अर्थशास्त्र

भारतीय कृषि संरचना | India Agrarian Structure in Hindi

भारतीय कृषि संरचना | India Agrarian Structure in Hindi

भारतीय कृषि संरचना

(India Agrarian Structure)

स्वतन्त्रता के समय कृषि पिछड़ी अवस्था में थी। उसमें श्रम और भूमि की उत्पादिता कम थी। खेती का ढंग परम्परागत था। अधिकांश किसान पीढ़ियों पुरानी रीतियों से खेती करते थे। लगभग साढ़े छः करोड़ किसानों के बीच एक हजार से भी कम ट्रैक्टर थे। रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग नाममात्र था। उदाहरणार्थ, प्रति एकड़ नाइट्रोजन की खपत 200 ग्राम के लगभग थी। किसान प्रायः जीवन-निर्वाह के लिए ही खेती करते थे। दूसरे शब्दों में, बड़े पैमाने पर कृषि का वाणिज्यीकरण नहीं हुआ था। मुद्रा का महत्व गांव की अर्थव्यवस्था में कितना कम होगा, यह इसी से समझा जा सकता है कि 1951-52 में भी किसानों के उपभोग में लगभग 45 प्रतिशत अंश उनके ही द्वारा उत्पादित वस्तुओं का होता था। ये सब बाते अक्सर ही कृषि के स्वरूप की व्याख्या करते हुए कही जाती हैं। इनसे कृषि क्षेत्र में एक सामान्य अल्प-विकास और गुणात्मक परिवर्तन के अभाव का आभास तो मिलता है, लेकिन भारतीय कृषिको को परम्परागत और गतिहीन कहना ही पर्याप्त नहीं है। रोग के लक्षण बताकर उसके कारणों की ओर ध्यान न देना अधिक उपयोगी नहीं होगा। हमें स्वतन्त्रता के समय कृषि के स्वरूप को समझने के लिए, उस समय के भूमि सम्बन्धों, कृषि जोत के आकार, कृषि तकनीकों, सिंचाई की सुविधाओं, ग्रामों में व्यापक ऋणग्रस्तता और महाजनी मूजे की भूमिका इत्यादि पर विचार करना होगा।

(1) उच्च ब्याजदरीय पूंजी और ग्रामीण ऋणग्रस्तता

भारतीय कृषि पर महाजनी पूंजी का नियन्त्रण बहुत मजबूत है और ऋणग्रस्तता छोटे किसानों के जीवन का सामान्य लक्षण है। स्वतन्त्रता से पहले अन्य संस्थाओं का विकास न होने के कारण किसानों की महाजनों पर अत्यधिक निर्भरता थी। इसलिए उनकी मजबूरी का फायदा उठाकर महाजन उनका भरपूर शोषण करते थे। स्वतन्त्रता के बाद सरकार ने महाजनों की गतिविधियों पर नियन्त्रण लगाने के उद्देश्य से कई कदम उठाए। इनमें सबसे महत्वपूर्ण कदम था वैकल्पिक संस्थाओं का विकास (विशेष रूप से सहकारी समितियों तथा बैंकों की कृषि वित्त में बढ़ती हुई भूमिका)। वस्तुतः बहुत से छोटे किसान, खेतिहर मजदूर तथा अन्य गरीब ग्रामीण लोग आज भी अपनी ऋण आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए महाजनों पर निर्भर करते हैं। इसका प्रमुख कारण यह है कि अन्य संस्थाएं केवल उत्पादक कार्यों के लिए ऋण देती हैं जबकि इन लोगों को कई अनुत्पादक कार्यों (जैसे शादी, सामाजिक उत्सव, मुकदमेबाजी) के लिए भी ऋण की आवयश्यकता पड़ती रहती है। इस प्रकार के ऋण अक्सर महाजनों से मिल जाते हैं जो अत्यधिक ब्याज लेते हैं, खाते बनाने में बेईमानी और गड़बड़ी करते हैं तथा कई अन्य तरीकों से इन अनपढ़ गरीब लोगों को ठगते हैं। एक बार महाजनों के चंगुल में फंस जाने पर निकल पाना इन लोगों के लिए बहुत मुश्किल होता है। यह ग्रामीण ऋणग्रस्तता सामाजिक व्यवस्था अथवा, दूसरे शब्दों में, उत्पादन सम्बन्धों का परिणाम है। भारत में ग्रामीण क्षेत्र में उत्पादन  सम्बन्ध आज भी अर्द्ध-सामन्ती हैं। खेतिहर मजदूरों और छोटे किसानों का भूमि के मालिकों द्वारा शोषण ही उनकी आर्थिक दुर्दशा के लिए जिम्मेदार है और यही प्रधान रूप से उनकी ऋणग्रस्तता का कारण है।

(2) श्रम बाजार की द्वयात्मकता

भूमि पर जनसंख्या के अत्यधिक दबाव के कारण कृषि क्षेत्र में मजदूरी औद्योगिक क्षेत्र में मजदूरी की तुलना में बहुत कम है। वैसे भी जहां औद्योगिक क्षेत्र में श्रमिक संगठित होते हैं और अपने हितों की सुरक्षा के लिए संघर्ष कर सकते हैं वहां खेतिहर मजदूर असंगठित होते हैं और कुछ नहीं कर पाते। इससे श्रम बाजार में द्वयात्मकता पैदा होती है। कृषि से बाहर रोजगार अवसरों के अपर्याप्त विकास के कारण खेतिहर मजदूर कृषि से चिपके रहते हैं और कम मजदूरी पर ही काम करते रहते हैं। कम मजदूरी के कारण उनकी प्रति व्यक्ति आय का स्तर नीचा रहता है, जीवन-स्तर नीचा रहता है और श्रम उत्पादिता भी कम रहती है।

