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हिमालय की संरचना | हिमालय की प्रमुख विशेषताएँ | हिमालय प्रदेश के उच्चावच की प्रमुख विशेषताएँ

हिमालय की संरचना | हिमालय की प्रमुख विशेषताएँ | हिमालय प्रदेश के उच्चावच की प्रमुख विशेषताएँ

हिमालय की संरचना

हिमालय की संरचना शिमला, गढ़वाल तथा कुमायूँ खंडों में आल्पस पर्वत जैसी तथा स्पीति प्रदेश में जूड़ा पर्वत जैसी है। आल्प्स प्रकार की संरचना जटिल है जिसमें अनेक क्षेप (thrust) तथा ग्रीवाखंड (nappe) पाये जाते हैं, जबकि जूड़ा प्रकार की संरचना सरल है। हिमालय का एक विशिष्ट लक्षण अनेक दीर्घ वलनों या ‘हेयर पिन’ मोड़ों की उपलस्थिति है जो पश्चिम तथा पूर्वी सिरों पर मौजूद हैं।

पूर्वी हिमालय की अपेक्षा पश्चिमी तथा मध्यवर्ती हिमालय का अध्ययन अधिक विस्तारपूर्वक किया गया है। वाडिया (Wadia) ने कश्मीर प्रदेश, वेस्ट तथा पिलग्रिम (West and Pilgrim) ने शिमला प्रदेश, ऑडेन (Auden) ने गढ़वाल प्रदेश तथा हीम व गैन्सर (Heim and Gansser) ने कुमायूँ प्रदेश का विशेष अध्ययन किया है। पूर्वी हिमालय (विशेषतः भूटान के पूर्व में) का अध्ययन शून्य प्रायः ही हुआ है।

वलनों की तीव्रता तथा निर्माण की आयु के आधार पर हिमालय को चार समांतर संरचनात्मक क्षेत्रों में बाँटा जाता है- (i) तिब्बत क्षेत्र (ट्रांस-हिमालय), (ii) महा हिमालय, (iii) लघु हिमालय तथा (iv) उप हिमालय

(A) तिब्बत क्षेत्र – यह क्षेत्र 40 किमी चौड़ा तथा इसमें सागरीय अवसाद पाये जाते हैं जिनके ऊपर टरी ग्रेनाइट शैलें बिछी हैं। इसमें आंशिक रूप से कायांतरित अवसाद पाये जाते हैं तथा हिमालयी अक्ष (axis) के मूल (core) की रचना करते हैं।

(B) महा हिमालय क्षेत्र- यह क्षेत्र लगभग 25 किमी चौड़ा है। इसकी औसत ऊँचाई 5000 मीटर है। यह क्षेत्र लघु हिमालय के उत्तर में एक दीवार की भाँति सहसा उठा हुआ है। इसी क्षेत्र में विश्व की कुछ सर्वोच्च शिखरें, विस्तृत हिमक्षेत्र तथा हिमनद स्थित हैं। यह प्रधानतः रवेदार आग्नेय या कायांतरित शैलों से निर्मित हैं। यह एक अविच्छिन्न श्रेणी है जिसमें तीव्र कटक तथा चौड़े स्कंध विशेष रूप से मिलते हैं।

(C) लघु हिमालय क्षेत्र- यह क्षेत्र लगभग 80 किमी चौड़ा है, जिसकी औसत ऊँचाई 1300-5000 मीटर है। इसमें जीवाश्मरहित अवसाद या कायांतरित रवेदार शैलें पायी जाती हैं जो कश्मीर, हिमाचल तथा गढ़वाल प्रदेश में प्रमुख प्रीवाखंड क्षेत्र की रचना करती है। यहाँ स्लेट, चूना पत्थर तथा क्वार्ट्जाइट प्रमुख शैलें हैं। इस क्षेत्र के दक्षिणी सिरे पर अत्यधिक संपीडित ऊपरी पैल्योजोइक से इयोसीन युग तक की शैलों वाली स्वस्थानिक मेखला (autochthonous belt) मिलती है जिसमें प्रायः ज्वालामुखी शैले पायी जाती हैं, जिनमें क्षैतिज संचलन नहीं हुआ है।

(D) उप-हिमालय क्षेत्र  यह क्षेत्र 8-45 किमी चौड़ा तथा 1300 मीटर से कम औसत ऊंचाई वाला है। यह एक विच्छिन्न श्रेणी है। यह पश्चिम में चौड़ी तथा पूर्व की ओर संकरी है। शिवालिक श्रेणी इस क्षेत्र की दक्षिणी सीमा बनाती है, जबकि आंतरिक भाग में विवर्तनिक अनुदैर्ध्य घाटियाँ (जिन्हें ‘दून’ या ‘दुआर’ कहा जाता है) स्थित हैं। देहरा, कोटा, पाटली, कोठरी, चुम्बी, क्यार्दा आदि ऐसी ही घाटियाँ हैं। इस क्षेत्र में जीवाश्मयुक्त अवसाद-जैसे-बालू पत्थर, चीका, चूना पत्थर, कांग्लोमरेट आदि पाये जाते हैं, जो अधिकांशत ऊपरी टयरी युग के हैं।

