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जे० एस० मिल का उपयोगितावाद | बेन्थम तथा मिल के उपयोगितावाद के मध्य मौलिक अन्तर

जे० एस० मिल का उपयोगितावाद | बेन्थम तथा मिल के उपयोगितावाद के मध्य मौलिक अन्तर

जे० एस० मिल का उपयोगितावाद

(Mill’s Utilitarianism)

बेथम की मृत्यु के पश्चात् इङ्गलैण्ड में सुखवाद विरोधी आन्दोलन (Anti-Hedonism Movement) प्रारम्भ हुआ । थामस कार्लाइल इस आन्दोलन का प्रमुख नेता था। उसने बेन्थम के सुखवाद की कटु आलोचना की तथा इसे ‘सुअर दर्शन’ (Pig-Philosophy) बताया । बेन्थम के सुखवादी दर्शन की विद्वानों द्वारा तीव्र भर्त्सना की गई। मिल बेन्थम का अत्यन्त निष्ठावान शिष्य था। उसने बेन्थम के दर्शन को आलोचनाओं से बचाने के लिए उसमें सुधार करना अपना प्रमुख कर्तव्य समझा।

(1) उपयोगितावाद की परिभाषा-

मिल ने उपयोगितावाद की परिभाषा अपनी प्रसिद्ध पुस्तक उपयोगितावाद में दी है। उसने लिखा है कि वह मत जो कि अधिकतम सुख के सिद्धान्त को नैतिकता का आधार मानता है, यह मानकर चलता है कि प्रत्येक कार्य उसी अनुपात में नहीं है जिसमें कि वह सुख वृद्धि करता है और जो भी कार्य सुख के विपरीत है वह गलत है। सुख का अर्थ है आनन्द अथवा दुख का अभाव और दुख का अर्थ है पीड़ा अथवा आनन्द का अभाव।” यह कहना कि कौन-कौन सी वस्तुएँ सुख में वृद्धि करती हैं और कौन-कौन सी सुख में कमी करती हैं, बड़ा कठिन है। मिल सुख तथा दुख को मनोगत भाव मानता है।

(2) वह सुखों में गुणात्मक भेद स्वीकार करता है-

मिल ने अपने गुरु बेन्थम के दर्शन को आलोचना से बचाने के लिए उसमें मात्रात्मक भेद के साथ-साथ गुणात्मक भेद भी स्वीकार किया । बेन्थम ने सुखों में केवल मात्रा का भेद ही माना था। उसका कथन था कि मनुष्य सुख की मात्रा को ही ध्यान में रखकर यह निर्णय करता है कि उसके कौन कौन से कार्य वांछनीय है तथा कौन से कार्य वांछनीय नहीं है। मिल अपने गुरु बेन्थम की इस धारणा का खण्डन करता है और कहता है कि “इस तथ्य को स्वीकार करना कि कुछ प्रकार के सुख दूसरों से अधिक वांछनीय तथा अधिक महत्वपूर्ण है, उपयोगिता के सिद्धान्त से मेल नहीं खाता । जब हम प्रत्येक वस्तु का मूल्यांकन करने के लिए मात्रा एवं गुणों को समान महत देते हैं तो सुखों का केवल मात्रा के आधार पर मूल्यांकन करना अनुचित है।”

मिल अपनी इस बात की पुष्टि के लिए कि सुख तथा दुखों में गुणात्मक भेद होता है, अनेक तर्क देता है। वह कहता है कि जिन लोगों ने उच्च कोटि के तथा निकृष्ट कोटि के सुखों का अनुभव किया वे इन दोनों के अन्तर के भली-भाँति समझ सकते हैं। वे लोग इस बात को स्वीकार करते है कि उच्च श्रेणी के सूत्रों को निम्न श्रेणी के सुखों के ऊपर प्राथमिकता दी जानी चाहिये। अपने मत के समर्थन में मिल ने कहा है कि एक सन्तुष्ट सुअर की अपेक्षा एक असन्तुष्ट सुकरात (बुद्धिमान पुरुष) होना अधिक अच्छा है। यदि उस मूर्ख अथवा सुअर की राय इससे भिन्न है तो वह इसलिए कि वह प्रश्न के केवल एक पहलू (अर्थात् अपने पहलू) को ही देखता है। दूसरा पक्ष वस्तुओं के दोनों पहलुओं को ही जानता है।”

