इतिहास

कार्ल हेनरिच मार्क्स | कार्ल मार्क्स | मार्क्स के इतिहास दर्शन की विवेचनात्मक समीक्षा | कार्ल मार्क्स का संक्षिप्त जीवन-परिचय | कार्ल मार्क्स के द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त

कार्ल हेनरिच मार्क्स | कार्ल मार्क्स | मार्क्स के इतिहास दर्शन की विवेचनात्मक समीक्षा | कार्ल मार्क्स का संक्षिप्त जीवन-परिचय | कार्ल मार्क्स के द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त

कार्ल हेनरिच मार्क्स

कार्ल हेनरिच मार्क्स का जन्म सन् 1818 में जर्मनी के यहूदी परिवार में हुआ। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा बोलन तथा बर्लिन में हुई थी। उन्होंने 1836 ई0 में बर्लिन विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया था। इंगलैण्ड में अध्ययन करते समय उनकी रुचि इतिहास और दर्शन के प्रति हुई थी। अपने देहावसान के समय (1883 ई0) तक वे सामाजिक, आर्थिक समस्याओं पर निरन्तर विचार-विमर्श करते रहे।

मार्क्स पर अंग्रेजी औद्योगिक क्रांति, फ्रेंच राजनीतिक क्रांति और जर्मन बौद्धिक क्रान्ति का प्रभाव पड़ा था। अर्नोल्ड रूज और लुडविक् वाखहोफर के विचारों के प्रभाव से उन्होंने हेगल के द्वन्द्वात्मक सिद्धान्त की नवीन व्याख्या की थी। भौतिकवाद को सर्वोत्तम और सर्वोन्नत वैज्ञानिक रूप देने का श्रेय इनको ही है। इन्हें हीगल का प्रमुख उत्तराधिकारी कहा जाता है। द्वन्द्वात्मक सिद्धान्त को स्वीकारने के कारण वे हीगल के अनुयायी थे। जबकि विज्ञानवाद को भौतिकवाद से विस्थापित करने के कारण हीगल के विरोधी भी थे।

मार्क्स ने 1839-41 में एपीक्यूर के भौतिकवादी दर्शन पर एक प्रबन्ध लिखा था। उसके बाद वे पत्रकारिता के क्षेत्र में आये और ‘रहाइनीत्सेत्साइतुंग’ के सम्पादक बने। 1843 ई0 में वे पेरिस गये और समाजवादी विचारकों से परामर्श किया। 1844 ई० में ही उन्होंने पेरिस के अर्थशास्त्र का अध्ययन प्रारम्भ किया और वहाँ से निर्वासित होने पर 1848ई० तक इसे जारी रखा। 1844 ई० में ही जब एंगल जर्मनी से लौटते समय पेरिस आये तो उनकी भेंट मार्क्स से हुई थी। दोनों के सह-लेखन में अनेक ग्रंथ प्रकाशित हुए। 1848 ई0 में इनके साथ साम्यवादी घोषणापत्र प्रकाशित किया। उसी वर्ष जर्मनी में एक क्रांतिकारी आन्दोलन हुआ, किन्तु वह तत्काली ही समाप्त हो गया। इसके बाद शीघ्र इंग्लैण्ड चले गये और वहाँ जीवनपर्यन्त अध्ययन में व्यस्त रहे। लगभग 20 वर्षों के इस अध्ययन का निष्कर्ष उनके महान् ग्रंथ ‘दास कापिताल’ (पूंजी) में सुरक्षित है जिसका प्रथम भाग ही वे लिख पाये थे, जबकि दूसरा व तीसरा भाग उनकी मृत्यु के बाद ऐंगिल्स ने उनकी टिप्पणियों के आधार पर प्रकाशित किया। उनकी अन्य महत्त्वपूर्ण कृतियाँ हैं—मिनेर द् ला फिलोजोफी (पावर्टी ऑफ फिलोसोफी), त्सूर क्रितिक देयर पोलिटिशन ओयकोनोमी (ए कण्ट्रीव्यूशन टू दि क्रीटिक ऑफ पोलिटिकल इकोनामी-राजनीति अर्थशास्त्र की आलोचना में योगदान)। एक कंट्रीव्यूशन टू ए क्रिटीक ऑफ हीगेल्स फिलोसोफी ऑफ ला इण्ट्रोडक्शन (विधि संबंधी हीगेल के दर्शन की आलोचना में एक योगदान-भूमिका), जर्मन आइडियोलाजी (जर्मन विचारधारा), वेज लेबर एण्ड कैपिटल (मजदूरी, श्रम और पूँजी), मानिफेस्ट देयर कोमूनिसटिशन पारताई शीर्षक क्रांति का आवाहान, इत्यादि। इसके अतिरिक्त न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून, दि इस्पेक्टेटर तथा न्यू अमेरिकन इनसाइक्लोपीडिया में भी उनके अनेक सारगर्भित लेख प्रकाशित हुए हैं, जिनके आधार पर कार्ल मार्क्स का नाम आज भी इतिहास में अमर हो गया है।

