अर्थशास्त्र

भारत के बैंकिंग क्षेत्र में वर्तमान सुधार | बैंकिंग सुधार के दौर | बैंकिंग सुधार का प्रथम दौर

भारत के बैंकिंग क्षेत्र में वर्तमान सुधार | बैंकिंग सुधार के दौर | बैंकिंग सुधार का प्रथम दौर | बैंकिंग सुधार का द्वितीय दौर | बैंकिंग सुधार में सरकार द्वारा निर्णय

भारत के बैंकिंग क्षेत्र में वर्तमान सुधार

भारत में वर्तमान बैंकिंग सुधार को दो भागों में स्पष्ट किया जा सकता है-

बैंकिंग सुधार के दौर (Phases of Banking Reforms):

  1. बैंकिंग सुधार का प्रथम दौर

(1st Phase of Banking Reforms)-

सार्वजनिक व्यापारिक बैंकों के राष्ट्रीयकरण की असफलताओं को ध्यान में रखकर भारत सरकार ने 14 अगस्त, 1991 को देश की कार्यप्रणाली एवं वित्तीय प्रणाली की संरचना में सुधार करने के लिए आवश्यक सुझाव देने हेतु श्री एम. नरसिम्हम की अध्यक्षता में एक समिति गठित की, जिसने अपनी रिपोर्ट 20 नवम्बर, 1991 को प्रस्तुत की।

समिति ने व्यापारिक बैंकों की गिरती लाभदायकता के लिए सार्वजनिक दायित्वों से बंधे होने के कारण गिरती ब्याज से आय निरन्तर बढ़ती हुई बैंकों की परिचालन लागत को उत्तरदायी माना है। समिति ने बैठक प्रणाली में राजनीतिक एवं प्रशासनिक हस्तक्षेप को भी बैंकों की घटती लाभदायकता के लिए दोषी माना है समिति की मुख्य सिफारिशों को देश के बैंकिंग ढाँचे में आधारभूत परिवर्तन करने, बैंकों को अपने क्रियाकलापों में पूर्ण स्वायत्तता देने, बैंक के लिए सर्वाधिक तरलता अनुपात को धीरे-धीरे घटाकर 25 प्रतिशत तक लाने, रियायती ब्याज दरों को समाप्त करने साख हेतु प्राथमिक लक्ष्यों के पुन निर्धारण करने तथा इसे कुल साख के 10 प्रतिशत तक सीमित करने की सिफारिश की गई है।

समिति ने पूँजी बाजार में त्वरित एवं प्रभावपूर्ण उदारीकरण की सिफारिश की है। विकास से सम्बद्ध वित्तीय संस्थाओं के सम्बन्ध में यह कहा गया है कि इन संस्थाओं को प्रतियोगी दरों पर बाजार से ही संसाधन जुटाने चाहिए।

समिति ने निजी क्षेत्र के अन्तर्गत नये बैंकों के विस्तार पर कोई नियंत्रण नहीं लगाया। बैंकों के ढाँचे को पुननिर्मित करके यह सुझाव दिया कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक जो कि लाभकारी गतिविधियाँ सम्पन्न करते हैं को अपनी पूँजी बढ़ाने के लिए पूँजी बाजार में बिना किसी रोकटोक के प्रवेश करने की अनुमति दी जानी चाहिए।

समिति ने बैंकिंग व्यवस्था पर रिजर्व बैंक तथा वित्त मंत्रालय के बैंकिंग विभाग के दोहरे नियंत्रण की व्यवस्था को समाप्त करने और बैंकिंग व्यवस्था पर नियंत्रण हेतु सार्वजनिक संस्था की सिफारिश की है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक के प्रबन्धक मण्डल में सरकार का प्रतिनिधि होना आवश्यक है।

यद्यपि केन्द्र सरकार ने नरसिंहम समिति की सिफारिशों को ध्यान में रखते हुए अनेक वित्तीय परिवर्तनों का समावेश बजट के अन्तर्गत किया है। वित्तीय क्षेत्र के अन्तर्गत लाभकारी प्रभावों का विगत वर्षों के बजटों से परिवर्तन के संकेत मिलते हैं।

