इतिहास

इतिहासवाद | इतिहासवाद काअभिप्राय | इतिहास के उपागम | इतिहासवाद का अर्थ | आदर्शवाद | मार्क्सवाद | राष्ट्रवाद

इतिहासवाद | इतिहासवाद काअभिप्राय | इतिहास के उपागम | इतिहासवाद का अर्थ | आदर्शवाद | मार्क्सवाद | राष्ट्रवाद

इतिहासवाद

इतिहासकारों ने इतिहास में जो दर्शन ढूँढ़ा और उसके आधार पर जो सिद्धान्त प्रतिपादित किया वह इतना प्रसिद्ध हुआ कि उस समय के लिए वह एक ‘वाद’ बन गया। इसी को विद्वानों ने उन इतिहासकारों एवं उनके प्रतिपादित सिद्धान्तों का ‘इतिहासवाद’ इंगित किया। इनमें कुछ तो विषय के सातत्य से कुछ विशिष्ट नामों से जाने गये और कुछ को उन इतिहास-दार्शनिकों के नामों के साथ जुड़कर प्रसिद्धि मिली।

‘इतिहासवाद’ एक ऐसा शब्द है जो अपने आप में पूर्ण है और इसका सम्बन्ध न तो किसी समय के इतिहास से है और न ही किसी इतिहासकार से, अपितु इसका प्रयोग हम सम्पूर्ण इतिहास एवं समस्त इतिहासकारों के सातत्य में किया करते हैं। यह सभी वादों को अपने में समेटे हुए होता है और सबकी सम्मिलित परिभाषा भी हुआ करता है। इससे इतिहास के समस्त वादों का बोध तो नहीं होता, फिर भी वादों को ऐतिहासिकता का मूर्त रूप देने का माध्यम यही है। विभिन्न ऐतिहासिक वादों के मध्य यह उभयनिष्ठ है। इसका परिचय विषयगत आधार पर हो सकता है और जब हम यह कहते हैं कि अमुक समय दैव अथवा ईश्वरवाद का था। अमुक भौतिकवाद का था, अमुक विज्ञानवाद का था, अमुक दर्शन और मनोविज्ञानवाद का था तो उसी के साथ हम यह भी कह पाते हैं कि अमुक समय इतिहासवाद का था। विद्वानों ने भी जहाँ इतिहासवाद को समझाने और उसकी परिभाषाएँ देने का प्रयास किया है, वहाँ उनका भी यही अभिप्राय रहा है।

उक्त कथन के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि इतिहासवाद भी किसी समय-विशेष की देन है। आरम्भ में इतिहासकारों द्वारा अपने संस्मरणों के आधार पर अपने पूर्वजों के कृत्यों को स्थायित्व प्रदान करने के उद्देश्य से जो इतिहास लिखा गया, उसमें अतीत की घटनाएँ उस समय विवादपूर्ण हो उठीं, जब इतिहासकार अपनी-अपनी दृष्टि से अतीत की एक ही घटना का निरूपण करने लगते थे। विवाद को कम करने के लिए इतिहासकारों ने विभिन्न सिद्धान्त स्वीकार किये जिनमें इतिहास का स्वरूप गूढ़ दर्शन बन गया। यह इतिहासवाद की प्रारम्भिक अवस्था का कारण था। किन्तु, लोगों ने इसे इतिहासवाद के रूप में उतनी गम्भीरता से नहीं लिया था। इस ओर ध्यानाकर्षण का समय प्रायः विश्वयुद्ध काल था।

सर्वप्रथम ट्रायेल्स ने जब इतिहासवाद का प्रयोग किया तो उसका मन्तव्य केवल इतिहास- सम्बन्धी समग्र ज्ञान एवं अनुभवों से ही था। इस प्रवृत्ति के दो प्रमुख उद्देश्य थे.- 1. ऐतिहासिक ज्ञान और 2. प्रवृत्ति सम्बन्धी ज्ञान का अन्वेषण। कार्ल मैनहीम ने सन् 1924 में इतिहासवाद पर एक लेख लिखकर यह सिद्ध करने का यत्न किया कि ऐतिहासिक ज्ञान का प्रयोग आध्यात्मिक तथ्यों की अपेक्षा लौकिक अधिक होना चाहिए, क्योंकि इतिहास वस्तुतः सामाजिक मानव के कार्य-व्यापारों का अध्ययन होता है, न कि अदृश्य आध्यात्मिक तत्वों का अध्ययन होता था। सन् 1936 में जर्मन इतिहासकार मीरेके ने अपने इतिहासवाद के अन्तर्गत ऐतिहासिक चेतना के प्राचीन एवं आधुनिक अन्तर को स्पष्ट करने का प्रयास किया। जर्मनी में इतिहास की समाजशास्त्र है। इतिहास में मनुष्य का अध्ययन ऐतिहासिक जीव के रूप में होता है। मनुष्य ऐतिहासिक है और इतिहास मनुष्य का अध्ययन है।

