शिक्षाशास्त्र

कोठारी आयोग | कोठारी आयोग ने आयोग के सुझाव एवं सिफारिश

कोठारी आयोग | कोठारी आयोग ने आयोग के सुझाव एवं सिफारिश

कोठारी आयोग

यद्यपि राष्ट्रीय शिक्षा आयोग गत एक शताब्दी से शिक्षा आयोगों की श्रृंखला में छठा आयोग था, परन्तु 1882 के भारतीय शिक्षा आयोग को छोड़कर बाद के सभी आयोगों ने शिक्षा के एक पक्ष विशेष पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। 1902 का भारतीय विश्वविद्यालय आयोग, 1917 का कलकत्ता विश्वविद्यालय शिक्षा पर और 1952 का माध्यमिक शिक्षा आयोग माध्यमिक शिक्षा पर था। अतः स्वाधीनता के बाद की बदली परिस्थिति में राष्ट्रीय शिक्षा के सम्पूर्ण सिंहावलोकन एवं उसमें समय की माँग के अनुकूल परिवर्तन एवं सुधार करने के लिये एक आयोग की आवश्यकता थी।

अतः भारत सरकार ने परिस्थिति की माँग के अनुकूल 14 जुलाई, 1964 को एक प्रस्ताव स्वीकार क कमीशन नियुक्ति की घोषणा की। प्रस्ताव में कहा गया कि-

“यह कमीशन सरकार की शिक्षा सम्बन्धी नीतियों, शिक्षा के राष्ट्रीय स्वरूप एवं शिक्षा के हर क्षेत्र में विकास की सम्भावनाओं पर विचार करने एवं अपनी सलाह सरकार को देने के लिये नियत किया गया है।”

चूँकि यह पुनर्संगठन देश के नवीन सामाजिक लक्ष्यों को ध्यान रखकर होना चाहिये, अतएव एक प्रकार की राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली की स्थापना को आवश्यक समझा गया और किसी नवीन आयोग की नियुक्ति की आवश्यकता का अनुभव किया जाने लगा। इस प्रकार कोठारी कमीशन की नियुक्ति 14 जुलाई, 1964 को की गई।

आयोग की नियुक्ति के कारण (Causes of the Appointment of the Commission)

भारत सरकार ने 14 जुलाई 1964 में अपने ‘प्रस्ताव’ में आयोग के निम्नलिखित उद्देश्य या नियुक्ति के कारण बताये हैं-

(1) स्वतन्त्रता की प्राप्ति के बाद देश की राजनैतिक, आर्थिक एवं सामाजिक परिस्थितियों में क्रान्तिकारी परिवर्तन हुए हैं। इन परिवर्तनों के अनुसार आज की शिक्षा के निम्न उद्देश्य निर्धारित किए जा सकते हैं-

(अ) शासन एवं जीवन ढंग के रूप में ‘धर्मनिरपेक्ष’ लोकतन्त्र की स्थापना करना।

(ब) समाजवादी समाज का निर्माण करना।

(स) जनता के रहन-सहन के स्तर को ऊँचा करना।

(द) सर्वव्यापी निर्धनता का अन्त करना।

(य) उद्योग के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करना।

(र) विज्ञान एवं प्रोद्यौगिकी के क्षेत्र में उन्नति करना।

(ल) उद्योग-धन्धों का तीव्र गति से विकास करना। इन उद्देश्यों या लक्ष्यों की प्राप्ति तभी सम्भव है जबकि परम्परागत शिक्षा-प्रणाली में क्रान्तिकारी परिवर्तन किए जायें।

(2) सदस्यता प्राप्ति के बाद भारतीय शिक्षा में संख्यात्मक’ वृद्धि तो हुयी लेकिन गुणात्मव’ वृद्धि अवरुद्ध बनी रही। इसके अतिरिक्त अब तक गुणात्मक वृद्धि के लिए राष्ट्रीय नीतियों एवं कार्यक्रमों को लागू न किया जा सका। अतः शिक्षा की गुणात्मक वृद्धि करने की आवश्यकता अनुभव की गयी।

(3) भारत सरकार ने यह अच्छी तरह समझ लिया था कि ‘राष्ट्रीय वृद्धि एवं कल्याण के लिए शिक्षा ही एक महत्वपूर्ण आधार है। शिक्षा द्वारा ही विज्ञान एवं औद्योगिकी का विकास करके राष्ट्र को उन्नति की दिशा की ओर अग्रसरित किया जा सकता है। अतः इस समय शिक्षा एवं वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए सरकार अधिक से अधिक धन व्यय करना चाहती थी।

(4) शिक्षा के सभी स्तर तथा प्राथमिक, माध्यमिक, विश्वविद्यालय एवं प्राविधिक-एक दूसरे से पृथक नहीं किये जा सकते हैं, अतः सम्पूर्ण शिक्षण-व्यवस्था को उपयोगी तथा प्रभुत्वपूर्ण बनाने के लिए शिक्षा के सम्पूर्ण क्षेत्र का एक इकाई के रूप में सूक्ष्म अध्ययन करने की आवश्यकता है ।

आयोग के सुझाव एवं सिफारिश (Suggestions and Recommendations of the Commission)

‘कोठारी आयोग’ ने शिक्षा के जिन महत्वपूर्ण अंगों के सम्बन्ध में अपने विचार व्यक्त किये और सुझाव दिये हैं, वे निम्नलिखित हैं-

(1) शिक्षा और राष्ट्रीय लक्ष्य,

(2) शिक्षा की संरचना और स्तर,

(3) शिक्षक की स्थिति,

(4) अध्यापक-शिक्षा,

(5) छात्र-संख्या और जनबल,

(6) शैक्षिक अवसरों की समानता,

(7) विद्यालय शिक्षा का विस्तार,

(8) विद्यालय पाठ्यक्रम,

(9) विद्यालय-प्रशासन और निरीक्षण,

(10) शिक्षण-विधियाँ, मार्ग-प्रदर्शन और मूल्यांकन,

(11) उच्च शिक्षा,

(12) कृषि की शिक्षा,

(13) व्यावसायिक, प्राविधिक और इंजीनियरिंग शिक्षा,

(14) विज्ञान की शिक्षा,

(15) वयस्क शिक्षा।

इनमें से कुछ का वर्णन निम्न प्रकार है-

(1) शिक्षा के राष्ट्रीय लक्ष्य (National Aims of Education)

आयोग ने शिक्षा के निम्नलिखित राष्ट्रीय लक्ष्य बताये हैं-

(क) उत्पादन में वृद्धि (Increase in Production)- आयोग ने शिक्षा द्वारा उत्पादन में वृद्धि करने

के लिए अधोलिखित सुझाव प्रस्तुत किए हैं-

(i) विज्ञान की शिक्षा को विद्यालय एवं विश्वविद्यालय शिक्षा के सभी पाठ्यक्रमों में सम्मिलित किया जाये। (ii) कार्यानुभव (Working Experience)- कार्य-अनुभव को शिक्षा का अभिन्न अंग स्वीकार किया जाये और औद्यौगिक एवं औद्योगीकरण की दिशा में मोड़ने का प्रयत्न किया जाये।

(iii) माध्यमिक शिक्षा को अधिकाधिक व्यवसायिक रूप प्रदान किया जाये।

(iv) उच्च शिक्षा में कृषि एवं औद्योगिक शिक्षा पर बल दिया जाये।

(1) विज्ञान का उत्पादन एवं कृषि के कार्यों में प्रयोग किया जाये ।

(ख) देश का आधुनिकीकरण (Modernization of the Country)- शिक्षा द्वारा देश का आधुनिकीकरण करने के सम्बन्ध में आयोग ने निम्नलिखित सुझाव प्रदान किये हैं—

(i) आधुनिकीकरण करने के लिए प्रौद्योगिकी को अपनाया जाये।

(ii) आधुनिकीकरण करने के लिए शिक्षा को महत्वपूर्ण साधन माना जाये।

(iii) शिक्षा के द्वारा लोगों में स्वतन्त्र अध्ययन, स्वतन्त्र विचार एवं स्वतन्त्र निर्णय की आदतों का निर्माण किया जाए।