परम्परागत कृषि क्षेत्र में सस्ते श्रम की उपलब्धि के कारण उसका व्यापक प्रयोग होता है। इसलिए श्रम-प्रधान तकनीकों का अपेक्षाकृत अधिक इस्तेमाल किया जाता है और मशीनों का कम।

(3) कृषि की पुरातन तकनीक

अधिकतर भारतीय किसान आज भी खेती के पुराने तकनीकों का प्रयोग कर रहे हैं। परम्परागत खेती मानव व पशु श्रम, वर्षा तथा गोबर की खाद पर निर्भर करती है। इस प्रकार की उत्पादन तकनीकों में किसानों को प्राप्त होने वाला प्रतिफल बहुत सीमित होता है और खेती केवल जीवन-निर्वाह के लिए साधन उपलब्ध करा पाती है। परन्तु 1966 में नई कृषि युक्ति को अपनाने के बाद से देश के कुछ चुने हुए क्षेत्रों में (खासतौर पर पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में) उत्पादन की नई तकनीकों का बड़े पैमाने पर प्रयोग किया जाने लगा है। इन तकनीकों के प्रयोग के कारण पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कृषि उत्पादिता में महत्वपूर्ण वृद्धि हुई है। परन्तु क्योंकि बहुत सारे राज्यों व क्षेत्रों में अभी भी परम्परागत पुरानी तकनीकों का प्रयोग किया जा रहा है इसलिए देश में एक तरह की तकनीकी द्वयात्मकता पैदा हो गई है।

(4) फसलों के उत्पादन में अनिश्चितता व अस्थिरता

जैसा कि सर्वविदित है भारतीय कृषि मानसून पर निर्भर करती है। हनुमन्तराव, एम0 के0 रे० तथा के0 सुब्बाराव ने 1959 से 1985 तक की अवधि के लिए जो अध्ययन किया है उससे वह सिद्ध होता है कि खाद्यानों के कुल उत्पादन की संवेदनशीलता वर्षा के होने वाली कमीबेशी के प्रति अधिक बढ़ गई है। वस्तुतः हरित क्रांति की अवधि में उत्पादन में अस्थिरता अधिक हो गई है परन्तु सी0 एच0 हनुमंत राव के अनुसार अस्थिरता में वृद्धि का कारण नई तकनीक (हरित क्रान्ति) नहीं है। इसके लिए वे प्रतिकूल कृषि परिस्थतियाँ जिम्मेदार हैं जिनमें नई तकनीक का प्रयोग किया जा रहा है। नई तकनीक के कारण, उत्पादन की जल-उपलब्धि पर निर्भरता बढ़ गई है। इसके परिणामस्वरूप, वर्षा में अनिश्चितता होने पर उत्पादन की अस्थिरता बढ़ जाती है। जहां कहीं भी उचित सिंचाई सुविधाएं उपलब्ध हैं, उत्पादन में वृद्धि एक सुनिश्चित व स्थिर पथ पर चलती हैं जैसा की गेहूं के लिए हुआ और गेहूं एक ऐसी फसल है जिस पर नई तकनीक का अधिकतम प्रभाव पड़ा। दूसरी ओर, वर्धा-आधारित क्षेत्रों तथा अनिश्चित सिंचाई व्यवस्था वाले क्षेत्रों में उत्पादन में अस्थिरता बढ़ गई जैसा कि चावल, तिलहन और दालों के लिए हुआ।

(5) कृषि क्षेत्र में विविधता और साधारणीकरण की समस्या

भारत एक विशाल देश है। भौगोलिक दृष्टि से इस देश के विभिन्न क्षेत्रों में बहुत थोड़ी समानता है। मिट्टी, वर्षा, तापक्रम, सतही पानी की उपलब्धि की दृष्टि से अन्तर इतने अधिक हैं कि एक राज्य के कुछ जिलों के लिए उपयुक्त कार्यक्रम अन्य राज्यों की दृष्टि से बिल्कुल अनुपात से हो सकता है। वर्षा को ही लीजिए। जहां बंगाल, असम, मेघालय आदि राज्यों में वर्षा इतनी अधिक होती है कि कृषि को प्रायः बाढ़,से भारी हानि होती है, वहां राजस्थान, पंजाब, हरियाणा आदि राज्यों में वर्षा थोड़ी है। कुछ क्षेत्रों की जलरोध और भूमि की सतह पर एकत्रित हो जाने की समस्याएं हैं परन्तु अनेक क्षेत्र ऐसे भी हैं जहां ऐसी समस्याएं नहीं हैं। सम्पूर्ण भारत में मिट्टी में नाइट्रोजन की कमी है और फास्फेट और पोटाश के तत्व सब कहीं समान नहीं है। प्रायः एक ही गांव में कम, अधिक उपजाऊ भूमि देखने को मिलती है। इतना ही नहीं, विभित्र राज्यों में उत्पादन-सम्बन्ध अलग-अलग हैं।

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Pankaja Singh

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