इतिहास

जर्मनी का एकीकरण | जर्मनी में राष्ट्रीयता और एकीकरण की भावना का विकास | बिस्मार्क के सम्मुख एकीकरण के मार्ग की बाधाएँ | बिस्मार्क के उद्देश्य

जर्मनी का एकीकरण | जर्मनी में राष्ट्रीयता और एकीकरण की भावना का विकास | बिस्मार्क के सम्मुख एकीकरण के मार्ग की बाधाएँ | बिस्मार्क के उद्देश्य | बिस्मार्क द्वारा जर्मनी के एकीकरण के विभिन्न चरण | जर्मन साम्राज्य की स्थापना | जर्मनी के एकीकरण में बिस्मार्क की भूमिका | जर्मनी के एकीकरण की विभिन्न अवस्थायें

जर्मनी का एकीकरण

जिस प्रकार प्रारम्भ में इटली अनेक छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त था, उसी प्रकार जर्मनी उससे भी अधिक छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त था जर्मनी के विभिन्न राज्यों की संख्या लगभग 200 थी तथा वहाँ राष्ट्रीयता की भावना का नितान्त अभाव है। फ्रांस की राज्य क्रान्ति के सिद्धान्तों ने जर्मन लोगों को भी प्रभावित किया। नेपोलियन ने अनेक छोटे-छोटे जर्मन राज्यों को पड़ोस के बड़े राज्यों में मिला दिया जिससे जर्मन राज्यों की संख्या केवल39 रह गई। इस प्रकार नेपोलियन ने अनजाने ही जर्मनी के एकीकरण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उसकी क्रान्तिकारी सेना ने वहाँ के निवासियों में ‘स्वतन्त्रता समानता और भ्रातृत्व की भावना तथा राष्ट्रीयता के विचारों का प्रसार किया, जिसके फलस्वरूप जर्मन लोगों अपने देश के एकीकरण का प्रयास करने लगे। नेपोलियन ने प्रशा और आस्ट्रिया को शक्तिहीन बनाने के लिए दक्षिण- पश्चिमी जर्मनी के राज्यों के संघ की स्थापना अपनी अध्यक्षता में की, संघ की सीमाओं के भीतर सभी प्रकार के विशेषाधिकार को समाप्त कर दिया और वहाँ नेपोलियन कोड प्रचलित किया। इस प्रकार जर्मनी का एकीकरण आरम्भ करने का श्रेय नेपोलियन को दिया जा सकता है।

बिस्मार्क के पूर्व जर्मनी के एकीकरण के प्रयास- वियेना कांग्रेस ने 39 प्रभुत्व सम्पन्न जर्मन राज्यों का एक शिथिल परिसंघ बनाया जिसका प्रधान आस्ट्रिया तथा उपप्रधान प्रशा था। आस्ट्रिया के चांसलर मेटरनिख ने इन राज्यों के राष्ट्रीय आन्दोलन का दमन करना अपनी नीति का अंग बना लिया, लेकिन वह राष्ट्रीयता और एकीकरण की भावनाओं को नष्ट नहीं कर सका। 1830 की फ्रांसीसी क्रान्ति के समय जर्मनी में भी अनेक विद्रोह हुए, लेकिन कुचल दिए गए। 1948 की क्रान्ति के साथ जर्मनी में फिर विद्रोह हुए और मेटरनिख को देश छोड़कर भागना पड़ा।1848 में ही फ्रंकफर्ट में संसद का उद्घाटन किया गया और इसने प्रशा के राजा को जर्मनी का सम्राट बनाने का आग्रह किया, जिसने यह कहकर प्रार्थना अस्वीकार कर दी कि वह जन साधारण द्वारा सम्राट बनना नहीं चाहता। प्रशा जिसने उदार विधान की घोषणा कर दी थी; अब आस्ट्रिया का अनुकरण करते हुए प्रतिक्रियावादी बन गया। इस प्रकार जर्मन देशभक्तों द्वारा किये गये सभी प्रयास असफल रहे।