(iv) शिक्षा द्वारा लोगों में उचित ‘दृष्टिकोणों’ एवं मान्यताओं का विकास किया जाये।

(७) सामान्य व्यक्तियों के शैक्षिक स्तर को ऊँचा किया जाये।

(ग) प्रजातन्त्र की सुदृढ़ता (Consolidation of Democracy)- शिक्षा द्वारा प्रजातन्त्र की सुदृढ़ता के लिए आयोग ने निम्नलिखित सुझाव प्रदान किए हैं-

(i) 14 वर्ष की आयु के बालकों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था की जाये ।

(ii) माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा को विस्तृत रूप प्रदान करते हुए सभी स्तरों पर कुशल नेतृत्व का प्रशिक्षण दिया जाये।

(ii) वयस्क-शिक्षा के कार्यक्रम को आयोजित किया जाये।

(iv) बिना जाति, वर्ग, स्थिति, धर्म एवं लिंग का भेदभाव किए सभी बच्चों को शिक्षा के समान अवसर दिये जायें।

(घ) सामाजिक एवं राष्ट्रीय एकता का विकास (Development of Social and National Integration)- शिक्षा द्वारा सामाजिक एवं राष्ट्रीय एकता का विकास करने के लिए आयोग ने निम्नलिखित सुझाव दिये हैं-

(i) सार्वजनिक शिक्षा के लिए राष्ट्रीय लक्ष्य के रूप में सामान्य विद्यालय प्रणाली’ को स्वीकार किया जाये।

(ii) सभी शिक्षा संस्था में ‘सामाजिक एवं सामुदायिक सेवा’ कार्यक्रम का विकास किया जाये और उनमें प्रत्येक छात्र द्वारा उचित ढंग से भाग लेने की व्यवस्था की जाये।

(ii) प्रत्येक जिले में श्रम एवं सामाजिक सेवा शिविरों का प्रबन्ध किया जाये और उनमें प्रत्येक छात्र की उपस्थिति अनिवार्य कर दी जाये।

(iv) शिक्षा के समस्त स्तरों पर ‘सामाजिक एवं राष्ट्रीय सेवा’ को सभी छात्रों के लिए अनिवार्य बना दिया जाये।

(v) राष्ट्रीय चेतना के विकास को विद्यालय की शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य बनाया जाये।

(vi) संविधान के सिद्धान्तों, लोकतन्त्रीय समाजवाद एवं नागरिकता के स्वरूप का पाठ्यक्रमों में समावेश किया जाये।

(vii) सांस्कृतिक विरासत के ज्ञान के विकास एवं पुनः मूल्यांकन के लिए भाषाओं साहित्यों, भारतीय इतिहास, धर्म एवं दर्शन के शिक्षण की समुचित व्यवस्था की जाये।

(viii) मातृभाषा अर्थात् प्रादेशिक भाषाओं के विद्यालय एवं उच्च शिक्षा के केन्द्र बनाये जायें।

(ix) अखिल भारतीय शिक्षा संस्थाओं में अंग्रेजी को शिक्षा के माध्यम के रूप में चालू रखा जाये।

(x) संसार की महत्वपूर्ण भाषाओं की शिक्षा के लिए कुछ विद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों की स्थापना की जाये।

(xi) बी० ए० एवं एम० ए० के स्तरों पर दो भारतीय भाषाओं के अध्ययन की सुविधा प्रदान की जाये।

(xi) विभिन्न राज्यों में पारस्परिक सम्बन्ध स्थापित करने के लिए समस्त भारतीय भाषाओं का विस्तार किया जाये।

(xiii) अंग्रेजी भाषा के अध्ययन एवं अध्यापन को विद्यालय स्तर से जारी रखा जाये।

(xiv) देश के अधिकांश निवासियों के लिए हिन्दी को ‘संयोजक भाषा’ का स्वरूप प्रदान किया जाये।

(xv) एन. सी० सी० के कार्यक्रम को चतुर्थ पंचवर्षीय योजना के अन्त तक चालू रखा जाये।

(ङ) सामाजिक, नैतिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों का विकास (Development of Social, Moral

and Spiritual values)- आयोग ने शिक्षा के द्वारा छात्रों में सामाजिक, नैतिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों काविकास करके उनके चरित्र निर्माण के सम्बन्ध में निम्नलिखित सुझाव दिए हैं-

(i) समस्त शिक्षा संस्थाओं में नैतिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक मान्यताओं की शिक्षा देने की व्यवस्था की जाये।

(ii) प्राथमिक स्तर पर इन मान्यताओं की शिक्षा रोचक कहानियों द्वारा प्रदान की जाये।

(iii) माध्यमिक स्तर पर इन मान्यताओं के सम्बन्ध में शिक्षकों एवं विद्यार्थियों द्वारा विचार-विमर्श करने का आयोजन किया जाये।

(iv) विद्यालय के वातावरण को सामाजिक, नैतिक एवं आध्यात्मिक मान्यताओं से परिपूर्ण बनाया जाये।

(v) विश्वविद्यालयों में ‘तुलनात्मक धर्म’ नामक विभाग की स्थापना की जाये जिसमें इस बात की खोज की जाये कि मान्यताओं का प्रभावशाली ढंग से कैसे अध्ययन किया जाये।

(2) शिक्षा की संरचना एवं स्तर (Structure and Standards of Education)

(क) विद्यालय शिक्षा की नवीन संरचना (New formation of School Education)- आयोग ने 10 वर्ष की सामान्य शिक्षा की नवीन संरचना इस प्रकार प्रस्तुत की है-

(i) 2 वर्ष की उच्चतर माध्यमिक शिक्षा।

(ii) 2 या तीन वर्ष की निम्न माध्यमिक शिक्षा।

(ii) 2 या तीन वर्ष की उच्च प्राथमिक शिक्षा

(iv) 4 या 5 वर्ष की पूर्व विद्यालय शिक्षा ।

(ख) विद्यालय की शिक्षा की नवीन संरचना के सम्बन्ध में सुझाव (Suggestions in relation to the new formation of School Education) –

(1) सामान्य शिक्षा की अवधि 10 वर्ष निश्चित की जाये।

(2) सामान्य शिक्षा चालू होने से पूर्व 1 से 3 वर्ष तक पूर्व विद्यालय या पूर्व प्राथमिक शिक्षा प्रदान की जाये।

(3) प्राथमिक शिक्षा की अवधि 7-8 वर्ष की रखी जाये। इसे निम्न दो भागों में विभाजित किया जाये-

(i) 4 या 5 वर्ष का निम्न प्राथमिक स्तर।

(ii) 3 या 2 वर्ष का उच्च प्राथमिक स्तर।

(4) निम्न माध्यमिक शिक्षा की अवधि 2 या 3 वर्ष रखी जाये और इस स्तर पर निम्नलिखित दो प्रकार की शिक्षा प्रदान की जाये-

(i) 2 या 3 वर्ष की सामान्य शिक्षा

(ii) 1 से 3 वर्ष की व्यवसायिक शिक्षा

(5) उच्चतर माध्यमिक शिक्षा की अवधि 2 वर्ष रखी जाये और इस स्तर पर निम्नलिखित दो प्रकार की शिक्षा दी जाये-

(1) 2 वर्ष की सामान्य शिक्षा या

(ii) 1 से 2 वर्ष की व्यावसायिक शिक्षा

(6) प्राथमिक शिक्षा सार्वजनिक वाह्य परीक्षा 10 वर्ष की विद्यालय शिक्षा के उपरान्त ली जाये ।

(7) 10वीं कक्षा तक किसी विषय में ‘विशेषीकरण’ की आज्ञा न प्रदान की जाये।

(8) 9वीं कक्षा से पृथक विद्यालय की स्थापना करने की प्रथा को समाप्त कर दिया जाये।

(9) माध्यमिक स्कूल निम्नलिखित दो प्रकार के रखे जाएं।

(i) हाई स्कूल जिसमें शिक्षा की अवधि 10 वर्ष की हो।

(ii) हायर सेकेन्ड्री स्कूल जिसमें शिक्षा की अवधि 11 या 12 वर्ष की हो ।

(ग) उच्च शिक्षा की नवीन संरचना (New outlines of higher education)– आयोग ने उच्च शिक्षा की संरचना इस प्रकार की है-

