शिक्षाशास्त्र

भारत में उच्च शिक्षा की प्रगति | ब्रिटिश काल में उच्च शिक्षा का विकास | स्वतन्त्रता के पश्चात् उच्च शिक्षा का विकास

भारत में उच्च शिक्षा की प्रगति | ब्रिटिश काल में उच्च शिक्षा का विकास | स्वतन्त्रता के पश्चात् उच्च शिक्षा का विकास

भारत में उच्च शिक्षा की प्रगति

(Development of higher Education in India)

भारत में प्राचीन काल से उच्च शिक्षा गुरुकुलों तथा आश्रमों में प्रदान की जाती है। इस काल में नालन्दा, तक्षशिला, वल्लभी विद्यालय आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। मुस्लिम काल में उच्च शिक्षा प्रदान करने हेतु विभिन्न मदरसे स्थापित किये गये।

भारत में उच्च शिक्षा का विकास ब्रिटिश काल में ही प्रारम्भ हो गया था। उच्च शिक्षा की प्रगति को दो वर्गों में विभक्त कर सकते हैं-

(I) ब्रिटिश काल में उच्च शिक्षा का विकास

(II) स्वतन्त्रता के पश्चात् उच्च शिक्षा का विकास।

(1) ब्रिटिश काल में उच्च शिक्षा का विकास

(Development of Higher Education in British Period)

ब्रिटिश काल में उच्च शिक्षा के विकास का अध्ययन तीन भागों में विभक्त करके सरलता से किया जा सकता है-

(1) महाविद्यालयों का युग (ब्रिटिश काल के प्रारम्भ से सन् 1857 तक)- अंग्रेजों के शासन के प्रारम्भ से लेकर सन् 1857 ई. तक यहाँ अनेक राजकीय एवं निजी महाविद्यालयों की स्थापना की गई थी यथा-कलकत्ता (कोलकाता), आगरा कालेज, बनारस संस्कृत कालेज आदि। इस समय तक सामान्य शिक्षा के महाविद्यालयों की कुल संख्या 23 थी। सर्वाधिक महाविद्यालय बंगाल में थे। बंगाल में इनकी संख्या 14 थी। इस समय तक मद्रास में 2 कालेज, बम्बई (मुम्बई) में 2 कालेज तथा पश्चिम-उत्तर प्रान्तों में 4 महाविद्यालय स्थापित किये जा चुके थे। सम्पूर्ण भारत में 3 चिकित्सा महाविद्यालय थे-मद्रास, मुम्बई और बंगाल में। इसके साथ ही देश में केवल पश्चिमोत्तर प्रान्त में केवल एक सिविल इन्जीनियरिंग कालेज था।

(2) प्रारम्भिक विश्वविद्यालयों का युग- सन् 1854 के घोषणा पत्र की सिफारिशों के आधार पर सन् 1857 में इंग्लैण्ड के विश्वविद्यालयों के समान ही कलकत्ता (कोलकाता), मद्रास तथा बम्बई (मुम्बई) में विश्वविद्यालय स्थापित किये गये। इन विश्वविद्यालयों का प्रमुख कार्य मात्र परीक्षा लेना था। इसके पश्चात् पंजाब विश्वविद्यालय 1882 में तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालय 1887 ई० में स्थापित किये गये। सन् 1901 में विश्वविद्यालय की संख्या में और अधिक वृद्धि हुई तथा सन् 1902 तक विश्वविद्यालयों की संख्या लगभग 179 पहुँच गई।

सन् 1902 में भारतीय विश्वविद्यालय आयोग की नियुक्ति की गई। इस आयोग का कार्य भारत के विश्वविद्यालयों की भाषा तथा कार्यों का अध्ययन करने के पश्चात् उनमें परिष्करण हेतु सुझाव प्रस्तुत करना था। इस आयोग के सुझावों के आधार पर भारतीय विश्वविद्यालयों के संगठन, कार्य क्षेत्र तथा शासन आदि में अनेक परिवर्तन किये गये, लेकिन 1904 ई० के अधिनियम द्वारा विश्वविद्यालयों की संख्या में वृद्धि करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया।

