अर्थशास्त्र

भारत सरकार की औद्योगिक नीति | भारत में स्वतंत्रता के पश्चात् औद्योगिक नीति | भारत सरकर की वर्तमान औद्योगिक नीति

भारत सरकार की औद्योगिक नीति | भारत में स्वतंत्रता के पश्चात् औद्योगिक नीति | भारत सरकर की वर्तमान औद्योगिक नीति

भारत सरकार की औद्योगिक नीति

यह कहा जाता है कि भारतीय औद्योगिक संवृद्धि अत्यधिक विनिमयन के कारण प्रभावित हुई है। अगर ऐसा हुआ है, तो औद्योगिक नीति के उन पहलुओं की चर्चा कीजिए जिनसे औद्योगिक संवृद्धि को क्षति पहुँची है?

It is said that India’s industrial growth suffered due to exessive regulation. If so discuss, which aspects of industrial policy hampered industrial growth?

स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व भारत की कोई औद्योगिक नीति नहीं थी। स्वतंत्रता के बाद सरकार ने यह आवश्यक समझा कि एक स्पष्ट नीति की घोषणा करके औद्योगिक क्षेत्र में अनिश्चितता का वातावरण दूर किया जाये और उद्योगों के निर्धारित निर्देश तैयार किये जायें। इसके लिए भारत सरकार ने दिसम्बर 1947 में ‘एक औद्योगिक सम्मेलन का आयोजन किया जिसने यह निष्कर्ष निकाला कि सरकार को शीघ्र ही एक स्पष्ट औद्योगिक नीति की घोषणा करनी चाहिए। अतः 6अप्रैल, 1948 को भारत की प्रथम औद्योगिक नीति की घोषणा की गई जिसकी मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  1. उद्देश्य-

इस नीति के दो उद्देश्य रखे गये हैं-(i) सभी नागरिकों को समान अवसर व न्याय देना, (ii) उत्पादन एवं वितरण की दशाओं में सुधार करके देश के नागरिकों का जीवन स्तर ऊँचा करना।

  1. उद्योगों का वर्गीकरण-

इस नीति में उद्योगों को निम्न चार वगों में विभाजित किया गया-

(अ) सरकार के एकाधिकार में उद्योग- इस वर्ग में उन तीन उद्योगों को रखा गया है उन सैनिक व राष्ट्रीय महत्त्व के हैं, जैसे- अस्क्ष-शस्त्रों का निर्माण, अणु शक्ति निर्माण तथा रेलवे डाक-तार आदि।

(ब) आधारभूत उद्योग- इस वर्ग में छ: उद्योग रखे गये लोहा एवं इस्पात, कोयला, हवाई जहाज निर्माण, खनिज तेल, टेलीफोन, तार तथा बेतार के उपकरणों का निर्माण। इन उद्योगों में नवीन इकाइयों की स्थापना सार्वजनिक क्षेत्र में स्थापित की जायेगी तथा पुरानी इकाइयाँ निजी क्षेत्र में चलती रहेंगी।

(स) सरकार द्वारा नियन्त्रित उद्योग- इस वर्ग में 18 उद्योग सम्मिलित किये गये। जैसे- सूती वस्त्र, सीमेंट, चीनी, कागज तथा रबड़ आदि। इन पर सरकार का नियमन व नियन्त्रण रहेगा।

(द) निजी क्षेत्र के उद्योग- शेष उद्योगों को पूर्ण रूप से निजी व सहकारी क्षेत्र के लिए, सुरक्षित रखा गया। इस उद्योगों पर भी सरकार का सामान्य नियन्त्रण रहेगा।