(i) 2 या 3 वर्ष का स्नातकोत्तर कोर्स

(ii) 2 या 3 वर्ष का द्वितीय डिग्री कोर्स

(i) 3 वर्ष का प्रथम डिग्री कोर्स

(घ) उच्च शिक्षा की नवीन संरचना सम्बन्धी सुझाव (Suggestions in relation of the new outlines of higher education) –

(1) उच्चतर माध्यमिक शिक्षा के उपरान्त प्रथम डिग्री कोर्स की अवधि 3 वर्ष रखी जाये।

(2) द्वितीय डिग्री कोर्स की अवधि 2 या 3 वर्ष रखी जाये ।

(3) उत्तर-प्रदेश में त्रिवर्षीय डिग्री कोर्स कुछ चुने हुए विश्वविद्यालयों एवं चुने हुए विषयों में प्रारम्भ किया जाये।

(4) कुछ विश्वविद्यालयों में ग्रेजुएट स्कूल स्थापित किए जायें, जिसमें कुछ विषयों में 3 वर्ष के स्नातकोत्तर कोर्स का प्रबन्ध किया जाये।

(ङ) शिक्षा के स्तरों का अध्ययन (Upgrading the stages of education)- शिक्षा के स्तरों को ऊँचा उठाने के लिए आयोग ने निम्नलिखित सुझाव दिये हैं-

(1) 10 वर्ष की विद्यालीय-शिक्षा को गुण-व्यवहार से उन्नत बनाया जाये।

(2) 10 वर्ष में 10वीं कक्षा के स्तर को इस स्थिति में पहुंचा दिया जाये जिस स्थिति में इस समय हायर सेकेन्ड्री का स्तर है।

(3) ‘विद्यालय संकुलों’ का निर्माण किया जाये। प्रत्येक संकुल में एक माध्यमिक स्कूल एवं उसके आस-पास के समस्त प्राथमिक स्कूल रखे जायें। ऐसे संकुल में होने वाले समस्त स्कूलों द्वारा सामूहिक रूप से स्तर में सुधार करने का प्रयास किया जाये।

(4) विश्वविद्यालयों-उपाधियों के कोर्स में अधिक उन्नत-विषयवस्तु का समावेश किया जाये।

(3) शिक्षक की स्थिति (Status of the Instructor)

आयोग ने शिक्षण-व्यवसाय के प्रति देश के योग्य एवं प्रभावशाली व्यक्तियों को आकर्षित करने के  लिए शिक्षकों की आर्थिक स्थिति, व्यावसायिक एवं सामाजिक स्थिति में सुधार करने के लिए निम्नलिखित सुझाव दिये हैं-

(क)वेतन

(Remuneration/Salary)

(1) भारत सरकार विद्यालयों के शिक्षकों का न्यूनतम वेतन-क्रम निश्चित कर दे।

(2) सरकारी एवं गैर सरकारी समस्त विद्यालयों के वेतन-क्रम में समानता के सिद्धान्त का अनुसरण किया जाये।

(3) विश्वविद्यालय एवं उससे सम्बद्ध कालेजों के अध्यापकों के वेतन-क्रम में पर्याप्त वृद्धि की जाये।

(ख) शिक्षकों का वेतन-क्रम (Grade of Salary of the Teacher)- आयोग ने शिक्षा के विभिन्न स्तरों पर शिक्षकों के लिए निम्नांकित वेतन क्रम (Pay Scale) का सुझाव दिया है-

(1) हायर सेकेण्डरी स्कूल के प्रशिक्षित अध्यापक-

20 वर्ष में अधिक से अधिक                                                             150 रु०

20 वर्ष के बाद                                                                               250 रु०

उसके बाद 15 प्रतिशत अध्यापकों को-                                              250 से 300 रु०

(2) प्रशिक्षित प्रेजुएट-                                                                      कम से कम 220 रु०

20 वर्ष के अन्दर वृद्धि                                                                      400 रु०

इसके बाद 15 प्रतिशत योग्य अध्यापकों का-                                        405 से 500 रु०

(3) प्रशिक्षित पोस्ट ग्रेजुएट                                                                 300 से 600 रु०

सम्बद्ध कालेजों में अध्यापकों का वेतन जो कि स्वीकृत हो चुका है-

(4) लेक्चर जूनियर-                                                                           300-25-600 रु०

सीनियर                                                                                           400-30-600-40-800 रु०

 रीडर                                                                                               700-40-1100 रु०

(5) सीनियर रीडर एवं प्रिंसिपल                                                         1-700-40-1100 50

                                                                                                       II-800-50-1250 रु०

                                                                                                       III-1000-50-1550 रु०

(6) विश्वविद्यालय स्तर लेक्चरार                                                           400-40-800 रु०

                                                                                                       50-950 रु०

रीडर-                                                                                              700-50-1050 रु०

प्रोफेसर-                                                                                          1100-50-1300 रु०

                                                                                                       60-1600 रु०

(ग) कार्य एवं सेवा की दशायें (Conditions of work and Service)-शिक्षा आयोग ने अध्यापकों के कार्य एवं सेवा सम्बन्धी दशाओं में सुधार करने के लिये निम्नलिखित सुझाव दिये हैं-

(1) समस्त शिक्षकों की ‘व्यावसायिक उन्नति’ करने के लिए उपयुक्त सुविधायें प्रदान की जायें।

(2) प्रत्येक शिक्षण-संस्था के कुशल कार्य के लिए न्यूनतम दशाओं एवं सुविधाओं को प्रदान किया जाये।

(3) शिक्षण-कार्य तथा अन्य कार्यों को सामने रखते हुए शिक्षकों के कार्य के घण्टे निश्चित किये जायें।

(4) वर्ष में कम से कम एक बार भारत के किसी भाग में भ्रमण करने के लिए शिक्षकों को उनके वेत के अनुसार रियायती दर पर रेलवे टिकट देने की योजना बनाई जायें।

(5) शिक्षकों के आवास के लिए सरकारी गृह-निर्माण योजनाओं को प्रोत्साहन दिया जायें।

(6) सरकारी विद्यालयों के समान व्यक्तिगत विद्यालयों के शिक्षकों की सेवा दशायें बनाई जायें।

(7) निर्वाचन में भाग लेने के लिए शिक्षकों पर किसी प्रकार का प्रतिबन्ध न लगाया जाये।

(8) अध्यापिकाओं के शिक्षा-स्तर को ऊँचा उठाने लिए ‘पत्र-व्यवहार’ द्वारा शिक्षा की सुविधायें दी जायें।

(9) शिक्षा के समस्त स्तरों पर अध्यापिकाओं की नियुक्ति का प्रयास किया जाये।

(10) ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षकों को आवास प्रदान करने के लिए प्रयत्न किये जायें

(4) अध्यापक शिक्षा (Teacher Education)

कोठारी आयोग ने अध्यापकों की व्यावसायिक शिक्षा में सुधार करने और उसे समुन्नत बनाने के लिये निम्नलिखित सुझाव दिये हैं-

(1) शिक्षक शिक्षा की पृथक्कता का अन्त-कोठारी आयोग का विचार है कि अध्यापकों की व्यावसायिक शिक्षा को प्रभावशाली बनाने के लिये उसे विश्वविद्यालय के साहित्यिक जीवन, विद्यालय जीवन तथाशिक्षा-सम्बन्धी नवीनतम विचारों के समीप लाया जाना आवश्यक है। इस उद्देश्य में सफलता प्राप्त करने के लिये ‘आयोग’ ने निम्नलिखित सुझाव दिये हैं-

(i) ‘शिक्षा’ विषय को विश्वविद्यालयों के बी० एऔर एम० ए० के पाठ्यक्रमों में स्थान दिया जाये ।

