इतिहास

इतिहास की प्रकृति | इतिहास एक विज्ञान है | इतिहास एक कला है | इतिहास एक दर्शन है | इतिहास का स्वरूप | इतिहास एक विज्ञान है अथवा कला

इतिहास की प्रकृति | इतिहास एक विज्ञान है | इतिहास एक कला है | इतिहास एक दर्शन है | इतिहास का स्वरूप | इतिहास एक विज्ञान है अथवा कला

इतिहास की प्रकृति  

इतिहास का स्वरूप –

किसी भी वस्तु को देखने, समझने और उसके स्वरूप को स्पष्ट करने में सबकी अपनी-अपनी दृष्टि और समझ का पृथक्-पृथक् महत्त्व होता है। जो जिसे जिस रूप में देखता व समझता है, उसी रूप में अभिव्यक्त करता है। इतिहास के स्वरूप के बारे में भी कुछ इसी प्रकार की बात देखने में आती है। प्राच्य और पाश्चात्य, दोनों ही इतिहासकारों ने इतिहास की प्रकृति को ठीक उसी प्रकार से भिन्न-भिन्न रूपों में अभिव्यक्त किया है जिस प्रकार से उन्होंने उसके अर्थ एवं परिभाषा को पृथक्-पृथक् पद्धति से प्रस्तुत किया है।

हेगेल ने इतिहास के स्वरूप को सामयिकतायुक्त तर्क मानते हुए बतलाया है कि तार्किक प्रक्रिया के द्वन्द्वात्मक और विरोधात्मक होने के कारण अर्थात् वाद, प्रतिवाद और समवाद के क्रम पर आश्रित होने के फलस्वरूप इतिहास की प्रक्रिया इसी प्रकार द्वन्द्वात्मक और विरोधात्मक होती. है, जिसे डाइलेक्टिक कहते हैं। हेगल ने इतिहास के स्वरूप को एक बुद्धिसंगत प्रक्रिया के रूप में, किन्तु प्रकृति से भिन्न स्वरूप में स्वीकार किया है और कहा है कि इतिहास का स्वरूप ऐसा होना चाहिए जिसमें प्रक्रिया रेखावत् चलती हो एवं आवृत्तियों में नवीनता भी पायी जाती हो।

हेगेल के कथन की समीक्षा करने पर उसमें इतिहास के स्वरूप-विश्लेषणान्तर्गत यह कमी पायी जाती है कि उन्होंने बुद्धि और भावना, दोनों को एक-सी मानते हुए यह कहने की भूल की है कि सभी कर्म बुद्धि पर आश्रित होते हैं, तथापि यह विशेष प्रशंसनीय भी है कि इतिहास की  प्रकृति को उसने ठीक कान्ट और हेरदर की भाँति “विश्व इतिहास” में फलीभूत होते देखकर इतिहास के स्वरूप को व्यापक बनाने का भरसक प्रयास किया है।

हेगेल के सर्वश्रेष्ठ अनुयायी कार्ल मार्क्स के विषय में ऐसा कहा जाता है कि इतिहास के स्वरूप-विश्लेषण में वह हेगल का एक अर्थ में अनुयायी था दो दूसरे अर्थ में विरोधी भी था। अनुयायी इसलिए कि उसने अपने इतिहास-दर्शन में हेगेल की द्वन्द्वात्मक पद्धति को स्वीकार किया था और विरोधी इस अर्थ में कि उसने विज्ञानवाद को भौतिकवाद से विशिष्टता स्थापित किया था। इस तरह वह दार्शनिक व्याख्याओं के स्थान पर ऐतिहासिक व्याख्या करना चाहता था। इसी आधार पर जहाँ हेगल को इतिहास-दर्शन का प्रवर्तक कहा जाता है, वहीं मार्क्स को ऐतिहासिक समाज-विज्ञान अथवा समाज-वैज्ञानिक-इतिहास-विश्लेषण का प्रवर्तक कहा जाता है।