प्रो० ई० एच० कार ने इतिहास-लेखन के विषय में बतलाया है कि यह अतीत के परिकल्पनात्मक पुनर्निर्माण का एकमात्र साधन है। इसको व्याख्याप्रधान बनाने के लिए इतिहासकार ऐतिहासिक तथ्यों का चयनशीलात्मक स्वरूप आवश्यक मानता है। इसी परिप्रेक्ष्य में इतिहासवाद को सम्बद्ध करते हुये प्रो0 कार ने कार्ल ए0 पापर की आलोचना करते हुये लिखा है कि प्रो० पापर अपने अनभिमत प्रत्येक विचार को इतिहासवाद से सम्बद्ध करते हैं, जो कि अस्पष्ट एवं भ्रामक होने से सर्वथा उचित नहीं कहा जा सकता।

इतिहासवाद को इतिहास-दर्शन के समान अर्थ एवं प्रयोग में लाने का कार्य एम0 सी0 डी0 आर्की महोदय ने विशेष रूप से किया है। इतिहासवाद के प्रवर्तक माने जाने वाले हीगेल ने भी इतिहास सम्बन्धी ज्ञान को ही इतिहासवाद माना है। डिल्थे ने भी इसी आशय से ज्ञान को दो भागों में विभक्त करके प्रकृति के ज्ञान के लिए विज्ञान तथा मानव सम्बन्धी ज्ञान के लिए इतिहास को सुनिश्चित किया है। इनके अनुसार इतिहास आत्मप्रकाशीय होता है, इसलिए इतिहास को मस्तिष्क की अभिव्यक्ति कहना उचित है, क्योंकि इसकी रचना मस्तिष्क से होती है। डिल्थे का विचार हर्डर से मिलता-जुलता है। हर्डर ने भी कहा है कि “सम्पूर्ण इतिहास मन की अभिव्यक्तियाँ होती हैं।”

स्पेंगलर ने इतिहास को संस्कृतियों के सन्दर्भ में प्रस्तुत किया है। उसके इतिहासवाद का अभिप्राय सामाजिक मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में संस्कृतियों का अध्ययन तथा विश्लेषण है। कालिंगवुड के अनुसार इतिहासवाद को चिन्तनविधा के रूप में परिभाषित होना चाहिए, क्योंकि इतिहास में विचारों का ही अध्ययन होता है किंवा भी इतिहास विचारों का इतिहास होता है। यहाँ, हम देखते हैं कि क्रोचे तथा कालिंगवुड प्रायः एक जैसी ही बात करते हैं। दोनों ही ऐतिहासिक ज्ञान को मानव-सम्बन्धी ज्ञान का स्रोत कहते हैं और वैज्ञानिक विधाओं के प्रयोग से इतिहास को पृथक् रखकर बात करते हैं।

इतिहासकार के क्षेत्र में मार्क्स के भौतिकवादी इतिहास की व्याख्या सर्वाधिक लोकप्रिय है। उनके द्वन्द्वात्मक सिद्धान्त के अनुसार इतिहास का निर्माण एक सामाजिक व्यवस्था के अन्त और दूसरे के जन्म से हुआ करता है। सामाजिक व्यवस्था को नियन्त्रित करने के लिए वह उत्पादन और वितरण व्यवस्था पर विशेष बल देते हैं।

इतिहासवाद को मुख्य रूप से ऐसा ही जानना चाहिए कि वह ऐतिहासिक ज्ञान की विश्लेषणात्मक तथा परिकल्पनात्मक व्याख्या है जिसका लक्ष्य इतिहास में किसी विशेष अर्थ का अन्वेषण है। अग्रांकित वादों के अध्ययन से इतिहासकार को समझने में सहायता मिल सकेगी।

1. अनुदारवाद

वाद मुख्यतः ब्रिटिश इतिहासकार सर लेविस नेमियर के नाम के। साथ सम्पृक्त है। प्रथम विश्वयुद्ध के पूर्व तक इंग्लैण्ड में आशावादिता थी और उसमें उदारवादिता पायी जाती थी। किन्तु इस युद्ध के बाद, विजयी होने के बाद भी उस देश में अनिश्चय एवं निराशाजनक भय व्याप्त होने लगा था। उदारवादी इतिहासकार नेमियर का दृष्टिकोण भी अनुदारवादी हो चला। क्योंकि उसके देश का साम्राज्य उस समय भी दूर-दूर तक कला हुआ था जिससे स्वयं उसके देश को समाजवाद के स्थान पर अनुदारवाद को ही स्वीकृत रखना आवश्यक हो गया था। इसीलिए नेमियर ने भी अपने वर्णन में इंगलैण्ड के इतिहास को उसी प्राचीन रूप में ही प्रस्तुत करना उचित समझा और क्रान्तियों की चर्चा एकदम नहीं की। उसने फ्रांस, रूस की ही नहीं अपितु इंगलैण्ड की क्रान्ति की भी चर्चा नहीं की। केवल 1848 ई० को यूरोपीय क्रान्ति की चर्चा को छोड़कर अन्य के विषय में वह मौन ही रहा। यह एक ऐसी क्रान्ति थी जो सफल नहीं हो सकी थी और उसने यह सिद्ध कर दिया था कि सशस्त्र सेनाओं के सन्मुख कोई भी विचारधारा कार्य नहीं कर सकती। इस क्रान्ति ने उदारवादी चिन्तन को पीछे रख छोड़ा था और उसका उल्लेख करने के कारण ही नेमियर को अनुदारवादी और उस समय को अनुदारवाद-काल एवं उस समय की प्रवृत्ति को अनुदारवाद कहा गया। इतिहास के अध्ययनार्थियों के लिए ब्रिटिश इतिहास को जानने हेतु उक्त अनुदारवाद को जानना आवश्यक है।