(ii) विभिन्न प्रकार की शिक्षण-संस्थाओं की पृथक्कता को दूर करने के लिये सबको ‘ट्रेनिंग कॉलेज’ की संज्ञा दी जाये।

(iii) प्रत्येक प्रशिक्षण संस्था में ‘प्रसार-सेवा-विभाग’ की स्थापना की जाये ।

(iv) प्रत्येक राज्य में ‘कॉम्प्रहेन्सिव कॉलेजों’ का निर्माण किया जाय, जिनमें शिक्षा के विभिन्न स्तरों के लिये अध्यापकों को प्रशिक्षण दिया जाये।

(v) प्रत्येक राज्य में अध्यापक-शिक्षा का स्टेट बोर्ड’ स्थापित किया जाये । यह बोर्ड सब स्तरों और सब क्षेत्रों में अध्यापक शिक्षा के लिये उत्तरदायी बनाया जाये।

(2) व्यावसायिक शिक्षा में सुधार- अध्यापक शिक्षा के कार्यक्रम में गुणात्मक उन्नति करने के लिये ‘आयोग’ ने निम्नलिखित सुझाव दिये हैं-

(i) प्रशिक्षण-विद्यालयों के पाठ्यक्रमों की शिक्षा और विषय-सामग्री को परिवर्तित किया जाये ।

(ii) विश्वविद्यालयों में सामान्य और व्यावसायिक शिक्षा के एकीकृत पाठ्यक्रम आरम्भ किये जायें।

(iii) अध्ययन के अभ्यास में गुणात्मक सुधार किया जाये।

(iv) विशिष्ट पाठ्यक्रमों और कार्यक्रमों का निर्माण किया जाये।

(v) अध्यापक शिक्षा के सब स्तरों पर पाठ्यक्रमों और कार्यक्रमों को दोहराया जाये।

(3) प्रशिक्षण काल-विभिन्न प्रशिक्षण-स्तरों की अवधि के बारे में कोठारी आयोग ने निम्नलिखित सुझाव दिये हैं-

(i) प्राइमरी स्कूल के उन शिक्षकों के लिये, जो सेकेण्डरी स्कूल-कोर्स पास हैं, प्रशिक्षण की अवधि 2 वर्ष की रखी जाये।

(ii) माध्यमिक स्कूलों के उन शिक्षकों के लिये जो स्नातक हैं, प्रशिक्षण की अवधि कुछ समय तक 1वर्ष की रखी जाय, पर इस अवधि को बढ़ाकर 2 वर्ष कर दी जाये।

(iii) शिक्षा में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम की अवधि को बढ़ाकर 4 सत्र अथवा 11/2वर्ष का कर दिया जाये।

(4) प्रशिक्षण-संस्थाओं में सुधार-प्रशिक्षण-संस्थाओं में गुणात्मक उन्नति करने के लिये ‘आयोग’ ने निम्नलिखित सुझाव दिये हैं-

(i) ट्रेनिंग कालेजों के अध्यापकों के पास दो ‘स्नातकोत्तर उपाधियाँ’ और शिक्षा की उपाधि होनी चाहिये।

(ii) मनोविज्ञान, समाजशास्त्र, विज्ञान या गणित ऐसे दो विषयों को पढ़ाने के लिये योग्य विशेषज्ञों को नियुक्त किया जाना चाहिये, भले ही वे अप्रशिक्षित हों।

(ii) स्कूलों में कार्य करने वाले अप्रशिक्षित अध्यापकों को प्रशिक्षण देने के लिये ‘ग्रीष्मकालीन संस्थाओं’ का संगठन किया जाये।

(iv) प्राइमरी स्कूलों के शिक्षकों को प्रशिक्षण देने वाली संस्थाओं के अध्यापक या तो ‘शिक्षा’ विषय में एम. ए. हों, या किसी अन्य विषय में स्नातकोत्तर उपाधि, आदि के साथ बी. एड. की उपाधि प्राप्त कर चुके हों।

(v) प्रशिक्षण संस्थाओं में छात्रों से शुल्क न लिया जाये और उनके लिये छात्रवृत्तियों तथा ऋण की व्यवस्था की जाये।

(5) प्रशिक्षण सुविधाओं का विस्तार– प्रशिक्षण सुविधाओं का विस्तार करने के लिये ‘कोठारी आयोग’ ने निम्नलिखित सुझाव दिये हैं-

(i) प्रत्येक राज्य को अपने क्षेत्र में प्रशिक्षण सुविधायें प्रदान करने के लिये एक योजना तैयार करनी चाहिये, जिससे शिक्षकों की माँग की पूर्ति तथा शिक्षण कार्य में लगे हुए शिक्षकों को प्रशिक्षण प्रदान किया जा सके।

(ii) विस्तृत आधार पर पत्र-व्यवहार द्वारा शिक्षा और अंशकालीन प्रशिक्षण की सुविधायें प्रदान की जानी चाहिये।

(iii) विद्यालय शिक्षकों को शिक्षण-कार्य करते हुए शिक्षा एवं प्रशिक्षण प्राप्त करने की सुविधायें दी जानी चाहिये।

(6) उच्च शिक्षा के शिक्षकों की व्यावसायिक तैयारी- आयोग ने उच्च शिक्षा के कार्य में संलग्न अध्यापकों के लिये अपने व्यवसाय अथवा शिक्षण कार्य के लिये तैयारी करना आवश्यक समझा है और इस सम्बन्ध में निम्न सुझाव दिये हैं-

(i) जो व्यक्ति पहली बार लेक्चरार के रूप में किसी उच्च शिक्षा संस्था में नियुक्त होते हैं, उन्हें संस्था के अच्छे अध्यापकों के व्याख्यानों को सुनने के अवसर दिये जायें।

(ii) प्रत्येक विश्वविद्यालय और यथासम्भव प्रत्येक कालेज में नये शिक्षकों के लिये नियमित रूप से ‘निश्चित पाठयक्रमों का संगठन किया जाये।

(iii) बड़े विद्यालयों या कुछ विश्वविद्यालयों के समूह में इन पाठ्यक्रमों को विशिष्ट शिक्षकों को नियुक्त करके संचालित किया जाये।

(5) विद्यालय पाठ्यक्रम (School Curriculum)

विद्यालय के प्रचलित पाठ्यक्रमों में दोषों को दूर करने के लिये ‘आयोग’ ने विभिन्न कक्षाओं के लिये पाठ्यक्रम निर्धारित किये हैं, जिनका विवरण निम्नलिखित हैं-

(a) निम्न प्राथमिक-(i) एक भाषा–मातृभाषा या क्षेत्रीय या प्रादेशिक भाषा, (ii) गणित,(iii) वातावरण का अध्ययन-कक्षा 3 और 4 में विज्ञान तथा सामाजिक अध्ययन पढ़ाया जाये, (iv) सृजनात्मक क्रियायें, (v) कार्य अनुभव और समाज-सेवा, (vi) स्वास्थ्य शिक्षा।

(b) उच्चतर प्राथमिक-(i) दो भाषायें : (अ) मातृभाषा अथवा प्रादेशिक भाषा (ब) हिन्दी या अंग्रेजी। (ii) गणित, (ii) विज्ञान, (iv) सामाजिक अध्ययन (इतिहास, भूगोल और नागरिकशास्त्र),(v) कला, (vi) कार्य अनुभव और समाज-सेवा, (vii) शारीरिक शिक्षा, (viii) नैतिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों की शिक्षा ।