जर्मनी में राष्ट्रीयता और एकीकरण की भावना का विकास

जर्मनी में राष्ट्रीयता और एकीकरण की भावना को प्रोत्साहित करने वाले प्रमुख तत्व या कारण निम्नलिखित थे-

(1) बौद्धिक आन्दोलन- जर्मनी के, दार्शनिकों, लेखकों, कवियों और इतिहासकारों ने जर्मन लोगों में राष्ट्रीयता की भावना का प्रसार किया। उन्होंने जर्मनी के महानता एवं प्राचीन गौरव पर प्रकाश डाला। फिश्ते, गेटे, हीगल, शिलर, डालमेन बोमर आदि की रचनाओं ने जर्मन लोगों में राष्ट्रीय भावना का संचार किया।

(2) जोलवरीन या आर्थिक संघ- 1839 में जर्मन राज्यों को मिलाकर जोलवरीन या आर्थिक संघ का निर्माण किया गया कि संघ के सदस्य राज्य के माल का स्वतन्त्र व्यापार करेंगे और एक दूसरे के माल पर चुंगी नहीं लेंगे।1850 तक जर्मनी के सभी राज्य इस आर्थिक संघ में शामिल हो गये। जोलबरीन ने जर्मनी की एकता का मार्ग प्रशस्त कर दिया । केटलबी का कथन है कि, “जोलवरीन के निर्माण में भविष्य में प्रशा के नेतृत्व में जर्मनी के राजनीतिक एकीकरण का कार्य तैयार कर दिया।”

(3) 1898 की क्रान्ति- फ्रांस की 1898 की क्रान्ति का जर्मनी पर भी प्रभाव पड़ा और अनेक राज्यों में विद्रोह शुरू हो गया। इसके फलस्वरूप अधिकांश जर्मन राज्यों में वैध राज्य सत्ता स्थापित हो गयी। प्रशा में भी एक उदार शासन की स्थापना हुई। परन्तु शीघ्र ही प्रतिक्रियावादियों की विजय हुई और जर्मन राज्यों में पुनः निरंकुश शासन स्थापित हो गये फिर भी जर्मनी में जो राष्ट्रीयता की लहर उत्पन्न हुई थी, वह मिट न सकी। आगे चलकर प्रशा के नेतृत्व में राष्ट्रवादी की विजय हुई।

(4) औद्योगिक क्रान्ति- 1850 से 1860 के बीच जर्मनी में औद्योगिक क्षेत्र में अत्यधिक प्रगति हुई। औद्योगिक विकास के फलस्वरूप जर्मनी में एक नये पूँजीपति वर्ग का उदय हुआ। जर्मनी के समर्थक हो गए। ऐसी परिस्थिति में संयुक्ति जर्मनी का निर्माण आवश्यक हो गया।

(5) विलियम प्रश्न के प्रयास- 1861 ई० में विलियम प्रथम प्रशा की गद्दी पर बैठा। वह सैन्य-शक्ति में वृद्धि करना चाहता था और प्रशा के नेतृत्व में जर्मनी का एकीकरण करना चाहता था। उसने प्रशा की सैन्य-शक्ति के विस्तार की योजना बनाई तथा शान्तिकाल में दो लाख तथा युद्ध काल में साढ़े चार लाख सैनिक रखने का निश्चय किया। परन्तु प्रशा की संसद ने विलियम प्रथम के धन-सम्बन्धी प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। अन्त में अपने युद्ध मंत्री रुन की सलाह पर विलियम प्रथम ने बिस्मार्क को प्रशा का चांसलर नियुक्त किया।