इतिहास-दर्शन-

मार्क्स के इतिहास दर्शन की सबसे अनुपम बात यह थी कि वह दार्शनिक व्याख्याओं के स्थान पर ऐतिहासिक व्याख्या करना चाहता था, किन्तु भौतिकवाद के आधार पर नहीं, अपितु विज्ञानवाद के आधार पर। यही कारण है कि हेगेल को इतिहास-दर्शन का प्रवर्तक कहते हैं तो मार्क्स को ऐतिहासिक समाज-विज्ञान या समाज-वैज्ञानिक-इतिहास- विश्लेषण का प्रवर्तक। धर्मनिरपेक्षता की भावना भी हीगेल की अपेक्षा मार्क्स में अधिक है।

इतिहास की अवधारणा के सन्दर्भ में हमें मार्क्स का आधार ‘आर्थिक सिद्धान्त’ प्राप्त होता है। नियतिवाद उसका प्रमुख आधार है। आर्थिक रूप ही सामाजिक परिवर्तन का कारण होता है। आर्थिक कारणों से दार्शनिक-वैज्ञानिक भी प्रभावित एवं नियंत्रित होते हैं। वे मानते थे कि ऐतिहासिक प्रगति का मूल कारण प्राचीन तथा नवीन सामाजिक संगठन के बीच संघर्ष होता है। वाद-प्रतिवाद के द्वन्द्व का परिणाम ही साम्यवाद है और यही साम्यवाद इतिहास का मानववाद है जिसे पाना मुख्य लक्ष्य है। साम्यवाद से ही नवीन इतिहास का प्रारम्भ तथा प्राचीन प्रथा का अन्त होता है। मार्क्स के अनुसार इतिहास की शक्ति को वर्ग-संघर्ष कहते हैं, जबकि प्राकृतिक शक्तियों पर मनुष्य की विजय को इतिहास का विकसित स्वरूप एवं सामाजिक व्यवस्था में निरन्तर परिवर्तन को इतिहास की गति स्वीकार की गयी है। मार्क्स की इस अवधारणा का प्रभाव आधुनिक इतिहास-अवधारणा पर सर्वाधिक पड़ा है।

इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या का सिद्धान्त मुख्यतः उन्हीं की देन है। वे ही एकमात्र ऐसे विद्वान हैं जो ऐतिहासिक व्यवस्था में आर्थिक कारणों की उपादेयता को स्वीकार करते हैं वह आज तक के सभी मानव-इतिहासों को वर्ग-संघर्ष का ही इतिहास कहते हैं। इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या नई सभ्यता को उन क्षेत्रों में प्रारम्भ होने का अवसर देती है जहाँ पूँजीवाद विकसित है तथा सारा ढांचा उत्पाद को बढ़ती हुई शक्तियों और उत्पाद के स्थिर संबंधों के संघर्ष के आन्तरिक तर्क पर खड़ा है और इस तरह यूरोप से निकलने वाले अधिकांश आधुनिक सिद्धान्तों की तरह इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या भी यथास्थिति की सेवा करनेवाला एक सिद्धान्त है, कम से कम यथास्थिति के उस भाग का जिसमें योरप की महानता है।