(c) निम्न माध्यमिक-(1) तीन भाषायें : अहिन्दी भाषा क्षेत्रों में सामान्य रूप से निम्नलिखित भाषायें होनी चाहिये-(क) मातृभाषा या प्रादेशिक भाषा, (ख) उच्च या निम्न स्तर की हिन्दी, (ग) उच्च या निम्न स्तर की अंग्रेजी। हिन्दी भाषी क्षेत्रों में सामान्यतः निम्नलिखित भाषायें होनी चाहिएँ-(क) मातृभाषा या प्रादेशिक भाषा, (ख) अंग्रेजी (हिन्दी यदि अंग्रेजी मातृभाषा के रूप में ले ली गई है), (ग) हिन्दी के अतिरिक्त एक अन्य आधुनिक भारतीय भाषा, (ii) गणित, (iii) विज्ञान, (iv) इतिहास, भूगोल तथा नागरिकशास्त्र, (5) कला, (i) कार्य अनुभव और समाज-सेवा, (vi) शारीरिक शिक्षा, नैतिक और अध्यात्मिक मूल्यों की शिक्षा।

(d) उच्चतर माध्यमिक-(i) कोई दो भाषायें-जिनमें कोई आधुनिक भारतीय भाषा,कोई आधुनिक विदेशी भाषा तथा कोई शास्त्रीय भाषा सम्मिलित हो, (ii) निम्नलिखित में से कोई से तीन विषय चुने जायें : (क) अतिरिक्त भाषा, (ख) इतिहास, (ग) भूगोल,(घ) अर्थशास्त्र, (ङ) तर्कशास्त्र, (च) मनोविज्ञान, (छ) समाजशास्त्र, (ज) कला, (झ) भौतिक शास्त्र, (ज) रसायन शास्त्र, (ट) गणित, (ठ) जीव विज्ञान, (ड) भूगर्भ शास्त्र, (ढ) गृह-विज्ञान (iii) कार्य अनुभव तथा समाज-सेवा, (iv) शारीरिक शिक्षा, (v) कला या शिल्प, (vi) नैतिक तथा आध्यात्मिक मूल्यों की शिक्षा।

(e) त्रि-भाषी फार्मूले में संशोधन- आयोग के विचार से त्रिभाषा फार्मूले में संशोधन निम्नांकित सिद्धान्तों के आधार पर किया जाना चाहिये-

(i) हिन्दी संघ की राजभाषा के रूप में मातृभाषा के बाद महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त करे।

(ii) अंग्रेजी का ज्ञान छात्रों के लिये लाभप्रद होगा।

(iii) तीन भाषाओं को सीखने के लिये सबसे उपयुक्त स्तर निम्नतर-माध्यमिक स्तर है।

(iv)हिन्दी या अंग्रेजी का शिक्षण उस समय प्रारम्भ किया जाये, जब उनके लिये अधिकाधिक प्रेरणा एवं आवश्यकता का अनुभव किया जाये।

आयोग ने उपर्युक्त सिद्धान्तों के आधार पर त्रिभाषी फार्मूले का रूप इस प्रकार अंकित किया है-

(i) मातृभाषा या प्रादेशिक भाषा।

(ii) संघ की राजभाषा या सह-राजभाषा, जब तक यह है।

(iii) एक आधुनिक भारतीय या योरोपियन भाषा, जो छात्र द्वारा पाठ्यक्रम में से न चुनी गई हो और शिक्षा का माध्यम न हो।

(f) हिन्दी का स्थान-आयोग’ ने कहा है कि अंग्रेजी को उच्च शिक्षा में बौद्धिक आदान-प्रदान की भाषा का काम करना होगा । परन्तु अंग्रेजी अधिकांश भारतीय जनता के लिये विनियम की भाषा नहीं बन सकती है। यह भाषा कालान्तर में हिन्दी ही होगी। इसलिये, इसे भारत के सभी भागों में फैलाने के लिये कार्य किया जाना चाहिये।

(g) विभिन्न भारतीय भाषाओं का स्थान–‘आयोग’ ने कहा कि हिन्दी के अतिरिक्त सभी आधुनिक भारतीय भाषाओं का विकास किया जाये, ताकि एक राज्य से दूसरे में विनिमय के लिये इन भाषाओं का प्रयोग किया जा सके।

(h) अंग्रेजी का स्थान-‘आयोग’ ने अखिल भारतीय सभी संस्थाओं और विश्वविद्यालयों में अंग्रेजी को ही शिक्षा का माध्यम बनाये रखने पर जोर दिया है। अंग्रेजी की पढ़ाई स्कूल स्तर से ही जारी रखनी चाहिये।

(i) शास्त्रीय भाषाओं का स्थान- ‘आयोग’ ने शास्त्रीय भाषाओं के अध्ययन के महत्व को स्वीकार किया है। उसने यह भी स्वीकार किया है कि राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली में संस्कृति विशेष अधिकार रखती है। परन्तु ‘आयोग’ इस प्रस्ताव से सहमत नहीं है कि संस्कृत या अन्य किसी शास्त्रीय भाषा को त्रिभाषी फार्मूले में स्थान दिया जाये। ‘आयोग’ का विचार है इस फार्मूले में केवल आधुनिक भारतीय भाषाओं को ही स्थान दिया जाये।

(6) कृषि शिक्षा (Agriculture Education)

आयोग ने स्पष्ट किया कि भारत एक कृषि प्रधान देश है, अतः यहाँ कृषि शिक्षा की व्यवस्था प्राथमिक स्तर से ही शुरू कर देनी चाहिए। साथ ही आयोग ने कृषि शिक्षा की पूरी रूपरेखा भी प्रस्तुत की जिसे निम्नलिखित रूप में क्रमबद्ध किया जा सकता है।

विद्यालयी स्तर पर कृषि शिक्षा-

(1) प्राथमिक स्तर पर कृषि सम्बन्धी सामान्य जानकारी को पाठ्यचर्या का अनिवार्य अंग बनाया जाए।

(2) माध्यमिक स्तर पर कृषि को कार्यानुभव का महत्त्वपूर्ण अंग बनाया जाए।

(3) माध्यमिक स्तर पर जूनियर कृषि विद्यालयों की स्थापना का विचार त्याग दिया जाए।

(4) उच्चतर माध्यमिक स्तर पर कृषि विषय में विशिष्टीकरण की व्यवस्था की जाए।

पॉलिटेक्निक स्तर पर कृषि शिक्षा-

(1) माध्यमिक शिक्षा उत्तीर्ण सामान्य छात्रों के लिए प्रत्येक प्रान्त में पर्याप्त पॉलिटेक्निक कॉलिज खोले जाएँ और इनमें आवश्यकतानुसार कृषि शिक्षा की भी व्यवस्था की जाए।

(2) इन कॉलिजों का कृषि शिक्षा सम्बन्धी पाठ्यक्रम ऐसा हो जिसे पूरा करने के बाद सामान्य छात्र कृषि कार्य कुशलतापूर्वक कर सकें और योग्य छात्र उच्च कृषि शिक्षा में प्रवेश पा सकें।

(3) ऐसे पॉलिटेक्निक कॉलिज जिनमें कृषि शिक्षा की व्यवस्था हो, उन्हें कृषि विश्वविद्यालयों से सम्बद्ध किया जाए।

(4) इन कॉलिजों में कृषकों और कृषि में विशेष रुचि रखने वाले व्यक्तियों के लिए सघन एवं संक्षिप्त कार्यक्रम चलाए जाएँ।

महाविद्यालय स्तर पर कृषि शिक्षा-

(1) अभी और नए कृषि महाविद्यालय न खोले जाएँ अपितु वर्तमान कृषि महाविद्यालयों की दशा सुधारी जाए।

(2) कुछ कृषि महाविद्यालयों में कृषि स्नातक पाठ्यक्रम के स्थान पर उच्च कृषि तकनीकी शिक्षा की व्यवस्था की जाए।

(3) प्रत्येक कृषि महाविद्यालय के पास कम से कम 200 एकड़ कृषि योग्य भूमि का फार्म होना चाहिए।

(4) सभी कृषि महाविद्यालयों का हर पाँच वर्ष बाद विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद द्वारा संयुक्त रूप से निरीक्षण किया जाए।

विश्वविद्यालय स्तर पर कृषि शिक्षा-

(1) प्रत्येक कृषि विश्वविद्यालय में कम से कम 1000 एकड़ कृषि योग्य भूमि का फार्म होना चाहिए।

