अर्थशास्त्र

हैबरलर का अवसर लागत सिद्धान्त | अवसर लागत सिद्धान्त की मान्यतायें | अवसर लागत सिद्धान्त का आलोचनात्मक मूल्यांकन

हैबरलर का अवसर लागत सिद्धान्त | अवसर लागत सिद्धान्त की मान्यतायें | अवसर लागत सिद्धान्त का आलोचनात्मक मूल्यांकन | अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के अवसर लागत सिद्धान्त की आलोचनात्मक समीक्षा

हैबरलर का अवसर लागत सिद्धान्त

(1) वास्तविक लागत की विचारधारा पर आधारित रिकार्डो के तुलनात्मक लागत सिद्धान्त को अपर्याप्त और अवास्तविक मान्यताओं पर आधारित बताते हुए हैबरलर ने अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के अवसर लागत सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।

(ii) हैबरलर के अनुसार दो वस्तुओं के बीच विनिमय अनुपात प्रतिस्थापन वक्र (Substitution Curve) अथवा उत्पादन सम्भावना वक्र (Production Possibility Curve) द्वारा व्यक्त किया जा सकता है।

(iii) हैबरलर के अनुसार उत्पादन सम्भावना वक्र की आकृति उत्पादन के नियमों अर्थात् लागत दशाओं से प्रभावित होती है।

(A) स्थिर लागत दशा (अर्थात्, स्थिर उत्पत्ति के नियम) में उत्पादन सम्भावना वक्र बाएं से दाएं गिरती हुई एक सीधी रेखा होती है अर्थात् एक वस्तु की दूसरी वस्तु से विनिमय करने की सीमान्त अवसर लागत स्थिर होगी। फलस्वरूप उत्पादन की सापेक्ष लागतें भी स्थिर रहेंगी और मांग दशाओं से अप्रभावित रहेंगी।

स्थिर लागत दशा में अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार को लाभप्रद बनाने के लिए दोनों देशों के उत्पादन सम्भावना वक्रों का ढाल अलग-अलग होना चाहिए। स्थिर लागत दशा में दोनों देशों को अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार से लाभ होगा एवं उत्पादन में पूर्ण विशिष्टीकरण होगा। दोनों देशों में दोनों वस्तुओं के विनिमय अनुपात का निर्धारण दोनों देशों के उत्पादन सम्भावना वक्रों (अवसर लागत वक्र) की सीमाओं के भीतर होगा।

(B) बढ़ती अवसर लागत (अथवा घटते उत्पत्ति के नियम) की दशा में उत्पादन सम्भावना वक्र मूलबिन्दु के प्रति नतोदार (Concave) होता है।

बढ़ती अवसर लागत की दशा में उत्पादन सम्भावना वक्र के मूल-बिन्दु के नतोदर होने के कारण व्यापार में संलग्न देश व्यापार के बाद पूर्ण विशिष्टीकरण न करके आंशिक विशिष्टीकरण अपनाते हैं।

(C) घटती अवसर लागत (अर्थात् बढ़ते उत्पत्ति के नियम) की दशा में उत्पादन सम्भावना वक्र मूलबिन्दु के प्रति उन्नतोदर (Convex) हो जाता है क्योंकि इस दशा में एक वस्त की तुलना में दूसरी वस्तु की सीमान्त लागत गिरती है।

हैबरलर के अनुसार घटती अवसर लागत की दशा में व्यापार से जुड़े देश उत्पादन में पूर्ण विशिष्टीकरण अपनाते हैं।