(3) नवीन विश्वविद्यालयों का युग-(सन् 1907 से सन् 1947) सन् 1907 से सन् 1947 ई. के मध्य चालीस वर्षों में कोई भी नवीन विश्वविद्यालय स्थापित नहीं किया गया। लेकिन महाविद्यालयों की संख्या 185 हो गई। इन समस्त महाविद्यालयों की परीक्षा का उत्तरदायित्व बम्बई (मुम्बई) कलकत्ता (कोलकाता), इलाहाबाद तथा पंजाब विश्वविद्यालयों पर था। इन महाविद्यालयों की परीक्षा संचालन में कठिनाई अनुभव होने के कारण सन् 1913 के सरकारी प्रस्ताव में नवीन विश्वविद्यालय स्थापित करने पर बल दिया गया तथा 15 नवीन विश्वविद्यालयों की स्थापना की गई। 15 नवीन विश्वविद्यालय निम्नलिखित स्थानों पर खोले गये-

  1. मैसूर विश्वविद्यालय — सन् 1916 ई०
  2. पटना विश्वविद्यालय — सन् 1917 ई०
  3. बनारस विश्वविद्यालय — सन् 1917 ई.
  4. उस्मानिया विश्वविद्यालय — सन् 1919 ई.
  5. अलीगढ़ विश्वविद्यालय — सन् 1920 ई.
  6. ढाका तथा लखनऊ विश्वविद्यालय — सन् 1920 ई.
  7. लखनऊ तथा ढाका विश्वविद्यालय — सन् 1922 ई.
  8. नागपुर विश्वविद्यालय — सन् 1923 ई.
  9. आन्ध्र विश्वविद्यालय — सन् 1926 ई.
  10. अन्नामलाई विश्वविद्यालय — सन् 1926 ई०
  11. आगरा विश्वविद्यालय — सन् 1927 ई०
  12. ट्रावनकोर विश्वविद्यालय — सन् 1937 ई.
  13. उत्कल विश्वविद्यालय — सन् 1943 ई.
  14. सागर विश्वविद्यालय —  सन् 1946 ई० 
  15. राजपूताना विश्वविद्यालय — सन् 1947 ई०

उपर्युक्त वर्णन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि ब्रिटिश काल में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में काफी प्रगति हुई।

(II) स्वतन्त्र भारत में उच्च शिक्षा का विकास

(Development of Higher Education in Free India)

1951 से हमारे देश में सभी विकास कार्य योजनाबद्ध तरीके से शुरू किए गए। प्रथम पंचवर्षीय योजना (1951-56) में शिक्षा पर कुल 153 करोड़ रुपये व्यय किए गए जिनमें से 14 करोड़ रुपये विश्वविद्यालयी शिक्षा (सामान्य एवं व्यावसायिक) पर व्यय किए गए। इस योजना में 20 करोड़ रुपये तकनीकी शिक्षा पर व्यय किए गए जिनमें से लगभग 50% अर्थात् लगभग 10 करोड़ रुपये उच्च तकनीकी शिक्षा के विकास पर व्यय किए गए। सरकार ने 1953 में विश्वविद्यालय अनुदान समिति (University Grant Committee) को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (University Grant Commission UGC) के रूप में सम्मुनत किया और इसके निम्नलिखित कार्य निश्चित किए-(i) उच्च शिक्षा के सन्दर्भ में केन्द्रीय सरकार को परामर्श देना,(ii) उच्च शिक्षा संस्थाओं को आर्थिक अनुदान देना, (iii) उच्च शिक्षा संस्थाओं को परामर्श देना, (iv) उच्च शिक्षा संस्थाओं का मार्गदर्शन करना, (v) उच्च शिक्षा का स्तरमान बनाए रखना, (vi) नए विश्वविद्यालयों की स्थापना के सम्बन्ध में विचार करना, (vii) विश्वविद्यालयों से उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रम, शोध कार्य और परीक्षा आदि सम्बन्धित सूचना प्राप्त करना।

वर्ष 1954 में ‘ग्रामीण उच्च शिक्षा समिति’ (Rural Higher Education Committee, RHEC) का गठन किया गया। इस योजना के दौरान कई नए विश्वविद्यालयों और कई कृषि, वाणिज्य इंजीनियरिंग, विधि और शिक्षक शिक्षा के स्वतन्त्र महाविद्यालयों की स्थापना की गई।

