अर्थशास्त्र

हरित क्रान्ति के पक्ष में तर्क | हरित क्रान्ति की आलोचनायें | हरित क्रान्ति के विपक्ष में तर्क | हरित क्रान्ति के लाभ

हरित क्रान्ति के पक्ष में तर्क | हरित क्रान्ति की आलोचनायें | हरित क्रान्ति के विपक्ष में तर्क | हरित क्रान्ति के लाभ

हरित क्रान्ति के पक्ष में तर्क/लाभ

(Arguments in Favor of Green Revolution)

कृषि क्षेत्र में हरित क्रान्ति अथवा कृषि विकास की नवीन व्यूह रचना की उपलब्धियों, सफलताओं को निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत स्पष्ट किया गया है-

(1) खाद्यान्नों में आत्म-निर्भरता- हरित-क्रान्ति में उन्नत तथा अधिक उपज देने वाले बीजों, उर्वरक तथा अन्य कृषि आदानों का प्रयोग किया गया। इसमें कम समय में तैयार होने बाली फसलों का विस्तार किया गया। इस नीति के कारण 1965 से 1982 की अवधि में ही 6 करोड़ टन अतिरिक्त खाद्यान्नों की पूर्ति की जा सकी। इस प्रकार भारत हरित क्रान्ति के 15 वर्ष बाद ही खाद्यान्नों में आत्म-निर्भर हो गया। वर्ष 1965-66 में खाद्यान्न का उत्पादन 7.2करोड़ टन था जो 1985-86 में बढ़कर 15 करोड़ टन हो गया। वर्ष 1996-97 में 19.9 करोड़ टन हुआ जो कि 1997-98 में 19.24 करोड़ टन तथा 1998-99 में 20.25 करोड़ टन होने का अनुमान है जो नवीं योजना के अन्त तक 23.4 करोड़ टन करने का लक्ष्य रखा गया है।

(2) औद्योगिक कच्चे माल की पर्याप्त पूर्ति- देश में औद्योगिक कच्चे माल की पर्याप्त पूर्ति, औद्योगीकरण को बढ़ावा देगी। हरित क्रान्ति के कारण तिलहन का उत्पादन दुगुना, गन्ने, जूट तथा कपास का उत्पादन पौने दो गुना हो गया है। औद्योगिक कच्चे माल की पूर्ति होने से औद्योगिक माल के निर्यात की सम्भावनायें बढ़ी हैं।

(3) विदेशी विनिमय की बचत- खाद्यान्नों तथा कृषिजन्य कच्चे मालों के उत्पादन में वृद्धि होने से इनके आयात पर व्यय होने वाली विदेशी मुद्रा की तो बचत होगी ही, साथ ही साथ आधिक्य का निर्यात करके विदेशी मुद्रा अर्जित की जा सकेगी।

(4) वैज्ञानिक कृषि को बढ़ावा- भारत में कृषि, रूढ़िवादिता से ग्रसित रही है, परन्तु हरित-क्रान्ति के कारण उन्नत हल, यन्त्र, बीज, उर्वरक, फसलों के हेर-फेर आदि का प्रयोग होने से कृषि पद्धति का आधार वैज्ञानिक होता जा रहा है। कृषक अब फसल बोने से पूर्व ही फसल की किस्म, बोने का क्षेत्र, समय आदि बातों का निर्धारण कर लेता है।

(5) कृषि का व्यवसायीकरण- भारतीय कृषक कृषि को व्यवसाय न मानकर जीवन- यापन का साधन मानता रहा है। हरित-क्रान्ति ने किसान के दृष्टिकोण में परिवर्तन किया है। हरित-क्रान्ति के कारण नये कृषि आदानों के प्रयोग में वृद्धि हई है जिनसे प्रति हैक्टेयर पैदावार बढ़ी है। कषक अब खेती को जीवन-यापन का साधन न मानकर, एक लाभदायक व्यवसाय मानने लगा है।

(6) साधनों का सर्वोत्तम प्रयोग- इस नीति में अनुकूल क्षेत्रों में जहाँ सिंचाई साधनों की पर्याप्त सुविधा है, कृषि विकास कार्यों को बड़े पैमाने पर चलाने से, अधिक उत्पत्ति कम समय में सम्भव हो सकी है। हरित-क्रान्ति का सर्वाधिक लाभ उठाने के लिए कृषक तथा प्रशासन दोनों ही प्रयत्नशील रहते हैं।