  1. कुटीर व लघु उद्योग का विकास- इन उद्योगों के राष्ट्रीय महत्त्व को स्वीकार किया गया और यह घोषणा की गई कि सरकार इनके विकास के लिए सहयोग एवं प्रेरणा देगी। इसके अन्तर्गत लघु एवं कुटीर उद्योगों के विकास पर बल दिया जायेगा।
  2. विदेशी पूँजी- देश के आर्थिक एवं औद्योगिक विकास के लिए विदेशी पूँजी के महत्व को स्वीकार किया गया।
  3. श्रम-प्रबन्ध सम्बन्ध- औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि करने की दृष्टि से सरकार ने श्रम और प्रबन्ध के बीच मधुर व सौहार्द्रपूर्ण सम्बन्ध बनाये रखने का निश्चय किया।
  4. प्रशुल्क नीति- सरकार ने ऐसी प्रशुल्क नीति अपनाने का निश्चय किया, जिससे कि‌ अनुचित विदेशी प्रतिस्पर्द्धा को समाप्त करके और उपभोक्ताओं पर अनुचित भार डाले बिना विदेशी साधनों के उपयोग को प्रोत्साहन दिया जा सके।
  5. कर नीति- सरकार अपनी कर नीति इस प्रकार रखेगी जिससे बचत एवं विनियोग को प्रोत्साहन मिले।
  1. नीति की समीक्षा- सरकार ने अपनी इस औद्योगिक नीति के अन्तर्गत निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र के सह-अस्तित्व को बनाये रखते हुए देश में मिश्रित अर्थव्यवस्था की नींव डाली। समाजवादियों ने इस नीति का समर्थन किया। दूसरी ओर उद्योगपतियों और पूँजीपतियों ने इस नीति को दोषपूर्ण बताया। उनके विचार में यह नीति निजी क्षेत्र के हितों के विरुद्ध थी। दूसरे, सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र के बीच उद्योगों के आबंटन की नीति अव्यावहारिकता एवं अनिश्चितता से सम्बद्ध था। तीसरे, राष्ट्रीयकरण की नीति अस्पष्ट थी। चौथी, इस नीति से समाज किसी भी वर्ग को लाभ नहीं पहुंचा। डॉ0 बी0के0आर0बी0 राव ने स्पष्ट कहा था, “यह नीति न तो उद्योपगतियों, विनियोजकों, औद्योगिक श्रमिकों और न ही जनसाधारण को सन्तुष्ट करती है और न ही उत्पादन के क्षेत्रों में तीव्र वृद्धि के लिए जिस सक्रिय उत्साह, उत्प्रेरणा तथा प्रावैगिकता की आवश्यकता थी, उसे प्रदान करने में असफल रही है।”

औद्योगिक नीति : 1956

(Industrial Policy : 1956)

30 अप्रैल, 1956 को नयी औद्योगिक नीति की घोषणा की गयी।

नीति के उद्देश्य-

(i) सार्वजनिक कल्याण को बढ़ावा देने एवं जनता के जीवन-स्तर को ऊँचा उठाने की दृष्टि से औद्योगीकरण एवं आर्थिक विकास की दर में वृद्धि करना, (ii) सुदृढ़ अर्थव्यवस्था के निर्माण हेतु भारी उद्योगों को विकसति करना, (iii) सार्वजनिक क्षेत्र का विस्तार करना, (iv) सहकारी क्षेत्र का उत्तरोत्तर विकास करना, (v) आय तथा धन के वितरण की विषमताओं को कम करना, (vi) एकाधिकारी प्रवृत्तियों तथा आर्थिक शक्ति के सकेन्द्रण को रोकना, (vii) रोजगार के अवसरों में वृद्धि करना और श्रम-कल्याण सम्बन्धी कार्यों को बढ़ावा देना।

औद्योगिक नीति की विशेषताएं

  1. सार्वजनिक उद्योगों का प्रबन्ध- सार्वजनिक क्षेत्र में उद्योगों के विकास के साथ-साथ उनकी प्रबन्ध व्यवस्था का भी उचित प्रबन्ध होना चाहिए। अतः सरकारी उद्योगों को व्यापारिक सिद्धान्तों पर आधारित किया जाना आवश्यक है।
  2. औद्योगिक एवं प्राविधिक शिक्षा- देश में बढ़ती हुई औद्योगिक इकाइयों एवं उद्योगों के विकास के लिए कुशल कर्मचारियों की आवश्यकता पड़ती है। अतः सरकार उनकी शिक्षा एवं दीक्षा के लिए आवश्यक सुविधाओं का प्रदान कर रही है।
  3. उद्योगों का वर्गीकरण- नवीन औद्योगिक नीति के अन्तर्गत समस्त उद्योग तीन वर्गों में विभक्त कर दिये गये हैं-

(क) सरकारी क्षेत्र के उद्योग- इस श्रेणी के अन्तर्गत वे उद्योग आते हैं जिनके विकास का पूर्ण उत्तरदायित्व सरकार पर है। इसमें कुल 17 उद्योग हैं।

(ख) मिश्रित क्षेत्र के उद्योग- इसमें कुल 12 उद्योग सम्मिलित हैं, जो धीरे-धीरे राज्य के उत्तरदायित्व में प्रवेश करेंगे। इसमें नयी इकाइयाँ सरकार द्वारा स्थापित की जायेंगी। निजी उद्योग विकास कर सकते हैं। इस श्रेणी में निम्न उद्योग आते हैं। (1) सड़क यातायात, (2) समुद्री यातायात, (3) रासायनिक लुगदी सम्बन्धी उद्योग, (4) लौह मिश्रित धातु के औजार बनाने वाले उद्योग, (5) रासायनिक खाद, (6) रासायानिक उद्योग, (7) मशीन तथा मशीनों के औजार सम्बन्धी उद्योग।