लघु हिमालय या हिमांचल (Lesser Himalayas of Himanchal)- यह श्रेणी हिमाद्रि श्रेणी के दक्षिण तथा शिवालिक श्रेणी के उत्तर में इससे मुख्य सीमांत क्षेप (Main Boundary Thrust-MBT) द्वारा पृथक है। इसकी अनेक समांतर, श्रेणियाँ, जैसे-घोलाघार, पीर पंजाल, नागटिब्बा, महाभारत श्रेणी तथा मसूरी श्रेणी हैं। इस श्रेणी में पीर पंजाल (3494) मीटर) तथा बनिहाल (2832 मीटर) दो प्रमुख दर्रे स्थित हैं। इस श्रेणी में अनेक पर्वतीय नगर, जैसे-शिमला, चैल, चकरौता, मसूरी, नैनीताल, रानीखेत, अल्मोड़ा, दार्जीलिंग आदि स्थित हैं। यहाँ अनेक घाटियाँ स्थित हैं, जैसे-पीर पंजाल तथा हिमाद्रि की एक पश्चिमी श्रेणी के मध्य कश्मीर की घाटी, हिमाचल प्रदेश में काँगड़ा घाटी जो धौलाधार श्रेणी की तलहटी से लेकर आगे तक फैली एक संरचनात्मक घाटी है। कुल्लु घाटी, जो एक अनुप्रस्थ घाटी (transvrese valley) है। लघु हिमालय के दक्षिणी ढाल तीव्र, विषम तथा नग्न हैं, जबकि उत्तरी ढाल मंद तथा सघन वनाच्छादित हैं। ढालों के सहारे अनेक चरागाह स्थित हैं, जिन्हें कश्मीर में ‘मर्ग’ (Merg) तथा उत्तरांचल में ‘बुग्याल’ (Bugyl) एवं ‘पयार’ (Payar) कहा जाता है।

शिवालिक- इसे बाह्य हिमालय भी कहा जाता है। यह हिमालय की सबसे दक्षिणी श्रेणी है। इसके दक्षिणी ढाल अपेक्षाकृत अधिक तीव्र है। इस श्रेणी में चौरस स्कार्प (Scarp), अभिनतीय घाटियाँ तथा अपनतीय शिखरें विद्यमान हैं। शिवालिक के उत्तरी ढालों तथा लघु हिमालय के दक्षिणी ढालों के मध्य अनेक चौरस तल वाली संरचनात्मक घाटियाँ स्थित हैं, जिन्हें पश्चिम में ‘दून’ (Dun) तथा पूर्व में ‘दुआर’ (Duar) कहा जाता है। यह श्रेणी अनेक स्थानीय नामों से जानी जाती हैं, जैसे-जम्मू-कश्मीर में जम्मू पहाड़ी, उत्तरांचल में दुदवा श्रेणी, नेपाल में चूरिया पहाड़ी तथा अरूणाचल प्रदेश में डाफला, मिरी, अबोर तथा मिशिमी पहाड़ियाँ। यह श्रेणी घने उष्ण कटिबंधीय आर्द्र पर्णपाती वनों से ढकी है।

हिमालय की प्रमुख विशेषताएँ

बुर्रार्ड (Burrad) ने हिमालय को चार अनुप्रस्थ विभागों में बाँटा है- (1) पंजाब हिमालय, (2) कुमायूँ हिमालय, (3) नेपाल हिमालय तथा (4) असम हिमालय। इसके विपरीत चटर्जी (5) ने हिमालय को तीन विभागों में वर्गीकृत किया है- (1) पश्चिमी हिमालय, (2) मध्कय हिमालय, (3) पूर्वी हिमालय।

(1) पश्चिमी हिमालय इनका विस्तार सिंधु से काली नदी तक, 880 किमी लंबाई में है जो जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश तथा उत्तरांचल में लगभग 4.33 लाख वर्ग किमी क्षेत्र पर विस्तृत है।

जम्मू-कश्मीर खंड में पश्चिमी हिमालय लगभग 3.50 लाख वर्ग किमी क्षेत्र तथा औसत रूप से 3000 मीटर ऊंचाई पर स्थित हैं। इस प्रादेश में अनेक हिमनदीय द्रोणियाँ (troughes) विद्यमान हैं। इस प्रदेश को दो भौतिकाकृति विभागों में बाँटा जाता है- (i) लद्दाख का पठार तथा (ii) कश्मीर घाटी जो उत्तर में जांस्कर श्रेणी तथा दक्षिण में पीर पंजाल श्रेणी के मध्य स्थित है। कश्मीर घाटी की एक प्रमुख विशेषता करेवा निक्षेप है जिसमें सिल्ट, बालू तथा चीका की प्रधानता है।