कार्ल मार्क्स कहते हैं कि इतिहास का स्वरूप ऐसा होना चाहिए जो सतत् विकसित व परिवर्तित होता रहे। उनके इतिहास का स्वरूप आधुनिक समस्याग्रस्त किन्तु प्रयत्नशील कर्मठ श्रमिकों से सम्बद्ध है। दूसरी तरफ स्पेंगलर के इतिहास का स्वरूप प्रकृति-विषयक और इतिहास- विषयक, दोनों है। वह इसका निर्धारण सभ्यता और संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में करते हैं। ट्वायनवी भी चुनौती और प्रतिक्रिया के आधार पर सभ्यता और संस्कृति को ही इतिहास के स्वरूप से संबद्ध करते हैं। कालिंगवुड कहते हैं—इतिहास का स्वरूप ऐसा होना चाहिए कि उसमें सुनिश्चित लक्ष्य एवं दिशा वाले बौद्धिक चिन्तन द्वारा प्रस्तुत विचारों को समाहित किया गया हो, किन्तु प्रत्येक विचार को नहीं। “वह केवल विज्ञान अथवा कला नहीं, अपितु दोनों है। उनके इतिहास के वैज्ञानिक स्वरूप की सबसे बड़ी विशेषता वर्तमान के परिवेश में अतीत की व्याख्या है, अतः वे इतिहास को कैंची और गोंद का स्वरूप प्रदान करके उसे विज्ञान की श्रेणी में रखे जाने को नहीं मानते और उसे विज्ञान माने जाने को एक “भ्रम’ की संज्ञा देते हैं।”

प्रो० कार ने इतिहास की प्रकृति को अतीत की घटनाओं एवं कारण और परिणाम के पारस्परिक सम्बन्धों को क्रम से प्रस्तुत किये जाने से सम्बद्ध किया है।

डॉ० काशीप्रसाद जायसवाल के अनुसार, “इतिहास का स्वरूप उसे यथावत् स्वीकार कर लेने से सम्बद्ध न होकर घटनाओं के कारणों की वैज्ञानिक विधि से खोज से सम्बन्धित होता है।” डॉ० रमेशचन्द्र मजूमदार ने इतिहास के स्वरूप को ‘सत्य के अन्वेषण’ से संबद्ध किया है। डॉ० डी0डी0 कौशाम्बी के अनुसार इतिहास का स्वरूप उत्पादन के संसाधनों एवं सम्बन्धों में उत्तरोत्तर परिवर्तनों के तिथिक्रमानुसार प्रस्तुतिकरण से संबद्ध होता है।

(1) इतिहास एक विज्ञान है-

सर्वप्रथम गिबन, वाल्टेयर, बूल्फ, रान्के आदि ने इतिहास को विज्ञान की श्रेणी में लाने का प्रयास किया था। रान्के ने तो इतना प्रयास किया है कि उसे आधुनिक विज्ञान का प्रवर्तक तक कहा जाने लगा। किन्तु, इतिहास को पूर्णतया विज्ञान की श्रेणी दिला सकने में वह भी असमर्थ रह गया। वह भी इन दो बाधाओं से इतिहास को मुक्त न कर सका—(1) राष्ट्रीयता की भावना और (2) इतिहास के दर्शन पर बल देना। प्रो0 जे0 बी0 व्यूरी के अनुसार उसकी सबसे बड़ी भूले यह थी कि उसने इतिहास को राजनीति में सम्मिलित कर दिया था जिससे उसका अध्ययन-क्षेत्र सीमित हो गया था, जबकि इतिहास का अध्ययन-क्षेत्र विस्तृत है। प्रो0 व्यूरी के अनुसार यही भूल सीले ने भी की। उसने भी इतिहास को राजनीति विज्ञान से सम्मिलित करने का उपक्रम किया है

इतिहास को विज्ञान की श्रेणी में लाने में एक कठिनाई ‘धर्म’ की थी जो कि पूर्णतया, इसके साथ सम्मिलित था। 1859 में प्रो० डार्विन ने ‘ओरिजिन ऑफ स्पेसीज’ द्वारा इससे परे रहकर इतिहास को विज्ञान की श्रेणी में लाने और उसे प्रत्येक भावना या दर्शन से मुक्त रखने में सफलता प्राप्त की थी। उसने इतिहास के अध्ययन को वैज्ञानिक आधार प्रदान किया और उसे अन्य विज्ञानों से सम्बद्ध कर दिया।

