शिक्षाशास्त्र

इतिहास के विभिन्न प्रकार | स्थान के आधार पर इतिहास का वर्गीकरण

इतिहास के विभिन्न प्रकार | स्थान के आधार पर इतिहास का वर्गीकरण | Different Types of History in Hindi | Classification of History by Location in Hindi

इतिहास के विभिन्न प्रकार – प्रस्तावना

इतिहास के विभिन्न प्रकार कौन से हैं ? प्रत्येक व्यक्ति को यह प्रश्न कुछ अटपटा-सा लगता है, क्योंकि इतिहास तो एक प्रकार का हो सकता है। यह मानवता के क्रमिक विकास के अतिरिक्त और कुछ नहीं हो सकता। इस प्रकार इतिहास हमारे सामने ‘मानवीय इतिहास’ के रूप में आता है। हमारी रुचि भी मानव में है और हम यह जानना चाहते हैं कि मानव पृथ्वी पर कब आया। उसने किस प्रकार सामाजिक जीवन का विकास किया ? उसने हमारे लिए इतिहास किस प्रकार तैयार किया ? इस रूप में इतिहास हमारे समक्ष एक सम्पूर्ण ऐक्य के रूप में जाता है; परन्तु इस सम्पूर्ण ऐक्य का ज्ञान मानव निश्चित अवधि में प्राप्त नहीं कर सकता। इस कारण उस सम्पूर्ण ऐक्य से परिचित होने के लिए विद्वानों ने उसको विभिन्न खण्डों में विभाजित कर दिया। ये खण्ड सामाजिक इतिहास, राजनैतिक इतिहास, आर्थिक इतिहास, स्थानीय इतिहास, प्रान्तीय इतिहास, राष्ट्रीय इतिहास, विश्व इतिहास, गुप्तकालीन इतिहास, मुगलकालीन इतिहास आदि है; परन्तु ये सब भेद पठन-पाठन की सुविधा, देश-काल एवं परिस्थिति के आधार पर किये गये। मानव का विकास विभिन्न युगों में निवास स्थान के अनुसार हुआ। इसी निवास स्थान के आधार पर स्थानीय, प्रान्तीय राष्ट्रीय आदि प्रकार से इतिहास का वर्गीकरण किया गया। नीचे संक्षेप में इनका विवेचन किया जा रहा है

(1) राजनैतिक इतिहास –

अरस्तू ने इतिहास को मानव की कहानी माना था; परन्तु उसने इस कहानी का मुख्य आधार मानव के राजनैतिक कार्यों को माना; परन्तु फ्रीमैन (Freeman) महोदय इतिहास को राजनंतिक घटनाओं का संग्रह मानते हैं। वह इतिहास को अतीत की राजनीति मानते हैं। उसने कहा कि इतिहास को समाज के राजनैतिक जीवन के विकास का वर्णन करना चाहिए । राजनीतिक घटनाओं के द्वारा इतिहास का निर्माण किया जाता है। इनके द्वारा सामाजिक तथा आर्थिक जीवन का भी निर्णय होता है। ये चटनाएँ काल-क्रम पैदा करने में भी सहायक हैं; परन्तु इतिहास को हम पूर्ण रूप से राजनीतिक घटनाओं का लेखा नहीं मान सकते । यदि ऐसा करते हैं तो भूल करेंगे; क्योंकि एक तो राजनैतिक इतिहास वैज्ञानिक इतिहास का लेखा देने में असमर्थ रहता है। ऐसा उसके द्वारा इस कारण नहीं हो पाता कि राजनैतिक इतिहास में केवल शासकों एवं उनके कार्यों का ही विवरण दिया जाता है। राजनैतिक इतिहास सामान्य व्यक्ति के कार्यों से सम्बन्ध नहीं रखता। यह सत्य है कि कभी-कभी राजनैतिक घटनाओं से सामाजिक तथा आर्थिक जीवन का निर्धारण होता है, परन्तु यह तथ्य सभी परिस्थितियों में सत्य नहीं हो पाता । फांस की क्रांति की मुख्य कारण सामाजिक तथा आर्थिक परिस्थितियाँ थीं। इनके अतिरिक्त कभी-कभी बहुत-सी घटनाएँ भौगोलिक परिस्थितियों के द्वारा भी निर्धारित की जाती हैं। यदि इतिहान मानव के विकास की कहानी है तो उसको अपनी सार्थकता को सिद्ध करने के लिए उसके सभी पक्षों के विकास का वर्णन करना पड़ेगा। यदि वह ऐसा नहीं करेगा तो वह अपने को इतिहास की संज्ञा नहीं दे सकता । राजनैतिक इतिहास के द्वारा समाज के केवल राजनीतिक अंग का ही वर्णन किया जाता है और उसमें समाज के अन्य अंगों का वर्णन नहीं होता।

