इतिहास

भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के उदय के कारण | भारतीय राष्ट्रीयता को ब्रिटश शासन की देन | 19वीं शताब्दी में राष्ट्रीय जागृति के लिये उत्तरदायी तत्त्व

भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के उदय के कारण | भारतीय राष्ट्रीयता को ब्रिटश शासन की देन | 19वीं शताब्दी में राष्ट्रीय जागृति के लिये उत्तरदायी तत्त्व

भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के उदय के कारण

परिचय-

अंग्रेजी शासन काल के अन्तर्गत विभिन्न कारणों ने भारतीय जनता में राष्ट्रीय जागृति तथा भावना को जन्म दिया, जिसके परिणामस्वरूप भारत में राष्ट्रीय आन्दोलन का उदय हुआ। अन्त में 1947 में भारत अपने आपको अंग्रेजी सत्ता के चंगुल से मुक्त करने में सफल हुआ। कूपलैण्ड के शब्दों में, “भारत में राष्ट्रीय आन्दोलन कई शक्तियों और कारणों के संयोग का परिणाम था।” वे इस प्रकार थे-

  1. 1857 का स्वतन्त्रता संग्राम-

अंग्रेजों की दमनकारी और अन्यायपूर्ण नीति के विरुद्ध भारतीयों ने 1857 में विद्रोह का झण्डा ऊँचा किया था जिसे भारत का प्रथम स्वतन्त्रता-संग्राम कहा जाता है। अंग्रेजों ने जिस बर्बरतापूर्ण तरीके से इस विद्रोह का दमन किया, उससे भारतीयों में तीव्र आक्रोश उत्पन्न हुआ था। डॉ० आर०सी०मजूमदार का कथन है कि “इसने पनपती हुई राष्ट्रीयता का उन भारतीयों के लिये एक ज्वलन्त उदाहरण प्रस्तुत किया, जो ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे। नाना साहब, झाँसी की रानी, बहादुरशाह तथा कुंवरसिंह बाद के लगभग 50 वर्षो तक राष्ट्रीय नायक तथा राष्ट्रीय स्वतन्त्रता के विजेता माने जाते रहे।”

  1. राजनीतिक एकता-

अंग्रेजी शासन काल के अन्तर्गत भारत एक राजनीतिक शक्ति के अधीन हो गया। इस समय सारे देश में एक-से कानून, एक-से अधिकार तथा एक ही सत्ता स्थापित हुई। यद्यपि इससे पहले भी बड़े शासकों के समय में भारत में राजनीतिक एकता स्थापित हुई थी, परन्तु वह एकता अधिक प्रभावशाली सिद्ध नहीं हो सकी थी।

  1. अंग्रेजी भाषा-

1835 ई० में अंग्रेजी बाषा को राज्यभाषा का स्थान दे दिया। शिक्षित वर्ग की भाषा अंग्रेजी हो गई जिसके कारण विभिन्न प्रान्तों के भारतीय एक-दूसरे के निकट सम्पर्क में आने लगे और उन्हें एक-दूसरे के विचारों को समझने का अवसर प्राप्त हो सका। इसके अतिरिक्त अंग्रेजी भाषा के ज्ञान के कारण भारतीयों को पश्चिमी साहित्य और विचारों के अध्ययन की सुविधा भी प्राप्त हुई।

  1. पश्चिमी साहित्य और शिक्षा-

भारतीयों ने पश्चिमी साहित्य का अध्ययन किया। स्वतन्त्रता, समानता, जनतन्त्र और राष्ट्रीयता के विचार भारतीयों ने पश्चिमी साहित्य से प्राप्त किये। बर्क, मिल, स्पेन्सर, जोसफ मेजिनी आदि विद्वानों के स्वतन्त्रता और राष्ट्रीयता के विचार भारतीयों को प्रोत्साहित करने वाले थे। अनेक भारतीय अध्ययन करने के लिये यूरोप गए और वहाँ के स्वतन्त्र वातावरण को देखकर प्रभावित हुए तथा भारत के लिये भी उन्होंने उसी प्रकार की कल्पना की। इसमें सन्देह नहीं कि भारत के प्रारम्भिक नेताओं में से अधिकाँश ऐसे थे जो पश्चिमी साहित्य और भाषा का अध्ययन कर चुके थे और जिन्हें विदेश जाने का अवसर प्राप्त हुआ था।