(ग) निजी क्षेत्र के उद्योग- इस श्रेणी में वे सभी उद्योग आते हैं जिनको व्यक्तिगत उद्यमियों के उत्तरदायित्व पर छोड़ दिया गया है। किन्तु सरकार को किसी भी उद्योग को स्थापित करने की छूट होगी। इस श्रेणी में मुख्यतः उपभोक्ता सामग्री का निर्माण करने वाले उद्योग आते हैं।

(4) लघु एवं कुटीर उद्योग- इस नीति में लघु एवं कुटीर उद्योगों को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया। सरकार इन उद्योगों के विकास के लिए विभेदात्मक कर लगायेगी, प्रत्यक्ष सहायता देगी, बड़े उद्योगों से समन्वय स्थापित करेगी, आधुनिक तकनीक को प्रोत्साहन देगी तथा सरकारी औद्योगिक समितियों को प्रोत्साहन देगी।

(5) क्षेत्रीय असमानताओं को कम करना- पिछड़े क्षेत्र को पानी, बिजली व परिवहन की सुविधाएँ दी जाएँगी और देश में सन्तुलित औद्योगिक नीति को अपनाया जायेगा ताकि क्षेत्रीय असमानतायें कम हो सकें।

(6) निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र में पारस्परिक सहयोग- इस नीति में निजी व सार्वजनिक क्षेत्र को एक-दूसरे का पूरक माना गया है। उद्योगों के वर्गीकरण में सार्वजनिक व निजी क्षेत्र के बीच कोई कठोर विभाजन रेखा नहीं खींची गयी है। निजी इकाइयाँ भी वर्ग ‘अ’ में वर्णित वस्तुओं का उत्पादन कर सकती हैं। इसी प्रकार सार्वजनिक क्षेत्र के भारी उद्योग निजी क्षेत्र पर निर्भर रह सकते हैं।

(7) विदेशी पूँजी- देशी व विदेशी पूँजी में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं किया जायेगा।

1973 की नई औद्योगिक नीति

(Industrial Policy of 1973)

औद्योगिक क्षेत्र में व्याप्त अनिश्चितता को समाप्त करने तथा पाँचवीं योजना में औद्योगिक उत्पादन में तीव्र गति से वृद्धि करने के लिए 2 फरवरी, 1973 को नवीन औद्योगिक नीति की घोषणा की गयी जिसकी मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(1) बड़े, औद्योगिक घरानों की नयी परिभाषा- इस नीति के अन्तर्गत बड़े औद्योगिक घरानों की परिभाषा में परिवर्तन किया गया। अब 20 करोड़ रुपये से अधिक की सम्पत्ति वाली इकाइयों को बड़े औद्योगिक घरानों की परिभाषा में रखा गया। पहली नीति में यह राशि 35 करोड़ रुपये थी।

(2) सार्वजनिक क्षेत्र के महत्त्व में वृद्धि-1956 की औद्योगिक नीति में वर्ग-अ  उद्योगों को सार्वजनिक क्षेत्र में रखा गया था। इस नीति में इनके अतिरिक्त, (i) जनोपयोगी सेवायें, (ii) उपभोग वस्तुओं का निर्माण करने वाले बड़े उद्योग, (iii) अधिक विनियोग चाहने वाले उद्योगों को सार्वजनिक क्षेत्र में सम्मिलित कर लिया गया है।

(3) संयुक्त-क्षेत्र का विकास- संयुक्त क्षेत्र के उपक्रमों में संचालन, प्रबन्ध-व्यवस्था और नीति-निर्धारण में सरकार का महत्वपूर्ण हाथ रहेगा। सरकार द्वारा यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि बड़े औद्योगिक घरानों, प्रमुख अभिकरणों एवं विदेशी कम्पनियों को उन उद्योगों को चलाने की अनुमति नहीं मिलेगी जिनके चलाने पर पहले से ही उन पर प्रतिबन्ध लगा हुआ है।

(4) बड़े औद्योगिक घरानों एवं विदेशी सहयोग के लिए निर्धारित उद्योग- 19 उद्योगों की एक सूची बनायी गयी है जिसमें अन्य प्रार्थियों के साथ ही बड़े औद्योगिक घराने एवं विदेशी साझीदार भाग ले सकते हैं।

(5) सरकारी क्षेत्र का विकास- कृषि पर आधारित उद्योगों की उदारता से अनुज्ञा-पत्र देने की बात स्वीकार की गई। चीनी उद्योग, जूट उद्योग व सूती उद्योग व सूती वस्त्र उद्योग के साथ-साथ रासायानिक उर्वरक उद्योग को भी इसी श्रेणी में रखा गया है।

