियोगिता हैं। दूसरे शब्दों में यह कहा जायेगा कि समस्त निवेशक विवेकशील (Rational) हैं, सूचनाएँ समय पर तत्काल निःशुल्क उपब्ध होती हैं; प्रतिभूतियों (जिसमें सौदे होते हैं) को किसी भी सीमा तक (Infinitely) विभाजित किया जा सकता है तथा पूँजी बाजार में कोई भी निवेशक इतना शक्तिशाली नहीं है कि वह अंशों के मूल्यों को प्रभावित कर सके।

(2) बाजार में व्यवहार लागते (Transaction Costs) शून्य हैं, अर्थात् प्रतिभूतियों के क्रय-विक्रय के लिए किसी प्रकार की कोई दलाली या कमीशन नहीं देना होता है।

(3) पूँजी-निर्गमन की लागतें (Cost of Issue of Capital) शून्य हैं, अर्थात् कोई विपणन लागतें (Marketing or Floating Costs) नहीं है।

(4) कम्पनियों की आय पर कोई कर नहीं लिया जाता है।

(5) फर्म द्वारा एक निश्चित निवेश नीति का परिपालन किया जाता है, जिसमें कोई परिवर्तन नहीं होता है। इसका आशय यह हुआ कि यदि नये निवेशों की वित्त-पूर्ति प्रतिधारित आय के आधार पर की जाती है तो फर्म की व्यावसायिक आय के जोखिम की अनुभूति (Business Risk Perception) में कोई अन्तर नहीं पड़ता है; और इस प्रकार प्रत्याय की वाछित दर (Required Rate of Return) में कोई परिवर्तन नहीं होता है।

(6) निवेशक इस स्थिति में होते हैं कि वे फर्म की आय, प्रगति एवं भावी सम्भावनाओं के विषय में निश्चित एवं सही अनुमान लगा सकें।

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Pankaja Singh

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