  1. 19 वीं सदी के धार्मिक और सामाजिक आन्दोलन-

राष्ट्रीय भावना की उत्पत्ति में 19वीं सदी के सामाजिक और धार्मिक आन्दोलनों का विशेष महत्त्व है। राजा राममोहन राय और ब्रह्म समाज, स्वामी दयानन्द सरस्वती और आर्य समाज, स्वामी विवेकानन्द और रामकृष्ण मिशन, श्रीमती ऐनीबेसेन्ट और थियोसोफिकल समाज आदि ने भारतीयों को सिखाया कि भारतीय धर्म और संस्कृति श्रेष्ठ है। हमें पश्चिमी सभ्यता तथा संस्कृति के अनुकरण का प्रयल नहीं करना चाहिए। उन्होंने हिन्दू समाज और धर्म के दोषों को ही दूर नहीं किया वरन् भारतीयों में अपने धर्म और संस्कृति के प्रति प्रेम और श्रद्धा उत्पन्न करके उन्हें अपने देश और राष्ट्र के प्रति प्रेम करना भी सिखाया। इन आन्दोलनों ने भारतवासियों को देश-प्रेम का पाठ पढ़ाया और भारतीय राष्ट्रीयता के विकास में योगदान दिया।

  1. विदेशी विद्वानों द्वारा भारतीय साहित्य की प्रशंसा करना-

यूरोप के अनेक विद्वानों ने प्राचीन भारतीय साहित्य का अध्ययन किया और उन्होंने प्राचीन भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति की प्रशंसा की। विलियम जोन्स, मैक्समूलर, जैकोबी, विल्किन्स आदि विद्वानों ने प्राचीन भारतीय साहित्य का अध्ययन और अनुवाद करके भारतीयों को यह बताया कि उनका धर्म और संस्कृति कितनी श्रेष्ठ है। इसमें भारतीयों में अपने धर्म, संस्कृति तथा देश के प्रति गौरव की भावना उत्पन्न हुई।

  1. अंग्रेजों द्वारा भारत का आर्थिक शोषण-

अंग्रेजी शासकों ने आरम्भ से अन्त तक भारत का आर्थिक शोषण किया। इंगलैंड की औद्योगिक क्रांति और 1813 ई० में सभी अंग्रेज कम्पनियों को भारत में व्यापार करने की सुविधा ने इस आर्थिक शोषण की गति को तीव्र कर दिया। भारतीय उद्योग-धन्धे नष्ट हो गए, कृषि पर भार अधिक हो गया और भारत दिन- प्रतिदिन निर्धन होता गया। इसके अतिरिक्त अंग्रेजों ने सुनियोजित तरीके से भारत का अतुल धन इंगलैण्ड पहुंचाया जिसके परिणामस्वरूप भारत में निर्धनता तथा बेरोजगारी में अत्यधिक वृद्धि हुई। आर्थिक कठिनाइयों के कारण राजनीतिक सत्ता के प्रति असन्तोष स्वाभाविक है और असन्तोष विदेशी सत्ता के विरुद्ध विरोध या विद्रोह का कारण बन जाए, यह स्वाभाविक है। यही स्थिति भारत में हुई। भारतीयों ने अपनी आर्थिक दुर्दशा का मूल कारण अंग्रेजी शासन को ठहराया।

  1. यातायात और आवागमन के साधनों में वृद्धि-

अंग्रेजी शासन के अन्तर्गत रेल, डाकतार सड़कें, मोटर आदि यातायात संचार की सुविधाओं में वृद्धि होने से नागरिकों को परस्पर सम्पर्क में आने का अवसर प्राप्त हुआ और राष्ट्रीय आन्दोलन को संगठित करने में बल मिला।