(6) पिछड़े क्षेत्रों में औद्योगिक घराने की प्राथमिकता- पिछड़े हुए क्षेत्रों में औद्योगिक विकास के लिए बड़े औद्योगिक घरानों को प्राथमिकता दी जायेगी। बड़े औद्योगिक घरानों में वे सम्मिलित किये जायेंगे जिनके पास अन्तर्सम्बन्धित इकाइयों में 20 करोड़ रुपये से अधिक की सम्पत्ति हो।

(7) अनुज्ञा-पत्र नीति में छूट- एक करोड़ रुपये तक के पूँजीगत निवेश के लिए अनुज्ञा-पत्र लेने की आवश्यकता नहीं होगी। परन्तु 5 करोड़ रुपये से अधिक की परिसम्पत्ति रखने वाले अनुज्ञापत्र या पंजीकृत उपक्रमों को विस्तार और निर्माण में विविधता लाने के लिए औद्योगिक अनुज्ञापत्र लेना अनिवार्य होगा।

1977 की औद्योगिक नीति

(Industrial Policy of 1977)

23 दिसम्बर, 1977 को जनता सरकार ने नवीन औद्योगिक नीति की घोषणा संसद में की जिसके निम्न कारण थे-(i) गत वर्षों में औद्योगिक उत्पादन आशा के अनुरूप नहीं बढ़ा है, (ii) प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय आय गत दस वर्षों में 1.5% बढ़ी है जो अपर्याप्त है, (iii) बेरोजगारी बढ़ी है, (iv) अमीर व गरीब के बीच खाई बढ़ी है, (v) वास्तविक विनियोग की दर लगभग स्थिर रही है, (vi) औद्योगिक उत्पादन में वार्षिक जिद्दी पिछले 10 वर्षों में औसतन 34% रही है, (vii) उद्योगों का केन्द्रीयकरण बढ़ा है, (viii) अनेक उद्योग दुर्बल संरचना के कारण बन्द हो गये। इन सब दोषों को दूर करने के लिए ही जनता सरकार ने नई औद्योगिक नीति की घोषणा करना आवश्यक समझा।

1977 की औद्योगिक नीति के उद्देश्य

(i) औद्योगिक संतुलन व आर्थिक संतुलन की दृष्टि से लघु एवं कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन देना।

(ii) विशाल औद्योगिक इकाइयों का कार्यक्षेत्र सीमित करना,

(iii) विदेशी सहयोग पर रोक लगाना,

(iv) औद्योगिक दृष्टि से पिछड़े क्षेत्रों का विकास करना,

(v) रोजगार के अधिक अवसर उपलब्ध कराना,

(vi) औद्योगिक दृष्टि से देश को आत्म-निर्भर बनाना।

औद्योगिक नीति, 1977 की प्रमुख विशेषताएँ

औद्योगिक नीति, 1977 की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(1) रोजगार-प्रधान नीति- नवीन औद्योगिक नीति का प्रमुख ध्येय ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में व्याप्त बेरोजगारी को समाप्त करना है। इसके लिए नियोजन से सम्बन्ध कार्यक्रमों एवं परियोजनाओं का क्रियान्वयन इस प्रकार किया जायेगा ताकि अधिकाधिक संख्या में लोगों को रोजगार प्रदान किया जा सके और जनसाधारण के जीवन-स्तर में सुधार लाया जा सके।

(2) लघु उद्योग के विकास पर बल- नवीन औद्योगिक नीति के अनुसार जिन वस्तुओं का उत्पादन लघु एवं कुटीर उद्योगों में सम्भव है, उनका उत्पादन उन्हीं क्षेत्रों द्वारा किया जाना चाहिए। लघु क्षेत्र में सम्पन्न की जाने वाली सुरक्षित वस्तुओं की संख्या अब 180 से बढ़ाकर 504 कर दी गई है। इस बात पर भी विशेष ध्यान दिया जायेगा कि लघु उद्योगों द्वारा उत्पादित वस्तुओं का स्तर गुण की दृष्टि से उत्तम हो तथा उनका मूल्य उचित हो।

(3) बड़े घराने (Large Houses)-  मूलतः तीन सिद्धान्तों पर बड़े घराने के लोगों का विस्तार आधारित होगा- (क) एकाधिकार एवं प्रतिबन्धात्मक व्यवहार अधिनियम के अनुसार ही पुराने एवं नये उद्योगों को विकास करने की अनुमति दी जायेगी। इस अधिनियम के प्रावधान प्रभावी उपक्रम (dominant undertaking) से सम्बन्धित बातें प्रभावी ढंग से लागू की जाएंगी (ख) वर्तमान इकाइयों को नवीन पंक्तियों में विकास करने की अनुमति विशेष रूप से लेनी होगी।

