अर्थशास्त्र

भुगतान शेष से आशय | विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं में भुगतान शेष की स्थिति की विवेचना

भुगतान शेष से आशय | विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं में भुगतान शेष की स्थिति की विवेचना

भुगतान शेष

भुगतान-संतुलन एक सांख्यिकीय विवरण है, जिसमें किसी देश द्वारा सामान्यतः एक वर्ष की अवधि में अन्य देशों के साथ किये गये समस्त आर्थिक लेन-देन का व्यवस्थित मौद्रिक उल्लेख होता है। यह एक निश्चित समयावधि में किसी एक देश के लोगों और शेष विश्व के लोगों के मध्य होने वाले समस्त आर्थिक लेन-देन को लेखाबद्ध करने की एक युक्ति है। भारतीय रिजर्व बैंक ने भुगतान संतुलन की परिभाषा इस प्रकार की है – “किसी देश का भुगतान संतुलन उस देश के निवासियों और शेष विश्व के मध्य होने वाले समस्त आर्थिक लेन- देन का व्यवस्थित अभिलेख है। इसमें एक देश के निवासियों द्वारा निर्यात की गयी वस्तुओं और सेवाओं के भुगतान के रूप में मिलने वाली प्राप्तियों तथा पूँजी प्राप्तियों के साथ-साथ निवासियों द्वारा आयात की गयी वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य के रूप में किये जाने वाले मौद्रिक भुगतानों तथा विदेशियों को स्थानान्तरित पूँजी का वर्गीकृत प्रलेख प्रस्तुत किया जाता है। किसी देश के भुगतान संतुलन खाते के अंतर्गत चालू खाता, पूँजी खाता, सरकारी रूप में किये गये लेनदेन का खाता और सरकारी परिसम्पत्तियों का खाता सम्मिलित रहता है। इससे किसी देश के व्यापार की शुद्ध स्थिति, ऋण लेन-देन की शुद्ध स्थिति और सरकारी आरक्षित निधि में परिवर्तन की स्थिति स्पष्ट होती है।” यहाँ भारत के भुगतान संतुलन की स्थिति का विवरण दिया गया है। भुगतान संतुलन की स्थिति का विवरण चालू खाते और पूँजी खाते के लेन-देन के आधार पर किया गया है।

भुगतान-शेष की सुविधा की दृष्टि से वर्गीकरण (क) चालू खाते पर भुगतान-शेष और (ख) पूंजी खाते पर भुगतान-शेष के रूप में किया जाता है। चालू खाते में वस्तुओं तथा सेवाओं का भुगतान, एकपक्षीय भुगतान (Unilateral transfer) और दान शामिल किये जाते हैं। इस प्रकार चालू खाते पर भुगतान-शेष में वस्तुओं तथा सेवाओं का निर्यात, अदृश्य मदें और दान (Donations) सम्मिलित किए जाते हैं। पूँजी खाते पर भुगतान-शेष में देश की अन्तर्राष्ट्रीय वित्त स्थिति से सम्बन्धित चालू खाते की मदों का और अधिक स्पष्टीकरण मिलता है। चालू खाते पर सभी मदें पूँजी खाते में व्यक्त होती है। परिणामतः पूँजी खाते में देश की विदेशी सम्पत्ति और दायित्वों (International assets and liabilities) का अध्ययन किया जाता है। देश के विदेशी मुद्रा प्रारक्षण (Foreign exchange reserve) में परिवर्तन, जो देश की वर्तमान अन्तर्राष्ट्रीय भुगतान स्थिति की सबलता या निर्बलता के सूचक होते हैं, पूँजी खाते (Capital account) में शामिल किए जाते हैं।