जर्मन विद्वानों ने इतिहास को पूर्ण विज्ञान बनाया। उन्होंने इतिहास का अध्ययन तुलना एवं अन्वेषण आदि द्वारा किया और उसे क्रमबद्ध करके वैज्ञानिक अध्ययन की श्रेणी में ला दिया। 19वीं सदी में राष्ट्रीयता की भावना की उत्पत्ति ने विभिन्न रूप-रंग प्रदान किया, परन्तु अन्त में इतिहास इन दोषों से मुक्त हो गया। अब आधुनिक समय में सामाजिक विज्ञानों के अन्तर्गत इसे एक विज्ञान की श्रेणी में स्वीकार कर लिया गया है। विज्ञान की भाँति इतिहास भी अपने अध्ययन में विभिन्न परिस्थिातेयों और घटनाओं के कारण और परिणामों पर विचार करता है। परिस्थितिया का अध्ययन कर वह यह कर सकता है कि अमुक समाज या राज्य अमुक कारण और परिस्थितियों के परिणामस्वरूप अपनी वर्तमान परिस्थिति में आया है और वह यह भी बता सकता है कि भविष्य की सम्भावना क्या है और किस प्रकार उस समाज या राज्य की भलाई के लिए प्रयत्न किया जा सकता है।

इस तरह 19वीं सदी में इतिहास में विज्ञान का अवलोकन करने वाले हीगल के उत्तराधिकारी कार्ल मार्क्स ने अपने को वैज्ञानिक इतिहासकार समझा और जर्मनी के बाहर अपना प्रभाव बनाया। वैज्ञानिक इतिहास के विषय में इंग्लैण्ड, फ्रांस और जर्मनी में पत्रिकाएँ निकलने लगी। इंग्लैण्ड में रांके के पद्धति की भूमिका लार्ड ऐक्टन ने बनायी। ऐक्टन के बाद व्यूरी ने अपने को प्रकाशित किया। रांके के ऐतिहासिक तत्व को डिल्थे ने भी ठीक उसी तरह आगे बढ़ाया जिस तरह 18वीं सदी के प्रारम्भ में विकी ने प्राकृतिक विज्ञान के सातत्य से अध्ययन किया था। डिल्थे के अपूर्ण अध्ययन की मान्यता यह थी कि इतिहास समस्त मानवीय अध्ययनों का सूत्ररूप है और प्राकृतिक तथा मानवीय विज्ञान में अन्तर है। जीवन अर्थपूर्ण है और इतिहास में व्यक्ति प्रमुख मूल्य है—एक मूलभूत इकाई है।

डिल्थे के बाद इटली के बेनेदित्तो क्रोचे एवं इंग्लैण्ड के आर0 जी0 कालिंगवुड ने यह कहा कि ऐतिहासिक ज्ञान मानव सम्बन्धी ज्ञान का स्रोत है, क्योंकि इसके लिए यथार्थ ज्ञान आवश्यक है। स्पेंगलर, ट्वायनवी, रिचर्ड होमस्टारउट्र, बोल्तेयर, जैकब बर्कहार्ट, हेनरी पिरेन आदि ने भी इस विषय में अपने-अपने विचार प्रकट किये। सभी विद्वानों के विचार अपने-अपने थे। इनमें से कुछ ने इतिहास को विज्ञान माना तो कुछ ने नहीं माना जिसे गोविन्दचन्द्र पाण्डेय ने विस्तार से समझाया है। हम स्वयं भी पाते हैं कि एक तरफ इतिहास एक विज्ञान है; क्योंकि इसमें गणित एवं रसायन की भाँति कारणों और परिणामों का सम्बन्ध स्थापित करते हुए कुछ निश्चित नियम निकाले जा सकते हैं, जैसे—अमुक परिस्थिति में क्रान्ति की सम्भावना होती है के स्थान पर यह भी कहा जा सकता है कि राष्ट्रीयता एक शक्तिशाली भावना है, तो दूसरी तरफ कतिपय विशेष परिस्थितियों के अनुसार अथवा यों कहें कि कुछ शर्तों के अन्तर्गत वह विज्ञान है। अन्यत्र इसे विज्ञान नहीं भी मानने का प्रयास किया गया

किसी भी वैज्ञानिक पद्धति में अवलोकन, सत्यापन तथा वर्गीकरण, सामान्यीकरण, भविष्यवाणी एवं वैज्ञानिक प्रवृत्ति (तटस्थता, धैर्य, परिश्रम, जिज्ञासा की प्रवृत्ति, रचनात्मक विचार-शक्ति) की विशेषताएँ मिलती हैं। इतिहास में परिकल्पना का निर्माण, आँकड़ों का संकलन, सामग्री का वर्गीकरण, सत्यापन और सामान्य नियम सम्भव है, इसलिए वह एक विज्ञान है।