(4) औद्योगिक विकास बैंक एवं अन्य वित्तीय संस्थाओं में विशेष विभाग- लघु एवं कुटीर उद्योगों की वित्तीय संस्थाओं में अलग से विभाग स्थापित किये जायेंगे इससे इस क्षेत्र की आवश्यकताओं की अनदेखी न की जा सकेगी। (च) हथकरघा उद्योग का विकास-इस उद्योग का विकास किया जायेगा तथा उचित मात्रा में सूत देने की व्यवस्था की जायेगी। (छ) खादी एवं ग्राम उद्योग आयोग के कार्यों का विस्तार, आजकल 22 ग्राम उद्योग इसके क्षेत्र में आते हैं। यह आयोग इसके विकास के लिए योजनाएँ बनायेगा एवं उनका विकास करेगा।

(5) सार्वजनिक क्षेत्र (Public Sector)-  नयी औद्योगिक नीति में यह विशेष रूप से उल्लेख किया गया है कि सार्वजनिक क्षेत्र न केवल महत्वपूर्ण और मूल दृष्टि से सामरिक महत्त्व की वस्तुओं उत्पादन करेगा बल्कि इसका प्रयोग उपभोक्ताओं को अनिवार्य वस्तुओं के निरन्तर स्मरण कायम करने में एक स्थायीकरण शक्ति के रूप में किया जायेगा।

(6) संयुक्त साहस (Joint Ventures)-  विदेशों में जो संयुक्त साहस स्थापित किये जायेंगे वे मुख्य रूप से मशीनरी, उपकरण, तकनीकी ज्ञान व प्रबन्धकीय अनुभव पर आधारित होंगे।

(7) विदेशी तकनीक एवं विदेशी विनियोग- उद्योगों के लिए आवश्यक तकनीक का विकास यथासम्भव देश में ही किया जाना चाहिए। प्राथमिकता प्राप्त उद्योगों में विदेशी तकनीक के आयात की अनुमति दी जाएगी। सरकार द्वारा विदेशी विनिमय मण्डल के सचिवालय में विदेशी तकनीक समझौतों के पंजीकरण की व्यवस्था की जाएगी। विदेशी कम्पनियों के सम्बन्ध में विदेशी विनिमय नियमन अधिनियम को दृढ़ता से लागू किया जायेगा। विदेशी कम्पनियों के स्वामित्व एवं संचालन में भारतीयों को अधिकाधिक भाग लेने का अवसर दिया जाएगा।

(8) उद्योगों का स्थानीयकरण- नवीन औद्योगीकरण नीति में सन्तुलित क्षेत्रीय विकास पर बल दिया गया है। विकास की क्षेत्रीय असमानताओं को क्रमशः कम किया जायेगा। 10 लाख से अधिक आबादी वाले महानगरों तथा 5 लाख से अधिक आबादी वाले बड़े शहरों के आसपास एक निर्धारित परिधि में उद्योगों की स्थापना के लिए लाइसेन्स नहीं दिये जायेंगे।

(9) श्रमिक भागीदारी- उद्योगों में परिवार नियन्त्रण का होना अराजकता है। इस सम्बन्ध में सरकार की नीति पेशेवर प्रबन्ध पर जोर देने की होगी। सरकार श्रमिकों को भागीदारी देने के प्रश्न का मूल्यांकन कर रही है जिससे कि वे अंशधारी बन सकें और उद्योग के प्रबन्ध में उचित हिस्सा ले सकें।

(10) बीमार उद्योग- भविष्य में बीमार उद्योगों की उचित देखभाल करने के बाद ही उन्हें सरकारी नियन्त्रण में लिया जायेगा। रिजर्व बैंक को यह अधिकार दिया गया है कि बीमार उद्योगों का पता शीघ्र लगायें।

(11) अनुज्ञा-पत्र देने की पद्धति को सुलभ करना- सरकार उद्योगों को लाइसेन्स देने का कार्य सरल बनायेगी। इसके लिए सरकार ने कई उच्च-अधिकार प्राप्त समितियाँ स्थापित की हैं।

1980 की औद्योगिक नीति

(Industrial Policy of 1980)

13 जुलाई 1980 को राज्य उद्योग मंत्री श्री चरणजीत चानना ने भारत सरकार की 1980 की औद्योगिक नीति की घोषणा की जिसमें लघु, मध्यम तथा बड़े पैमाने के उद्योगों के आधुनिकीकरण, विस्तार तथा पिछड़े क्षेत्रों के विकास के सम्बन्ध में अनेक सुविधाएं तथा रियायतें देने की घोषणा की गयी।