बिस्मार्क के सम्मुख एकीकरण के मार्ग की बाधाएँ-

1862 में जब बिस्मार्क प्रशा का चांसलर नियुक्त हुआ तब भी जर्मन देशभक्त जर्मनी के एकीकरण के लिए बहुत इच्छुक थे। बिस्मार्क भी प्रशा के नेतृत्व में जर्मनी का एकीकरण चाहता था कि लेकिन वह एक महान् कुटनीतिज्ञ होने के कारण वह भली-भाँति समझता था कि जर्मनी का एकीकरण करना इतना सरल नहीं है, जितना कि साधारण जनता और आन्दोलनकारी समझते हैं।

बिस्मार्क ने अनुभव किया कि प्रशा के नेतृत्व में जर्मनी के एकीकरण के सम्बन्ध में निम्नलिखित समस्यायें थीं-

(i) एक शक्तिशाली सेना का गठन,

(ii) अन्य जर्मन राज्यों को प्रभावित करना, जिससे वे आस्ट्रिया के प्रभाव से मुक्त हो जाये, विशेषतया दक्षिण जर्मनी के कैथोलिक राज्य, जो कैथोलिक आस्ट्रिया के प्रभाव में थे,

(iii) आस्ट्रिया को पराजित कर उसे सदैव के लिए जर्मनी से निकाल देना,

(iv) फ्रांस को पराजित करना क्योंकि यह जर्मन एकीकरण के मार्ग में सबसे बड़ा रोड़ा था।

(v) राजनीतिक दलों में एकता का अभाव था;

(vi) आस्ट्रिया तथा प्रशा में आपसी द्वेष था,

(vii) जर्मनी की सम्पूर्ण जनता में राष्ट्रीय जागृति विकसित नहीं हो पाई थी।

बिस्मार्क की लौह तथा रक्त की नीति और जर्मनी का एकीकरण- बिस्मार्क की मान्यता थी कि सैनिक दृष्टि से प्रशा को शक्तिशाली बनाकर ही जर्मनी का एकीकरण किया जा सकता था, अतः सेना को शक्तिशाली बनाने के लिए बिस्मार्क ने संसद की अवहेलना कर धन एकत्रित कर लिया। सौभाग्यवश उसके युद्ध मन्त्री और चीफ ऑफ दि स्टाफ (रुनी एवं मोल्टके) बहुत योग्य व्यक्ति थे तथा प्रशा के राजा का भी बिस्मार्क में पूर्ण विश्वास था। विस्मार्क प्रशा के नेतृत्व में जर्मनी का एकीकरण अपनी उपर्युक्त नीति और योजना के आधार पर करने को अब कटिबद्ध हो गया। उसने घोषणा की, “महत्वपूर्ण समस्याओं का हल भाषणों और बहुमत के आधार पर नहीं किया जा सकता! उनका हल तो ‘लौह और रक्त की नीति से ही सम्भव है।”

डा० मथुरा लाल शर्मा का कथन है कि “जर्मनी का एकीकरण बिस्मार्क की ‘लौह और रक्त’ की नीति का परिणाम था। इस नीति का अनुसरण बिस्मार्क ने तीन लड़ाइयों में किया। पहली लड़ाई डेनमार्क के साथ 1864 में, दूसरी आस्ट्रिया के साथ 1866 में और तीसरी फ्रांस के साथ 1870 में हुई।” तीन युद्धों में विजय प्राप्त करके बिस्मार्क ने जर्मनी एकीकरण का कार्य पूरा किया।

बिस्मार्क के उद्देश्य-

बिस्मार्क की नीति के दो प्रमुख उद्देश्य थे-

(1) प्रशा के नेतृत्व में जर्मनी का एकीकरण करना,

(2) आस्ट्रिया को पराजित करना तथा उसे पराजित करने के लिए यूरोप के शक्तिशाली देशों का समर्थन प्राप्त करना।

बिस्मार्क ने लौह और रक्त की नीति का अनुसरण करते हुए डेनमार्क, आस्ट्रिया तथा फ्रांस को पराजित किया।