(2) प्रत्येक प्रान्त में कम से कम एक शिक्षण कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना की जाए और इसमें स्नातक एवं परास्नातक शिक्षा और कृषि में अनुसन्धान कार्य की उत्तम व्यवस्था की जाए। साथ ही कृषि प्रसार कार्यक्रमों की व्यवस्था की जाए।

(3) उपाधि प्रदान करने से पूर्व फार्म पर एक वर्ष कृषि कार्य करना अनिवार्य हो।

(4) प्रथम स्नातक पाठ्यक्रम कक्षा 10 के बाद 5 वर्ष का और कक्षा 12 के बाद 3 वर्ष का हो।

(5) कृषि विश्वविद्यालयों में 25% छात्रों को छात्रवृत्तियाँ दी जाएँ।

अन्य कृषि संस्थानों में कृषि शिक्षा-

(1) भारतीय कृषि अनुसन्धान संस्थान (IARI) कृषि शिक्षा के विस्तार और उन्नयन के लिए भी उत्तरदायी हो।

(2) भारतीय कृषि अनुसन्धान संस्थान (IARI), भारतीय पशु अनुसन्धान संस्थान (IVRI) और राष्ट्रीय डेरी अनुसन्धान संस्थान (NDRI) भी अपने-अपने क्षेत्र में परास्नातक शिक्षा की व्यवस्था और शोध कार्य के लिए उत्तरदायी हों।

(7) व्यावसायिक एवं तकनीकी शिक्षा

आयोग ने सबसे अधिक बल शिक्षा को उत्पादन से जोड़ने पर दिया। उसकी सम्मति में माध्यमिक शिक्षा का व्यावसायीकरण करने से शिक्षा और उत्पादन में सम्बन्ध स्थापित किया जा सकता है। पॉलिटेक्निक और इंजीनियरिंग कॉलिजों की तो इस क्षेत्र में विशेष भूमिका है। लेकिन इन सबमें सुधार की आवश्यकता है।

माध्यमिक व्यावसायिक एवं तकनीकी शिक्षा सम्बन्धी सुझाव

(1) जूनियर टेक्नीकल स्कूलों को टेक्नीकल हाई स्कूलों में बदल दिया जाए।

(2) माध्यमिक शिक्षा का व्यावसायीकरण किया जाए और 20 वर्ष के अन्दर अर्थात् 1985-86 तक माध्यमिक स्तर पर 25% और उच्चतर माध्यमिक स्तर पर 50%, छात्रों को व्यावसायिक वर्ग में लाया जाए।

(3) पॉलीटेक्निक कॉलिजों में महिलाओं की रुचि के उद्योगों की शिक्षा की व्यवस्था की जाए।

(4) नए पॉलीटेक्निक कॉलिज केवल औद्योगिक क्षेत्रों में ही खोले जाएँ।

(5) माध्यमिक (व्यावसायिक वर्ग) और पॉलिटेक्निक कॉलिजों के पाठ्यक्रम अपने आप में पूर्ण होने चाहिए, ऐसे कि इनको पूर्ण करने के बाद छात्र-छात्राएँ यथा व्यवसायों में लग सकें और इच्छुक छात्र-छात्राएँ उच्च व्यावसायिक तकनीकी शिक्षा में प्रवेश पा सकें।

(6) ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित पॉलीटेक्निक कॉलिजों में कृषि और कृषि से सम्बन्धित उद्योगों की शिक्षा की व्यवस्था की जाए।

(7) इन संस्थाओं में केवल यथा उद्योगों में अनुभव प्राप्त शिक्षकों की नियुक्ति की जाए।

(8) विद्यालयी शिक्षा पूरी करने वाले इच्छुक छात्र-छात्राओं के लिए अंशकालिक, पत्राचार, सैंडविच औ लघु व्यावसायिक एवं तकनीकी पाठ्यक्रमों की सुविधा में वृद्धि की जाए।

(9) माध्यमिक व्यावसायिक विद्यालयों और पॉलीटेक्निक कॉलिजों में होने वाले अपव्यय को रोका जाए। यह तभी सम्भव है जब इनके पाठ्यक्रम उपयोगी एवं रोजगारपरक हों।

(10) इन पाठ्यक्रमों में सैद्धान्तिक ज्ञान की अपेक्षा व्यावहारिक प्रशिक्षण पर अधिक बल दिया जाए।

उच्च इंजीनियरिंग शिक्षा सम्बन्धी सुझाव

(1) विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की भाँति केन्द्रीय तकनीकी शिक्षा संस्थान (Central Technical Education Institute, CTEI) का गठन किया जाए जो उच्च तकनीकी शिक्षा के लिए उत्तरदायी हो।

(2) इंजीनियरिंग के उन कॉलिजों में जो उच्च स्तर की शिक्षा प्रदान नहीं कर रहे हैं, सुधार किया जाये। निम्न स्तर के इंजीनियरिंग कॉलिजों को बन्द कर दिया जाये।

(3) इंजीनियरिंग कॉलिजों के पाठ्यक्रमों को अद्यतन बनाया जाए। इग्में विमान तकनीकी, नक्षत्र विज्ञान, रासायनिक तकनीकी आदि नए पाठ्यक्रम शुरू किए जायें।

(4) व्यावहारिक प्रशिक्षण के लिए औद्योगिक संस्थानों का सहयोग लिया जाये।

(5) नए इंजीनियरिंग कॉलिजों की स्थापना मानव शक्ति की माँग के आधार पर की जाये।

(6) इंजीनियरिंग कॉलिजों में केवल विज्ञान वर्ग से उच्चतर माध्यमिक शिक्षा प्राप्त योग्य छात्र-छात्राओं को ही प्रवेश दिया जाए। इंजीनियरिंग की इलेक्ट्रॉनिक आदि शाखाओं में बी० एस-सी. (गणित वर्ग) उत्तीर्ण अभ्यर्थियों को वरीयता दी जाये।

(7) इंजीनियरिंग कॉलिजों के शिक्षकों को अपने-अपने क्षेत्र के अद्यतन शान से अवगत कराने के लिए ‘ग्रीष्मकालीन संस्थानों’ (Summer Institutes) की व्यवस्था की जाये।

(8) जहाँ आवश्यक हो, पत्राचार पाठ्यक्रम शुरु किए जाये।

(9) इंजीनियरिंग कॉलिजों में सैद्धान्तिक ज्ञान की अपेक्षा व्यावहारिक प्रशिक्षण पर अधिक बल दिया जाये।

(10) इन्जीनियरिंग के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में केवल उन्हीं छात्र-छात्राओं को प्रवेश दिया जाए जो इंजीनियरिंग की स्नातक शिक्षा प्राप्त करने के बाद किसी उद्योग में 1 वर्ष कार्य कर चुके हों।

(8) विज्ञान, शिक्षा एवं अनुसन्धान

आयोग ने स्पष्ट किया कि देश के आर्थिक विकास, उसकी सुरक्षा और उसके आधुनिकीकरण के लिए विज्ञान की शिक्षा अति आवश्यक है और साथ ही इस क्षेत्र में निरन्तर अनुसंधान करने की आवश्यकता है ! आयोग ने देश में विज्ञान शिक्षा के विकास (प्रसार एवं उन्नयन) के सम्बन्ध में निम्नलिखित सुझाव दिए-

(1) विकसित देशों में राष्ट्रीय आय का 2 प्रतिशत से भी अधिक वैज्ञानिक शोधों पर व्यय किया जाता है, हमारे देश में केवल 0.03 प्रतिशत ही व्यय किया जाता है। इस धनराशि को बढ़ाया जाए।

(2) विज्ञान में दो वर्षीय स्नातकोत्तर शिक्षा के अतिरिक्त एक वर्षीय विशेष पाठ्यक्रमों की व्यवस्था क आए, जिनमें विज्ञान की अद्यतन जानकारी दी जाए।

(3) विश्वविद्यालयों में विज्ञान के क्षेत्र में अनुसन्धान की उचित व्यवस्था की जाए। ये अनुसन्धान कार्य अंतरराष्ट्रीय स्तर के होने चाहिए।