द्वितीय पंचवर्षीय योजना (1956-61) में शिक्षा पर कुल 273 करोड़ रुपये व्यय किए गए जिनमें से विश्वविद्यालयी शिक्षा (सामान्य एवं व्यावसायिक) पर 48 करोड़ रुपये व्यय किए गए। इस योजना में तकनीकी शिक्षा पर कुल 49 करोड़ रुपये व्यय किए गए जिनमें से लगभग 24 करोड़ रुपये उच्च तकनीकी शिक्षा के विकास पर व्यय किए गए। इस योजना के दौरान 1956 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (U.G.C.) को संवैधानिक दर्जा दिया गया जिससे उसके अधिकार और बढ़ गए। इस योजना के दौरान कई नए विश्वविद्यालय और एक बड़ी संख्या में नए सामान्य कॉलिज, व्यावसायिक कॉलिज और इंजीनियरिंग कॉलिजों की स्थापना की गई। परिणामस्वरूप 1961 में विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़कर 45 हो गई, महाविद्यालयों की संख्या बढ़कर 1455 हो गई और इनमें पढ़ने वालों की संख्या बढ़कर 6,37,000 हो गई।

तृतीय पंचवर्षीय योजना (1961-66) में शैक्षिक योजनाओं पर कुल 589 करोड़ रुपये व्यय किए गए जिनमें से 87 करोड़ रुपये विश्वविद्यालयी शिक्षा (सामान्य एवं व्यावसायिक) पर व्यय किए गए। इस योजना में तकनीकी शिक्षा पर कुल 125 करोड़ रुपये व्यय किए गए जिनमें से लगभग 65 करोड़ रुपये उच्च तकनीकी शिक्षा के विकास पर व्यय किए गए। इसी बीच 1964 में राष्ट्रीय शिक्षा आयोग का गठन किया गया। इस आयोग ने अपनी रिपोर्ट 1966 में प्रस्तुत की। 1968 में ग्रामीण उच्च शिक्षा समिति (RHEC) ने ग्रामीण उच्च शिक्षा संस्थाओं की स्थापना पर बल दिया। वैसे तो भारत में इससे पहले भी श्री निकेतन (बंगाल),गाँधी धाम (मद्रास), जामिया मिलिया (नई दिल्ली), बिजपुरी (उ० प्र०) अमरावती एवं वर्धा (महाराष्ट्र) में इस प्रकार के ग्रामीण उच्च शिक्षा संस्थान स्थापित थे परन्तु इस सिफारिश के बाद कई अन्य ग्रामीण उच्च शिक्षा संस्थानों की स्थापना हुई। 1961 से 1968 के बीच लगभग एक दर्जन नए विश्वविद्यालय और लगभग 400 नए महाविद्यालय स्थापित किए गए और उच्च व्यावसायिक एवं तकनीकी शिक्षा के प्रसार एवं उन्नयन के लिए विशेष कदम उठाए गए।

चतुर्थ पंचवर्षीय योजना (1969-74) शुरू होने से पहले 1968 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1968) की घोषणा हो चुकी थी। इस योजना में शैक्षिक योजनाओं पर कुल 786 करोड़ रुपये व्यय किए गए जिनमें से 195 करोड़ रुपये विश्वविद्यालयी शिक्षा (सामान्य एवं व्यावसायिक) पर व्यय किए गए। साथ ही इसमें 106 करोड़ रुपये तकनीकी शिक्षा के प्रसार एवं उन्नयन पर व्यय किए गए जिनमें से लगभग 55 करोड़ रुपये उच्च तकनीकी शिक्षा के विकास पर व्यय किए गए। इस योजना के दौरान विज्ञान, कृषि, चिकित्सा और तकनीकी शिक्षा के प्रसार एवं उन्नयन के लिए विशेष प्रयल किए गए।

पाँचवीं पंचवर्षीय योजना (1974-79) में शैक्षिक योजनाओं पर कुल 912 करोड़ रुपये व्यय किए गए जिनमें से 205 करोड़ रुपये विश्वविद्यालयी शिक्षा (सामान्य एवं व्यावसायिक) पर व्यय किए गए। साथ ही 107 करोड़ रुपये तकनीकी शिक्षा के उन्नयन एवं विकास पर व्यय किए गए जिनमें से लगभग 55 करोड़ रुपये उच्च तकनीकी शिक्षा के विकास पर व्यय किए गए। इस योजना के दौरान उच्च शिक्षा के प्रसार की अपेक्षा उसके उन्नयन पर विशेष ध्यान दिया गया। साथ ही उच्च शिक्षा में छात्रों के बढ़ते हुए प्रवेश दबाव की समस्या के समाधान के लिए कॉलिजों में संध्याकालीन शिक्षा की व्यवस्था की गई, विश्वविद्यालयों में पत्राचार पाठ्यक्रम शुरू किए गए और कला एवं वाणिज्य के छात्रों को व्यक्तिगत रूप से परीक्षा देने की सुविधा बढ़ाई गई।

