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ग्रामीण अधिवासों के प्रतिरूप | भारतीय ग्रामीण अधिवासों की बनाबट | ग्रामीण अधिवासों के मकानों के प्रकार

ग्रामीण अधिवासों के प्रतिरूप | भारतीय ग्रामीण अधिवासों की बनाबट | ग्रामीण अधिवासों के मकानों के प्रकार

ग्रामीण अधिवासों के प्रतिरूप

(Patterns of Rural Settlement)

अधिवासों के प्रकार (Types) और प्रतिरूप में अन्तर होता है। अधिवसों के प्रकार उनमें बने मकानों की संख्या और मकानों के बीच पारस्परिक दूरी के आधार पर निर्धारित होते हैं। जबकि, अधिवासों के प्रतिरूप वसाव की आकृति के आधार बनते हैं। इस दृष्टि से ग्रामीण अधिवासों के निम्नलिखित मुख्य प्रतिरूप मिलते हैं-

(1) रेखीय प्रतिरूप (Linear Pattern) –  जब गाँव किसी नदी, सड़क या नहर के किनारे बसा होता है तब रेखीय प्रतिरूप बनता है। रेखीय प्रतिरूप के अन्तर्गत अधिवास में मकान नदियों, नहरों अथवा सड़कों के समानान्तर एक पंक्ति में बने होते हैं। सड़कों के दोनों किनारों पर बने पंक्तिवद्ध मकानों के द्वारा आमने-सामने होते हैं। गाँव का आकार एक रेखा की भाँति लम्बा होता है। इस प्रकार के गाँव गुजरात के कच्छ, सौराष्ट्र व सूरत जिलों, दक्षिणी राजस्थान और तमिलनाडु, उड़ीसा, आन्ध्र प्रदेश के तटीय भागों में मिलते हैं। इस प्रकार के  अधिवासों को फीता प्रतिरूप (Ribbon Pattern) या डोरी प्रतिरूप (String Pattern) भी कहते हैं। पश्चिम उत्तर प्रदेश के देहरादून जिले में नहरों के किनारे बसे गाँवों में इस प्रतिरूप के उदाहरण मिलते हैं।

(2) चौकपट्टी प्रतिरूप (Check Board Pattern) –  मैदानों में जहाँ दो मुख्य सड़कें एक-दूसरे को लगभग समकोण पर काटती हैं, वहाँ क्रास स्थल पर बसने वाले गाँवों में यह प्रतिरूप बनता है। गाँवों की गलियाँ मुख्य सड़कों के लगभग समानान्तर होती हैं और वे भी एक-दूसरे को समकोण पर काटकर आयतों का निर्माण करती हैं। इन सड़कों पर गलियों के किनारे मकान सुनियोजित ढंग से बने सुन्दर लगते हैं। गंगा के मैदान में यह प्रतिरूप अधिक स्पष्ट रूप में देखने को मिलता है। बाद में विकसित होकर अधिवास कस्बे का रूप ले लेते हैं। चीन के उत्तरी मैदान में बहुत से ग्रामीण अधिवास इसी प्रतिरूप में बसे हैं। उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में इस प्रतिरूप के अनेक गाँव हैं।

(3) अरीय प्रतिरूप (Radial Pattern) – जिस स्थान पर कई दिशाओं से कच्ची या पक्की सड़कें आकर मिलती हैं, वहाँ यह प्रतिरूप विकसित होता है। ये सड़कें वृत्त की त्रिज्या की भाँति होती हैं। इनके मिलन स्थल, अर्थात् केन्द्र में गाँव का चौराहा होता है, जहाँ से अनेक दिशाओं की ओर रास्ते निकलते हैं। भारत में यह प्रतिरूप प्रधान रूप से गंगा-यमुना क मैदान के गाँवों में मिलता है तथा चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश के गाँवों में भी यह प्रतिरूप पाया जाता है।

(4) तारा प्रतिरूप (Star Pattern)-  प्रारम्भ में आरीय प्रतिरूप में बसे ग्रामीण अधिवासों में मकान सड़कों के साथ बाहर की ओर बढ़ते जाते हैं। बाद में केन्द्र के पास दो मार्गों के बीच की भूमि पर मकान बनने लगते हैं, फलस्वरूप आरीय प्रतिरूप तारा प्रतिरूप में बदल जाता है।

