इतिहास

कारणत्व के सिद्धान्त | कारणत्व के सिद्धान्त पर टिप्पणी

कारणत्व के सिद्धान्त | कारणत्व के सिद्धान्त पर टिप्पणी

कारणत्व के सिद्धान्त

  1. दैवी योजना (Divine Plan)-

यह सिद्धांत यह बतलाता है कि भाग्य ही इतिहास का निर्माण करता है। मिस्र, बेबीलोन और यूनानी इतिहासकारों ने इस सिद्धांत का समर्थन किया है। कारणत्व के इस सिद्धांत के समर्थक महान् नायकों, पुरोहितों एवं राजाओं के योगदान के महत्त्व को स्वीकार करते हैं। वे जिस कारण की व्याख्या नहीं कर पाते, उन्हें ईश्वर की इच्छा कह देते हैं। मानवी मामलों में ईश्वर के इस प्रत्यक्ष हस्तक्षेप ने ईसाई सोद्देश्यवाद और आकस्मिक इतिहास-लेखन को जन्म दिया। धर्मसुधार-आन्दोलन के फलस्वरूप इतिहास का दृष्टिकोण धर्मनिरपेक्ष हो गया और देव की अपेक्षा मानव की कृतियों पर विशेष बल दिया जाने लगा। अतः आजकल किसी ऐतिहासिक घटना के कारण को दैवी योजना के अन्तर्गत नहीं रखा जाता।

  1. बुद्धिवादी सिद्धान्त (Rationalist Theory)-

17वीं और 18वीं शताब्दियों में वृद्धिवाद के विकास के फलस्वरूप मानवीय विकास के कारणों के विश्लेषण में दैवी प्रेरणा को त्याग दिया गया है और व्यक्ति के योगदान पर विशेष बल दिया गया है। लॉक ने कहा है, “प्राकृतिक समाज की सबसे बड़ी विशेषता मनुष्यों का पारस्परिक प्रेम है। नागरिक संस्थाओं का जन्म मानव के अधिकारों और स्वतन्त्रता की सुरक्षा के लिए हुआ है।” फ्रांस के दार्शनिकों ने कहा है कि ज्ञान और तर्क की विजय के फलस्वरूप इतिहास मानवीय संपूर्णता की ओर बढ़ रहा है।

  1. राष्ट्रीय चरित्र (National Character)-

19वीं शताब्दी के आरंभ से ऐतिहासिक घटनाओं के कारणों के विश्लेषण के लिए अनेक प्रणालियों की सहायता ली गई है। इनमें से एक राष्ट्रीय चरित्र है। यह कहा जाता है कि राष्ट्रीय चरित्र और संस्थाएँ व्यक्ति के चरित्र और भाग्य का निर्धारण करते हैं। इस सिद्धान्त के प्रतिपादक जर्मनी के हर्डर और फ्रांस के माइकलेट (Michelet) हैं।

  1. मानवीय मनोभाव (Human Emotion)-

हैंगेल, और सायमन का विचार है कि इतिहास के निर्माण में मानवीय मनोभावों का हाथ रहा है। वे सांस्कृतियों के उत्तराधिकार में विश्वास करते हैं। उनका विचार है कि प्राचीन सभ्यता-संस्कृतियाँ विनष्ट होती हैं और उनकी जगह नई सभ्यता-संस्कृतियाँ ले लेती हैं। नई संस्कृति नए मानवीय मनोभावों का प्रतिनिधि करती है।

  1. मार्क्सवादी सिद्धान्त (Marxian Theory)-

माल्थस और उसके समर्थकों ने एक भौतिकवादी सिद्धांत का प्रतिपादन किया और आर्थिक क्षेत्र में अस्तित्व का संघर्ष बतलाया। कालान्तर में मार्क्स ने इसका विस्तार किया जिसने इतिहास की आर्थिक व्याख्या की। मार्क्स ने बतलाया कि उत्पादन के साधनों का नियंत्रक व पूँजीपति सत्ता को प्रभावित करता है। वह शोषक वर्ग है जो मजदूरों का शोषण करता है। मार्क्स ने बतलाया कि अंत में विजय मजदूरों या सर्वहारा वर्ग की होगी।

  1. वैज्ञानिक सिद्धान्त (The Scientific Theory)-

19वीं शताब्दी में रेंक (Ranke) के नेतृत्व में इतिहासकारों के एक सम्प्रदाय का उदय हुआ। रेंक ने बतलाया कि इतिहास बिना कारणत्व-दर्शन (Philosophy of causation)के भी बतलाया जा सकता है। उसके सम्प्रदाय के इतिहासकारों का कथन है कि इतिहास का उत्तम दर्शन कारत्व का सर्वांगीण सिद्धांत नहीं, बल्कि पूर्ववर्तियों और अनुवर्तियों का संयोजन (A concatenation of antecedents and consequents) है। लेकिन उन्होंने किसी ऐतिहासिक घटना के पूर्ववर्ती और अनुवर्ती कारणों की व्याख्या करने का कोई प्रयास नहीं किया।

  1. ऐतिहासिक सम्प्रदाय (The Historical School)-

19वीं शताब्दी के अंत में जर्मनी में एक ऐतिहासिक सम्प्रदाय का महत्त्व बढ़ गया। इसका प्रमुख प्रवक्ता विलियम डिल्थे (Wilheim Dilthy) था। इस सम्प्रदाय ने हेगेल के स्वर में बतलाया कि विश्व इतिहास एक शाश्वत प्रक्रिया है और अनुभवजन्य ऐतिहासिक खोज विकास की व्याख्या कर सकती है। ऐतिहासिक सम्प्रदाय के इतिहासकारों ने बतलाया कि इतिहास को मूल्यों की खोज करनी चाहिए जो वर्तमान जीवन की व्याख्या और मार्गदर्शन कर सके।

  1. बहुलवादी सम्प्रदाय (The Pluralistic School)—

बहुलवादी सम्प्रदाय के इतिहासकारों ने इस विचार को अस्वीकार कर दिया है कि इतिहास महत्त्वपूर्ण घटनाओं और महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों की उपलब्धियों का वृत्तान्त है। उनका कहना है कि इतिहास, सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक विकास का अध्ययन करें। दूसरे शब्दों में उन्होंने यह बतलाया कि इतिहास में विकास के एक कारण की जगह अनेक कारण हो सकते हैं।

इस प्रकार, यह स्पष्ट है कि ऐतिहासिक कारणत्व की समस्या का अभी तक समाधान नहीं हो सका है। इससे कुछ इतिहासकार यह कहने लगे हैं कि “इतिहास के सभी दर्शन खराब हैं। अच्छा होगा कि हम उनमें से किसी को न अपनाएँ।” उनके इस कथन से सहमत होना संभव नहीं है, किन्तु गोटचाक (Gortschalk) के इस कथन से हम अवश्य सहमत हो सकते हैं, “इतिहासकार को कारण या कारणों शब्द का प्रयोग करना चाहिए। उन्हें निश्चित शब्दों जैसे उद्देश्य (purpose), अवसर (occasion), पूर्ववर्ती (antecedent), साधन (means) व मूलभाव (motive) का प्रयोग करना चाहिए। उसे हर हालत में ऐतिहासिक घटना के कारणों पर प्रकाश डालना चाहिए।”

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Pankaja Singh

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