अवसर लागत की मान्यतायें-

हैबरलर ने अवसर लागत वक्र की व्याख्या निम्न मान्यताओं के अन्तर्गत की है-

  1. केवल दो ही देश हैं, A तथा BI
  2. प्रत्येक देश के पास उत्पादन के दो साधन हैं, श्रम एवं पूँजी।
  3. प्रत्येक देश दो वस्तुओं x तथा Y का उत्पादन कर सकता है।
  4. साधन तथा वस्तु बाजार दोनों में ही पूर्ण प्रतियोगिता है।
  5. प्रत्येक वस्तु की कीमत उसकी सीमांत मुद्रा लागतों के बराबर है।
  6. प्रत्येक साधन की कीमत प्रत्येक रोजगार में उसके सीमांत उत्पादकता मूल्य के बराबर है।
  7. प्रत्येक साधन की पूर्ति स्थिर है।
  8. प्रत्येक देश में पूर्ण रोजगार है।
  9. प्रौद्योगिकी में कोई परिवर्तन नहीं होता।
  10. दोनों देशों में साधन अगतिशील है।
  11. दोनों देशों के भीतर साधन पूर्ण रूप से गतिशील है।
  12. व्यापार पूर्ण रूप से स्वतंत्र व अबाधित है।

इन मान्यताओं के दिये हुए होने पर, उत्पादन संभावना वक्र बनाता है कि कोई देश उपलब्ध प्रौद्योगिकी के साथ उत्पादन के साधनों का पूर्ण उपयोग करते हुए दोनों वस्तुओं के अधिकत दक्षता से कितने विविध वैकल्पिक संयोग बना सकता है। अन्य शब्दों में, उत्पादन संभावना वक्र की ढलान उसकी रूपान्तरण की सीमान्त दर है।

विभिन्न लागत स्थितियों के अन्तर्गत उत्पादन संभावना वक्र का रूप यह निर्धारित करता है कि अवसर लागत सिद्धान्त के अन्तर्गत अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के आधार और उससे प्राप्त होने वाले लाभ क्या हैं।

स्थिर अवसर लागतों के अन्तर्गत व्यापार-

स्थिर अवसर लागतों के अन्तर्गत उत्पादन संभावना वक्र एक सरल रेखा होती है। चित्र में PA देश A का और PB देश B का उत्पादन संभावन वक्र है। देश A या तो Y वस्तु की OP मात्रा अथवा X की OB माख का उत्पादन कर सकता है। यदि वे चाहते हैं कि दोनों वस्तुओं का उत्पादन करें, तो उन्हें अपने-अपने उत्पादन संभावना वक्रों पर किसी एक ही बिन्दु पर स्थित होना पड़ेगा।

मान लीजिए देश B,देश A से छोटा है और देशA से व्यापार करने लगता है। क्योंकि देश A बड़ा देश है। इसलिए मान लीजिए कि PA वक्र द्वारा व्यक्त किया गया उसका आन्तरिक कीमत अनुपात, देश B के लिए अन्तर्राष्ट्रीय कीमत अनुपात है। व्यापार शुरू होने से पहले, देश Bअपन घरेलू कीमत रेखा PB के बिन्दु E पर उपभोग एवं उत्पादन कर रहा था। यह बिन्दुE से चलकर बिन्दु P पर पहुंच सकता है और इस बिन्दु । पर उत्पादन कर सकता है। यह नई अन्तर्राष्ट्रीय कीमत रेखा PA पर अपने उपभोग को बिन्दु E से बढ़ाकर बिन्दु D पर ले जा सकता है, जहाँ पर यह PA रेखा द्वारा व्यक्त अन्तर्राष्ट्रीय कीमत पर देश A को Y की TD मात्रा निर्यात करके और उसके बदले वस्तु X की PT मात्रा का आयात करके उपभोग कर सकता है। इसलिए, देश A से व्यापार शुरू करने के बाद देश B को निश्चय रूप से लाभ हुआ है।

परन्तु देश B के साथ व्यापार शुरू करने के कारण देश A को लाभ नहीं हुआ, क्योंकि व्यापार से पहले या बाद में देश A में वस्तु X तथा वस्तु Y की सापेक्ष कीमतों में परिवर्तन नहीं हुआ है जैसा कि PA रेखा से पता चलता है।