(5) वृत्तीय प्रतिरूप (Circular Pattern)-  किसी झील या तालाब के किनारे चारों ओर बने मकानों से निर्मित अधिवास का प्रतिरूप वृत्तीय होता है। नैनीताल जिले में इस अधिवास प्रतिरूप के उदाहरण देखने को मिलते हैं। इस प्रतिरूप के दो उपभाग हैं-

(क) केन्द्रीकृत (नाभिक) (Nucleated),

(ख) नीहारकीय (Nebular) |

(क) केन्द्रीकृत अधिवास में गोले का मध्य भाग (केन्द्र) हवेली या गढ़ी के रूप में बसा होता है और उसके चारों ओर गाँव बसा होता है।

(ख) नीहारकीय अधिवास का मध्य भाग तालाब या झील के कारण खाली अथवा गैर बसा होता है और उसके चारों ओर गाँव बसा होता है।

(6) त्रिभुजाकार प्रतिरूप (Triangular Pattern)-  जब कोई सड़क या नहर दूसरी सड़क या नहर से मिलती है, परन्तु उसको पार नहीं करती तो ऐसे स्थान पर त्रिभुजाकार प्रतिरूप का विकास होता है। मकानों का बसाव सड़क या नहर के एक किनारे पर (जिस ओर से दूसरी सड़क आकर मिलती है) तथा मिलने वाली सड़क या नहर के साथ होता है। फलस्वरूप अधिवास का स्वरूप त्रिभुज के आकार का हो जाता है। जब कोई सड़क किसी नदी तक जाकर समाप्त हो जाती है यहाँ मकान नदी के समानान्तर और सड़क के किनारे पर बनते हैं। नीहारकीय एवं नाभिक प्रतिरूप कुछ समय के बाद सड़क के दोनों ओर तथा नदी के बीच के भाग पर भी बसाव हो जाता है और गाँव की आकृति त्रिभुजाकार हो जाती है।

(7) तीरनुमा प्रतिरूप (Arrow pattern) – जब कोई मार्ग या सड़क किसी अन्तरीप के सिरे तक या किसी नदी के मोड़ तक जाती है तो अन्तरीप के सिरे अथवा नदी के मोड़ पर तीरनुमा आकृति में गाँव की बसावट हो जाती है। अन्तरीप के सिरे पर मकानों की संख्या अधिक तथा सड़क या मार्ग के साथ बाहर की ओर मकान कम होते जाते हैं। दक्षिण भारत के सुदूर दक्षिणी सिरे पर स्थित कन्याकुमारी गाँव का प्रतिरूप तीरनुमा है।

(8) सीढ़ीनुमा प्रतिरूप (Terrace Pattern)-  पर्वतीय ढालों पर बसे गाँवों में यह प्रतिरूप मिलता है। विभिन्न ऊँचाई के ढालों पर भूमि को समतल करके ऐसे गाँवा बसाये जाते है। ढाल के नीचे से ऊपर तक मकानों की पंक्तियाँ सीढ़ी की आकृति प्रस्तुत करती हैं। इन गाँवों से ऊपर तथा नीचे की समतल भूमि पर खेती का काम होता है। हिमालय, आल्प्स, राकी, एण्डीज आदि पर्वतों के ढालों पर बसे गाँव इसी प्रतिरूप को प्रकट करते हैं।

भारतीय ग्रामीण अधिवासों की बनाबट

(Layout of Indian Rural Settlements)

भारतीय उपमहाद्वीप में लगभग 6.25 लाख गाँवों में देश की लगभग 75% जनसंख्या निवास करती है। यहाँ ग्रामीण अधिवासी के आकार व प्रकारों में पर्याप्त भिन्नता पाई जाती है। यहाँ सम्पूर्ण ग्रामीण जनसंख्या का 26%, 500 से कम जनसंख्या वाले गाँवों में; 49%, 500 से 2000 जनसंख्या वाले गाँवों में; 20%, 2000 से 5000 जनसंख्या वाले बड़े आकार के गाँवों में तथा 5,000 से अधिक जनसंख्या वाले गाँवों में 5% ग्रामीण जनसंख्या निवास करती है।