(4) राष्ट्रीय संस्थान (National Institute of Science) का पुनर्गठन किया जाए। यह विज्ञान शिक्षा वस्तार एवं उन्नयन के लिए उत्तरदायी हो।

(5‍)प्रत्येक विज्ञान कॉलिज और विश्वविद्यालय में विज्ञान की शिक्षा और शोध कार्य के लिए अच्छे स्तर की प्रयोगशालाओं की व्यवस्था की जाए।

(6)विज्ञान की शिक्षा प्रारम्भिक कक्षाओं से ही शुरू की जाए और इसके लिए क्षेत्रीय भाषाओं में वैज्ञानिक शब्दावली का विकास किया जाए।

(7)विज्ञान की शिक्षा हेतु योग्य एवं अनुभवी शिक्षक नियुक्त किए जाएँ।

(8)विदेशी वैज्ञानिकों और विदेशों में कार्यरत भारतीय वैज्ञानिकों को व्याख्यान हेतु आमन्त्रित किया जाए। कुछ अतिरिक्त प्रतिभा के व्यक्तियों को एक से तीन वर्ष तक के लिए विजिटिंग प्रोफेसर नियुक्त किया जाए।

(9) विज्ञान के सर्वोत्तम पाठ्यक्रमों को पूरा करने वाले छात्रों का मूल्यांकन उनके वर्षभर के प्रायोगिक कार्यों के आधार पर किया जाए।

(10) विज्ञान के स्नातक, स्नातकोत्तर और विशेष पाठ्यक्रमों में सुधार किया जाए, उन्हें अद्यतन बनाया जाए। ये अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के होने चाहिए।

(11) विज्ञान एवं गणित की उच्च शिक्षा हेतु उच्च अध्ययन केन्द्रों (Centres of Advanced Studies) की स्थापना की जाए। इनकी स्थापना के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग आवश्यक आर्थिक सहायता दे।

(12) अनुसन्धानकर्ताओं को आर्थिक सहायता दी जाए तथा विदेश जाने की सुविधाएँ दी जाएँ।

(13) विज्ञान की शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्र-छात्राओं के मूल्यांकन में सैद्धान्तिक परीक्षा की अपेक्षा प्रायोगिक कार्य को अधिक महत्त्व दिया जाए।

(14) इन शिक्षकों को विज्ञान के क्षेत्र की अद्यतन जानकारी देने हेतु प्रीष्मकालीन संस्थानों (Surnmer, Institutes) की व्यवस्था की जाए।

(9) स्त्री शिक्षा (Women Education)

आयोग की सम्मति में बच्चों के चरित्र निर्माण, परिवारों की उन्नति और राष्ट्रीय मानव संसाधनों के विकास के लिए स्त्रियों की शिक्षा पुरुषों की शिक्षा से अधिक महत्त्वपूर्ण है। आयोग ने इस बात पर बल दिया कि स्त्री शिक्षा के प्रसार एवं उन्नयन के लिए विशेष प्रयास किए जाने चाहिए। आयोग के स्त्री शिक्षा सम्बन्धी सुझावों को निम्नलिखित रूप में क्रमबद्ध किया जा सकता है-

शिक्षा संस्थाओं की स्थापना

(1) बालिकाओं के लिए 20 वर्षों के अन्दर कम से कम इतने माध्यमिक विद्यालय खोले जाएँ कि इस स्तर पर पढ़ने वाले बालक-बालिकाओं का अनुपात 2:1 हो जाए।

(2) स्त्रियों के लिए पत्राचार पाठ्यक्रमों की व्यवस्था की जाए।

(3) बालिकाओं के लिए 20 वर्षों के अन्दर इतने प्राथमिक विद्यालय खोले जाएँ कि सभी बालिकाओं को प्राथमिक शिक्षा सुलभ हो सके।

(4) प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रमों में स्त्रियों की शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाए।

(5) जहाँ महिलाओं की उच्च शिक्षा की अधिक माँग हो वहाँ अलग से महिला महाविद्यालय स्थापि किए जाएँ।

पाठ्यक्रम सुविधा

(1) लड़कियों को लड़कों की भांति सभी प्रकार की शिक्षा प्राप्त करने के समान अवसर देने चाहिए।

(2) शिक्षा के किसी भी स्तर का पाठ्यक्रम बालक-बालिकाओं के लिए समान होना चाहिए। परन्तु माध्यमिक स्तर के पाठ्यक्रम में बालिकाओं के लिए गृह विज्ञान की अलग से व्यवस्था की जानी चाहिए।

आर्थिक सहायता

(1) बालिकाओं के लिए माध्यमिक स्तर तक की शिक्षा निःशुल्क की जाए।

(2) दूर से आने वाली छात्राओं को निःशुल्क वाहन सेवा सुलभ कराई जाए।

(3) स्त्री शिक्षा के प्रसार के लिए उदारतापूर्वक आर्थिक सहायता दी जाए।

(4) जहाँ आवश्यक हो वहाँ छात्राओं के लिए कम खर्चीले छात्रावासों की व्यवस्था की जाए।

(5) उच्च शिक्षा में बालिकाओं के लिए विशेष छात्रवृत्तियों की व्यवस्था की जाए।

(10) प्रौढ़ शिक्षा (Adult Education)

सन् 1947 में स्वतन्त्रता प्राप्ति के साथ ही प्रौढ़ शिक्षा के क्षेत्र में नये युग का उदय हुआ। केन्द्रीय और प्रान्तीय सरकारें इस सम्बन्ध में योजना बनाने पर गम्भीरतापूर्वक विचार करने लगीं। 1948 में केन्द्रीय शिक्षा परामर्श बोर्ड (Central Advisory Board of Education) ने प्रौढ़ शिक्षा के लिए एक कमेटी नियुक्त की। कमेटी की रिपोर्ट से प्रौढ़ शिक्षा के विषयों और सामग्री के सम्बन्ध में सरकार की नीति में निश्चित परिवर्तन हुआ। प्रौढ़ शिक्षा अब साक्षरता तक ही सीमित नहीं रह गयी, बल्कि उसमें नागरिकता की शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और हस्तशिल्प की शिक्षा को भी सम्मिलित किया गया।

कोठारी आयोग के विचार (Views of Kothari Commission)

प्रौढ़ शिक्षा के सम्बन्ध में कोठारी आयोग ने शिक्षा के तीन पक्ष बताये हैं-

(1) प्रौढ़ शिक्षा काम पर आधारित होनी चाहिए। इसका उद्देश्य व्यक्ति में नये दृष्टिकोण तथा अभिरुचियाँ उत्पन्न करना होना चाहिए। इसके अलावा व्यक्ति को आवश्यक कौशल (Skills) और सूचनाएँ प्रदान करनी चाहिए जिससे कि वह सभी काम को जो उसे दिया जाये, कुशलतापूर्वक कर सके।

(2) इसके द्वारा व्यक्ति के मन में राष्ट्र की सजीव समस्याओं की ओर रुचि उत्पन्न करनी चाहिए, जिससे वे देश के सामाजिक और राजनैतिक जीवन में सक्रिय रूप से भाग ले सकें।

(3) ऐसे लोगों में पढ़ने, लिखने और गणित की ऐसी कुशलता उत्पन्न करनी चाहिए कि वह व्यक्तिगत अथवा अन्य साधनों के द्वारा अपनी शिक्षा जारी रख सके।

कोठारी आयोग के सुझाव (Recommendations of Kothari Commission)

कोठारी आयोग ने निरक्षरता के उन्मूलन, प्रौढ़ शिक्षा के संगठन व प्रशासन साधन तथा पाठ्यक्रम के सन्दर्भ में निम्नांकित सुझाव दिये हैं-

(1) निरक्षरता का उन्मूलन (Liquidation of Illiteracy) – निरक्षरता को जड़ से उखाड़ने के लिए हर सम्भव प्रयत्न करना चाहिए। इस कार्य को पूरा करने में 20 वर्ष से अधिक का समय नहीं लगना चाहिए। 1971 तक देश के 60% व्यक्ति पढ़े-लिखे होने चाहिए और 1976 तक यह संख्या 80% तक पहुँच जानी चाहिए।