मार्क्स ने मानव-इतिहास का वर्गीकरण. कुल चार भागों में करते हुए उन भागों को ‘प्रागैतिहासिक’ नाम दिया है और मानव के वास्तविक इतिहास को साम्यवाद के आगमन से प्रारम्भ माना है। उसके अनुसार वे विभाग इस प्रकार हैं-एशियाई, प्राचीन, सामन्तशाही और पूंजीवादी। मार्क्स के अनुसार, इन विभागों में प्रथम का लक्षण सामूहिक सम्पत्ति का श्रम है तथा इनके प्रमुख व्यवसाय कृषि और उद्योग हैं। इसमें व्यक्ति का पूर्ण विकास नहीं मिलता, किन्तु कुछ कारणों से इस आदिम साम्यवाद का अन्त हो गया और दासता का आविर्भाव हुआ। दासता उत्पादन की एक विशेष विधि थी जिसका लक्ष्य औद्योगिक विकास, व्यापारिक प्रसार और दानसंचय था। इसमें युद्धबन्दियों को भूमि पर निःशुल्क काम करने हेतु विवश किया गया था जिससे स्वतन्त्र कृषक की जीविका कठिन हो गयी और वह भी भूमि बेचकर अथवा गिरवी रखकर स्वयं दास बनकर बिकने लगा। स्थिति यह आयी कि एक समय में एथेन्स में 90 हजार स्वतन्त्र नागरिक थे तो 3 लाख 65 हजार दास । उस स्थिति में उत्पादन-शक्तियों का पूर्ण उपयोग न हो पाने से निर्धनता बढ़ी और जिससे विवश होकर स्वासी अपने दासों को मुक्त करने लगे तो वह सामाजिक व्यवस्था समाप्त हो गयी।

सामन्तशाही-युग में लघु कृषि-उद्योग का विकास हुआ। दासों के स्थान पर कर्मकर नियुक्त हुए जो जमींदारों को कर देते थे और बेगार भी करते थे। नगरीय उद्योग-व्यवसायों पर श्रेणियों का प्रभुत्व था जिसके अधीन कारीगर हुआ करते थे। पूंजी-निर्माण कम होने से लगभग 14वीं शती तक इस व्यवस्था का भी अन्त हो गया। 15वीं शती के भौगोलिक अनुसन्धान से व्यापार और वितरण का क्षेत्र विस्तीर्ण होने लगा जिसमें अधिकाधिक धन की आवश्यकता हुई। यहीं से पूंजीवाद का जन्म हुआ जिसने छोटे-छोटे कृषक-कर्मकरों ने उत्पाद-साधनों पर से अपना आधिपत्य समाप्त होने पर श्रम-दल बनाया। उधर अमरीकी स्वर्ण-चाँदी के यूरोप में आधिक्य हो जाने से मूल्य बढ़ गये, जमींदार-ग्रामीण मजदूरों का पतन हो गया और पूंजीवाद ने उपनिवेश और साम्राज्यवाद को जन्म दिया। दो सौ वर्षों तक पूँजीवाद ने उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद को जन्म दिया। दो सौ वर्षों तक पूंजीवादी व्यवस्था यन्त्रों के बिना चली, फिर यन्त्रों के प्रचलन से इसकी प्रक्रिया तेज हो गयी। परन्तु पूंजीपतियों की आपसी प्रतिस्पर्धा-प्रतिद्वन्द्विता से लाभ कम होने लगा, श्रम-दलों के संगठन सशक्त पड़ने लगे और एक देश का दूसरे से युद्ध आरम्भ हो गया और जब आर्थिक विधान आर्थिक विकास का सहायक न होकर बाधक हो गया तो समाजवाद और साम्यवाद की लहर दौड़ गयी तथा श्रमिक फिर से श्रम के साधनों का अधिकारी हो गया।