(2) आर्थिक इतिहास –

मार्क्सवादियों के अनुसार आर्थिक आवश्यकता समाज के समस्त आचरण की जड़ है। आर्थिक परिस्थितियाँ युद्ध एवं सान्ध का निर्णय करती हैं। इन परिस्थितियों के कारण अनेक राजनैतिक समस्याएँ उठ खड़ी होती हैं। यहाँ तक कि राज्य, समाज, संस्कृति आदि का उत्थान एवं पतन बहुत कुछ सीमा तक इन्हीं आर्थिक परिस्थितियों पर आधारित है। इस कारण वे लोग इतिहास में आर्थिक प्रश्नों को प्रधानता देने के लिए कहते हैं। यह सत्य है कि इतिहास में आर्थिक कारण अत्यन्त महत्वपूर्ण है परन्तु इसको ही समस्त विकास का आधार मान लेना उपयुक्त नहीं है। मानव केवल रोटी के लिए जीवित नहीं रहता वरन् उसमें पर-सेवा की  भी भावना होती है जिसकी सन्तुष्टि करना आवश्यक है। इतिहास हमे मानव में त्याग के कार्यों के भी बहुत-से उदाहरण प्रस्तुत करता है जिससे मनुष्य स्वार्थ त्याग करने की भावना अपने में उत्पन्न करने में समर्थ होता है। बहुत से ऐसे मो परिवर्तन हैं जो कि आर्थिक कारणों के अभाव में हुए हैं। इस प्रकार आर्थिक इतिहास, इतिहास का पूर्ण चित्र प्रस्तुत करने में असमर्थ रहता है। अतः आर्थिक कारणों को ही इतिहास का मूलाधार नहीं मान सकते ।

(3) धार्मिक इतिहास-

कुछ विद्वान् धार्मिक इतिहास के अध्ययन पर बल देते हैं। वे धर्म को मानव समाज में परिवर्तन का प्रमुख कारण मानते हैं। धार्मिक कारणों के कारण मानव समाज में विभिन्न क्षेत्रों में उथल-पुथल होती है। धर्म को ही मूल रूप में राजनैतिक इतिहास का निर्माता मानते हैं। परन्तु धर्म की संकीर्णता ने धार्मिक इतिहास के महत्त्व को कम कर दिया। परन्तु हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि यदि धर्म को मानव-धर्म के रूप में ग्रहण किया जाय तो मानवता की उन्नति एवं प्रगति के लिए बहुत कुछ किया जा सकता है ।

(4) सामाजिक इतिहास –

सामाजिक इतिहास का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है। सामाजिक जीवन के अन्तर्गत कृषि, उद्योग, शिक्षा, पारिवारिक जीवन, साहित्य, धर्म रीति-रिवाज, रहन-सहन भाषा आदि सब कुछ बा जाता है। एक प्रकार से आर्थिक तथा राजनैतिक परिवर्तन भी सामाजिक जीवन के अंग हैं, परन्तु इसका यह व्यापक क्षेत्र इतिहासकारों तथा शिक्षाशास्त्रियों के समक्ष बहुत-सी समस्याएं उत्पन्न कर देता है कि इसकी सामग्री का अध्ययन हेतु चयन किस प्रकार किया जाय ? किस स्तर पर किन सामाजिक घटनाओं को पढ़ाने के लिए निर्धारित किया जाय ? दूसरे शब्दों में इसमें पाठ्यक्रम निर्धारित करने में कठिनाई उत्पन्न होती है। दूसरे इसके विरुद्ध एक यह भी प्रस्तुत किया जाता है कि सामाजिक इतिहास के द्वारा बालकों में समय- ज्ञान विकसित करना कठिन है। इसी कारण विद्वान् पाठ्यक्रम में सामाजिक इतिहास को स्थान देने के पक्ष में नहीं हैं।