  1. स्वतंत्रता – उपरान्त काल में चालू खाते पर भुगतान-शेष

1951-52 से 1955-56 पहली योजना का काल

प्रथम योजना के दौरान, भुगतान-शेष की स्थिति कोरिया के युद्ध के प्रभावस्वरूप आरम्भ हुई तेजी, 1953 में अमरीका में घटित प्रतिसार (Recession), देश में अनुकूल वर्षा होने के कारण कृषि और औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि का प्रभाव पड़ा। इस प्रकार इस काल में खाद्य के आयात में कमी हुई परन्तु भारत सरकार की उदार आयात नीति (Liberal import policy) के कारण आयात 963 करोड़ रुपये के ऊँचे स्तर पर पहुँच गया। अतः कोरिया के युद्ध के लाभ समाप्त हो गए। चाहे अदृश्य मदों के कारण 70 करोड़ रुपए की शुद्ध सकारात्मक आय प्राप्त हुई, फिर भी भुगतान-शेष 163 करोड़ रुपए तक प्रतिकूल रहा। कुल मिलाकर पहली योजना के दौरान स्थिति सन्तोषजनक रही और पाँच वर्षों की अवधि में भुगतान-शेष केवल 42 करोड़ रुपए प्रतिवर्ष की औसत दर तक प्रतिकूल रहा।

1956-57 से 1961-61-दूसरी योजना का काल

दूसरी योजना का महत्त्वपूर्ण लक्षण यह था कि इसके दौरान व्यापार-शेष का घाटा 2,339 करोड़ रुपए था। अदृश्य मदों तथा मित्र देशों से प्राप्त अनुदानों से कुल 614 करोड़ रुपए शुद्ध अतिरेक के रूप में प्राप्त हुए। इस प्रकार पाँच वर्षों के दौरान भुगतान-शेष का कुल घाटा 1,725 करोड़ रुपए रह गया। इस परिस्थिति के मुख्य कारण थे : (1) मूल तथा भारी उद्योगों के विकास के लिए पूँजी-वस्तुओं का भारी आयात, (2) बढ़ती हुई जनसंख्या और विस्तृत होते हुए उद्योगों की खाद्य-पदार्थों और कच्चे माल की बढ़ती हुई मांग को कृषि उत्पादन में वृद्धि द्वारा पूरा करने में विफलता, (3) अर्थव्यवस्था द्वारा निर्यात को पर्याप्त मात्रा में न बढ़ा पाना और एक विकासमान अर्थव्यवस्था के लिए न्यूनतम परिपोषक आयात (Maintenance Imports) उपलब्ध कराने की आवश्यकता। परिणामतः विदेशी मुद्रा प्रारक्षण (Foreign exchange, reserve) में तीव्र कमी हुई और देश के सामने आयात पर प्रतिबन्ध लगाने और निर्यात का विस्तार करने की अपेक्षा कोई चारा न रहा।

तीसरी योजना और वार्षिक योजनाओं का काल

तीसरी योजना के दौरान व्यापार-शेष घाटा 2,384 करोड़ रुपए था, परन्तु अदृश्य मदों के खाते में 432 करोड़ रुपए की शुद्ध आय प्राप्त हुई। इस प्रकार 1961-62 और 1965-66 के बीच चालू खाते पर भुगतान-शेष का घाटा 1,951 करोड़ रुपए रह गया।

वार्षिक योजनाओं (1966-67 से 1968-69) के काल के दौरान, विदेशों से प्राप्त किए गए उधार पर ब्याज के रूप में भारी राशि अदा करनी पड़ी। विनियोग आय (Investment Income) के रूप में 1,449 करोड़ रुपए का शुद्ध उत्प्रवाह हुआ। इस कारण अदृश्य मदों में अतिरेक का सफाया हो गया। परिणामतः भुगतान-शेष का घाटा व्यापार-शेष के घाटे की तुलना में और प्रतिकूल हो गया। 1969.70 और 1970-71 में अच्छी फसल होने के कारण खाद्यान्न- आयात बहुत कम हो गया और इस प्रकार व्यापार-शेष का घाटा और भी कम हो गया। परन्तु 1971-72 और 1973-74 के दौरान स्थिति फिर बिगड़ गयी।