बिस्मार्क द्वारा जर्मनी के एकीकरण के विभिन्न चरण

(1) डेनमार्क के साथ युद्ध तथा जर्मनी के एकीकरण का प्रथम चरण- 1864 में प्रशा- डेनमार्क युद्ध का कारण श्लेसविग और होल्सटीन की दो डचियाँ थी। 1852 की लन्दन सन्धि के अनुसार दोनों डचियों का अस्तित्व अलग-अलग बना रहना आवश्यक था। दोनों डचियों की जर्मन जनता उन्हें जर्मनी के साथ संयुक्त करना चाहती थी।

1863 में डेनमार्क के शासक क्रिश्चियन नवम् ने 1852 की लन्दन सन्धि का उल्लंघन करते श्लेसविग तथा हालस्टीन को डेनमार्क के राज्य में सम्मिलित कर लिया। बिस्मार्क ने डेनमार्क को दण्डित करने का निश्चय कर लिया। उसने आस्ट्रिया को भी लालच देकर अपनी ओर मिला लिया और दोनों देशों ने मिलकर 1864 में डेनमार्क को पराजित कर दिया। डेनमार्क ने श्लेसविग तथा हालस्टीन के प्रदेश आस्ट्रिया और प्रशा को सौंप दिए।

गेस्टाइन की सन्धि (1865 ई०)- 14 अगस्त, 1865 को आस्ट्रिया के सम्राट फ्रांसिस जोसेफ तथा प्रशा के सम्राट विलियम प्रथम के बीच एक सन्धि हुई जिसे ‘गेस्टाइन की सन्धि’ कहते हैं। इस सन्धि के अनुसार निम्नलिखित शर्ते निश्चित की गईं-

(1) श्लेसविग पर प्रशा का अधिकार स्वीकार कर लिया गया।

(2) हालस्टीन पर आस्ट्रिया का अधिकार मान लिगा गया।

(3) प्रशा को बेंच दिया गया।

(4) लाइनवर्ग कील के बन्दरगाह पर आस्ट्रिया और प्रशा का संयुक्त अधिकार रहा, किन्तु प्रशा को किलेबन्दी करने तथा समुद्र तक नहर खोदने का अधिकार मिल गया।

डेनमार्क से युद्ध छोड़ने का बिस्मार्क का उद्देश्य दोनों डचियों को प्राप्त कर प्रशा के साम्राज्य का विस्तार करना तो था ही, किन्तु ऐसा करने का उसका वास्तविक उद्देश्य यह था कि जर्मनी के अन्य राज्य प्रशा की सैनिक शक्ति और बढ़ी हुई प्रतिष्ठा से प्रभावित हो जाँए तथा प्रशा को जर्मन जाति का नेता मानते हुए उसके नेतृत्व में जर्मन एकीकरण स्वीकार कर लें। इस प्रकार जर्मनी का प्रशा के नेतृत्व में एकीकरण करने का यह पहला कदम था।

(2) आस्ट्रिया से युद्ध और जर्मनी के एकीकरण का द्वितीय चरण- बिस्मार्क ने यह अनुभव किया कि जब तक आस्ट्रिया को जर्मनी से बाहर न निकाल दिया जायेगा, तब तक प्रशा के नेतृत्व में जर्मनी का एकीकरण असम्भव है। साथ ही गेस्टाइन के समझौते के बाद आस्ट्रिया और प्रशा के सम्बन्ध बिगड़ते चले गये थे। अतः आस्ट्रिया से युद्ध होना अवश्यम्भावी था।

आस्ट्रिया की पराजय- आस्ट्रिया-प्रशा युद्ध का तत्कालीन कारण श्लेसविग और होल्सटीन की डचियों पर विवाद था, जिन पर दोनों देशों का संयुक्त अधिकार था। बिस्मार्क ने आस्ट्रिया को अलग-थलग करने के लिए कूटनीति का सहारा लिया। उसने इटली को आस्ट्रिया से बेनेशिया दिलाने का आश्वासन दिया और इटली ने आस्ट्रिया के विरुद्ध दक्षिण में दूसरा मोर्चा खोलने का वचन दिया। फ्रांस के सम्राट नेपोलियन तृतीय को बिस्मार्क ने राइन नदी के पास के कुछ प्रदेश देने का इशारा किया और इस प्रकार फ्रांस को तटस्थ रखने में सफल रहा।