  1. विदेशों से सम्पर्क-

विदेशों से सम्पर्क स्थापित होने के कारण विदेशी विचारों और आन्दोलनों का प्रभाव भारत पर पड़ा। प्रथम महायुद्ध के अवसर पर और उसके पश्चात् यह सम्पर्क और अधिक बढ़ा और उससे राष्ट्रीय भावना को प्रोत्साहन प्राप्त हुआ।

  1. समाचार पत्र-

भारत में विभिन्न प्रादेशिक भाषाओं में अनेक समाचार-पत्र प्रकाशित होने लगे थे। 1874 ई० में इनकी संख्या 498 थी। प्रायः ये सभी समाचार पत्र अग्रेजी शासन के विरुद्ध थे और अंग्रेजों के व्यक्तिगत दुर्व्यवहार, आर्थिक शोषण, जातीय दमन, रंग विभेद की नीति और शासन के दोषों आदि को छापते रहते थे जिससे जनसाधारण में अंग्रेजी शासन के प्रति घृणा उत्पन्न हो रही थी। इस आधार पर भी भारतीय एक होते जा रहे थे।

  1. लॉर्ड लिटन का शासन काल-

लॉर्ड लिटन की अफगान नीति, दुभिक्ष और महामारी के बीच दिल्ली दरबार का आयोजन और रानी विक्टोरिया को भारत की महारानी घोषित करना तथा भारत के जन-आन्दोलन को समाप्त करने के लिये वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट तथा शस्त्र कानून का निर्माण भारतीयों के लिये असन्तोष का कारण बने।

  1. इलबर्ट बिल का प्रतिरोध-

लॉर्ड रिपन के समय में एक विशिष्ट समस्या खड़ी हो गयी। लॉर्ड रिपन ने एक प्रस्ताव के द्वारा भारतीय मजिस्ट्रेटों को यूरोपियन अपराधियों के मुकदमों का निर्णय करने का अधिकार देना चाहा। इस बात पर सम्पूर्ण भारत और इंगलैंड में अंग्रेजों ने संगठित होकर ऐसा तीव्र आन्दोलन किया कि वह प्रस्ताव संशोधन के पश्चात ही कानून बन सका। इसमें काले और गोरे के भेदभाव को लेकर जो वाद-विवाद उठ खड़ा हुआ, उससे स्पष्ट हो गया कि अंग्रेज रंग के आधार पर भारतीयों से कितनी घृणा करते थे। इससे भारतीयों में अंग्रेजों के विरुद्ध घृणा उत्पन्न हुई। इसके अतिरिक्त भारतीयों को संगठित होकर आन्दोलन करने की शक्ति का प्रभाव स्पष्ट हो गया।

  1. लार्ड कर्जन का शासन-

लॉर्ड कर्जन का भारतीयों पर विश्वास करना, उनको सम्मानित पदों से हटाना और उनके विरुद्ध निरन्तर कटु शब्दों का प्रयोग करना भारतीयों के असन्तोष का कारण बना। इसके अतिरिक्त उसका कलकत्ता विश्वविद्यालय कानून, स्थानीय संस्थाओं का कानून और मुख्यतया बंगाल विभाजन भारत में गम्भीर असन्तोष का कारण बना। बंगाल-विभाजन के विरोध से ही भारत में सर्वप्रथम स्वदेशी आन्दोलन और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार आरम्भ हुआ।

  1. शिक्षित भारतीयों में असंतोष-

भारतीयों के लिए भारतीय उच्च सेवाओं में प्रवेश पाना कठिन था। अंग्रेजी सरकार द्वारा भारतीयों को इण्डियन सिविल सर्विस से अलग रखने का भरसक प्रयास किया गया। यद्यपि सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने 1869 में आई०सी०एस० की परीक्षा पास कर ली, परन्तु उन्हें सेवा में नहीं लिया गया। 1876 में आई०सी०एस० की परीक्षा में प्रवेश की आयु 21 वर्ष के स्थान पर 19 वर्ष ही कर दी गई जिससे भारतीयों के लिए इस प्रतियोगिता में शामिल होना अत्यन्त कठिन हो गया। अतः इस कारण भी शिक्षित भारतीयों में अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध तीव्र आक्रोश था।