भारतीय औद्योगिक नीति 1980 की विशेषताएँ

(1) निजी क्षेत्र के उद्योग- उत्पादन को प्रोत्साहन देने के लिए स्वतः विकास की सुविधा जो अब तक केवल 15 उद्योगों को दी जाती है, अब अन्य बहुत से उद्योगों को भी दी जायेगी। राष्ट्रीय योजनाओं और नीतियों के लक्ष्यों तथा उद्देश्यों के अनुरूप विकास करने के लिए गैर सरकारी क्षेत्र के उपक्रमों को आवश्यक छूट दी जाएगी किंतु सरकार यह सहन नहीं करेगी कि देश में आर्थिक शक्ति तथा धन का केन्द्रीयकरण कुछ ही व्यक्तियों के हाथों में हो अथवा एकाधिकारात्मक प्रवृत्ति को पनपने का अवसर मिले।

(2) क्षेत्रीय असन्तुलन दूर करना- औद्योगिक क्षेत्रीय असन्तुलन को दूर करने और औद्योगिक विकास को इस प्रकार पुनर्जीवित करने में, जिससे राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पुनः फलीभूत होने की स्थिति में पहुँच सके, एक महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

(3) कुटीर एवं लघु उद्योग- अत्यन्त लघु उद्योग के सम्बन्ध में निवेश सीमा एक लाख से बढ़ाकर दो लाख रुपये, लघु उद्योगों में निवेश की सीमा 10 लाख रुपये से बढ़ाकर 20 लाख रुपये तथा सहायक उद्योगों में निवेश की सीमा 15 लाख से बढ़ाकर 25 लाख रुपये कर दी गई है।

(4) सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग- सार्वजनिक क्षेत्र में उद्योगों के प्रति जनता में विश्वास उत्पन्न किया जायेगा। उनकी कार्यक्षमता बढ़ायी जायेगी और उनकी कुशल व्यवस्था के लिए प्रबन्धकों की नई श्रेणी तैयार की जायेगी।

(5) ऋण इकाइयाँ- ऋण इकाइयों को ऐसे स्वास्थ्य उद्योगों के साथ विलय को बढ़ावा दिया जायगा जो कि ऋण इकाइयों का प्रबन्ध करने तथा उन्हें जीवनदान देने में समर्थ हैं। इस सम्बन्ध में सरकार की यह नीति रहेगी कि राज्य सरकार, वित्तीय संस्थाएँ तथा श्रम तीनों मिलकर ऋण इकाई को पुनर्जीवित करें।

(6) औद्योगिक सम्बन्ध- औद्योगिक शान्ति स्थापित करने व श्रमिक व पूँजीपति के पारस्परिक सम्बन्धों को मधुर बनाने के लिए त्रिपक्षीय श्रम सम्मेलन को पुनर्जीवित किया जायेगा।

(7) बफर स्टॉक का निर्माण- लघु उद्योगों को सहायता देने के लिए ऐसे आवश्यक पदार्थों का जो कठिनाई से उपलब्ध होते हैं, बफर स्टॉक बनाया जायेगा। इसके लिए राज्यों में लघु उद्योग विकास निगम तथा केन्द्र में राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम की सहायता ली जायेगी।

(8) क्षेत्रीय असन्तुलन को दूर करना- औद्योगीकरण, क्षेत्रीय असन्तुलन को दूर करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगा। इस दृष्टि से उद्योगों के विकेन्द्रीयकरण और औद्योगीकरण दृष्टि से पिछड़े क्षेत्रों में नयी इकाइयाँ उपलब्ध करने को प्रोत्साहन दिया जायेगा। इस दिशा में विशेष रियायतें और सुविधाएँ उपलब्ध करायी जायेंगी, पिछड़े क्षेत्रों के विकास में सहायता देने के लिए प्रत्येक जिले में Nucleus Plants लगाने का विचार है।

(9) मूल्य स्थायित्व- सरकार की यह नीति रहेगी कि उद्योग मूल्यों को स्थिर रखने, जमाखोरी, चोरबाजारी, सट्टा बाजारी, सट्टा बाजारी को रोकने तथा प्रभावी रूप से उत्पादन बढ़ाने के सम्बन्ध में अपने सामाजिक दायित्व को स्वीकार करे।