1866 के सात सप्ताहों में ही आस्ट्रिया-प्रशा युद्ध का निर्णय हो गया। आस्ट्रिया सेडोवा के युद्ध में बुरी तरह परास्त हुआ। प्राग की सन्धि के अनुसार प्रशा को श्लेसविग और होल्सटीन की  पूर्णतया प्राप्त हो गई और इटली को वेनेशिया दे दिया गया। युद्ध के हर्जाने के रूप में प्रशा को 30 लाख पौण्ड मिले।

इस युद्ध के परिणामस्वरूप प्रशा की प्रतिष्ठा बढ़ गई और जर्मनी में आस्ट्रिया के प्रभाव का अन्त हो गया। प्राग की सन्धि बहुत उदार शर्तों वाली थी। महान् कूटनीति बिस्मार्क, आस्ट्रिया को अधिक नाराज नहीं करना चाहता था, क्योंकि वह जानता था कि शीघ्र ही जर्मन एकीकरण के सर्वाधिक बाधक फ्रांस से उसे उलझना पड़ेगा।

उत्तरी जर्मन संघ की स्थापना- आस्ट्रिया को पराजित कर बिस्मार्क ने जर्मनी के उत्तरी भाग में स्थित सभी राज्यों को मिलाकर उत्तरी जर्मनी संघ का निर्माण किया जिसमें प्रशा सहित 22 राज्य सम्मिलित थे। प्रशा के राजा विलियम प्रथम को संघ का स्थाई सदस्य, बनाया गया तथा प्रशासनिक कार्यों के सम्पादन के लिए एक कौंसिल की स्थापना की गयी। इस कौंसिल को कानूनों के निर्माण तथा संघ के शासन-संचालन का अधिकार दिया गया।

संघीय कौंसिल पर बिस्मार्क (या दूसरे अर्थ में प्रशा) का पूर्ण रूप से प्रभुत्व था तथा वही अकेला शासन-सम्बन्धी कार्यों के लिए प्रशा के राजा के प्रति उत्तरदायी था। संघीय कौंसिल के

श अतिरिक्त रीशहैग (लोकसभा) की भी स्थापना की गई जिसका निर्वाचन वयस्क मताधिकार पर हुआ। रीशटैग को पर्याप्त अधिकार सौंपे गए, किन्तु उसकी स्थिति इंग्लैण्ड के हाऊस ऑफ कॉमन्स जैसी शक्तिशाली व सुदृढ़ नहीं थी। इस प्रकार बिरमार्क ने इस संघ को बनाकर प्रशा के नेतृत्व में जर्मनी के एकीकरण की ओर एक और कदम बढ़ाया।

दक्षिणी जर्मनी के राज्यों की स्थिति- यद्यपि प्रशा ने आस्ट्रिया को परास्त कर उसे जर्मनी से बाहर कर दिया था, प्रशा की शक्ति और प्रतिष्ठा बहुत बढ़ गई थी और प्रशा के नेतृत्व में उत्तरी जर्मनी संघ की स्थापना हो चुकी थी, फिर भी दक्षिणी जर्मनी के बड़े राज्य जैसे बुरटेम्बर्ग, बेडेन, बवेरिया, हेस आदि प्रशा के प्रभाव से दूर थे। बिस्मार्क ने उन्हें धमकी या बल का प्रयोग के द्वारा प्रशा का नेतृत्व स्वीकार करने या जर्मन संघ में सम्मिलित होने के लिए विवश नहीं किया। उसने इन राज्यों के प्रति आदर व सहानुभूति का व्यवहार रखा और उनकी स्वतन्त्रता में किसी प्रकार की कमी नहीं आने दी। इसका यह भी कारण था कि कैथोलिक आस्ट्रिया के साथ कैथोलिक राज्यों की अभी भी सहानुभूति थी। विस्मार्क गृह युद्ध छेड़कर जर्मन एकीकरण की प्रगति रोकना नहीं चाहता था।