भारतीय ग्रामीण अधिवासों में मकान प्रायः छोटे आकार के ही होते हैं, परन्तु मकान में पूरे परिवार के लोगों के निवास की व्यवस्था होती है। इनहीं मकानों में परिवार के सदस्यों के निवास के साथ-साथ पशुओं के रहने, चारा रखने, कृषिकार्य में काम आने वाले औजारों को रखने तथा परिवार की अन्य आवश्यक वस्तुओं को रखने की भी व्यवस्था होती है। मकानों के सामने थोड़ी खुली भूमि होती है, जिसके अन्तिम छोर पर पशुओं को खिलाने के लिए ‘चरनी’ बनी होती है। इस खुली भूमि को प्रायः ‘द्वार’ कहा जाता है। द्वार के उत्तरी कोने पर कुएँ बने होते है तथा सुविधानुसार एक ओर एक छोटा-सा बैठक या दालान भी बना होता है, जो मुख्यतया पुरुष वर्ग के लिए तथा अतिपियों के लिए होती है। कुछ अधिक घने बसे गाँवों में जहाँ द्वार के  लिए पर्याप्त भूमि उपलब्ध नहीं होती वहाँ पशुओं के लिए गाँव से बाहर किसी बाग या खेत में झोंपडे बनाकर व्यवस्था की जाती है। गाँवों में मकान या तो सटे हुए होते हैं या उनके बीच संकरों खाली जगह छोड़ दी जाती है, जिसे प्रायः ‘कोकिया’ कहा जाता है। कोलिया ये हाकर एक मकान से दूसरे मकान को आने-जाने के लिए रास्ते बन जाते है। मकानों के निर्माण में स्थानीय सामग्री जैसे, मिट्टी, बाँस, लकड़ी, सरपत, ईख की पत्ती तथा खपरैल आदि का प्रयोग किया जाता है। मकानों में खिड़कियों और रोशनदानों की कमी पायी जाती है, क्योंकि सुरक्षात्मक दृष्टिकोण प्रधान होता है। ग्रामों का वास-स्थल कृषि क्षेत्रों के यथासम्भव समीप किसी ऊँची भूमि अथवा बंजर या ऊसर भूमि में चुना जाता है। प्रारम्भ में गाँव एक केन्द्र स्थल के रूप में बसते हैं, परन्तु पारिवारिक विखण्डन से धीरे-धीरे गाँव का विकास बाहर की ओर विशेष रूप से उत्तर एवं पूरब दिशा में होता जाता है।

ग्रामीण अधिवासों के मकानों के प्रकार

(Types of Rural House)

मकानों को अनेक आधारों पर वर्गीकृत किया जा सकता है, क्योंकि आकृति, आकार, निमाण सामग्री तथा उपयोग आदि की दृष्टि से इनमें बहुत भिन्नता मिलती है, इसलिए वर्गीकरण के समय इनहीं तथ्यों को आधार बनाना उचित होता है। कई विद्वानों ने मकानों का वर्गीकरण करने के प्रयास किये हैं, परन्तु उनके दृष्टिकोण किसी एक पक्ष पर विशेष बल देने के कारण अपूर्ण समझे जाते है। कुछ के वर्गीकरण निम्नलिखित हैं-

डिमांजियाँ (Demangeon)-  इन्होंने मकानों को कार्य के आधार पर निम्नलिखित चार वर्गों में रखा है- (1) साधारण (Rudimentary) –  यह साधारण प्रकार का मकान होता है, जिसमें केवल एक ही भाग हाता है। उसी में किसान अपने कृषि-यन्त्रों, पशुओं तथा कृषि उपजों को रखता है।

(2) सघन या संहत (Compact) – सघन प्रकार के मकानों में निवास के कमरों के अतिरिक्त, पशुओं, कृषि-यन्त्रों आदि के अलग-अलग भाग बने होते हैं।