अब देश B की व्यापार से पहले और बाद की स्थिति चित्र में दिखाई गई है जिसमें PR नई अन्तर्राष्ट्रीय कीमत रेखा है। व्यापार से पहले यह देश दोनों वस्तुओं का उपभोग एवं उत्पादन बिन्दु E पर कर रहा था। व्यापार के बाद यह बिन्दु P पर वस्तु Y के उत्पादन में विशेषीकरण करता है और इसका उपभोग स्तर बिन्दु E से सरककर नई कीमत रेखा PR के बिन्दु C पर पहुँच जाता है। अब यह वस्तु र के आयात के बदले देश A को वस्तु Y की TC मात्रा निर्यात करेगा। ऐसी स्थिति में देश को उतना लाभ नहीं होगा जितना कि पिछले उदाहरण में था, परन्तु देश A को निश्चय ही अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार से लाभ होगा।

बढ़ती हुई अवसर लागतों के अन्तर्गत व्यापार-

स्थिर अवसर लागतों का जो विश्लेषण ऊपर प्रस्तुत किया गया है वह इन मान्यताओं पर आधारित है कि दोनों वस्तुओं उत्पादन के लिए पूर्ण स्थानापन्नता के कारण उत्पादन के साधन एक बढ़ती हुई अवसर लागों के अन्तर्गत उत्पादन संभावना वक्र मूल बिन्दु की ओर नतोदर (Concave) होता है क्योंकि जब कोई देश किसी ऐसी वस्तु के उत्पादन में विशिष्टीकरण प्राप्त करता है जिसके उत्पादन में उसे तुलनात्मक लाभ हो, तो उसकी अवसर लागतें बढ़ जाती है। चित्र के भाग (A) मेंA A1 वक्र देश A का उत्पादन संभावना वक्र है जो मूल बिन्दु की ओर नतोदर है। इसकी ढलान से पता चलता है कि यह देश वस्तु X क उत्पादन में विशिष्टीकरण करेगा। ज्यों-ज्यों हम इस वक्र पर बिन्दु A से बिन्दु A1 की ओर बढ़ेंगे, त्यों त्यों यह देश वस्तु X की प्रत्येक अतिरिक्त इकाई का उत्पादन करेगा जिसमें इसने विशिष्टीकरण किया है, त्यों-त्यों इसे बढ़ती हुई अवसर लागतों का सामना करना पड़ेगा।

दूसरी ओर चित्र का भाग (B) बताता है कि B देश का उत्पादन संभावना वक्र BBहै। इस वक्र की ढलान से पता चलता है कि यह देश वस्तु के उत्पादन में विशिष्टीकरण करेगा। हम ज्यों-ज्यों इस वक्र पर बिन्दु B1 से बिन्दु Bकी ओर बढ़ेंगे, त्यों-त्यों यह देश वस्तु Y की अतिरिक्त इकाइयों का उत्पादन करने के लिए X की अधिकाधिक इकाइयों को छोड़ता चलेगा। इस प्रकार ज्यों-ज्यों देश B वस्तु Y की प्रत्येक अतिरिक्त इकाई का उत्पादन करता है जिसमें कि इसने विशिष्टीकरण किया है, त्यों-त्यों इसे बढ़ती हुई अवसर लागतों का सामना करना पड़ता है।

यदि दोनों व्यापार करने का निर्णय लेते हैं-

पहले देश A को लीजिए जहां कीमत रेखा PL द्वारा निर्धारित नया संतुलन बिन्दुE है, जैसा कि चित्र में दिखाया गया है। इसका मतलब है कि घरेलू बाजार के मुकाबले अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में वस्तु X अधिक महंगी हो गई है। इसका कारण यह है कि घरेलू कीमत रेखा aa की अपेक्षा PL की ढलान अधिक है।