अब जर्मनी दो भागों में बँट गया – प्रशा के नेतृत्व में उत्तरी जर्मनी संघ तथा दक्षिणी जर्मनी के बड़े, किन्तु असंगठित राज्य।

फ्रांस-प्रशा युद्ध तथा जर्मनी के एकीकरण का अन्तिम चरण- इस समय तक जर्मनी में ही नहीं, वरन् सम्पूर्ण यूरोप में प्रशा की शक्ति में बहुत वृद्धि हो गई थी। बिस्मार्क यह भली- भाँति जानता था कि बिना फ्रांस को पराजित किये जर्मनी का एकीकरण असम्भव है। 1870-71 में प्रशा और फ्रांस के मध्य भीषण युद्ध हुआ, जिसके कारणों का सम्बन्ध प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जर्मनी के एकीकरण के साथ था। इस युद्ध के निम्नलिखित कारण थे-

(i) आस्ट्रिया की पराजय- आस्ट्रिया से युद्ध आरम्भ करने के पूर्व बिस्मार्क ने फ्रांस के सम्राट के नेपोलियन तृतीय को राइन नदी के आस-पास के कुछ प्रदेश देने का संकेत दिया था और इस प्रकार फ्रांस को आस्ट्रिया की सहायता देने से रोक दिया था। युद्ध की समाप्ति पर बिस्मार्क ने अपना वायदा पूरा नहीं किया, जिससे नेपोलियन बहुत क्रोधित हो गया। आस्ट्रिया ने सात सप्ताह में ही घुटने टेक देने से सम्पूर्ण यूरोप और विशेषतः फ्रांस आश्चर्यचकित रह गये। नेपोलियन तृतीय ने तो सोचा था कि प्रशा और आस्ट्रिया के आपस में भिड़ने से दोनों ही कमजोर हो गये और तब फ्रांस को जर्मनी में अपना प्रभुत्व बढ़ाने का अवसर मिल गया। लेकिन उसकी आशायें पूरी होने के बजाय हुआ यह कि प्रशा जैसा शक्तिशाली देश उसकी सीमा पर सुरक्षा के खतरे के रूप में प्रकट हो गया और यदि प्रशा के नेतृत्व में जर्मनी का एकीकरण हो गया तो फ्रांस को और अधिक खतरा पैदा हो जायेगा। अतः फ्रांस को शीघ्र-देर से प्रशा का दमन करना ही था।

(ii) फ्रांस की अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा में कमी- प्रशा की आस्ट्रिया पर विजय ने उसे यूरोप का सर्वाधिक शक्तिशाली राज्य बना दिया और उसकी प्रतिष्ठा में बहुत वृद्धि हो गई। प्रशा ने आस्ट्रिया जैसी प्राचीन, शक्तिशाली और प्रतिष्ठित देश को सात सप्ताहों में ही घुटने टेकने को विवश कर दिया और फ्रांस दर्शक की भाँति यह सब देखता रहा, यह अभिमानी और महत्त्वाकांक्षी नेपोलियन तृतीय को बहुत अखरा अतः उसने प्रशा को नीचा दिखाने का निश्चय किया।