1973-74 में अदृश्य मदों के खाते में असामान्य अनुकूलता का कारण संयुक्त राज्य अमेरिका की सरकार के साथ पी. एम. 480 और अन्य रुपया राशि के भुगतान से छूट का निर्णय था और इस प्रकार भारत को 1,664 करोड़ रुपए अदृश्य प्राप्ति के रूप में मिल गए। 1974-75 में इस मद में अनुकूलता का कारण परिवहन खाते और निजी खाते पर लिए गए ऋणों के रूप में 280 करोड़ रुपए की भारी राशि की प्राप्ति थी। यदि इन असामान्य वर्षों को छोड़ दिया जाए तो चालू खाते में घाटे का मुख्य भाग व्यापार शेष में घाटे के कारण ही था।

पाँचवीं योजना : 1975-76 से 1978-79

1975-76 और 1978-79 के दौरान अदृश्य मदों में तीव्र वृद्धि के कारण चालू खाते पर भुगतान शेष में अधिशेष उत्पन्न हो गया। अदृश्य मदों की प्राप्ति में वृद्धि के उत्तरदायी मुख्य कारण ये – (i) तस्करी (Smuggling) और अन्य गैर-कानूनी अन्तर्राष्ट्रीय भुगतान के विरुद्ध किए गए कड़े उपाय, (ii) रुपये के विदेशी मूल्य में ऐसे समय स्थिरता जब मुख्य अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राओं के मूल्यों में भारी उच्चावचन हो रहे थे, (iii) पर्यटकों से प्राप्तियों में वृद्धि, (iv) तकनीकी परामर्श एवं अनुबन्ध सेवाओं (Technical consultancy and contract services) से प्राप्तियों में वृद्धि और (v) रोजगार के लिए विदेश जाने वाले भारतीयों की संख्या में वृद्धि और इनके द्वारा भारत को प्रेशण (Remittance) के रूप में अधिक राशि भेजना। 1974-75 से 1978-79 के काल में व्यापार-घाटा 3,179 करोड़ रुपए रहा किन्तु अदृश्य मदों में 6,261 करोड़ रुपये प्राप्त होने के कारण भुगतान-शेष में 3,085 करोड़ रुपए का भारी अतिरेक कायम हो गया। आयोजन आरम्भ होने के पश्चात् भारत की पहली बार विदेशी खाते में संतोषजनक स्थिति थी।

छठी योजना और सातवीं योजना का काल

1979-80 के पश्चात् भुगतान-शेष की स्थिति में भारी परिवर्तन हुआ है। जबकि पांचवीं योजना की समग्र अवधि के दौरान भारत ने अनुकूल भुगतान-शेष अनुभव किया, 1979-80 के पश्चात् भारत ने प्रतिकूल भुगतान-शेष अनुभव किया। इसका मुख्य कारण व्यापार घाटे में वृद्धि था। व्यापार घाटा 1980-81 में बढ़कर 5,967 करोड़ रुपए हो गया। 1983-84 और 1984- 85 में भी व्यापार घाटा क्रमशः 5,871 करोड़ रुपए और 6,721 करोड़ रुपए रहा। इस असन्तोषजनक स्थिति का मुख्य कारण आयात में वृद्धि थी जबकि निर्यात में अपेक्षाकृत कहीं कम वृद्धि हई। चाहे अदृश्य मदों के रूप में 1980-81 और 1984-85 के बीच प्राप्ति 19,072 करोड़ रुपए हुई जोकि अपने आप में एक रिकार्ड उपलब्धि थी, परन्तु व्यापार – शेष का घाटा 30,456 करोड़ रुपए होने के कारण भुगतान शेष 11,384 करोड़ रुपए तक प्रतिकूल हो गया। शुद्ध विदेशी सहायता के अतिरिक्त, भुगतान-शेष के इस भारी घाटे को पूरा करने के लिए भारत सरकार को अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से भारी ऋण प्राप्त करना पड़ा।

1985-86 और 1989-90 के दौरान (सातवीं योजना की अवधि में) कुल व्यापार घाटा 54,204 करोड़ रुपए था। इसी काल के दौरान 13,157 करोड़ रुपए अदृश्य मदों से प्राप्त हुए। परिणामतः चालू खाते पर भुगतान-शेष का कुल घाटा 41,047 करोड़ रुपए हो गया।