मिल ने सुखों के गुणात्मक भेद को स्वीकार करके यद्यपि बेन्थम के उपयोगितावाद को अधिक तर्क संगत बना दिया, परन्तु उसने ऐसा करके बेन्थम के सुखवादी आधार को पूर्ण रूप से त्याग दिया। यह सत्य है कि मिल ने सुखों के गुणात्मक भेद को स्वीकार करके उपयोगितावाद के सिद्धान्त को तर्कसंगत बनाया, परन्तु इससे बेन्थम द्वारा प्रतिपादित उपयोगिता का नापदंड समात्त हो जाता है और मिल उपयोगितावादी दर्शन से विलग हो जाता है। प्रो० वेपर के शब्दों में. “यदि सुखों में गुणात्मक भेद होता है तो मनुष्य का लक्ष्य उपयोगिता के सिद्धान्त को प्राप्त करना नहीं वरन् उच्चतर स्तर के सुख को प्राप्त करना होता है।”

इस प्रकार मिल ने बेन्थम के उपयोगितावाद में संशोधन करने के प्रयास में इस बात पर जोर दिया कि मनुष्य में दो प्रकार के तत्त्व होते हैं उच्चतम तथा निकृष्टतम। मनुष्य के उच्चतर तत्त्व निम्नतर तत्त्वों के विरुद्ध संघर्ष में सहायता देते हैं। इस प्रकार मिल ने बेन्थम के भौतिकवाद से व्यक्ति के अस्तित्व तथा गौरव की रक्षा की।

(3) मिल का उपयोगितावाद नैतिकता से प्रेरित है-

मिल के उपयोगितावाद की एक अन्य महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि वह भौतिकवाद की अपेक्षा नैतिकता से अधिक प्रेरित है। बेन्थम ने अधिकतम व्यक्तियों के अधिकतम सुख को अपने उपयोगितावाद का आधार माना था। उसका मत था कि विधायकों तथा प्रशासकों को इसी लक्ष्य को ध्यान में रख कर कानूनों का निर्माण करना चाहिये। इसके विपरीत मिल ने इस बात पर जोर दिया कि प्रत्येक व्यक्ति को यह स्वयं निर्णय करना चाहिये कि उसे क्या करना चाहिए तथा उसका हित किस चीज में है? प्रो० मैक्सी के शब्दों में, “बेन्थम का उपयोगिता का सिद्धान्त भेड़ियों के समाज में भेड़ियों की प्रकृति तथा साधुओं के समाज में साधुवादिता का समर्थन करेगा।” पर मिल ने इस बात का समर्थन किया कि किसी समाज में उपयोगिता की कसौटी साधुवादिता होनी चाहिये।”

(4) सुखवादी मापक यंत्र का खंडन-

मिल ने बेन्थम के उपयोगितावाद में एक अन्य महत्वपूर्ण संशोधन यह किया कि उसने बेन्थम के सुखवादी मापक यन्त्र (Hedonistic calculus) को अव्यावहारिक बताया है। उसके विचार में मनुष्यों के सुखों और दुःखों को आँकने में अब तक उन लोगों के प्रभाव पर भरोसा करते आये है जो इस कार्य में समर्थ है। इस प्रकार मिल ने बेन्थम के सुखवादी मापक यंत्र की सार्वभौमिकता का खंडन किया।

(5) मिल ने अन्त:करण की स्वतन्त्रता पर बल दिया-

मिल ने अपने गुरु बेन्थम के उपयोगितावाद में एक महत्त्वपूर्ण संशोधन यह किया कि उसने बेन्थम द्वारा सार्वजनिक तथा व्यक्तिगत हितों के मध्य स्थापित की गई एकरूपता को नैतिक महत्व दिया । बेन्थम सार्वजनिक या व्यक्तिगत हित में कृत्रिम साधनों द्वारा एकरूपता स्थापित करना चाहता था। परन्तु मिल का विचार था कि यह एकरूपता नैतिक आधार पर स्थापित की जानी चाहिए। तभी यह अधिक स्थाई रह सकेगी। इसलिये उसने व्यक्ति में विद्यमान अन्त करण के तत्व को अधिक महत्वपूर्ण माना।

(6) निष्कर्ष-

उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि मिल ने अपने गुरु बेन्थम के उपयोगितावाद को आलोचनाओं से बचाने के प्रयत्न में उसके भौतिकवादी आधार को ही त्याग दिया। उसन उसे नैतिक आधार प्रदान करके उसके वाह्य रूप को सुरक्षित रखने का प्रयास किया। प्रो० मैक्सी के शब्दों में, “मिल ने उपयोगितावाद में अपने नैतिक कसौटी को प्रस्तावित करके बेन्थमवाद में एक क्रान्तिकारी आन्दोलन ला दिया। उसने राज्य को एक बार पुनः नैतिक संस्था बना दिया जिसका लक्ष्य नैतिक है। इसका उद्देश्य व्यक्ति के अन्तर्गत उपयोगिता की दृद्धि नहीं वरन् व्यक्तिगत गुणों की वृद्धि करना है। इस प्रकार मिल ने उपयोगिता के भौतिकवादी आधार को त्यागकर उपयोगितावाद की रक्षा की।”

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Pankaja Singh

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