(3) विचरण (Straggling)-  इस प्रकार के मकान वे होते हैं, जिनमें मानवीय निवास, पशुओं तथा कृषि के यन्त्रों को रखने के लिए अलग इमारतें बनी होती हैं। निवास की इमारत में भी खाने-पीने तथा सोने के कमरे अलग-अलग होते हैं। पूरा मकान एक ही घेरे के अन्तर्गत होता है।

(4) ऊर्ध्वाधर (Vertical) –  ये मकान कई मंजिल के होते हैं, जिनमें पशुओं तथा कृषि- यंत्रों को रखने के लिए निचली मंजिल तथा निवास के लिए ऊपरी मंजिल होती है। उसके ऊपर अर्थात् तीसरी मंजिल पर बीज तथा अनाज रखा जाता है।

मारगेरिट लेफर (Marguerite Lever) –  इन्होंने मकानों को दो वर्गों में रखा है-

(1) प्रकीर्ण मकान (Dispersed Houses) –  इनमें इन्होंने पाँच भेदों का उल्लेख किया है- (क) तटीय मकान (Coastal), (ख) विशाल एकाकी फार्म (Large Isolated Farms), (ग) वर्गों में विभक्त प्रकीर्ण मकान (Dispersal in Groups), (घ) पुरवों के प्रकीर्ण मकान (Dispersal in Hamlets), तथा (ङ) अधिक प्रकीर्ण मकान (Maximum Dispersal)।

(2) संकेन्द्रित मकान (Concentrated Houses)-  इस वर्ग में लेफर ने चार भेद बताये हैं-(क) नीहारिकीय गाँव (Nebular Villages), (ख) केन्द्रीकृत गाँवा (Nucleated Villages), (ग) सड़कों के क्रॉस पर बसे गाँव (Cross Road Villages), (घ) बिना गाँव के

प्रदेश।

परन्तु लेफर का उपर्युक्त वर्गीकरण अपूर्ण है, क्योंकि उन्होंने मकान के स्थान पर गाँवों के प्रारूपों का उल्लेख किया है।

एस. डी. कौशिक- उपर्युक्त वर्गीकरणों में व्याप्त कमियों को ध्यान में रखकर डॉ. एस. डी. कौशिक ने मकानां का वर्गीकरण उनकी आकृति, आकार, निर्माण सामग्री, कार्यों आदि दृष्टिकोण से निम्नलिखित रूप से प्रस्तुत है-

(क) आकृति (Shape) के अनुसार- आकृति के अनुसार मकानों का वर्गीकरण निम्नलिखित प्रकार है-

(1) ढालू छत के मकान- अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों तथा ऊँचे पर्वतीय भागों, जैसे असम, बंगाल, बिहार, केरल, तमिलनाडु के तटीय भाग पर और हिमालय प्रदेश में पाये जाने वाले मकान।

(2) सपाट छत के मकान- अल्प वर्षा के क्षेत्रों, जैसे राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा उत्तरी मध्य प्रदेश के मकान।

(3) ढालू और सपाट छत के मिज्ञित मकान- उपर्युक्त दोनों वर्गों के बीच मध्यम वर्षा के क्षेत्रों में जैसे मध्य एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश के जबलपुर, रायपुर, कटनी आदि जिले तथा मध्य आन्ध्र प्रदेश के मकान।

(4) चौकोर या आयताकार मकान- इस प्रकार के मकान प्रायः भारत में सर्वत्र मिलते हैं।

तराई का तीव्र ढालू छत का छप्पर वाला मकान

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का सपाट छत का मकान

(5) वृत्तकार मकान- ओडिशा के तटवर्ती क्षेत्रों, विशाखापत्तनम के पृष्ठ प्रदेश तथा जगदलपुर के आदिम जनजातियों के झोंपड़े।

(6) द्विछतीय मकान।

(7) चहारदीवारी से घिरे मकान।

(8) दो दिशाओं में दरवाजे वाले मकान।

(ख) आकार (Size) के अनुसार-आकार के अनुसार मकानों के निम्नलिखित भेद हैं-

(1) छोटे आश्रय।

(2) झोंपड़ियाँ।

(3) एक मंजिले मकान।

(4) दो मंजिले मकान।

(5) तीन मंजिले मकान।

(6) अन्य आकार के मकान।

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Pankaja Singh

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