हिमाचल हिमालय लगभग 45,000 वर्ग किमी क्षेत्र पर विस्तृत हैं। इस खंड में महा हिमालय जांस्कर श्रेणी के रूप में, लघु हिमालय पीर पंजाल तथा धौलाधार श्रेणी के रूप में, तथा बाह्य, हिमालय शिवालिक श्रेणी के रूप में विस्तृत हैं। इन श्रेणियों के उत्तरी ढाल नग्न हैं। जबकि दक्षिणी ढाल विषम तथा वनाच्छादित हैं। कुल्लु, काँगड़ा तथा लाहुल एवं स्पीति की घाटियाँ इस खंड में स्थित हैं। जोलीला, रोहतांग, बारा लाचाला, शिपकीला आदि प्रमुख दर्रै हैं।

कुमायूँ हिमालय सतलज तथा काली नदियों के मध्य 320 किमी लंबाई में तथा 38,00 वर्ग किमी क्षेत्र पर विस्तृत हैं। नंदा देवी इस प्रदेश की उच्चतम शिखर है। बद्रीनाथ, केदारनाथ, त्रिशूल, कामेत, माना आदि अन्य प्रमुखा शिखरें हैं। इस प्रदेश में अनेक झीलें पायी जाती हैं।

मसूरी तथा नाग टिब्बा (नगतिमा) श्रेणियाँ लघु हिमालय को सूचित करती हैं। शिवालिक श्रेणी मसूरी श्रेणी के दक्षिण में विस्तृत है। शिवालिक तथा लघु हिमालय के मध्य दून घाटी स्थित है। कुमायूँ हिमालय तथा तिब्बत को जोड़ते हुए अनेक दर्रे, जैसे-थागला, मुलिंग ला, माना, नीति, कुंगड़ी-बिंगड़ी, दर्मा, लिपुलेख आदि स्थित हैं।

(ii) मध्य हिमालय (The Central Himalayas)- यह खंड काली नदी से तिस्ता नदी तक लगभग 800 किमी में तथा लगभग 1.16 लाख वर्ग किमी क्षेत्र पर विस्तृत है। इसका अधिकांश भाग (दार्जीलिंग तथा सिक्किम हिमालय के अपवादस्वरूप) नेपाल के अंतर्गत है। यहाँ हिमालय की तीनों श्रेणियाँ विद्यमान हैं। विश्व की सर्वोच्च शिखर माउंट एवरेस्ट इसी खंड में नेपाल में स्थित है। कंचन जंगा (8598 मीटर), मकालू (8481 मीटर), अन्नपूर्णा (8075 मीटर) धौलागिरि (8168 मीटर) आदि अन्य उच्च शिखरें हैं। यहाँ लघु हिमालय महाभारत लेख के नाम से जाने जाते हैं, जिसे काटकर घाघरा, गण्डकक तथा कोसी नदियाँ बहती हैं। महा हिमालय तथा लघु हिमालय के मध्य काठमांडू तथा पोखरा घाटियाँ संरचनात्मक घाटियाँ हैं। गण्डक नदी के पार शिवालिक श्रेणी अनुपस्थित है।

(iii) पूर्वी हिमालय (The Eastern Himalayans)- यह खंड तिस्ता तथा ब्रह्मपुत्र नदियों के मध्य 720 किमी लंबाई में तथा लगभग 67,500 वर्ग किमी क्षेत्र पर विस्तृत है। इसका विस्तार भूटान तथा अरूणाचल प्रदेश में है। इसे ‘असम हिमालय’ भी कहा जाता है। इस प्रदेश में आका, डाफला, मिरी, अबोर, मिशिमी आदि अनेक पहाड़ियाँ स्थित हैं। इस प्रदेश में नामचा बरवा (7756 मीटर) कुलाकांगड़ी (7539 मीटर), चोमो-लहरी (7314 मीटर), ग्यालपेरी (7151 मीटर) आदि उच्च शिखरें स्थित हैं। जेलेप ला, बुमला, सेला, तुंगा, योंग्याप, कांगड़ी, कार्पोला आदि अनेक दर्रे स्थित है।

पूर्वांचल के अंतर्गत अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर तथा मिजोरम की उत्तर दक्षिण दिशा में विस्तृत पहाड़ियां सम्मिलित है। इन सघन वनाच्छादित पहाड़ियों को अनेक स्थानीय नामों से पुकारा जाता है, जैसे-अरुणाचल प्रदेश में पटकोई बूम, नागा पहाड़ियां, मणिपुर पहाड़ियां, मिजो पहाड़ियां, त्रिपुरा पहाड़ियां तथा वरैल श्रेणी।

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Pankaja Singh

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