  1. जातीय कटुता-

अंग्रेज अपनी जाति को सर्वश्रेष्ठ मानते थे तथा भारतीयों को घृणा की दृष्टि से देखते थे। वे भारतीयों को तुच्छ एवं हीन समझते थे और उन्हें सूअर, हब्शी, नीग्रो आदि शब्दों से पुकारते थे। यद्यपि अंग्रेज भारतीयों पर भारी अत्याचार करते थे, परन्तु इसके बावजूद उन्हें कोई दण्ड नहीं दिया जाता था। इससे भारतीयों में तीव्र आक्रोश था। भारतीयों ने भी अनुभव किया कि उन्हें भी जातीय स्तर पर संगठित होकर अपने अपमान का बदला लेना चाहिए।

  1. विदेशी घटनाओं का प्रभाव-

इंगलैंड की गौरवपूर्ण क्रान्ति, अमरीकी क्रान्ति, इटली तथा जर्मनी का एकीकरण, फ्रांस में तृतीय गणतन्त्र की स्थापना आदि अनेक घटनाओं ने भारतीयों को बड़ा प्रभावित किया। इनसे भारतीयों को यह विश्वास हो गया कि भारत की दयनीय दशा के लिये ब्रिटिश शासन उत्तरदायी है तथा उससे मुक्ति पाने के लिये उन्हें संगठित होकर संघर्ष करना चाहिए।

भारतीय राष्ट्रीयता को ब्रिटश शासन की देन-

जब हम भारतीय राष्ट्रीयता की जागृति के उपर्युक्त कारणों पर विचार करते हैं, तो स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय राष्ट्रीयता ब्रिटिश शासन का स्वाभाविक परिणाम थी। ब्रिटिश सरकार ने निजी स्वार्थ पूर्ति हेतु अंग्रेजी शिक्षा का प्रसार किया, जिससे भारतीय पाश्चात्य संस्कृति के अन्धे भक्त बन जाएँ। ब्रिटिश सरकार ने शासन में दृढ़ता व स्थायित्व लाने के लिये देश का राजनीतिक एकीकरण किया, यातायात के साधनों का विकास किया और इन सबके द्वारा भारतीयों का शोषण किया।

किन्तु बाद में ब्रिटिश शासन के इन्हीं सब कार्यों ने भारत में राष्ट्रीय भावना जागृत कर दी। अंग्रेज यदि भारत में राजनीतिक एकता स्थापित नहीं करते तो भारतीयों में राष्ट्रीयता की भावना का उदय व.विकास होना असम्भव था। पाश्चात्य शिक्षा ने ही भारतीयों को स्वाधीनता का पाठ पढ़ाया। ब्रिटिश दमनकारी नीति ने ही भारतीयों में घोर असन्तोष फैलाया। यदि वास्तव में ब्रिटिश शासन उदार रहा होता, तो वह असन्तोष उत्पन्न नहीं होता जिसने राष्ट्रीय स्वतन्त्रता की इच्छा को जन्म दिया। अंग्रेजों के भीषण आर्थिक शोषण और भेद-भाव ने भारतीयों को बहुत असन्तुष्ट कर दिया और भारतीय राष्ट्रवादी अंग्रेजी शासन का अन्त करने के लिये तैयार हो गए। इस प्रकार एक ओर ब्रिटिश शासन के प्रगतिशील पहलू ने राष्ट्रीयता के उदय को अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न कर दी, तो दूसरी ओर प्रतिगामी पहलू ने भारतीय राष्ट्रीयता को उग्रता प्रदान की।

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Pankaja Singh

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