इतिहास का जो उपर्युक्त विभाजन प्रस्तुत किया है, वह परिस्थिति के बाधार पर है, परन्तु इतिहास के इन विभिन्न विभागों में समन्वय होना आवश्यक है; क्योंकि इसके अभाव में इतिहास का शिक्षण ठीक रूप से नहीं किया जा सकता। इनमें समन्वय स्थापित करने के लिए यह उपयुक्त होगा कि इतिहास को राष्ट्र के दृष्टिकोण से विभाजित किया जाय और उसका विभाजन काल-विशेष की दृष्टि से किया जाय; परन्तु यह विभाजन बड़ी सतर्कता के साथ किया जाना चाहिए। जिस काल-विशेष को शिक्षण के लिए चुना जाय, उसके महत्त्वपूर्ण अंगों की विवेचना उसकी महत्ता के अनुसार की जानी चाहिए। इसके साथ-साथ यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उसका कोई अंग अछूता न रह जाय। इस विभाजन में यह भी ध्यान रखा जाय कि उसमें वर्णित घटनाओं का क्रम भी न टूटने पाये; अर्थात् काल-क्रम के अनुसार उन घटनाओं को प्रस्तुत किया जाय।

स्थान के आधार पर इतिहास का वर्गीकरण

शिक्षाशास्त्रियों ने स्थान के आधार पर इतिहास का वर्गीकरण निम्न श्रेणियों में किया है-

(1) विश्व इतिहास,

(2) राष्ट्रीय तथा प्रान्तीय इतिहास, और

(3) स्थानीय इतिहास ।

(1) विश्व इतिहास –

आज विश्व में जो कलह एवं अशान्ति का वातावरण छाया हुआ है, उसको दूर करने के लिए मानव में विस्तृत दृष्टिकोण की आवश्यकता है। मानव में इस दृष्टिकोण का निर्माण करने के लिए बहुत से साधन बताये गये हैं; परन्तु समस्त विद्वान् एक साधन के विषय में एकमत है। यह साधन यह है कि छात्रों को विश्व इतिहास का ज्ञान कराया जाय, परन्तु विद्वान् इस बात पर एकमत नहीं हैं कि बालकों को विश्व इतिहास का अध्यापन किस स्तर पर कराया जाय। कुछ विद्वान् बात के पक्ष में हैं कि निम्न स्तर पर बालकों को विश्व इतिहास नहीं पढ़ाया जाय परन्तु दूसरा दल इस बात का प्रतिपादन करता है कि बच्चों को इसकी एक झलक कहानियों के रूप में प्रदान की जाय। जिन महानुभावों ने मानवता के लिए अनुपम देन प्रदान की है, उनके विषय में बच्चों को कहानियों के रूप में निम्न स्तर पर ज्ञान प्रदान किया जाय, परन्तु दूसरे दल वालों ने अपने पक्ष में यह तर्क प्रस्तुत किया है कि इस स्तर के बालक विश्व की समस्याओं को समझने में असमर्थ रहेंगे। दूसरे सांस्कतिक विषय इस स्तर के बालकों की रुचि को अपनी ओर आकृष्ट नहीं कर सकते । उत्तर प्रदेश के शिक्षा बोर्ड ने हाई स्कूल कक्षाओं के हेतु विश्व इतिहास को निर्धारित किया है। आज के वैज्ञानिक आविष्कारों ने समस्त राष्ट्रों को एक-दूसरे के समीप ला दिया है। इस सामीप्य ने भी विश्व इतिहास की मांग को और अधिक तीव्र कर दिया है । इसके अतिरिक्त आज यह भी सत्य प्रतीत होता है कि कोई भी आज के युग में अकेला नहीं रह सकता। इस कारण इस अन्योन्याश्रित एवं पारस्परिक सम्बन्धों के लिए विश्व इतिहास का अध्यापन आवश्यक हो गया है।