यदि मार्क्स के उपर्युक्त विचारों की समीक्षा की जाय तो हम पायेंगे कि उसमें आर्थिक तत्व को ही कारणस्वरूप माना गया है, जबकि धर्म का भी अपने आप में कम प्रभाव नहीं रहा है। परन्तु केवल धर्म (वेबर), सर्जनशक्ति (रोस्तोबेतजफ), बाजार-मार्ग (ब्रुक आदप्स), भू-ऊसरता की वृद्धि (सिन्खोविच), उत्पादन की यान्त्रिक पद्धति (फ्रीमैन) आदि में से किसी एक को कारण स्वरूप मानना उचित नहीं है। मार्क्स में केवल अर्थ को ही लिया गया है इसलिए उनकी भी आलोचना करते हुए कहा जाता है. ‘मार्क्स के दर्शन में वे तत्व प्रस्तुत हैं जिनके द्वारा इतिहास की संतुलित और सर्वाङ्गीण व्याख्या हो सकती है। वस्तुतः भौतिकवाद एवं विस्तीर्ण दर्शन है,किन्तु उसकी व्याख्या एक पक्षीय हुई है। डॉ० राममनोहर लोहिया का भी यही कहना है “केवल योरप का ही नहीं, अपितु समस्त विश्व का मानव इतिहास इन तीन या चार युगों में बाँटा जा सकता है, इसमें गम्भीर शंका है। यह सिद्ध करने के लिए कि दास-युग में भारत में भी निरंकुशता थी, तथ्यों को बहुत अधिक तोड़ना-मरोड़ना पड़ेगा।। नियम कहता है कि पूंजीवादी विकास जब बहुत आगे बढ़ जायगा, तब वर्ग-संघर्ष भी अत्यधिक बढ़ जायेगा। अधिक विकसित पूँजीवादी देशों के श्रमिक इतने संगठित हो जायेंगे कि वे पूँजीवाद का नाश करके साम्यवादी या समाजवादी सभ्यता रथापित करेंगे।”

इतिहास के भावी युग के विषय में भी मार्क्स के अपने विचार हैं। उसने इतिहास की आर्थिक व्याख्या में इतिहास की गति को विकासात्मक प्रक्रिया में देखा था। इस प्रक्रिया का संकेत सदैव भविष्य की ओर रहता है। भास ने वर्गहीन समाज के विषय में सोचा है जिसमें शासक की आवश्यकता नहीं होती। उन्होंने इतिहास में भविष्यवाणी या भविष्य कथन करने के सामर्थ- सिद्धान्त को पुष्ट करते हुए उक्त भविष्यवायी की है जो सत्य के निकट जान पड़ती है। उनका भौतिकवादी सिद्धान्त इसी विशेषता से युक्त होने के कारण अति महत्त्वपूर्ण माना जाता है। उनके अभिलेखों के आधार पर उनके भौतिक दर्शन के सिद्धान्त इस प्रकार से निश्तित किये जा सकते हैं- यथार्थवाद, द्वन्द्ववाद, नियतिवाद, प्रगतिशील विकासवाद, कालवाद, पारस्परिक प्रक्रिया का सिद्धान्त, ऐतिहासिक भौतिकवाद, भावों को सामाजिक पृष्ठभूमि, विचार और आचार की एकता, क्रान्ति का जयघोष इत्यादि।

विश्व का वर्ग-संघर्षीय सिद्धान्त मार्क्स के उन विचारों को बतलाना है जिनके अनुसार प्रत्येक व्यवस्था में एक अन्तर्द्वन्द्व रहता है। एक वर्ग उत्पादन में परिश्रम करता है तो दूसरा साधन-सम्पन्नता के कारण अतिरिक्त फल का उपभोग करता है। सभी ऐतिहासिक समाज इस श्रमिक और धनिक के वर्ग-द्वैत को अपने अन्दर लिए होने के कारण साधनों के विकसित होने पर संघर्ष और क्रान्ति से नष्ट हुए हैं। अब तक समाजों का इतिहास वर्ग-संघर्ष का इतिहास है जिसका अन्त कभी समाज के क्रान्तिकारी पुनर्गठन से हुआ या कभी दोनों वर्गों के समान विनाश से।