(7) व्यापक प्रचार सम्भव- साधारण कृषक को हरित क्रान्ति के प्रति आकर्षित करने के लिए पहले कुछ आदर्श क्षेत्र चुने जाते हैं। इन क्षेत्रों में हरित क्रान्ति के तत्त्वों का प्रयोग करके उत्पादन में वृद्धि की जाती है। अन्य क्षेत्रों के कृषकों को अपनाने के लिए आकर्षित किया जाता है। इससे इसके क्षेत्र में वृद्धि हुई है।

(8) प्रति हैक्टर उत्पादन में वृद्धि- हरित क्रान्ति में कृषि के आधुनिक आदानों के प्रयोग पर विशेष बल दिया गया है। जिससे सघन कृषि कार्यक्रम अपनाने में सहायता मिली है। परिणामस्वरूप प्रति हैक्टर उत्पादन बढ़ाना सम्भव हुआ है। गेहूँ का प्रति हैक्टर उत्पादन काफी तेजी से बढ़ा है। 1960-61 में 851 कि0 ग्राम से बढ़कर 1997-98 में 2470 कि०ग्रा० हो गया। चावल का प्रति हैक्टर उत्पादन 1960-91 के मुकाबले 1995-96 में 90% अधिक है। तिलहनों का उत्पादन भी प्रति हैक्टेयर 83.6 प्रतिशत बढ़ गया है।

(9) सफेद क्रान्ति का आधार- हरित-क्रान्ति के कारण कृषिजन्य पदार्थों के उत्पादन में वृद्धि के साथ-साथ पशुधन के लिए अधिक पौष्टिक चारा उपलब्ध होना स्वाभाविक है। इस प्रकार दुधारू पशुओं की संख्या व नस्ल में सुधार होने से दुग्ध व्यवसाय की प्रगति होगी, जो सफेद क्रान्ति लाने का आधार तैयार करेगी।

(10) सिंचित क्षेत्रों का विस्तार- हरित क्रान्ति में छोटी सिंचाई योजनाओं के विस्तार के कारण सिंचित क्षेत्र में वृद्धि है। 1965-66 में सिंचित क्षेत्र 3.22 करोड़ हैक्टर था जो 1997-98 तक बढ़कर 8.3 करोड़ हैक्टेयर होने का अनुमान था। इससे भारतीय कृषि की मानसून पर निर्भरता कम होगी और कृषि उत्पादन में तीव्र गति से वृद्धि सम्भव होगी।

(11) व्यावसायिक फसलों के उत्पादन में वृद्धि- देश के औद्योगिक विकास के लिए कच्चे माल की व्यवस्था कृषि से ही होती है। हरित क्रान्ति के कारण कपास, व ऊट, गन्ना, तिलहन के उत्पादन में पर्याप्त वृद्धि हुई है। कपास का उत्पादन जो 1985-86 में 85 लाख गांठे था, वह 1996-97 में 143 लाख गांठें हो गया। 2004-05 में कपास का उत्पादन 138 लाख गांठें रह जाने का अनुमान है। जूट का उत्पादन 1985-86 में 83 लाख गाँठे था, जो 2003- 04 लाख गांठें होने का अनुमान है। वर्ष 1996-97 में गन्ने का उत्पादन 277.3 मिलियन मी0 टन था जो 2003-04 में 236.2 मिलियन मी0 टन होने का अनुमान है।

(12) अधिक उपज देने वाली फसलों का क्षेत्र विस्तार- 1965-66 में जहाँ अधिक उपज देने वाली फसलों का क्षेत्र नगण्य था, वह 1973-74 में बढ़कर 259 लाख हैक्टर हो गया तथा 2003-04 तक 920 लाख हैक्टर हो गया।

(13) पौध संरक्षण एवं कीटनाशक दवाइयों का प्रयोग- हरित क्रान्ति के बाद कीटनाशक दवाइयों के प्रयोग में पर्याप्त वृद्धि हुई है। 1984-85 में देश में 50 हजार टन कीटनाशक दवाइयों का प्रयोग हुआ जो 1997-98तक 86 हजार टन हो जाने की आशा है।

(14) रासायनिक खादों के प्रयोग में वृद्धि- हरित क्रान्ति के बाद रासायनिक खादों के प्रयोग में क्रान्तिकारी परिवर्तन आया है। अब गाँव का किसान भी इसका प्रयोग करने लगा है। 1970-71 में रासायानिक खादों का उपयोग 21 लाख टन था जो बढ़कर 1997-98 तक 165 लाख टन हो गया। इस तरह इसमें लगभग 211/2गुना वृद्धि संभव हुई है।

हरित क्रान्ति की आलोचनायें/विपक्ष में तर्क

(Arguments Against Green Revolution)

