अर्थशास्त्र

केन्द्रीय बैंक की परिभाषा | केन्द्रीय बैंक के कार्य | साख नियंत्रण की प्रमुख विधियाँ

केन्द्रीय बैंक की परिभाषा | केन्द्रीय बैंक के कार्य | साख नियंत्रण की प्रमुख विधियाँ

 केन्द्रीय बैंक की परिभाषा

(Definition of Central Bank)-

प्रत्येक देश की अर्थव्यवस्था में केन्द्रीय बैंक का महत्वपूर्ण स्थान होता है क्योंकि अन्य बैंक इससे निर्देशन प्राप्त करते हैं तथा अनेक प्रकार से इस पर निर्भर करते हैं। केन्द्रीय बैंक के महत्व को बताते हुए विल रोजर्स ने कहा है कि “अतीत से अब तक तीन महान आविष्कार हुए हैं- आग, पहिया तथा केन्द्रीय बैंक।” केन्द्रीय बैंक की परिभाषा कुछ विद्वानों ने निम्न प्रकार से दी है-

सेम्यूलसन के अनुसार, “केन्द्रीय बैंक एक ऐसा बैंक है जिसे देश की सरकार अपने लेन-देन के लिए कार्य करने, व्यावसायिक बैंकों को नियंत्रित करने तथा राष्ट्र की मुद्रा की पूर्ति एवं साख व्यवस्था के नियंत्रण में सहयोग देने के लिए स्थापित करती है।

बैंक ऑफ इन्टरनेशनल सेटलमेन्ट के अनुसार “केन्द्रीय बैंक किसी देश का वह बैंक है जिसे वहाँ की चलन मात्रा तथा साख की मात्रा के नियमन का उत्तरदायित्व सौंपा होता है।”

वीर स्मिथ के अनुसार, “केन्द्रीय बैंक एक बैंक को पूर्ण रूप से मुद्रा निर्गमन का एकाधिकार होता है।”

उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि केन्द्रीय बैंक एक ऐसी संस्था होती है जो किसी देश की मुद्रा तथा साख के निर्गमन एवं बैंकिंग व्यवस्था पर नियंत्रण करती है।

केन्द्रीय बैंक के कार्य-

केन्द्रीय बैंक के प्रमुख कार्यों का विवरण निम्नलिखित है-

  1. पत्र मुद्रा का निर्गमन- प्रत्येक देश में पत्र मुद्रा जारी करने का कार्य केन्द्रीय बैंक के द्वारा किया जाता है। केन्द्रीय बैंक को नोट निर्गमन की एकाधिकारी संस्था मानने के प्रमुख कारण हैं- साख पर नियंत्रण करना, जनता का विश्वास प्राप्त करना, मुद्रा प्रणाली में एकरूपता लान तथा मुद्रा मूल्य स्थिरता लाना इत्यादि।
  2. सरकार का बैंकर एजेन्ट व सलाहकार- केन्द्रीय बैंक प्रायः सभी देशों में सरकार के बैंकर, एजेन्ट व सलाहकार के रूप में कार्य करते हैं। सरकारी बैंकर होने के नाते यह सरकारी विभागों, प्रान्तीय एवं स्थानीय सरकारों तथा विभिन्न परिषदों एवं निगमों का जमा अपने पास रखता है तथा अनेक प्रकार के सरकारी भुगतान के लिए एजेन्ट के रूप में कार्य करता है। केन्द्रीय बैंक अनेक प्रकार के आर्थिक मामलों पर सरकार को सलाह भी देता है।
  3. बैंकों का बैंक- प्रत्येक देश के व्यावसायिक बैंक अपने नकद कोष का एक निश्चित प्रतिशत भाग केन्दीय बैंक के पास जमा करते हैं जिससे केन्द्रीय बैंक के पास देश के नकद कोषों का विकेन्द्रीयकरण हो जाता है। डी. काल के अनुसार “केन्द्रीय बैंक में नकद मुद्रा का यह केन्द्रीयकरण देश की अर्थव्यवस्था को पर्याप्त मात्रा में शक्ति प्रदान करता है।” केन्द्रीय बैंक व्यावसायिक बैंकों के सुरक्षित कोषों के अनुपात में परिवर्तन लाकर देश में मुद्रा एवं साख की मात्रा में आवश्यकतानुसार परिवर्तन करते हैं।
  4. देश के विदेशी विनिमय कोषों का संरक्षक- केन्द्रीय बैंक विदेशी मुद्रा का संरक्षक होता है। अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के विकास तथा विनिमय दरों की स्थिरता के लिए विदेशी विनिमय कोषों को उचित मात्रा में केन्द्रीय बैंक के पास बनाये रखना होता है। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि विदेशी विनिमय का आदान-प्रदान केन्द्रीय बैंक के माध्यम से ही होता है।
  5. अन्तिम सहायक के रूप में कार्य- जब मुद्रा बाजार अथवा व्यावसायिक बैंकों को ऋण प्राप्ति का कोई दूसरा साधन नहीं रह जाता तो ऐसी स्थिति में केन्द्रीय बैंक अन्तिम सहायक के रूप में इन्हें सहायता प्रदान करता है। यह साख पत्रों को भुनाता है तथा संकट काल में विशेष सहायता प्रदान करता है।
  6. खातों का समाशोधन, निबटारा तथा स्थानान्तरण-केन्द्रीय बैंक समाशोधन गृह के रूप में ऐसी व्यवस्था करता है कि विभिन्न बैंकों के पारस्परिक लेने देन अथवा एक दूसरे पर लिखे गये चेकों के भुगतान का निबटारा केवल खातों में आवश्यक परिवर्तन द्वारा किया जा सके। इसी तरह केन्द्रीय बैंक के पास सब सदस्य बैंकों के खाते खुले होने से इन खातों में रकम के हस्तान्तरण कर देने मात्र से है। बैंकों के मध्य, बिना नकद लेनदेन के ही, लेनदेन का हिसाब हो जाता है।
  7. अनुसंधान कार्य तथा आँकड़ों का संकलन एवं प्रकाशन- केन्द्रीय बैंक अनेक प्रकार की आर्थिक समस्याओं के समाधान के लिए शोध कार्य करता है तथा महत्वपूर्ण आँकड़ों का संकलन करने के साथ-साथ इनका प्रकाशन भी करता है।
  8. साख पर नियंत्रण- देश में साख की मात्रा पर नियंत्रण करना केन्द्रीय बैंक का प्रमुख कार्य होता है। साख नियंत्रण के प्रमुख उद्देश्य हैं- (i) विनिमय दर में स्थिरता बाये रखना; (ii) मुद्रा के आन्तरिक मूल्य में स्थिरता बनाये रखना; (iii) व्यापार चक्रों पर नियंत्रण करना; (iv) रोजगार के उच्च स्तर पर आर्थिक स्थायित्व को बनाये रखना।

साख नियंत्रण की प्रमुख विधियाँ हैं-

(i) बैंक दर की नीति; (ii) खुले बाजार की क्रियायें; (iii) व्यावसायिक बैंकों के नकद कोष के अनुपात में परिवर्तन; (iv) साख की राशनिंग; (v) प्रत्यक्ष कार्यः (vi) नैतिक दबाव; (vii) प्रचार; (viii) उपभोक्ता साख का नियंत्रण; (ix) शेयर बाजार की ऋण की सीमा में परिवर्तन करना।

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Pankaja Singh

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