इतिहास एक सुव्यवस्थित तथा क्रमबद्ध ज्ञान है। प्रो० बाल्श ने इतिहास और विज्ञान, दोनों के चिन्तन को एक सा माना है। ए० एल० राउज ने इसे स्वीकार किया है कि विज्ञान की भाँति इतिहास में वस्तुनिष्ठ यथार्थता का अन्वेषण क्रमबद्ध विधियों एवं नियमों के माध्यम से किया जाता है। डिल्थे और सर जॉन मायर्स ने भी विज्ञान में प्रस्तुति तथा इतिहास में मनुष्य के अध्ययन को महत्त्वपूर्ण माना है। शिलर वैज्ञानिक विधियों के प्रयोग को आवश्यक मानते हैं।

इतिहास विज्ञान की भाँति शिक्षाप्रद भी है। प्रो० बेकन. चार्ल्स फर्थ, वाल्टर रैले, ग्रोट, डेवी, वाल्श आदि की इतिहास-विषयक परिभाषाओं का अवलोकन करने पर यह बात स्पष्ट हो जाती है कि वर्तमान के सन्दर्भ में इतिहासकार जब अतीत का अध्ययन करता है तो वह उद्देश्यपूर्ण अवश्य होता है।

वैज्ञानिक भविष्यवक्ताओं की भाँति इतिहासकार भी भावी घटनाओं के सम्बन्ध में भविष्यवाणी कर सकने में समर्थ होता है। प्रो० वाल्श, कार्ल आर0 पापर, ई० एच० कार आदि ने इस कथन को स्वीकार किया है कि यदि एक वैज्ञानिक भविष्यवाणी करता है तो एक इतिहासकार परिस्थितियों के सन्दर्भ में भविष्य के लिए मार्गदर्शन करता है। प्रो० कार के अनुसार, “इतिहासकार की भविष्यवाणी तथा भावी मार्गदर्शन का आधार सामान्यीकरण का सिद्धान्त है।”

जिस वस्तुनिष्ठता के आधार पर वैज्ञानिक निष्कर्ष को सार्वभौम मान्यता प्रदान की जाती है, वह तो नहीं; किन्तु विषयनिष्ठता के गुण इतिहास में पाये जाते हैं ऐसा मानने वाले इतिहास को विज्ञान नहीं मानते। किन्तु आगस्ट काम्टे इसे अलग बतलाते हुए कहते हैं कि जब इतिहासकार व्यक्तिगत भाव का परित्याग कर सिद्धान्त का आश्रय लेता है तो इतिहास का विषयनिष्ठ स्वरूप वस्तुनिष्ठता में परिवर्तित हो जाता है। और तब ऐतिहासिक अनुसन्धान वैज्ञानिक अन्वेषण की भाँति वस्तुनिष्ठ एवं सार्वभौम हो जाता है जिसके आधार पर इतिहास को एक विज्ञान कहा जा सकता है।

विज्ञान की भाँति इतिहास में भी धर्म और नैतिक शिक्षा को मुख्य स्थान नहीं दिया गया। धर्म और नैतिकता को आदर्श बनाकर कोई इतिहास नहीं लिखा जा सकता, अतएव इस आधार पर किसी इतिहास को अवैज्ञानिक कहना मूर्खतापूर्ण होगा। हाँ, यह अवश्य है कि इतिहास विशुद्ध अथवा पूर्ण विज्ञान नहीं अपितु एक सामाजिक विज्ञान है।