हरित क्रान्ति की आलोचना निम्न आधारों पर की गई है-

(1) क्षेत्रीय असमानता में वृद्धि क्षेत्रीय असमानता में वृद्धि हरित क्रान्ति के अनुसार अनुकूल क्षेत्रों की उत्पादन क्षमता को बढ़ाने के लिए ही कृषि विकास कार्यक्रमों को बड़े पैमाने पर लागू किया जाएगा। इस कार्यक्रम का लाभ उन्हीं क्षेत्रों को मिलेगा जहाँ सिंचाई की पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध हैं तथा फसलों की प्राकृतिक प्रकोप से सुरक्षा है। ऐसा क्षेत्र भारत में 260लाख हैक्टर है जबकि शेष 1,120 लाख हैक्टर कृषि योग्य भूमि को इसका लाभ नहीं मिलेगा। इस प्रकार यह नीति सम्पन्न क्षेत्रों को अधिक सम्पन्न बनाने वाली तथा अविकसित क्षेत्रों की उपेक्षा करने वाली है।

(2) आर्थिक एवं सामाजिक विषमता- हरित क्रान्ति के द्वारा कृषि क्षेत्र में जो भी प्रगति हुई है, उसका लाभ बड़े, सम्पन्न कृषकों को ही उपलब्ध हुआ है क्योंकि वे ही अधिक विनियोजन करने एवं विभिन्न वित्तीय संस्थाओं से आवश्यक सहायता प्राप्त करने में समर्थ होते हैं। इन परिस्थितियों से ग्रामीण क्षेत्र में आर्थिक विषमतायें और भी अधिक बढ़ गई हैं। कृषि श्रमिक एवं छोटे कृषकों की स्थिति आज भी दयनीय बनी हुई है। इन तथ्यों को स्वीकार करके ही सरकार द्वारा लघु कृषकों, सीमान्त कृषकों एवं कृषि श्रमिकों को उपयुक्त सहायता प्रदान करने हेतु विभिन्न संस्थाओं की स्थापना की गई है।

(3) कृषकों में शिक्षा, प्रशिक्षण एवं अभिप्रेरणा की कमी- कृषि की नवीन यान्त्रिक विधियों का उपयोग करने हेतु कृषकों के ज्ञान में वृद्धि होनी चाहिए। उन्हें नवीन तकनीकों के लाभ, उपयोग एवं कुशलता से अवगत कराने के साथ-साथ इनकी उपयोग विधियों का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। इसके साथ ही कृषकों को यह आश्वासन भी मिलना चाहिए कि वे अपने उत्पादन का उचित मूल्य बिना किसी दबाव के प्राप्त कर सकेंगे। उसे सरकारी, सहकारी तथा अन्य संस्थाओं से सरलता से आश्यक साख एवं अन्य सुविधायें समन्वित रूप से मिलती रहनी चाहिए। उन्हें शोषण से मुक्त करवा कर अधिक उत्पादन के लिए प्रेरित करना चाहिए।

(4) उर्वरकों के उपयोग पर अनावश्यक बल- श्री आर0एस0 सावले ने नवीन कृषि नीति की यह आलोचना की है कि इसमें उर्वरकों का प्रयोग असफल ही रहेगा। अतः कृषि अर्थव्यवस्था में सिंचाई को ही सर्वोच्च स्थान प्राप्त होना, कृषि विकास की दृष्टि से आवश्यक है। अत्यधिक उर्वरकों के प्रयोग से भूमि बेकार हो गयी है।

(5) बेरोजगारी में वृद्धि- हरित क्रान्ति के अन्तर्गत कृषि के यन्त्रीकरण का विस्तार हो रहा है, जिसके परिणामस्वरूप कृषि कार्यों हेतु श्रमिकों की माँग में कमी होना स्वाभाविक है, विशेष रूप से अकुशल श्रम-शक्ति की माँग कम होती जा रही है। इस परिस्थिति के परिणामस्वरूप जनसंख्या का ग्रामीण क्षेत्रों से नगरीय क्षेत्रों में प्रवाहित होना स्वाभाविक है जो अर्थव्यवस्था में अन्य समस्याएँ उत्पन्न करता है। भारत में पहले से ही बेरोजगारी की समस्या विद्यमान है।

(6) कृषि पड़तों के वितरण की उचित व्यवस्था नहीं- हरित क्रान्ति के विकास से उन्नत कृषि आदानों (Inputs) की आवश्यकता हुई है, लेकिन इनके विपणन तथा वितरण की उचित व्यवस्था नहीं की जा सकी। इस कारण, कृषि आदान खुले बाजार में नियन्त्रित मूल्यों पर उपलब्ध नहीं होते हैं और उनकी कालाबाजारी की जाती है। उन्नत खाद व बीजों की माँग इनकी पूर्ति की तुलना में अधिक होने से इन वस्तुओं के मूल्य में तेजी से वृद्धि हुई है। वर्तमान ढिलाई, भ्रष्टाचार, विलम्ब, असमान वितरण, ऊँचे मुल्य व अपर्याप्त पूर्ति के कारण हरित क्रान्ति की सफलता सन्देहजनक हो गई है।