2. अनुभववाद–

तथ्यों की समीक्षा करके उनसे अपने निष्कर्ष प्राप्त करने का दर्शन लाक से बट्रेण्ड रसेल तक ही अनुभववादी मुख्य दार्शनिक विचारधारा से पूरी तरह मेल खाता है। ज्ञान का अनुभववादी सिद्धान्त विषय और वस्तु को पूर्णतया विच्छिन्न मानता है। अनुभववादी सम्प्रदाय के इतिहासकारों द्वारा लिखित एक अच्छी, किन्तु सोद्देश्य पुस्तक ‘आक्सफोर्ड शार्टर इंगलिश डिक्शनरी’ में इन दोनों प्रतिक्रियाओं के अन्तर को स्पष्ट किया है। उसमें तथ्य की परिभाषा यों दी गयी है-‘अनुभव के वे आंकड़े जो निष्कर्ष से भिन्न होते हैं।’ इसे हम इतिहास का सामान्य दृष्टिकोण कह सकते हैं। इस विषय में ट्वायनबी के विचार द्रष्टव्य हैं।

ट्वायनबी ने स्पेंगलर के प्राग अनुभव-पद्धति की आलोचना की है और अपने दार्शनिक मत को ‘अनुभववाद’ की संज्ञा दी है। उनका कहना है कि जब मैंने सभ्यताओं की उत्पत्ति से सम्बद्ध अपने प्रश्न के उत्तर स्वरूप स्पेंगलर की पुस्तक को देखा, मैंने पाया कि स्पेंगलर बिना अपनी स्थापनाओं को प्रकाशित किए हुए नितान्त मताग्रही और नियतिवादी था, जबकि जर्मन प्रागनुभव पद्धति निरर्थक सिद्ध हुई। हमें यह देखना होगा कि अंग्रेजी अनुभववाद से क्या उपलब्ध होता है।

ट्वायनवी ने अपने अनुभववाद को स्पेंगलर और हेगल, दोनों से भिन्न माना है। उसने लिखा है-“वह अनुभव जो हम आधुनिक विश्व में अर्जित कर रहे थे (1914 की घटनाओं के रूप में) उन्हें थ्यूसिडाइडिस ने अपने समय में अनुभूत किया था। ट्वायनबी ने इतिहास में समसामयिकता के सिद्धान्त को ही अनुभववादी के नाम से प्रस्तुत किया है।

3. अवतारवाद–

अवतारवाद मूलतः भारतीय दृष्टिकोण है। यह कर्म के सिद्धान्त की भाग्यवादी व्याख्या है। अवतारवाद धर्म से अनुप्राणित है। यदि इसे धर्म से पृथक् कर दिया जाय तो विविध अवतारों को महान व्यक्तियों के इतिहास के रूप में समझा जा सकता है, जिन्होंने अपने समय में उत्पन्न होकर समाज और परिवेश के अवांछनीय तत्वों को दूर किया। ‘यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत’ के सातत्य से गीता में अवतारवाद की बहुत सुन्दर व्याख्या प्रस्तुत की गयी है। भारतीय विचार के अनुसार ईश्वरीय तत्व प्रत्येक जीव में विद्यमान है, परन्तु अवतार सामान्य जीव से कुछ विशेष योग्यता रखता है। ये अवतारी पुरुष समसामयिक अपेक्षाओं को ठीक ढंग से पहचानते हैं और तद्नुरूप कार्य करके इतिहास-प्रक्रिया को एक विशिष्ट आयाम प्रदान करते हैं। इतिहासकार इनको ही इतिहास-स्रष्टा मानते हैं।

4. आदर्शवाद-

इतिहास में इस वाद का आशय केवल इतने से है कि चाहे इतिहास में विज्ञान देखा जाय अथवा कला, किन्तु उसमें आदर्श की स्थापना अवश्यमेव की जानी चाहिए। हीगल तथा अंग्रेज आदर्शवादियों (यथा-बोसाके, ब्रैडले आदि) की भाँति क्रोचे ने इस ओर ध्यान दिया था इसीलिए उसे ही अधिकांश इतिहासकार आदर्शवाद का प्रतिष्ठापक मानते हैं। कुछ लोग हीगल को ही यह महत्त्व देते हैं। हमें इस विवाद में न पड़कर केवल आदर्शवाद का परिचय करना है। यह वह वाद है जिसमें एक इतिहासकार अपना चित्रण विवेकपूर्ण ढंग से किन्तु सर्वथा आदर्श रूप में करता है। इसे व्याख्या का आदर्शवादी दृष्टिकोण भी कह सकते हैं। हीगल में बुद्धिवाद और विज्ञानवाद के साथ-साथ आदर्शवाद भी था और इसीलिए उसके इतिहास दर्शन को विद्वान् द्वन्द्वात्मक आदर्शवाद कहते हैं। इस वाद की सीमा ने रचित इतिहास को अधिक लोकप्रियता प्राप्त होती है, इसीलिए प्रायः अधिकांश इतिहासकार इतिहास में आदर्शवाद के पक्ष में मत देते हैं।