(10) वित्तीय सुविधाएँ- सरकार अल्पावधि व दीर्घावधि ऋणों के समन्वय की एक ऐसी पद्धति तैयार करेगी जिसमें विकेन्द्रीकृत क्षेत्र में विकासशील उपक्रमों को ठीक समय पर तथा उपयुक्त शर्तों पर ऋण दिया जाना सुनिश्चित किया जा सके।

(11) रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना- इसके लिए सरकार सार्वजनिक तथा निजी क्षेत्र में पूँजी निवेश को प्रोत्साहन देगी। ग्रामों की आर्थिक निर्भरता बढ़ाने, ग्रामीण जनता को अच्छा रोजगार देने तथा प्रति व्यक्ति आय बढ़ाने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में उपयुक्त उद्योगों को बढ़ावा देने की प्रक्रिया तेज की जायेगी।

(12) विकसित तकनीकें- सरकार विकसित तकनीक के उपयोग पर अनुकूल दृष्टि से विचार करेगी तथा उत्पादन क्षमता में विस्तार करने के लिए प्रोत्साहन देगी। अनुसंधान कार्यों पर भी विशेष बल दिया जायेगा।

(13) लाइसेंसिंग पद्धति- लाइसेंस देने की प्रक्रिया को और भी सरल बनाया जायेगा तथा लाइसेंस लेने के लिए आवेदन-पत्रों पर शीघ्रता से कार्य किया जायेगा।

निष्कर्ष- यह नीति वास्तव में बड़ी उत्साहवर्द्धक है तथा देश में औद्योगीकरण की गति को तीव्रता प्रदान करने वाली है। परन्तु इसकी सफलता के लिए प्रभावपूर्ण समन्वय की आवश्यकता है। केन्द्रीय और राज्य सरकारों में समन्वय होना चाहिए, वित्तीय संस्थाओं द्वारा सहयोग देना चाहिए। श्रम और पँजी में समन्वय होना चाहिए तथा सामान्य जनता को सहयोग देना चाहिए। सबके सहयोग से ही देश का औद्योगीकरण बढ़ेगा, राष्ट्रीय आय और प्रति व्यक्ति आय बढ़ेगी, निर्यात बढ़ेंगे तथा आयात हतोत्साहित होंगे। देश का तीव्र आर्थिक विकास होगा और समाज में सम्पन्नता बढ़ेगी।

1985 की औद्योगिक नीति

(Industrial Policy of 1985)

देश के आर्थिक विकास में आने वाली बाधाओं को दूर करने, गतिशील औद्योगिक वातावरण का निर्माण एवं विकास करने, विनियोग एवं उत्पादन के गति को तेज करने के उद्देश्य से सन् 1985 में नवीन औद्योगिक नीति की घोषणा की गयी जिसकी प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं-

(1) अल्प विकसित क्षेत्रों का विकास- अल्प विकसित एवं प्रादेशिक असन्तुलन को कम करने के उद्देश्य से सरकार ने 87 जिलों को उद्योग रहित जिला घोषित किया है जिनमें उद्योग लगाने के लिए लाइसेंस देने की प्राथमिकी नीति अपनाई है तथा MRTP उपक्रमों को कुछ छूट भी दी गई है।

(2) लघु उद्योग के लिए निवेश सीमा- लघु उद्योगों में निवेश की सीमा 20 लाख से 35 लाख रुपये तथा 25 लाख से 45 लाख रुपये कर दिया गया है जिससे प्राप्त होने वाले लाभ अधिक औद्योगिक उपक्रमों को प्राप्त हो सकेगा।

(3) उद्योगों को लाइसेंस मुक्त करना- उद्योगों की 25 विभिन्न श्रेणियों को लाइसेंस मुक्त कर दिया गया है। यदि उपक्रम MRTP अधिनियम और EFRA के अधिनियम की सीमा में नहीं आता है, उत्पादित की जाने वाली वस्तु लघु क्षेत्र के लिए आरक्षित न हो। जनसंख्या के आधार पर नगरीय सीमा के अन्तर्गत स्थापित न किया जा सकता हो तो ऐसे उपक्रमों को औद्योगिक अनुमोदनों के सचिवालय में केवल पंजीकरण करना होगा।

(4) आधुनिकीकरण को प्रोत्साहन- उद्योगों में आधुनिकीकरण और मशीनों के प्रतिस्थापन की योजना के फलस्वरूप लाइसेंस प्राप्त क्षमता में 49% तक वृद्धि हो जाती है। नयी नीति में यह व्यवस्था की गयी है कि इस प्रक्रिया के अन्तर्गत लाइसेंसिंग प्रावधान में विशेष सुविधा प्रदान की जायेगी।