(2) अनवरत शिक्षा (Continuing Education)- सभी संस्थाओं को प्रोत्साहन देना चाहिए कि अपने नियमित समय के बाद उन व्यक्तियों के लिए विभिन्न पाठ्य विषयों की व्यवस्था करें, जो पढ़ना चाहते हैं। समान्तर रूप से एक अंशकालिक शिक्षा प्रणाली की व्यवस्था की जाये जिसके माध्यम से प्रौढ़ भी स्कूल और कॉलेज के विद्यार्थियों के समान डिप्लोमा और डिग्रियाँ प्राप्त कर सकें।

(3) संक्षिप्त पाठ्यक्रम (Condenced Courses)- महिलाओं में साक्षरता का विकास करने के लिए केन्द्रीय समाज कल्याण बोर्ड (Central Social Welfare Board) द्वारा संक्षिप्त पाठ्यक्रमों की व्यवस्था होनी चाहिए। ग्रामीण महिलाओं को शिक्षा देने के लिए और स्थानीय समुदायों में प्रौढ़ शिक्षा की व्यवस्थ करने के लिए ग्राम सेविकाओं (Village Sisters) की नियुक्ति को प्रोत्साहन मिलना चाहिए।

(4) विकास कार्यक्रम (Development Programme)- निरक्षरता को रोकने के लिए निम्नलिखित कार्यक्रम अपनाने चाहिए-

(अ) 6-11 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों के लिए 5 वर्षों की सार्वभौमिक शिक्षा का विस्तार करना।

(ब) 11-14 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों के लिए अंशकालिक शिक्षा व्यवस्था की जानी चाहिए। उन बच्चों के लिए जो या तो स्कूल नहीं जा सके अथवा समय से पहले ही स्कूल से निकल गये।

(स) 15-30 वर्ष आयु वर्ग के व्यक्तियों के लिए अंशकालिक सामान्य और व्यावसायिक शिक्षा की व्यवस्था की जाये।

(5) साधन (Approach)-निरक्षरता को समाप्त करने के लिए निम्न साधन अपनाने चाहिए-

(अ) सामान्य साधन (General Approach)- इस साधन के अन्तर्गत उपलब्ध शिक्षित व्यक्तियों (स्त्री-पुरुषों) को एकत्रित करके निरक्षरता से संघर्ष करने के लिए एक शक्ति का निर्माण करना चाहिए और सुनियोजित ढंग से साक्षरता कार्यक्रम में लगाना चाहिए । इसमें अध्यापकों, विद्यार्थियों तथा सभी शिक्षा संस्थाओं को सक्रिय रूप से भाग लेना चाहिए। सैकेण्डरी, हायर सैकेण्डरी तथा व्यावहारिक स्कूलों एवं विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों को प्रौड़ों को शिक्षा देनी चाहिए तथा इसे अनिवार्य राष्ट्रीय सेवा का कार्यक्रम बना देना चाहिए। प्रत्येक संस्था को किसी निश्चित इलाके के लोगों को साक्षर बनाने की जिम्मेदारी सौंपनी चाहिए।

 (ब) विशेष साधन (Selective Approach)- ये साधन उन वयस्कों के लिए हैं, जिन्हें गम्भीर शैक्षिक कार्य करने के लिए आसानी से प्रेरित किया जा सकता है। बड़ी-बड़ी औद्योगिक, व्यापारिक और ठेका लेने वाली फर्मों के मालिकों के ऊपर यह जिम्मेदारी डालनी चाहिए कि वे अपने कर्मचारियों को काम पर लगने के तीन वर्ष के अन्दर-अन्दर व्यावहारिक रूप से साक्षर बना दें। यदि आवश्यकता हो तो इसके लिए कानून भी बनाया जा सकता है।

(6) पत्राचार पाठ्यक्रम (Correspondence Course)- उन उद्योगों के लिए जो अंशकालीन कोर्स (Part-time courses) का भी अध्ययन नहीं कर सकते, पत्राचार पाठ्यक्रमों की व्यापक व्यवस्था की जानी चाहिए। पत्राचार पाठ्यक्रम का रेडियो और टेलीविजन कार्यक्रमों से सामंजस्य स्थापित किया जाना चाहिए।

(7) अस्थाई विषय (Adhoc Subjects)- शिक्षा संस्थाओं को ऐसे अस्थाई पाठ्य विषयों की व्यवस्था करनी चाहिए, जिनसे लोगों को अपनी समस्याओं को हल करने में सहायता मिले और वे अपने ज्ञान व अनुभव में वृद्धि कर सकें।

(8) विशेष पाठ्यक्रम (Selective Coursc)- पत्राचार पाठ्यक्रम के विद्यार्थियों को केवल विश्वविद्यालय की डिग्रियाँ प्राप्त करने के लिए ही तैयार नहीं करना चाहिए बल्कि कृषि,उद्योग तथा अन्य क्षेत्रों के कार्यकर्ताओं के लिए विशेष पाठ्यक्रम की भी व्यवस्था की जानी चाहिए ताकि वे उत्पादन बढ़ा सकें।

(9) विशेष संस्थाएँ (Selective Institutions)- प्रौढ़ महिलाओं के लिए केन्द्रीय समाज-कल्याण बोर्ड द्वारा प्रचलित तथा मैसूर प्रान्त में स्थित विद्यापीठों के समान विशेष संस्थाएँ स्थापित की जानी चाहिए। पहले से ही स्थापित इस प्रकार की संस्थाओं का निरीक्षण किया जाना चाहिए, जिससे कि वे ग्रामीण समुदाय के लिए ठीक ढंग से कार्य करती रहें।

(10) पुस्तकालय (Liberaries)- (a) विद्यालय के पुस्तकालयों को सार्वजनिक पुस्तकालय के रूप में संगठित किया जाये, जहाँ पर नये पढ़े-लिखे लोगों के लिए भी उपयोगी पाठ्य-पुस्तकों की व्यवस्था हो। (b) पुस्तकालयों में प्रौढ़ों को आकर्षित करने की क्षमता होनी चाहिए ताकि प्रौढ़ उनका उपयोग कर सकें।

(11) विश्वविद्यालयों के कार्य (Functions of Universities)- (अ) प्रौढ़ शिक्षा के कार्यक्रमों को सुनियोजित एवं प्रभावशाली बनाने के लिए प्रत्येक विश्वविद्यालय को प्रौढ़ शिक्षा बोर्ड (Adult Education Board) की व्यवस्था करनी चाहिए, जिससे कि प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रमों की व्यवस्था करने वाले सभी विभागों को प्रतिनिधित्व मिल सके। (ब) विश्वविद्यालयों में प्रौढ़ शिक्षा विभाग भी खोलने चाहिए। प्रौढ़ शिक्षा कार्य को ठीक प्रकार से चलाने के लिए विश्वविद्यालयों में उपयोगी सामग्री की व्यवस्था करनी चाहिए और उन्हें आर्थिक सहायता भी दी जानी चाहिए।

(12) संगठन तथा प्रशासन (Organisation and Administration)- (अ) प्रौढ़ शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने वाली स्वैच्छिक संस्थाओं को प्रोत्साहन मिलना चाहिए तथा उन्हें तकनीकी व आर्थिक सहायता भी प्रदान करनी चाहिए। (ब) राष्ट्रीय प्रौढ़ शिक्षा बोर्ड की स्थापना करनी चाहिए जिसमें सभी मन्त्रालयों और साधनों को प्रतिनिधित्व मिल सके। इस प्रकार की संस्थाएँ प्रान्त और जिला स्तर पर भी स्थापित की जानी चाहिए। (स) राष्ट्रीय प्रौढ़ शिक्षा परिषद के सम्भाग स्तर पर परिषदों का और जिला स्तर पर समितियों का निर्माण किया जाना चाहिए। ग्राम स्तर पर परिषद के कार्यों को विद्यालयों को सौंपना चाहिए।

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