5. उपनिवेशवाद–

इस वाद की शाब्दिक व्याख्या से ही स्पष्ट है कि इसमें एक स्थान पर जाकर अपना उपनिवेश बनाया करते हैं। इस वाद के चलते जहाँ एक ओर नये-नये अनुसन्धान हुआ करते हैं, वहीं अनैतिकता, क्रूरता के दृश्य भी देखने को मिलते हैं। इतिहास में ऐसे सत्य का वर्णन हमें मिल जाता है जब कतिपय यूरोपीय देशों में अन्यत्र उपनिवेश बनाने की प्रतिस्पर्धा- सी लगी हुई थी।

6. कारणतावाद-

इतिहास को जब कला के साथ-साथ एक विज्ञान भी मानते हुए उसके अध्ययन में कार्य और कारण का प्रयोग किया जाने लगा तो उस सत्य को विद्वानों ने कारणतावाद की संज्ञा प्रदान की। वह नियतिवाद के सन्दर्भ में भी प्रस्तुत होता है जहाँ कहा जाता है कि समान परिस्थितियों का कारण के फलस्वरूप समान घटना होती है और जो भी घटना होती है उसका एक कारण या अनेक कारण होते हैं जिन्हें बतलाया जा सकता है, यद्यपि ये कारण कभी-कभी काफी जटिल एवं विविध रूप में प्राप्त होते हैं। कारणत्व के सिद्धान्त में इसे अच्छी प्रकार समझाया गया है।

7. कालवाद-

मार्क्स एवं एंगिल्स के अभिलेखों के आधार पर भौतिक दर्शन में जो सिद्धान्त निरूपित किये गये हैं उनमें से कालवाद भी एक है। इस वाद की मान्यता यह है कि समस्त विश्व परिवर्तनशील है और उस परिवर्तन का मानदण्ड यह काल ही है। भारतीय इतिहास-दर्शन में सृष्टिकर्ता के विराट रूप को ‘काल’ कहा गया है जो गति का परिचायक है। वेदों में उसे घोड़ा बताया गया है जो सात रासों द्वारा सबको खींच ले जाता है। समस्त आकाश- पृथ्वी आदि की सृष्टि उसी से है। मन प्राण और नाम का काल से अभिन्न सम्बन्ध होता है। उसके तीन रूप हैं-1. अनन्तकाल या अव्ययनिरपेक्ष भूतकाल, 2. करालकाल आय सापेक्षकाल और 3. कुटिलकाल या गणनकाल। पाणिनि, पतंजलि और भर्तृहरि आदि ने इसका पर्याप्त उल्लेख किया है। भूत-भविष्य और वर्तमान-ये काल की सापेक्ष व्यंजनाएँ हैं। काल वस्तु-जगत् का उपकरण है। यह सृष्टि की मौलिक प्रक्रिया है। काल शाश्वत है, अतः वस्तुओं का अन्त कभी नहीं होता, केवल परिवर्तन होता है, किन्तु यह क्षणिक भी है। इसकी गति यांत्रिक और चक्रात्मक है। इसके दो पक्ष ब्रह्मा के दिन और रात हैं। पुराणों में कत, त्रेता, द्वापर और कलि नामक काल में तो जैन ग्रन्थों ने छह कल्पों को छ: युगों में बाँटा है। इस वाद के विषय में पूर्ण ग्रन्थ बन सकता है, क्योंकि काल-चक्र का पार पाना सर्वथा असम्भव है, अतएव कालवाद के सन्दर्भ में इसे इतना ही समझना पर्याप्त होगा।

8. द्वन्द्ववाद-

इस वाद का जन्म रोमान्तिक युग में हीगेल से हुआ माना जाता है। इतिहास- दर्शन को इसी वाद के अन्तर्गत द्वन्द्वात्मक-आदर्शवाद कहा जा सकता है। हीगेल का इतिहास- दर्शन तार्किक है और तार्किक प्रक्रिया के द्वान्द्वात्मक तथा विरोधात्मक होने के कारण वाद, प्रतिवाद और साम्यवाद का उद्भव होता है। इस तरह हीगेल ने इतिहास का प्रारूप दर्शन में पाया था, जबकि मार्क्स ने उसकी कुंजी आर्थिक परिवर्तनों में ढूँढ़ी है। आर्थिक विषमता ही द्वन्द्ववाद को जन्म देती है और वर्गसंघर्ष होता है तथा क्रान्ति आती है। इस तरह मार्क्स ने हीगेल का द्वन्द्ववाद ग्रहण तो किया, किन्तु उसका आशय पूर्णतः बदल दिया है। द्वन्द्ववाद उसके भौतिकवाद के मुख्य सिद्धान्तों में से एक है।