(7) महंगे साधनों का प्रयोग- हरित क्रान्ति में अपनाए गए सभी साधन महँगे हैं। एक तरफ बीज, खाद, कृषि यन्त्र आदि के मूल्यों में अत्यधिक वृद्धि हो रही है जिससे कृषि की उत्पादन लागत बढ़ गई है, दूसरी तरफ अत्यधिक उत्पादन से कृषि उत्पादन के मूल्य गिरने लगे हैं। इस प्रकार कृषि करने में अब किसान को विशेष लाभ नहीं रहा है। वह हतोत्साहित हुआ है। वर्ष 1985 में गन्ने के अति उत्पादन की स्थिति इसका अच्छा उदाहरण है।

(8) निर्धन जनसंख्या में वृद्धि- हरित क्रान्ति के अन्तर्गत बड़े कृषकों की आय में वृद्धि होने के साथ उनके जीवन-स्तर, शैक्षणिक स्तर, आर्थिक ज्ञान एवं यान्त्रिक योग्यता में निरन्तर वृद्धि होती जा रही है और इस वर्ग ने छोटे परिवार के अर्थशास्त्र को स्वभावतः स्वीकार कर “लिया है। दूसरी ओर कृषि-श्रमिक अपने जीवन निर्वाह के लिए बड़े परिवार को महत्त्व देता है। इन विपरीत प्रवृत्तियों के फलस्वरूप ग्रामीण क्षेत्र में निर्धन जनसंख्या में वृद्धि होती जा रही है।

(9) तकनीकी परिवर्तन के पीछे संस्थागत परिवर्तनों की उपेक्षा- नई कृषि नीति में तकनीकी परिवर्तनों की तरफ विशेषतः ज्यादा ध्यान दिया गया है, लेकिन संस्थागत परिवर्तनों जैसे-भूमि सुधारों की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया गया है। कृषि उपज में स्थायी वृद्धि के लिए संस्थागत परिवर्तन होना अति आवश्यक है। संस्थागत परिवर्तन तकनीकी परिवर्तनों के आधार का काम करते हैं। अतः संस्थागत परिवर्तन न होने से कृषि उत्पादन में अस्थायी वृद्धि हुई है।

(10) कुछ फसलों तक ही सीमित- हरित क्रान्ति की सफलता कुछ ही फसलों विशेषतः गेहूँ, चावल, मक्का, ज्वार तथा बाजरे तक ही सीमित रही है। अन्य फसलों के सम्बन्ध में अभी कुछ भी कार्य नहीं हो पाया है।।

(11) अनुभव का अभाव- भारतीय परिस्थितियों में अनुभव के अभाव के कारण उन्नत बीजों का प्रयोग नहीं हो पा रहा है। विभिन्न उन्नत साधनों के प्रयोग का भारतीय परिस्थितियों में दीर्घकाल में क्या प्रभाव पड़ेगा ? इसका निश्चित ज्ञान नहीं है। बिना अनुभव के कार्य करना बिना रास्ता जाने चलने के समान है, जिससे गलत दिशा में जाने की सम्भावना होती है।

इन आलोचनाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि हरित क्रान्ति अधिक सफल नहीं रही है। यह एक अल्पकालीन कार्यक्रम था, जिसे विशेष परिस्थितियों में अपनाया गया। यहाँ संस्थागत परिवर्तन को कोई स्थान नहीं दिया गया।

निष्कर्ष-

हरित क्रान्ति की सफलता व असफलताओं का अध्ययन करने से स्पष्ट हो जाता है कि हरित क्रान्ति पूर्ण रूप से हरी नहीं रही है अर्थात यह आंशिक रूप से सफल रही है। हरित क्रान्ति के माध्यम से हम खाद्यान में आत्मनिर्भर हुए हैं। हरित क्रान्ति ने विभिन्न क्षेत्रों में, तीव्र विकास में सहयोग दिया है। हरित क्रान्ति से कृषि विकास को एक नयी दिशा मिली है, लेकिन हरित क्रान्ति ने क्षेत्रीय विषमताओं में वृद्धि की है, देश में आर्थिक विषमता को बढ़ाया है, धनवान अधिक धनी हआ है तथा निर्धन अधिक कमजोर हुआ है। यह समाजवादी विचारधारा के प्रतिकूल है।

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Pankaja Singh

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