देश B कोलीजिए जहां अन्तर्राष्ट्रीय कीमत रेखा P1L1 उत्पादन संभावना वक्र BB1 को बिन्दु E पर स्पर्श करती है जैसा कि चित्र (B) में दिखाया गया है। इसका मतलब है कि घरेलू बाजार की अपेक्षा अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में वस्तु Y अधिक महंगी हो गई है। इसका कारण यह है कि घरेलू कीमत रेखा bb की अपेक्षा P1L1 की ढलान कम तिरछी है। इसलिए देश B का लाभ इस बात में है कि वह अपने कुछ संसाधनों को वस्तु x के उत्पादन से हटाकर वस्तु Y के उत्पादन में लगा दे जिसके लिए उसे अपना उत्पादन स्तर उत्पादन संभावना वक्र पर बिन्दु K1 से बिन्दु E1पर लाना होगा। तब यह Y की OQ1 तथा X की OR1 मात्रा का उत्पादन करेगा। देश B का उपभोग बिन्दु C 1, कीमत रेखा P1L1 पर होगा। यह व्यापार त्रिभुज E1D1C1 पर X की D1C1 मात्रा का आयात और Y की D1E1 मात्रा का निर्यात करेगा और घरेलू रूप से यह Y की os1 तथा X की OR1 मात्रा का उपभोग करेगा। इस प्रकार देश A के साथ व्यापार के परिणामस्वरूप देश B को भी लाभ प्राप्त होता है क्योंकि वह X तथा Y दोनों वस्तुओं की अधिक मात्रा का उपभोग कर सकता है, क्योंकि व्यापार के बाद C1 उपभोग बिन्दु K1 बिन्दु से ऊपर और दाई ओर है।

घटती हुई अवसरं लागतों के अन्तर्गत व्यापार-

जब दो देशों में घटती हुई लागतों की स्थिति होती है तो उनके उत्पादन संभावना वक्र मूल बिन्दु की ओर उन्नतोदर (Convex) होते हैं। घटती हुई अवसर लागतों के अन्तर्गत, व्यापार के बाद प्रत्येक देश केवल एक ही वस्तु के उत्पादन में विशिष्टीकरण करता है। इसका कारण यह है कि उत्पादन के बढ़ते हुए प्रतिफल होते हैं जो उत्पादन की आन्तरिक मितव्ययिताओं (economies) पर आधारित होते हैं।

घटती हुई अवसर लागतों के अन्तर्गत व्यापार को चित्र में प्रदर्शित किया गया है जहांAA1 देश A का उत्पादन संभावना वक्र है और BB1 देश B का उत्पादन संभावना वक्र है। व्यापार से पहले देश A का उपभोग और उत्पादन बिन्दु है जहाँ इसकी घरेलू कीमत रेखा aa इसके उत्पादन संभावना वक्र AA1 को स्पर्श करती है। इसी प्रकार, देश B का उपभोग और उत्पादन बिन्दु K1 है जहाँ इसकी घरेलू कीमत रेखा bb इसके उत्पादन संभावना वक्र को स्पर्श करती है।

इस प्रकार, देश Aबिन्दु A1 पर वस्तु x के उत्पादन में पूर्ण रूप से विशिष्टीकरण करेगा और देश B बिन्दु B पर वस्तु Y के उत्पादन में पूर्ण रूप से विशिष्टीकरण करेगा। अब प्रत्येक देश अन्तर्राष्ट्रीय कीमत रेखा के साथ-साथ आगे बढ़ेगा, देश A बिन्दु से ऊपर की ओर तथा देश B विन्दु B से नीचे की ओर जाएगा और दोनों ही उपभोग में बिन्दु C पर पहुंच जाएंगे। देश A व्यापार त्रिभुज CD1A1 पर वस्तु X की D1A मात्रा देश B को निर्यात करेगा और वहाँ से वस्तु Y की D1C मात्रा आयात करेगा और स्वयं वस्तु की OD1 मात्रा उपभोग करेगा। इसी प्रकार, देश B व्यापार त्रिभुज BDC पर देश A को वस्तु Y की DB मात्रा निर्यात तथा वहाँ से वस्तु X की DC मात्रा आयात करेगा और स्वयं वस्तु Y की OD मात्रा उपभोग करेगा।

आलोचनात्मक मूल्यांकन (Critical Appraisal)

हैबरलर का अवसर लागत सिद्धान्त निम्नलिखित कारणों से अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के क्लासिकी सिद्धान्त से श्रेष्ठ है:

  1. क्लासिकी तुलनात्मक लागत सिद्धान्त के विकल्प के रूप में अवसर लागत सिद्धान् अधिक वास्तविक है क्योंकि यह मूल्य के सिद्धान्त की उन वास्तविक मान्यताओं को छोड़ देता है जिन पर क्लासिकी तुलनात्मक लागत सिद्धान्त आधारित है।
  2. अवसर लागत सिद्धान्त स्थिर, बढ़ती हुई तथा घटती हुई अवसर लागतों के अन्तर्गत व्यापार के पहले और व्यापार के बाद की स्थिति का विश्लेषण करता है जबकि तुलनात्मक लागत सिद्धान्त देश के भीतर स्थिर लागतों और दो देशों के बीच तुलनात्मक लाभ तथा हानि पर आधारित है।
  3. यह व्यापार सिद्धान्त में साधन स्थानापन्नता के महत्व को उजागर करता है।
  4. यह अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के सामान्य संतुलन सिद्धान्त का सरल मॉडल प्रस्तुत करता है। इस प्रकार विश्लेषणात्मक आधार पर क्लासिकी तुलनात्मक सिद्धान्त की अपेक्षा अवसर लागत सिद्धान्त अधिक श्रेष्ठ है।

जैकब वाइनर (Jacob Viner) ने मूल्य के वास्तविक लागत सिद्धान्त का समर्थन किया है और अवसर लागत सिद्धान्त की कटु आलोचना की है-

  1. कल्याण विश्लेषण का घटिया औजार (Inferior as a Tool Welfare Analysis): वाइनर का मत है कि कल्याण मूल्यांकन के औजार के रूप में क्लासिकी वास्तविक लागत सिद्धान्त की अपेक्षा अवसर सिद्धान्त घटिया है। उसका कहना है कि उत्पादक सेवाएं प्रदान करने में “परित्याग”,”अनुपयोगिताओं” अथवा “कठिनाइयों” के रूप में जो वास्तविक लागतें पाई जाती हैं, अवसर लागतों का सिद्धान्त उन्हें मापने में असमर्थ रहता है।
  2. साधन पूर्तियों में परिवर्तनों की उपेक्षा (Ignores Changes in Factor Supplies): वाइनर अवसर लागत सिद्धान्त की इस कारण भी आलोचना करता है कि उत्पादन सम्भावना वक्र साधन पूर्तियों की उपेक्षा करता है।
  3. आय की अपेक्षा अवकाश को अधिमान की उपेक्षा (Neglects Preference for Leisure against Income) : वाइनर की एक आलोचना यह है कि उत्पादन संभावना वक्र आय की तुलना में “अवकाश” को दिए जाने वाले अधिमान को ध्यान में नहीं रख सकता। वाल्श ने इस आक्षेप का भी खण्डन किया है। वाल्श का तर्क यह है कि “अन्तर्राष्ट्रीय कीमत अनुपात पर व्यापार की संभावना सामान्य रूप से किसी देश को अपनी आय वास्तविक रूप में बढ़ाने का अवसर देती है। इस बढ़ोत्तरी का कुछ भाग अपेक्षाकृत अधिक अवकाश के रूप में ग्रहण किया जाएगा जिससे दोनों वस्तुओं का उत्पादन घट जाएगा।” उसने इसे त्रिआयामीय (Three Dimensional) चित्र पर उत्पादन संभावना वक्र के रूप में प्रदर्शित किया है जहां अवकाश को तीसरे आयाम पर लिया गया है।
  4. अवास्तविक मान्यताएं (Unrealistic Assumptions): हैबरलर का अवसर लागत सिद्धान्त ऐसी मान्यताओं पर आधारित है जैसे दो देश, दो वस्तुएं, दो साधन, पूर्ण प्रतियोगिता, पूर्ण रोजगार, तकनीकी परिवर्तन नहीं, आदि। ये सभी अवास्तविक मान्यताएं हैं जो वास्तविक जगत् में नहीं पाई जाती है।

परन्तु ये सब आलोचनाएं निराधार हैं। अर्थशास्त्रियों ने वास्तविक लागत सिद्धान्त को हमेशा-हमेशा के लिए छोड़ दिया है क्योंकि “यह अवास्तविक तथा भ्रान्तिपूर्ण उपकल्पना की भूल-भूलैया में उलझा देता है।

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Pankaja Singh

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