9. नियतिवाद-

विश्व का गतिमान, प्रक्रियात्मक, अमूर्त और निर्माण रूप जिसे ‘इतिहास-रूपी-विश्व’ (वर्ल्ड ऐज हिस्ट्री) कहते हैं, ‘काल’ (टाइम) के अन्तराल में व्याप्त है। यही काल की प्रवृत्ति ही ‘नियतिवाद’ (डेस्टिनी) है। प्रकृति में कार्य-कारण ढूँढ़ा जा सकता है, किन्तु इतिहास में केवल गति और नियति तथा प्रक्रिया ही प्राप्ति कर सकते हैं। तब, जीवन अपनी आन्तरिक प्रवृत्ति और मौलिक प्रेरणा से विकास और निर्माण की जिस प्रक्रिया में गतिमान है उसे इतिहास कहेंगे। इसकी मौलिक गति को ‘नियति’ कहेंगे। बुद्धप्रकाश के अनुसार, ‘चलना और फिरना’ ही इसका कार्य है। इसे किसी अन्य या बाह्य कारण की अपेक्षा नहीं है। इसका स्वभाव ही इसकी गति का आधार है। उत्पत्ति, विकास, क्षय और विलय का क्रम इसकी ‘नियति है। इसमें निश्चय, अटलता और अनिवार्यता है। अतः इसका अतीत और भविष्य सुनिश्चित और बोधगम्य है। संसार, समाज और संस्कृति भी जीवन की प्रक्रिया के अन्तर्गत होने के कारण ऐतिहासिक हैं। इनमें गति और नियति एवं काल है। अर्थात् इनका प्रत्येक पक्ष और क्षण अतीत और भविष्य की अपेक्षा रखता है। इसमें स्थिरता नहीं क्षणिकता है निर्मित नहीं निर्माण है, अस्ति नहीं भवति है। यही ऐतिहासिक दृष्टिकोण है। इसे गेटे ने अपने काव्यों, नाटकों और वार्ताओं में अभिव्यक्त किया है।

नियतिवाद इतिहास की ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण मानव-व्यापार की समस्या है। यह एक विश्वास है कि प्रत्येक घटना के कुछ कारण होते हैं। प्रत्येक इतिहासकार द्वारा मानवीय व्यवहार के कारणों की व्याख्या की जाती है। अन्य शब्दों में, इतिहासकार नियतिवाद अवधारणा के अन्तर्गत मानवीय व्यवहार को प्रभावित करने वाले कारणों की व्याख्या करता है। नियतिवाद में अटूट आस्थावान् इतिहासकारों का विश्वास है कि मनुष्य बाह्य परिस्थितियों तथा व्यक्तित्व की बाध्यता के कारण व्यवहार करता है। यूनानियों का विश्वास नियतिवाद में नहीं है। उनके अनुसार इतिहास का स्वरूप लोचदार होता है और मानवीय इच्छा की प्रबलता के अनुसार उसके स्वरूप में प्रायः परिवर्तन होता रहता है।

10. प्रक्रियावाद-

इस वाद का जन्मदाता हीगल माना जाता है। उसने अपने इतिहास- दर्शन में जिस नये नियम (सिद्धान्त) का प्रतिपादन किया उसे ऐतिहासिक प्रक्रिया का नाम दिया गया और उसी प्रक्रिया को एक वाद के रूप में मान्यता दी गयी है जिसे सम्बद्ध सिद्धान्त का वर्णन करते समय बतलाया जा चुका है। आजकल इस वाद को सार्वभौम स्वरूप प्रदान करते हुए कहा जाता है कि जिस प्रकार की प्रक्रिया का बोलबाला होता है उस समय वही प्रक्रियावाद हो जाता है, इसलिए प्रक्रियावाद का अर्थ किसी एक विशेष वाद से लगाना व्यर्थ है।

11. प्रगतिवाद-

प्रगतिवाद इतिहास के सन्दर्भ में 19वीं सदी की देन है। ऐतिहासिक प्रगति की अवधारणा में इसे (प्रगति को) विकास से भिन्न बतलाते हुए विस्तार से बतलाया गया है। वाद के सन्दर्भ में प्रगति का आशय संक्षेप में यही है कि जिस युग को प्रगति पथ पर बढ़ता हुआ स्वीकृत किया गया हो और लोगों का विचार-भाव निरन्तर प्रगति के विषय में ही दिखलायी देता हो, वही प्रगतिवाद है। उदाहरण के लिए यदि हम ग्रेट ब्रिटेन को 19वीं सदी के उत्तरार्ध में लें तो पायेंगे कि उस समय वह उच्च शिखर पर था और तब उस समय के विद्वान् इतिहासकार भी अपना चिन्तन एवं लेखन प्रगति-परम्परान्तर्गत ही करते थे, जिसे लोग उनका प्रगतिवादी विचार- भाव इंगित करते थे। संक्षेप में प्रगतिवाद का यही अर्थ है।

12. प्रजातिवाद-

जातिवाद और प्रजातिवाद में कोई विशेष अन्तर नहीं है। इतिहास में प्रजातिवाद का सिद्धान्त आज भी शत-प्रतिशत मान्य नहीं है। ऐसा इसलिए है कि मनुष्य के जाति विभाजन का कोई भी एक ऐसा आधार अभी तक नहीं मिल पाया है जिसे सर्वमान्य किया जाय, चाहे वह चमड़े के रंग का आधार हो अथवा बाल का या सिर की बनावट का, आदि। किन्तु तब भी हमें समाज में जातिविशेष के लोग मिलते हैं जिससे प्रजातिवादी भावना को जीवन मिलता है। इतिहास में ऐसा भाव जब प्रायः सर्वत्र दिखलायी देने लगता तब उस समय के इतिहासकारों की लेखनी में भी जाति-प्रथा की अधिक कथा लिखी मिलने लगती है और तब उसी आधार पर हम कह उठते हैं कि वह समय प्रजातिवाद का समय था।