इतिहास को विज्ञान न मानने वाले कहते हैं कि इतिहास के निर्णय निश्चित नहीं होते, जबकि विज्ञान के निश्चित होते हैं, अतएव इतिहास कभी भी विज्ञान नहीं हो सकता। वास्तव में, इतिहास यद्यपि एक सामाजिक विज्ञान है इसलिए भौतिक-रसायनशास्त्र की भाँति उसके निर्णय निश्चित तो नहीं ही हो सकते, क्योंकि भौतिक रसायन पर स्थान परिस्थितियों का प्रभाव नहीं पड़ता, जबकि इतिहास पर पड़ता है। दूसरी बात यह कि सजीव मानव इतिहास का अध्ययन विषय है, जबकि विज्ञान का निर्जीव वस्तु। बर्कहार्ट ने भी मावर्स के वैज्ञानिक विचारों का विरोध किया है। उनका कहना है कि यद्यपि इतिहास मूल्यवान् है, लेकिन विज्ञानों में वह सबसे अधिक अवैज्ञानिक है, निश्चित विचार तर्क से सम्बद्ध है, इतिहास से नहीं, जहाँ प्रत्येक वस्तु अस्थिर और परिवर्तनशील स्थिति में होती है। एक युग को समझने के लिए उस युग की विशेष  समस्याओं और परिस्थितियों का ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि विभिन्न परिस्थितियों के विभिन्न कारण और विभिन्न परिणाम होते हैं। इसीलिए प्रो० जोoबी0 व्यूरी का कथन ही अधिक उचित जान पड़ता है कि इतिहास विज्ञान है, न कम और न अधिक।

(2) इतिहास एक कला है

जो विद्वान इतिहास को एक विज्ञान नहीं मानते वे भी उसे एक कला मानते हैं। कुछ विद्वान् विज्ञान के साथ-साथ इसे कला मानते हैं। कला उस ज्ञान को कहते हैं जो ज्ञान का व्यावहारिक प्रयोग करके तथा अच्छाई और बुराई कर निर्णय करके, व्यक्ति या समाज को अच्छाई की ओर ले जाने का प्रयत्न करता है। इतिहास में ऐसा होता है, अतएव वह कला भी है। इतिहासकार एक कलाकार होता है, वह भूतकाल की परिस्थितियों का अध्ययन करके भविष्य के मार्ग का निर्माण करता है। दूसरे शब्दों में, वह सत्यता और घटनाओं की प्रामाणिकता के आधार पर भविष्य के निर्माण का आधार बनाता है। गिबन, मेकाले, कार्लाइल प्रभृति इतिहासकार ऐसा ही करते थे। हेनरी पिरेन ने इतिहास को प्राचीन काव्य से सम्बद्ध करके उसे कला कहा है। कला के समर्थकों ने ही इतिहास को साहित्य की शाखा माना है। क्रोचे ने भी तथ्यों का प्रस्तुतिकरण इतिहासकार का पवित्र कर्त्तव्य माना है। इतिहासकार और कलाकार में यही सामंजस्य है कि इतिहासकार एक कलाकार के रूप में अनुभव करता है। कला और इतिहास में थोड़ा सा अन्तर केवल यही है कि कला में सम्भावनाओं का वर्णन होता है, जबकि इतिहास में यथार्थता का प्रस्तुतिकरण होता है। परन्तु दोनों ही अपने मस्तिष्क से काम लेते हैं, जिसका उत्तरदायित्व उनका अपना होता है और उनकी प्रस्तुति उनकी मानसिक प्रक्रिया का परिणाम होता है। इतिहास इसलिए भी कला है कि उसमें यथार्थता के साथ विवरण सम्बन्धी कुशलता, रोचकता, दृष्टान्तों का चयन तथा चरित्र-चित्रण की विशेषताओं पर विशेष ध्यान दिया जाता है। यदि उसमें कला जैसी रोचकता न होती तो उसका अध्ययन नीरस बन जाता। अतएवं वह निश्चित रूप से कला है। उदाहरणार्थ हड़प्पा, मोहनजोदड़ो जैसे प्रसंग यदि कलात्मक विधि से प्रस्तुत न किये जाँय तो वे नीरस इतिहास बनरकर रह जायेंगे। मैकाले तथा कार्लाइल के इतिहास के वर्णनात्मक रोचक शैली ने उनको शिखर पर पहुंचा दिया है, जबकि गिबन में इसका अभाव होने से वह असफल से रह गये हैं। बीती घटनाओं को अपनी कला के बल पर ही इतिहासकार सजीव बनाता है और मैकाले के अनुसार वह रोचक इतिहास विदेश-भ्रमण के समान सुखद लगता है। किन्तु, इतना ध्यान अवश्य रखना चाहिए कि इतिहासकार और कवि की कल्पनाओं में अन्तर होती है, वह यह कि इतिहासकार साक्ष्यों आधार पर ऐतिहासिक तथ्यों को काव्यात्मक शैली में प्रस्तुत करता है, जबकि उसकी रचना यथार्थप्रधान होती है- कल्पनाप्रधान नहीं। कवि के लिए यथार्थ से अधिक कल्पना का महत्त्व होता है। इसीलिए जयशंकर प्रसाद का चन्द्रगुप्त, एक इतिहासकार के चन्द्रगुप्त से भिन्न होगा। दूसरी बात यह कि इतिहासकार स्थान तथा समय की परिधि में बँधा होता है, कवि के लिए यह आवश्यक नहीं है। इतिहास-लेखन तथ्यों के संकलन तथा विश्लेषण के बाद आरम्भ होता है, कविता में ऐसा आवश्यक नहीं है। इतिहासकार उचित तथ्यों का ही संकलन करता है, कवि दोनों का कर सकता है। कवि के लिए सामान्यीकरण सिद्धान्त के अन्तर्गत तथ्य-चयन आवश्यक नहीं है। प्रो० कार ने भी एक इतिहासकार में कलाकार की भाँति चयनता के गुण होना आवश्यक माना है। इतिहासकार की अन्तश्चेतना एक अच्छी शैली की परिचायक है। उसकी अन्तर्रात्मा मानवीय आत्मा के लिए जीवन-ज्योति है, केवल कला के माध्यम से ही उसकी अभिव्यक्ति सम्भव है। इतिहासकार एक माली की तरह अथवा एक उपन्यासकार की भाँति होता है जिसके द्वारा प्रतिपाद्यविषय सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किये जाते हैं। सामाजिक आवश्यकता के परिवेश में ए० एल० राउज का स्पष्ट मत है कि इतिहास सदैव कला रहेगा।