(2) राष्ट्रीय तथा प्रान्तीय इतिहास –

भारतीय शिक्षालयों में राष्ट्रीय इतिहास की प्रधानता है। राष्ट्रीय इतिहास के शिक्षण में बहुत सी कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं। प्रथम तो एक राष्ट्र दूसरे से पृथक नहीं रह सकता। यदि हम भारतीय इतिहास का अध्यापन कर रहे हैं – यदि हमने इस प्रकार पढ़ना शुरू किया कि भारत में आर्य बाहर से आये तो स्वतः ही प्रश्न उठेंगे कि वे कब और कहाँ से आये ? उनकी सभ्यता कैसी थी? उन्होंने भारत पर किस प्रकार अपना प्रमुख स्थापित किया ? उन्होंने भारत में अपनी सभ्यता का किस प्रकार निर्माण किया ? इन समस्त प्रश्नों के विश्लेषण के लिए हमें दूसरे देशों के इतिहास की सहायता लेनी पड़ेगी। इसके लिए फिशर (Fisher) तथा अत्तमिरा (Altamira ने यह सुझाव दिया कि प्रारम्भिक स्तर से विश्व इतिहास का सामान्य ज्ञान बालकों को दिया जाय। इसके अतिरिक्त छात्रों को गुफाओं के मानव, शिकारी मानव, गड़रिया के रूप में मानव आदि का भी ज्ञान दिया जाय तभी राष्ट्रीय इतिहास का अध्यापन उपयुक्त सिद्ध होगा। राष्ट्रीय इतिहास के शिक्षण में एक दूसरी महत्त्वपूर्ण समस्या यह उत्पन्न होगी कि राष्ट्र के अन्दर बहुत से ऐसे प्रान्त होते हैं जो कि स्वयं अपना एक इतिहास रखते हैं। इस समस्या का समाधान इस प्रकार किया जा सकता है— प्रान्तीय इतिहास का निर्धारण निम्न स्तरों पर कर दिया जाय तथा उन प्रान्तों की राष्ट्रीय इतिहास की जो देन है, वह राष्ट्रीय इतिहास के शिक्षण के साथ प्रस्तुत की जा सकती है ।

(3) स्थानीय इतिहास-

स्थान की दृष्टि से इतिहास का एक अन्य विभाजन स्थानीय इतिहास है। विद्वानों का मत है कि इसको पाठ्यक्रम में स्थान मिलना चाहिए; परन्तु प्रत्येक स्थान अर्थात् कस्बा, नगर या ग्राम का अपना इतिहास होता है। यदि सबके इतिहास को पाठ्यक्रम में स्थान दिया जाना सम्भव नहीं है तो बालक को कम से कम उस स्थान के इतिहास का ज्ञान अवश्य कराया जाय जिसमें वह रहता है, परन्तु इससे इतिहास-शिक्षण के मुख्य उद्देश्य ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ को ठेस न पहुंचने पाये । प्रो० घाटे का विचार है कि- “स्थानीय इतिहास का अर्थ यह नहीं है। कि जिस नगर या जिले में बालक रहता है, उसका इतिहास ही स्थानीय इतिहास है। जिस पड़ोस अथवा जिस स्थान पर मनुष्य रहता है, उस स्थान के वातावरण की भी विशेषता होती है। छात्रों को इन विशेषताओं से परिचित कराया जाय ।” एक अन्य विद्वान का मत है कि उत्तम प्रकार से चयन किया हुआ स्थानीय इतिहास एक पाठ को विस्तार प्रदान करता है तथा अनुभवपूर्ण क्रियाओं हेतु प्रोत्साहित करता है; उदाहरणार्थ – ऐतिहासिक स्थान का भ्रमण । स्थानीय इतिहास के द्वारा छात्रों में स्थानीय परम्पराओं तथा रीति-रिवाजों के प्रति बादर की भावना उत्पन्न की जानी चाहिये; क्योंकि ये परम्पराएँ उनके निवासियों के जीवन का अंग होती हैं।

इतिहास का वर्गीकरण काल के आधार पर भी किया गया है। इसके अनुसार इतिहास को अघोलिखित भागों में विभक्त किया गया है-

  1. अति प्राचीन काल – इसमें पाषाण युग का समावेश किया गया है।
  2. प्राचीन काल- इसमें मानव सभ्यता के विकास की ओर कार्य करता है ।
  3. मध्य काल- सभ्यता का काफी विकास हो जाता है।
  4. वर्तमान काल- सभ्यता का अधिकतम विकास ।
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Pankaja Singh

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