13. प्रभाववाद-

प्रभाव किसी का किसी पर, किसी समय और किसी भी प्रकार का हो सकता है, यथा—राष्ट्रीय उन्नति में वातावरण का प्रभाव, आदतों का प्रभाव, मन्त्रिपरिषद् का प्रभाव, सेना का प्रभाव, राजा का प्रभाव आदि। इतिहासकार मानते हैं कि सभी समयों में किसी न किसी प्रकार के प्रभाववाद की स्थिति पायी ही जाती है, और जिस समय जैसी प्रभावी दशा होती है उस समय वैसा ही प्रभाववाद भी होता है।

14. मनोविज्ञानवाद-

ज्ञान-विज्ञान सभी का मन से सम्बन्ध होता है। दर्शन से निकलकर एक स्वतंत्र विज्ञान के रूप में अध्ययन किये जाने वाले मनोविज्ञान विषय के विद्वानों को मनोवैज्ञानिक कहते हैं और जिस समय उनका प्रभाव समाज पर छाया हुआ होता है उसे ही मनोविज्ञानवाद कहा जाता है। इतिहास के सन्दर्भ में ऐतिहासिक तथ्यों (यथा-शक्ति और उसका चरित्र) में मनोविज्ञानवादी सिद्धान्त अधिकांशतः देखने में आता है। इतिहास बतलाता है कि एक समय ऐसा था, जब व्यक्तिगत व्यक्ति और समूहगत व्यक्ति के बीच अन्तर करके ऐतिहासिक चरित्रों की व्याख्या की जाती थी। वही समय मनोविज्ञानवाद का था।

15. मार्क्सवाद-

इतिहास-दर्शन में कार्ल मार्क्स ने अपने जो विचार दिये वे इतने प्रसिद्ध हुए कि लोग उन्हें उनके नाम के साथ सम्पृक्त कर बतलाने व समझने लगे। उनका सभी क्षेत्रों में जो चिन्तन हुआ उसे मार्क्सवाद कहते हैं। इतिहास-अवधारणा का आधार उसने आर्थिक सिद्धान्त माना है-इसे मार्क्सवादी विचार कहेंगे। ऐतिहासिक प्रगति प्राचीन तथा नवीन सामाजिक संगठन के बीच संघर्ष होने के कारण होती है—यह भी मार्क्सवादी विचार है। वाद तथा प्रतिवाद के द्वन्द्व के परिणामस्वरूप साम्यवाद का उदय होता है और साम्यवाद से ही नवन इतिहास का प्रारम्भ तथा प्राचीन प्रथा का अन्त होता है। (साम्यवाद की इतिहास का मानववाद है) ये विचार भी मार्क्सवादी ही है। पूंजीवाद के स्थान पर समाजवाद, व्यक्तिवाद के स्थान पर समाजवाद का आविर्भाव-यह भी भार्क्सवादी विचार है और यही सब एक प्रकार का मार्क्सवाद है। मार्क्स के विचार वस्तुतः रोशर, नीत्शे, हेगल की स्थापनाओं पर आधृत थे। क्रांति के बाद रूसी इतिहास- लेखन पर मार्क्स की भौतिक व्याख्या का गम्भीर प्रभाव पड़ा था। मार्क्स ने आर्थिक आधार पर समाज के सन्दर्भ में जो भी भौतिकवादी ऐतिहासिक व्याख्या प्रस्तुत की उसका सर्वत्र स्वागत हुआ और उसके प्रभाव में अनेक क्रांतियाँ हुईं। उसी के फलस्वरूप मार्क्स की ख्याति भी इतनी बढ़ गयी कि उनके समय को लोगों को मार्क्स-युग और उसके युग की विचारधारा को मार्क्सवाद की संज्ञा प्रदान की गयी। मार्क्स ने इतिहास में भी आर्थिक कारणों को भी इतिहास की आधारशिला बतलाया है, जिसे बर्टेण्ड रसेल ने खिन मन से स्वीकार किया है।

16. मानववाद-

मार्क्स ने साम्यवाद को ही मानववाद कहा है और उसे पाना मुख्य लक्ष्य माना है। मानववाद को कुछ लोग मानवीय स्वतंत्रता तथा मानवीय प्रगति से भी सम्बद्ध करते हैं जो सीधे तौर पर मानव इतिहास से अनुप्रेरित है। हेरोडोटस की इतिहास-अवधारणा मानववादी थी। कालिंगवुड के अनुसार, “उनके इतिहास-लेखन का एकमात्र उद्देश्य भावी पीढ़ी के लिए अतीत के मानवीय कार्यों को सुरक्षित रखना था। वे यह भी मानते हैं कि मानवीय कार्य व्यापार भाग्य (ईश्वर) द्वारा नियंत्रित होते हैं। उसने इतिहास में मानवीय कार्य को स्वीकार किया है और मानवीय कार्यों पर प्रकृति, भौगोलिक परिस्थिति एवं वातावरण के प्रभाव को स्वाभाविक भी माना है। इतिहास-जनक के रूप में उसने सर्वप्रथम इतिहास के वैज्ञानिक स्वरूप का प्रतिपादन किया है। यही हेरोडोटस का इतिहास में मानववाद है।