कुछ विद्वान् इसे कला नहीं मानते। प्रो0 जे0 बी0 व्यूरी, ऐसा ही मानते हुए, कहते हैं कि जब तक इसे कला माना जायगा तब तक इसमें सत्य एवं यथार्थ को प्रतिष्ठित करना होगा। ब्यूरी ने इतिहास को साहित्य की शाखा मानने से अस्वीकार कर दिया है। इनका समर्थन एच० डब्ल्यू० टेम्परले, जी० एन० क्लार्क ने भी किया है। ये भी वैज्ञानिक अवधारणा से प्रभावित थे, इसीलिए ऐसा कहते हैं। क्रोचे भी यही कहते हैं कि इतिहास यथार्थ कहानी की तरह प्रस्तुत किया जाना चाहिए, उसमें कला की आवश्यकता नहीं है। परन्तु इतिहास को, सर्वथा कला न मानना भी ठीक नहीं।

अतः निष्कर्ष स्वरूप हम कह सकते हैं कि इतिहास न तो केल विज्ञान है और न ही केवल कला है, अपितु वह विज्ञान भी है और कला भी। विज्ञान में वह एक सामाजिक विज्ञान और कला में कल्पना प्रधान न होकर यथार्थ प्रधान है। जहाँ हम इतिहास और विज्ञान में एकरूपता पाते हैं वहाँ इतिहास को विज्ञान कहा जा सकता है, जबकि दोनों में अन्तर मिलने की दशा में इतिहास को विज्ञान नहीं माना जाता है। उसी तरह जहाँ उसमें (इतिहास में) कला की विशेषताएँ मिलती हैं वहाँ वह कला होता है और जहाँ नहीं मिलतीं वहाँ उसे कला से पृथक् रखते हैं। अतएव यह कहना अनुचित न होगा कि इतिहास एक विज्ञान है, न उससे कम न अधिक, और कला भी है, न उससे कम और न उससे अधिक।

(3) इतिहास एक दर्शन है

प्रश्न उठता है कि इतिहास एक विज्ञान और कला होने के साथ-साथ क्या एक दर्शन भी है? पूर्वाग्रहरहित होकर विचार करने पर हमें वास्तव में इतिहास एक दर्शन के रूप में प्राप्त होता है। इसके पक्ष में आज अनेक विद्वानों ने अपने विचार व्यक्त किये हैं, किन्तु कुछ ने अपने तर्कों द्वारा यह भी सिद्ध करने का यथासम्भव प्रयास किया है कि इतिहास और दर्शन दोनों पृथक्-पृथक् दो विषय हैं तथा किसी भी दशा में इतिहास एक दर्शन नहीं है। इसका उत्तर स्वतः ढूँढ़ पाने के लिए हमें दोनों तरह के कथनों पर दृष्टिपात करना होगा।