मार्क्स ने नियतिवाद की व्याख्या के लिए भी प्रयास किया है। सामान्य रूप से नियतिवाद का आशय यह है—‘एक विश्वास जो सकारण घटना घटित होने से सम्बद्ध होता है और जिसके अभाव में घटना या तो घटती नहीं है या फिर भिन्न तरीके से घटित होती है। इसकी गतिविधि एक निश्चित दिशा में चल रही होती है और जो अचल, अटल तथा अनिवार्य होती है।

कार्ल मार्क्स प्रगतिशील विकासवादी सिद्धान्त में यह मानते हैं कि समाज निरन्तर प्रगति की तरफ अग्रसरित हो रहा है। उनकी प्रगति सम्बन्धी अवधारणा उस भविष्यवाणी में प्रस्फुटित हुई कि सर्वहारा क्रान्ति से वर्गहीन समाज का अन्तिम लक्ष्य प्राप्त करना सम्भव होगा। इसे प्रगतिशील विकासवादी इसलिए भी कहते हैं कि यह सामाजिक परिवर्तन के अनुसार स्वतः ही आगे बढ़ता है। समाज में आर्थिक कारणों से परिवर्तन होते रहते हैं और अन्त में पूँजीवादी- व्यवस्था स्वयं ही अपनी कमियों के कारण समाजवादी-व्यवस्था की स्थापना के लिए मार्ग तैयार कर देती है। मार्क्स ने समाजवाद की स्थापना भी एक क्रमिक विकास के अनुसार ही माना है, किन्तु उनका विचार क्रान्तिकारी भी था। मार्क्स ने इतिहास की प्रगति के तीन आधार बतलाये हैं-

(1) विचार और समुदाय प्रगतिशील होते हैं,

(2) ये आर्थिक परिस्थितियों से प्रभावित होते हैं और

(3) ये अपने विरोधियों को जन्म देते हैं, जिनके साथ संघर्ष होने से नवीन परिस्थितियों का निर्माण होता है।

मार्क्स के कालवाद अथवा साम्यवाद की मान्यता यह है कि विश्व परिवर्तनशील है और काल-परिवर्तन का मापदण्ड है। भाव और विचार भी भौतिक परिस्थितियों के अनुरूप बदलते रहते हैं। अतः प्रत्येक वस्तु का स्वरूप ऐतिहासिक है। भौतिक विचारधारा ऐतिहासिक चेतना से ओतप्रोत है। अन्यत्र अपने पारस्परिक प्रक्रिया के सिद्धान्त में मार्क्स यह मानते हैं कि ज्ञान कोई विशुद्ध चिन्तन नहीं है, अपितु वह मन और जगत् की पारस्परिक क्रिया की उत्पत्ति (उपज) है। जगत् की पारस्परिक क्रियाओं को देखकर मन जो कुछ सोचता है, चिन्तन करता है और समझता है उसे ‘मन का ज्ञान’ कहते हैं। यदि वे क्रियाएँ न होती तो उनको विषय में कोई ज्ञान उत्पन्न न हो पाता। इस तरह पारस्परिक प्रक्रिया सिद्धान्त में व्यक्ति और जगत् तथा समाज और संसार सभी एक-दूसरे को प्रभावित करते रहते हैं।

मार्क्स के भौतिकवाद का एक सिद्धान्त ऐतिहासिक भौतिकवाद भी है कि विश्व में जो भी सामाजिक परिवर्तन और राजनैतिक क्रान्तियाँ होती हैं वे सब उत्पादन और वितरण की प्रक्रिया अनुकूल विधि से न होने के कारण ही होती हैं। यदि समस्त उत्पादन का वितरण समुचित विधि सो होता रहे और किसी को कोई परेशानी न हो तो वैसा कभी भी नहीं हो सकेगा। इसलिए मार्क्स का यह कहना है कि उन परिवर्तनों और क्रान्तियों के लिए मन से उत्पन्न विचारों को दोषी नहीं ठहराना चाहिए, क्योंकि मन केवल तभी इस विषय में सोच सकता है जब वैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं। अतः केवल वे विषम परिस्थितियाँ ही दोषी होती हैं, न कि मस्तिष्क। बुद्धप्रकाश उचित ही लिखते हैं-‘सामाजिक परिवर्तन और राजनीतिक क्रान्तियाँ मनुष्य के मस्तिष्क की उत्पत्ति मात्र नहीं होते और न इसके द्वारा शाश्वत सत्य के साक्षात्कार से उत्पन्न होते हैं, अपितु उत्पादन तथा वितरण की प्रक्रिया के बदलने से उत्पन्न होते हैं।