यूनानी-रोमन इतिहासदर्शन की मुख्य विशेषता ‘मानववाद’ थी! उसका लक्ष्य मनुष्य के कार्य-कलाप, सफलता-असफलता, उत्थान-पतन आदि का सर्वाङ्गीण चित्र प्रस्तुत करना था। इसके दृष्टिकोण से मनुष्य एक बुद्धि-प्रधान प्राणी है। उसकी बुद्धि के विकास में ही उसकी सफलता सन्निहित है। दैवीय तत्वों में उसकी विशेष निष्ठा नहीं थी। मानव-प्रकृति के निरन्तर स्वरूप का अध्ययन ही इतिहास का उद्देश्य था। चौथी शती में आइसोक्रेतीज की यह धारणा थी कि इतिहास का सम्बन्ध राजनीति (बाह्य परिस्थितियाँ) से है, किन्तु स्तोइक दर्शन के प्रभाव के बाद में आन्तरिक परिस्थितियों (मनःस्थितियों) पर अधिकार करने से भी इतिहास को सम्पृक्त किया गया। यह माना गया कि दुःखान्त नाटकों का उद्देश्य यह नहीं है कि उनको देखकर या पढ़कर मनुष्य दुःखों से बचे, बल्कि उसके अन्दर उन दुःखों को झेलने की शक्ति और तत्परता उत्पन्न हो। मानव-जीवन के सुख का रहस्य भाग्य के आघातों को शांतिपूर्वक सहन करने में निहित है। यूनानी नीतिशास्त्र का यह महान् परिवर्तन पोलीबरा की रचनाओं में दृष्टिगत होता है। उनके बाद के सब रोमन और यूनानी इतिहासकार भी इसे ओत-प्रेत दिखलायी देते हैं। स्तोइक और एपीक्यूरियन विचारकों ने जो विश्वभ्रातृत्व के अनुयायी और प्राचीन यूनानी नगर-राज्य- व्यवस्था के विरोधी एवं आर्थिक विषमता, तथा सामाजिक असमानता के शत्रु थे, इस विषय में अधिक प्रसिद्धि प्राप्त की। दोनों की (विलुप्त) ‘रिपब्लिक’ एवं अन्य कृतियों ने विश्वव्यापी प्रवृत्तियों पर दृष्टिगत किया तथा रोम के उत्कर्ष ने इस दृष्टिकोण को बहुत अधिक बढ़ावा दिया जिससे इतिहासकार जातिवाद से ऊपर उठकर विश्वव्यापी मानववाद के अनुयायी हो गये, फलतः उनके लिए ‘ओर्बिस’ (संसार) और ऊर्वी (नगर) में कोई भेद न रहा। सर्वत्र एक रूप में  मानव को देखा गया जिससे मानववाद का दर्शन विख्यात हुआ।

17. यथार्थवाद—

यथार्थ सत्य के समीपस्थ माना गया है। कुछ लोगों का कहना है कि आदर्श की स्थापना के लिए यथार्थ की उपेक्षा कर देना भी अन्यथा नहीं है, जबकि कुछ लोग आदर्श से हटकर भी यथार्थ चित्रण पर विशेष बल देते हैं। किन्तु अधिकांश लोग अब यह मानने लगे हैं कि यथार्थ और आदर्श के स्थान पर यथार्थ एवं आदर्श को प्रतिष्ठापित किया जाना चाहिए। आधुनिक इतिहास-दर्शन की मुख्य धाराओं में भौतिकवादी मार्क्स का चिन्तन यथार्थवाद को प्रथम स्थान पर रखता है। यथार्थवाद आदर्शात्मक और कलात्मक दोनों होता है। अमरीका के महान् दार्शनिक आर्थर ओ० लवज्वाय ने कलात्मक यथार्थवाद (टेम्पोरलिस्टिक रियलिज्म) को मान्यता दी है।

18. राष्ट्रवाद—

जिस युग में व्यक्ति प्रधान होता है और राष्ट्र गौण होता है, उस समय व्यक्तिवाद प्रधान होता है और जिस समय राष्ट्र को व्यक्ति से प्रधान माना जाता है तब उसे राष्ट्रवाद कहा जाता है। राष्ट्रवाद जब स्वार्थपरक होता है तो राज्य-सीमा विस्तार-नीति के अन्तर्गत युद्ध और संधि होती है। राष्ट्रीयता की भावना अच्छी होती है किन्तु उग्र राष्ट्रीयता का विचार वर्तमान समय में स्वीकार नहीं किया जाता। प्रथम युद्धकाल मे उग्र राष्ट्रीयता भी एक कारण थी। इतना तो मानना ही होगा कि यदि राष्ट्रवाद न होता तो प्रतिस्पर्धा, प्रगति और परिवर्तन भी न होता। इसका आदर्श रूप अब भी आवश्यक है, किन्तु अंधी राष्ट्रवादिता त्याज्य है।