हम मानते हैं कि इतिहास नेयार्थ है। ‘नेयार्थ’ कहते हैं ऐसी अभ्यर्थना को जो मूलवता के कारण नेय, अथवा धारणीय होती है। अभ्यर्थना से हमारा तात्पर्य अन्वेष्यार्थ से है। अन्वेष्य स्वभावतः मूल्यवान् होता है, परिणामतः नेय भी है। नेयता अतीत और वर्तमान का भविष्य के लिए धारण करना है और अन्वेष्यता भविष्य का वर्तमान में धारण है। ये दोनों परस्पर सापेक्ष हैं और यह सापेक्षता काल के ऐतिहासिक होने के लिए अनिवार्य है। अतीत भविष्य के लिए और भविष्य को अतीत में धारण किये बिना काल केवल प्रतिबिम्बित वर्तमान होता है। प्रतिबिम्बित वर्तमान के अर्थ में कालिकता का जीव-धर्म है, जो उसे अजीव से पृथक् करता है। किन्तु अर्थानुपुष्टिकालिकता मनुष्य की विशेषता है। यही इतिहास का दर्शन है।

हमारा विचार अथवा चिन्तन एक तरफ इतिहास से सम्बद्ध है तो दूसरी ओर दर्शन से। सच पूछिये तो विचार ही दर्शन की प्रक्रिया को प्रारम्भ करता है और विचार से इतिहास का निर्माण भी होता है। आज का युग विचार का युग है। विचार मस्तिष्क में उद्भूत होता है और वाणी से अभिव्यक्त होता है। विचार मानवव्यापी होता है, जबकि ज्ञान वस्तुतन्त्र होता है। इतिहासकार वस्तुतन्त्रीय ज्ञान को अभिव्यक्ति देता है, परन्तु जब विचारों में आग्रह आ जाता है तो वह बाद में परिणत हो जाता है। जिस तरह विचार अथवा चिन्तन दर्शन के लिए आवश्यक है उसी तरह से इतिहास के लिए भी। इसी आधार पर विचारक यह मानते हैं कि इतिहास एक दर्शन है।

इतिहास के क्षेत्र में वाल्टेयर वीको तथा हर्डर ने अपनी पुस्तक ‘आइडिया फार फिलासाफी ऑफ हिस्ट्री मैनकाइण्ड’ द्वारा इतिहास दर्शन को प्रस्तुत किया है। हीगल ने अपनी रचना ‘रेक्टर्स ऑन फिलासाफी ऑफ हिस्ट्री’ के माध्यम इतिहास को एक गूढ़ विषय के रूप में समाज के सम्मुख प्रस्तुत किया है। वाल्टेयर ने इतिहास-दर्शन का अभिप्राय वैज्ञानिक अथवा विश्लेषणात्मक अध्ययन द्वारा इसे प्रस्तुत करना स्वीकार किया है। उनके अनुसार इतिहास-दर्शन और इतिहासकार के मस्तिष्क का पारस्परिक सामञ्जस्य है। इतिहास-दर्शन घटनाओं में एक घटनामात्र को देखता है, जबकि इतिहास-दर्शन के प्रमाणित अर्थ और वास्तविकता को निश्चित करने का गर्व करता है। परिणामस्वरूप इतिहास-दर्शन’का अभिप्राय अतीतकालिक घटनाओं में निहित मानसिक प्रक्रिया अथवा विचार को वर्तमान और भविष्य में प्रतिरोपित करना मात्र होता है।

वस्तुतः इतिहास-दर्शन इतिहास-चिन्तन की एक विधि है।

स्पेंसर के कथन के आधार पर हम दर्शन को इतिहास से सम्पृक्त करने का प्रयास करते देखे जाते हैं। विज्ञान अन्ततः एकीकृत ज्ञान है, जबकि दर्शन पूर्णतया एकीकृत ज्ञान है। इतिहास की भी वही स्थिति है कि वह पूर्णतः विज्ञान नहीं है और जिस प्रकार दर्शन में गणित नहीं उसी तरह इतिहास में भी गणित के नियम नहीं है। इस तरह दोनों ही समान रूप से एक विज्ञान हैं, किन्तु विशुद्ध विज्ञान नहीं। अतः यह कहा जा सकता है कि इतिहास की प्रकृति दार्शनिक है।

इतिहास – महत्वपूर्ण लिंक

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Pankaja Singh

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