मार्क्स यह मान कर चलते हैं कि सिद्धान्त और व्यवहार, चिन्तन तथा कर्म और आचार एवं विचार में मौलिक रूप से एकता की विशेषता पायी जाती है। मनुष्य, प्रकृति और इतिहास की विशिष्ट समस्याओं के समाधान की पद्धति से ही सिद्धान्त बनते हैं। सिद्धान्त का उपयोग इसकी व्यावहारिकता में सन्निहित होता है। विशुद्ध सिद्धान्त काल्पनिक है। यही कारण है कि क्रान्ति का जयघोष एक विचारक ही कर पाता है, क्योंकि, क्योंकि सभी लोग क्रान्तिकारी नहीं हो सकते- ठीक उसी प्रकार से जैसे सभी लोग सैद्धान्तिक मूल्यों को व्यावहारिक रूप नहीं दे सकते और सामाजिक ज्ञान अपने सर्वांगीण-समस्त रूपों की सामाजिक, परिस्थितिकीय सुधार की क्रिया में हाथ नहीं बँटा सकता। परन्तु, जो विचार नहीं करेगा वह क्रान्ति किस प्रकार कर सकता है? अतएव जो विचारक होगा, वही क्रान्तिकारी होगा। अन्य शब्दों में, प्रत्येक विचारक क्रान्तिकारी होगा। उसकी इस गर्जना (बुलन्द आवाज) को ही मार्क्स ने ‘क्रान्ति का जयघोष’ इंगित किया है।

मार्क्स के इतिहास-दर्शन का समीक्षात्मक बोध कर लेने के बाद हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं होता कि यदि हेगल इतिहासदर्शन के प्रवर्तक हैं तो मार्क्स भी ऐतिहासिक समाज- विज्ञान अथवा समाज-वैज्ञानिक इतिहास-विश्लेषण के प्रवर्तक कहे जा सकते हैं। उनका ‘द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद’ समाज की एक नयी विश्लेषण पद्धति, इतिहास की तरफ नयी दृष्टि है। यदि हेगेल ने इतिहास का प्रारूप दर्शन में पाया था तो मार्क्स ने उसकी कुंजी आर्थिक परिवर्तनों में खोजी है। फिर भी यह सच है कि मार्क्स के आर्थिक इतिहास का महत्त्व अब उसकी तथ्यात्मक उपलब्धियों में कम है, संस्थात्मक परिवर्तनों के सामाजिक सन्दर्भ में अध्ययन की द्वन्द्वात्मक पद्धति में अधिक।

मार्क्स के आलोचक कहते हैं कि उसने आर्थिक तत्व को एक पक्षीय महत्त्व देकर अच्छा नहीं किया। ऐतिहासिक विकास में अर्थ को विशेष महत्त्व दिया है, जबकि धर्म के परिप्रेक्ष्य में चर्च को भी देना चाहिए था, क्योंकि ऐसा होने में चर्चों की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही थी। मार्क्स ने भौगोलिक और जीव सम्बन्धी धारणाओं को छोड़कर जो भौतिक व्याख्या को ही विशेष महत्त्व दिया, उसे भी लोगों ने अनुचित माना है। बर्कहार्ट ने मार्क्स की इतिहास की भौतिक व्याख्या को स्वीकार नहीं किया है। वे कहते हैं कि इतिहास मूल्यवान भले ही हो, लेकिन विज्ञानों में वह सबसे अधिक अवैज्ञानिक भी है। उनका यह भी कहना है कि युग को समझने के लिए उस युग की विशेष समस्याओं और परिस्थितियों का ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि विभिन्न परिस्थितियों के विभिन्न कारण और विभिन्न परिणाम होते हैं।

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Pankaja Singh

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