छठी पंचवर्षीय योजना (1980-85) में शैक्षिक योजनाओं पर कुल 2530 रुपये व्यय किए गए जिनमें से 559 करोड़ रुपये विश्वविद्यालयी शिक्षा (सामान्य एवं व्यावसायिक) पर व्यय किए गए। इस योजना में तकनीकी शिक्षा पर 273 करोड़ रुपये व्यय किए गए जिनमें से लगभग 130 करोड़ रुपये उच्च तकनीकी शिक्षा के विकास पर व्यय किए गए। इस योजना के दौरान उच्च शिक्षा को रोजगारपरक बनाने और उसके स्तर को ऊँचा उठाने पर विशेष बल दिया गया और साथ ही उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों के लिए सतत् शिक्षा की व्यवस्था की गई।

सातवीं पंचवर्षीय योजना (1985-90) में शैक्षिक योजनाओं पर कुल 7633 करोड़ रुपये व्यय किये गए जिनमें से 1201 करोड़ रुपये विश्वविद्यालयी शिक्षा (सामान्य एवं व्यावसायिक) पर व्यय किए गए। इस योजना में तकनीकी शिक्षा पर कुल 1083 करोड़ रुपये व्यय किए गए जिनमें से लगभग 500 करोड़ रुपये उच्च तकनीकी शिक्षा के विकास पर व्यय किए गए। इस योजना के दौरान राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 (NEP, 1986) की घोषणा की गई और एक नए जोश के साथ शिक्षा के सभी स्तरों में सुधार की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई। इस योजना के दौरान 1985 में देहली में ‘इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय’ (IGNOU) की स्थापना की गई और दूर शिक्षा कार्यक्रमों का विकास किया गया। साथ ही उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रमों को अद्यतन बनाने की मुहिम शुरू हुई।

आठवीं पंचवर्षीय योजना (1992-97) में शैक्षिक योजनाओं पर कुल 19600 करोड़ रुपये व्यय किए गए जिनमें से 1516 करोड़ रुपये विश्वविद्यालयी शिक्षा (सामान्य एवं व्यावसायिक) पर व्यय किये गए। इस योजना में तकनीकी शिक्षा पर 2786 करोड़ रुपये व्यय किए गए जिनमें से लगभग 1300 करोड़ रुपये उच्च तकनीकी शिक्षा पर व्यय किए गए। साफ जाहिर है कि इस योजना के दौरान व्यावसायिक एवं तकनीकी शिक्षा के प्रसार एवं उन्नयन पर विशेष ध्यान दिया गया। इस दौरान नए-नए व्यावसायिक,तकनीकी एवं प्रबन्ध शिक्षा पाठ्यक्रम शुरू किए गए, मुक्त विश्वविद्यालयों का कार्यक्षेत्र बढ़ाया गया और दूर शिक्षा का विस्तार किया गया।

नवीं पंचवर्षीय योजना (1997-2002) में शैक्षिक योजनाओं के लिए 20381.6 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था जिनमें से 2500 करोड़ रुपये विश्वविद्यालयी शिक्षा और 2373.5 करोड़ रुपये तकनीकी एवं प्रबन्ध शिक्षा के प्रसार एवं उन्नयन के लिए आवंटित किए गए थे। परन्तु व्यय क्रमश: 2270.9 एवं 2109.5 करोड़ रुपये ही किए गए। माध्यमिक शिक्षा के प्रसार के कारण इस योजना के दौरान उच्च शिक्षा के प्रसार के लिए प्रयत्न किए गए।

दसवीं पंचवर्षीय योजना (2002-07) में शिक्षा के लिए 42850 करोड़ रुपयों का प्रावधान किया गया है जिनमें से 3607 करोड़ रुपये उच्च शिक्षा और 4300 करोड़ रुपये तकनीकी शिक्षा के लिए आवंटित किए गए हैं। इस योजना के उच्च शिक्षा सम्बन्धी पाँच मुख्य लक्ष्य हैं-(i) उच्च शिक्षा का विस्तार करना, वर्तमान में 18-23 आयु वर्ग के केवल 6% युवक अध्ययनरत हैं, योजना के अन्त तक इन्हें 10% करने का लक्ष्य है, (ii) वर्तमान पाठ्यक्रमों को अद्यतन बनाना, (iii) इस स्तर पर नए-नए पाठ्यक्रम शुरू करना, (iv) उच्च तकनीकी शिक्षा संस्थानों को साधन सम्पन्न बनाना और (v) उच्च तकनीकी शिक्षा का स्तर उठाना ।

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Pankaja Singh

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