(iii) नेपोलियन तृतीय की लोकप्रियता का अन्त- जब जर्मन जनता, विशेषतः दक्षिण जर्मनी के बुरटेम्बर्ग, बवेरिया आदि की जनता और शासकों को यह पता चला कि नेपोलियन तृतीय जर्मन राज्यों के कुछ भागों की माँग कर रहा है तो वे उससे घृणा करने लगे। ऐसा होना बिस्मार्क के हित में हुआ, जो अब जर्मनी जनता और दक्षिणी जर्मन के राज्यों का, प्रशा और फ्रांस का युद्ध होने पर, सहयोग प्राप्त करने के सम्बन्ध में आश्वस्त हो गया, क्योंकि प्रशा भी फ्रांस से शीघ्र-देर से युद्ध का जर्मनी का एकीकरण और स्थायी सुरक्षा चाहता था। दूसरी ओर फ्रांस में भी नेपोलियन तृतीय के प्रति असन्तोष बढ़ गया और यह कहा जाने लगा कि सेडोवा के युद्ध में आस्ट्रिया की नहीं, फ्रांस की पराजय थी। नेपोलियन तृतीय की चारों ओर कटु आलोचना होने लगी। अतः नेपोलियन तृतीय के लिए यह आवश्यक हो गया कि वह प्रशा को परास्त कर अपनी खोई प्रतिष्ठा पुनः प्राप्त करें, जिससे उसकी सत्ता पर कोई संकट उत्पन्न न हो जाये।

(iv) युद्ध का तात्कालिक कारण- युद्ध का तात्कालिक कारण स्पेन के उत्तराधिकार का प्रश्न था। जब वहाँ का सिंहासन रिक्त हुआ तो स्पेनिश नेताओं ने प्रशा के शासक के भाई लियोपोल्ड को स्पेन का शासक बनाना चाहा। यह सुनकर नेपोलियन तृतीय सशंकित हो उठा। क्योंकि ऐसा होने पर प्रशा बहुत शक्तिशाली हो जाता और फ्रांस दो ओर से घिर जाता। प्रशा के शासक ने नेपोलियन तृतीय के विरोध देखते हुए लियोपोल्ड से स्पेन का राजा बनने का प्रस्ताव अस्वीकृत करवा दिया। परन्तु नेपोलियन तृतीय इससे ही सन्तुष्ट नहीं हुआ और उसने अपने राजदूत से कहा कि वह भविष्य के लिए प्रशा के शासक से इस सम्बन्ध में लिखित गारण्टी माँगे। एक्स नामक स्थान पर फ्रेंच राजदूत ने प्रशा के राजा से ऐसा करने को कहा, किन्तु प्रशा के राजा ने शिष्टतापूर्वक केवल मौखिक आश्वासन देकर राजदूत को विदा कर दिया।

इस घटना की सूचना तार द्वारा बिस्मार्क को भेजी गई, जिसने तार को संशोधित कर दिया। जब संशोधित तार जर्मन समाचार-पत्रों में प्रकाशित हुआ तो जर्मन जनता भड़क उठी, क्योंकि इन्होंने इसे अपने सम्राट और देश का अपमान समझा। उधर फ्रांस में भी जब इस घटना का विवरण समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ तो जनता यह समझी कि उसके राजदूत और राष्ट्र का घोर अपमान किया गया है, अतः फ्रांस ने 15 जुलाई, 1870 के दिन प्रशा के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी।

फ्रांस की पराजय- अपनी कूटनीतिक चतुराई द्वारा बिस्मार्क ने फ्रांस को ही युद्ध की घोषणा करने पर विवश कर दिया, जिससे यूरोप के अन्य राष्ट्रों ने फ्रांस को ही अक्रान्ता समझा और वे तटस्थ रहे। इस युद्ध को प्रशा की जनता ने ही, नहीं, वरन् दक्षिणी जर्मनी की जनता ने भी राष्ट्रीय संग्राम समझा और उन्होंने अपनी सेनायें प्रशा के सहायतार्थ भेजीं। प्रशा पूरी तैयारी के साथ युद्ध में कूदा था, जबकि फ्रांस ने कोई विशेष तैयारी नहीं की थी। फलतः सितम्बर, 1870 में सीडान के रणक्षेत्र में फ्रांस की निर्णायक पराजय हुई, नेपोलियन तृतीय ने आत्म- समर्पण कर दिया और वह बन्दी बना लिया गया। फ्रांस में गणतन्त्र की स्थापना हो गयी, जिसने कुछ समय तक युद्ध जारी रखा, लेकिन अन्त में 28 जनवरी, 1871 के दिन पेरिस के पतन के साथ युद्ध समाप्त हो गया।