19. विज्ञानवाद–

आज का युग विज्ञान का युग है। चारों ओर विज्ञान का ही बोलबाला है। अतः कहा जा सकता है कि वर्तमान पर विज्ञानवाद प्रभावी है। हेगेल का विज्ञानवाद यह मानता है कि अज्ञेय विषय भी एक कल्पना मात्र है। आरम्भ में जब चिन्तन में विज्ञान को अपनाया गया उस समय एक अद्भुत कार्य होने के कारण वस्तुतः वही समय विज्ञानवाद से समाहित किया गया जबकि वर्तमान समय तो पूर्णतः वैज्ञानिक हो चला है। इसलिए अब इसे विज्ञानवाद कहना उतना अर्थ नहीं रखता। इतिहास विज्ञान है न उससे अधिक और न उससे कम, यहीं से विज्ञानवाद का प्रादुर्भाव मानना चाहिए।

20. समाजवाद-

समाजवाद सामान्य अर्थों में व्यक्तिवाद का प्रतिकूल स्वरूप है। किसी समय पश्चिम में व्यक्तिवाद का सिद्धान्त बहुत प्रबल था, किन्तु उसकी कब्र बन गयी और वहाँ ‘मास डेमोक्रेसी’ का शब्द सुनायी देने लगा, किन्तु व्यक्तिवादी विचारधारा का सर्वथा लोप नहीं हो सका। इसीलिए कुछ इतिहासकारों ने व्यक्तिवाद को तथा कुछ ने समाजवाद को इतिहास में प्रतिष्ठित करने का यथासम्भव प्रयास किया है। मार्क्स ने समाजवाद को ही विशेष रूप से लिया है, क्योंकि वह व्यक्तिवाद का प्रबल विरोधी था। ट्वायनवी भी अनुभव करते थे कि सामूहिकता अथवा समाजवाद एक प्रकार से व्यक्तिवाद पर प्रभावी हो रही है। आचार्य नरेन्द्रदेव तथा डॉ० लोहिया भी समाजवाद के विशेष चिन्तक इतिहासकार थे।

21. साम्यवाद-

व्यक्तिवाद और पूँजीवाद के विपरीत समाजवाद और साम्यवाद का चिन्तन बहुजनहिताय, बहुजनसुखाय की भावना से किया गया है। साम्यवाद और समाजवाद में बहुत थोड़ा-सा अन्तर है। दोनों ही सामाजिक समानता और न्याय की बात करते हैं, परन्तु समाजवाद में इसके लिए सरल नियम बने होते हैं जबकि साम्यवाद में कठोर नियम बने होते हैं। रूस, चीन जैसे साम्यवादी देशों के साथ भारत जैसे समाजवादी देश को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।

इतिहास में साम्यवाद एक ऐसी विचारधारा है जिसके माध्यम से मानवीय कार्यों का विश्लेषण सम्भव है। विश्लेषणवादी इतिहास-दर्शनकारों ने साम्यवाद के ही माध्यम से इतिहास की कतिपय मूलभूत समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। ऐतिहासिक साम्यवाद के तीन तत्व हैं—आकस्मिकता, आवश्यकता और तक। साम्यवाद को इतिहास की व्याख्या का एक आधुनिकतम प्रयास भी कहते हैं। इसके प्रथम तत्व के अनुसार कुछ ऐतिहासिक घटनाएँ आकस्मिक रूप से इस प्रकार घटित हो जाती हैं जो इतिहास की गति को अकस्मात् (अचानक) ही मोड़ प्रदान कर दिया करती हैं, जैसे—राणा सांगा का अचानक घायल हो जाना, हेमू को तीर लगना आदि। दूसरे तत्व ‘आवश्यकता’ ने भी इतिहास की गति को समय-समय पर अनेक नवीन मोड़ दिये थे। तीसरे तत्व ‘तर्क’ में विषय में ऐसा समझना चाहिए कि जब एक युग की घटना और विचार को दूसरे युग में प्रवेश करने का अवसर मिलता है तो स्वाभाविक रूप से उनके बारे में तर्क उपस्थित होते है। इन्हीं तत्वों के सहारे इतिहास में साम्यवाद की प्रक्रिया गतिमान है। मार्क्स के अनुसार वाद्-प्रतिवाद के द्वन्द्व का परिणाम ही साम्यवाद है। साम्यवाद से ही नवीन इतिहास का प्रारम्भ तथा प्राचीन प्रथा का अन्य होता है। मानव का वास्तविक इतिहास साम्यवाद के आगमन से प्रारम्भ माना गया है।

22. साम्राज्यवाद एवं सैनिकवाद-

राज्य विस्तार हेतु सेना का प्रयोग भी किसी समय में असंवैधानिक नहीं माना जाता था। सेना द्वारा विनाश-लीला अथवा सैनिकवाद के बलबूते पर राज्य करना अपराध नहीं था। आज ऐसी स्थिति नहीं है, किन्तु इतिहास साक्षी है कि किसी समय में यह स्थिति साधारणतः पायी जाती थी। सच पूछे तो प्राचीन एवं मध्यकाल तक सैनिकवाद और साम्राज्यवाद का प्रभाव विद्यमान था।

इतिहास – महत्वपूर्ण लिंक

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Pankaja Singh

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