(5) अन्य- रुग्ण उद्योगों के पुनस्र्थापन, हस्तशिल्प हस्तकरघा, लघु एवं ग्राम उद्योग के विकास, पर्यावरण संरक्षण, प्रौद्योगिकीय विकास आदि के सम्बन्ध में उपयुक्त नीति अपनाने पर बल दिया गया है।

(6) उद्योगों के प्रमुख क्षेत्रों में सरकार द्वारा उद्योग कर नीति की घोषणा का क्रम अपनाया गया है।

(7‍) अतिरिक्त क्षमताओं के पुनः पृष्ठांकन की उदार योजना- अप्रैल 1982 में तीन वर्षों के लिए लागू की गई क्षमता के पुनः पृष्ठांकन की योजना के अन्तर्गत यह प्रावधान रखा गया था कि औद्योगिक उपक्रम अपनी अनुज्ञापित क्षमता को पिछले किन्हीं पाँच वर्षों के दौरान प्राप्त किये गये उच्चतम उत्पादन में उसका 1/3 जोड़कर पुनः पृष्ठांकित करा सकते हैं, बशर्ते यह लाइसेंस क्षमता के 125% से अधिक न हो। इस योजना को और उदार शर्तों पर 1989-90 की अवधि के लिए बढ़ा दिया गया है। अब औद्योगिक उपक्रम पूर्व घोषित कार्यक्रम के अनुसार ही बिना किसी अधिकतम सीमा के पुनः पृष्ठांकित क्षमता को प्राप्त कर सकता है।

यद्यपि 1985 में घोषित औद्योगिक नीति के परिणामों का विश्लेषण करना अभी कठिन है। तथापि अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में गतिशीलता के जो प्रारम्भिक संकेत मिले हैं, वे उत्साहवर्द्धक हैं। राष्ट्रीय प्राथमिकताओं एवं सामाजिक-आर्थिक उद्देश्यों के अनुरूप वर्तमान औद्योगिक नीति को अधिक उदार बना दिया गया है। इसके फलस्वरूप विनियोग व पूँजी के प्रवाह में वृद्धि हुई है। संरचनात्मक क्षेत्र में उत्पादन में वृद्धि हुई है। लाइसेंसिंग नीति में उदारता के फलस्वरूप पिछड़े क्षेत्रों में अनेक नये उपक्रम स्थपित हुए हैं। लघु उद्योगों का विकास उत्साहवर्द्धक रहा है।

आशा है कि इस औद्योगिक नीति के फलस्वरूप सातवीं योजना के विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहायता मिल सकेगी।

नयी औद्योगिक नीति 1991

(Industrial Policy 1991)

नयी औद्योगिक नीति 24 जुलाई, 1991 को संसद में पेश की गयी। इस औद्योगिक नीति में 18 प्रमुख उद्योगों को छोड़कर अन्य सभी के लिए लाइसेंस की व्यवस्था समाप्त कर दी गयी है। इस नीति के अन्य मुख्य बातें इस प्रकार हैं-

  1. सुरक्षा एवं सामरिक महत्व की वस्तुओं से सम्बन्धित उद्योगों, कोयला, चीनी, पेट्रोलियम, मोटर कार, सिगरेट, औषधि, खतरनाक रासायनिक उत्पाद तथा विलासिता की वस्तुओं को छोड़कर शेष सभी पर लाइसेंस समाप्त होगा।
  2. उत्पादन व निर्यात में वृद्धि के लिए विदेशी पूँजी निवेश और तकनीकी सहयोग को प्रोत्साहन दिया जायेगा।
  3. सार्वजनिक कम्पनियों के व्यापार संवर्धन पर सरकार पूरा ध्यान देगी और सामरिक तथा राष्ट्रीय महत्त्व के उत्पादों के विकास और अनुसंधानों को जारी रखेगी।
  4. प्रबन्ध में श्रमिकों की भागीदारी को प्रोत्साहित किया जायेगा ताकि प्रगति और समृद्धि वे समान रूप से भागीदार बन सकें।
  5. उच्च प्राथमिकता वाले उद्येगों में विदेशी तकनीकी सहयोग समझौतों की स्वतः अनुमति होगी।
  6. विदेशी पूँजी निवेश की सीमा बिना किसी हस्तक्षेप के 40 प्रतिशत से 51 प्रतिशत तक बढ़ायी गयी।
  7. उद्योगों को प्रशासकीय व कानूनी नियंत्रण से मुक्त रखने के लिए अनेक उपायों का प्रस्ताव है।
  8. सार्वजनिक क्षेत्र की जिन इकाइयों का काम-काज ठीक नहीं चल पा रहा है, उन्हें औद्योगिक और वित्त पुनर्निर्माण बोर्ड को सौंपा जायेगा।
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Pankaja Singh

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