फ्रेंकफर्ट की सन्धि (18 मई 1871 के अनुसार, स्ट्रासबर्ग और मेत्ज के दुर्गों के साथ फ्रांस के अल्सास और लारेन प्रान्तों को जर्मन साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया गया तथा फ्रांस से युद्ध के हर्जानें के रूप में 20 करोड़ पौण्ड की राशि वसूल की गई।

जर्मन साम्राज्य की स्थापना-

18 जनवरी, 1871 के दिन वर्साय के शीशमहल में एक शानदार दरबार लगाया गया कि जिसमें प्रशा के शासक को जर्मन सम्राट बनाया गया। जर्मनी के विभिन्न राज्यों के शासकों की उपस्थिति में बिस्मार्क ने घोषणा की, “जर्मन राज्य संघ आज से साम्राज्य के नाम से सम्बोधित किया जायेगा। राजा विलियम प्रथम जर्मन सम्राट कहलायेंगे। सभी जर्मन राज्य संघ के यथा पूर्व सदस्य माने जायेंगे तथा संघ का संविधान भी बिना किसी परिवर्तन के साम्राज्य का संविधान माना जायेगा।” इस प्रकार जर्मनी के एकीकरण का कार्य सम्पन्न हो गया।

निष्कर्ष-

इसमें कोई सन्देह नहीं कि जर्मनी के एकीकरण का श्रेय केवल बिस्मार्क को ही नहीं दिया जा सकता, क्योंकि जर्मन जनता ने भी आन्दोलन और त्याग किये थे तथा तत्कालीन परिस्थितियों ने बिस्मार्क की सहायता की। फिर भी जर्मनी के एकीकरण में बिस्मार्क का बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण योगदान था, अपनी कूटनीति से उसने यह कार्य सम्पन्न किया। आस्ट्रिया को पहले बलपूर्वक जर्मन मामलों से निकाला, फिर उसके साथ उदार सन्धि कर उसे तटस्थ रखा। फ्रांस को आक्रान्ता सिद्ध कर उसने जर्मन जनता और शासकों का सहयोग प्राप्त किया। यदि बिस्मार्क न होता तो जर्मनी के एकीकरण में बहुत विलम्ब हो सकता था।

प्रो० बी० एन० मेहता का कथन है कि “इस प्रकार बिस्मार्क ने अपनी कूटनीतिक कुशलता से अनेक बाधाओं का सामना करते हुए अपना उद्देश्य पूरा किया, तीन शताब्दियों से फ्रांस और आस्ट्रिया यूरोपिय समाज के माने हुए नेता थे, परन्तु बिस्मार्क ने पाँच वर्ष तक के अन्दर दोनों का विनाश करके जर्मनी को उनके स्थान पर बैठा दिया। बिस्मार्क की सफलता ने जर्मन लोगों को आश्चर्यचकित कर दिया। वे उस पर मुग्ध हो गये और उदारवाद भूलकर सैनिकवाद के भक्त बन गये। अतुल सैन्य बल, नवीन एकता और गौरवपूर्ण उल्लास से सुसज्जित जर्मनी नबीन युग में प्रविष्ट हुआ और आधी शताब्दी तक यूरोप में अग्रणी बना रहा। उसके साथ ही नवीन जर्मनी का निर्माता विस्मार्क अपने युग के प्रथम बीस वर्षों में जर्मनी का कर्णधार और यूरोपीय राजनीति का सूत्रधार रहा।”

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Pankaja Singh

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