1991-92 और इसके बाद का काल

पिछले वर्षों में पहली बार शुद्ध अदृश्य प्राप्तियाँ 1990-91 में 433 करोड़ रु. तक नकारात्मक हो गयी। इसका मुख्य कारण 1990-91 में विनियोग-आय (Investment Income) के रूप में 6,732 करोड़ रुपए का उत्प्रवाह था जबकि 1989-90 में यह 4,875 करोड़ रुपए था। इस प्रकार इस उत्प्रवाह में 1990-91 में 38 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इस प्रकार जो सुविधा व्यापार-घाटे का निष्प्रभावीकरण (Neutralization) करने के लिए अदृश्य मदों के रूप में उपलब्ध थी, समाप्त हो गयी।

आठवीं योजना (1992-97) के दौरान, व्यापार-घाटा बढ़ता ही गया और यह 1992-93 के 17,238 करोड़ रुपए से बढ़कर 1996-97 में 52,561 करोड़ रुपए हो गया। आठवीं योजना के दौरान अदृश्य मदों से प्राप्ति ने व्यपार-घाटे को 58 प्रतिशत तक निष्प्रभावी बना दिया। यह एक सराहनीय उपलब्धि है। इसके बावजूद भी व्यापार-शेष में लगातार घाटा ही व्यक्त हुआ है।

1997-98 में हमारे चालू खाते का घाटा 20,883 रुपए के रिकार्ड स्तर पर पहुंच गया और 1998-99 में थोड़ा कम हो कर 16,787 करोड़ रुपये हो गया। 1999-2000 में, यह पुनः बढ़कर 20,331 करोड़ रुपये हो गया। इसका मुख्य कारण व्यापार घाटे का बहुत अधिक बढ़कर 77,359 करोड़ रुपये तक पहुँच जाना था जिसको अदृश्य मदों के रूप में 57,028 करोड़ रुपए की प्राप्ति पूर्णतया निष्प्रभावी न बना सकी। 2000-01 में परिस्थिति में सुधार हुआ और चालू खाते का घाटा कम होकर 16,410 करोड़ रुपये हो गया।

2001-02 के दौरान चाहे हमारा व्यापार-घाटा 60,427 करोड़ रुपए था परन्तु अदृश्य प्राप्तियों की भारी मात्रा अर्थात् 64,141 करोड़ रुपये उपलब्ध होने के परिणामस्वरूप न केवल व्यापारिक घाटे को ही साफ कर दिया बल्कि हमारे चालू खाते में 3,734 करोड़ रुपये का अतिरेक पैदा हो गया। समग्र नौवीं योजना (1997-98 से 2001-02) के दौरान, हमारे व्यापार- घाटे के 78 प्रतिशत की पूर्ति अदृश्य मदों द्वारा की जा सकी। परिणामतः नौवीं योजना के दौरान चालू खाते में कुल घाटा 70,670 करोड़ रुपये रह गया।

दसवीं योजना के पहले दो वर्षों के दौरान 2002-03 में पुनः हमारे चालू खाते का अधिशेष 30,660 करोड़ रुपये तक सकारात्मक हो गया और 2003-04 में यह और बढ़कर 47,952 करोड़ रुपये हो गया। परन्तु यह अदृश्य मदों (Invisibles) में प्राप्त भारी अतिरेक का परिणाम था जिसने न केवल व्यापार घाटे को साफ कर दिया बल्कि चालू खाते (Current Account) में सकारात्मक अधिशेष कायम कर दिया। भारत को यह अद्वितीय श्रेष्ठता प्राप्त है कि चाहे 2001-02 से 2003-04 की 3 वर्षीय अवधि के दौरान, हमारे व्यापार संतुलन में भारी घाटा व्यक्त हुआ, परन्तु शुद्ध अदृश्य मदों के भारी प्रवाह ने इसे चालू खाते में सकारात्मक अधिशेष के रूप में पलट दिया।

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Pankaja Singh

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