चूँकि बैंकों के कामकाज में पारदर्शिता आयी है तथा उनकी वास्तविक वित्तीय स्थिति का अध्ययन भी होता है लेकिन भारतीय बैंकिंग क्षेत्र अभी भी अनेक दुर्बलताओं से ग्रसित है जिससे न तो उसका स्वस्थ विकास हो पा रहा है और न ही स्तर में लेन-देन का त्वरित निपटारा करने में सक्षम है। राष्ट्रीयकृत बैंकोंके समक्ष कड़ी चुनौती है कि वे उच्च कोटि की सेवा में एवं ऋण वसूली सम्बन्धित क्रियाओं को सम्पन्न करें।

  1. बैंकिंग सुधार का द्वितीय दौर

(2nd Phase of Banking Reforms);

वैश्वीकरण के परिप्रेक्ष्य में बैंकिंग सुधारों के लिए गठित दूसरी नरसींहम समिति ने अपनी रिपोर्ट 23 अप्रैल, 1998 को केन्द्रीय वित्त मंत्री को सुपुर्द की। आर्थिक समीक्षा के अनुसार भारतीय बैंकिंग प्रणाली में सुधार लाने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा गया कि महत्वपूर्ण उपलब्धियों के बावजूद हमारी बैंकिंग प्रणाली को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धा में आने के लिए सुधारों की आवश्यकता है।

इसके लिए वित्तीय निष्पादन को बढ़ाने और उच्च क्षमता को प्राप्त करने में उपायों को अपनाने की आवश्यकता है। समिति ने पूँजी खाते में रुपये की पूर्ण परिवर्तनीयता से पूर्व देश में मजबूत व प्रभावी वित्तीय व्यवस्था विकसित करने का सुझाव दिया।

इसके अलावा बैंकों की परिसम्पत्तियों की गुणवत्ता में सुधार, गैर निष्पादन परिसम्पत्तियों में कमी, पूँजी पर्याप्तता अनुपात में वृद्धि, बैंकों को राजनीति से मुक्त करने आदि के परिपेक्ष्य में बैंकिंग क्षेत्र को सुदृढ़ बनाने की दिशा में प्रयास प्रारम्भ हो गये हैं।

इसी प्रकार बैंकिंग प्रणाली को सुदृढ़ करने हेतु पूँजी पर्याप्तता अपेक्षाओं में ऋण जोखिमों के अतिरिक्त बाजारीय जोखिम को भी ध्यान में रखा गया है। वित्तीय क्षेत्र में जो व्यापक सुधार पिछले वर्षों में किये गये वे समग्र आर्थिक सुधारों का एक भाग रहे हैं। वित्तीय का समग्र औचित्य वित्तीय प्रणाली की दक्षता एवं कार्यकुशलता को सुधारना एवं एक ऐसी प्रतियोगी प्रणाली विकसित करना था जिससे विकास का मार्ग प्रशस्त हो सके।

इस संदर्भ में कुछ सीमा तक बैंकिंग क्षेत्र में आम उपभोक्ताओं को अपने धन को अनुकूलतम संसाधनों में निवेश करने के पर्याप्त अवसर उपलब्ध हो रहे हैं। बैंकिंग क्षेत्र में म्यूचुअल फण्ड योजनाएँ सार्वजनिक क्षेत्र के अतिरिक्त निजी क्षेत्र द्वारा भी संचालित की जा रही हैं।

वर्तमान में हमारे देश में लगभग 42 म्यूचुअल फण्ड कार्यरत हैं। ये फण्ड पोर्टफोलियो प्रबन्धक के रूप में कार्य करते हैं। वर्ष 1999-2000 के बजट में म्यूचुअल फण्डों से प्राप्त आय एवं लाभांश को करमुक्त कर दिया गया था। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में क्रेडिट कार्ड व्यवसाय में प्रवेश किया है

इस समय भारत में लगभग 15 लाख से भी अधिक लोगों के पास मास्टर कार्ड हैं एवं वर्ष 1997-98 में इसने 967 करोड़ डालर का व्यवसाय किया था जबकि वर्ष 2006-07 में 135.6 करोड़ डालर का व्यवसाय हुआ है। क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों सहित व्यापारिक बैंकों की कुल शाखाएँ वर्ष 2013-14 में 109811 है, जिनमें से लगभग 50 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्र में है।

ग्रामीण ऋण के सम्बन्ध में रिजर्व बैंक ने एक विशेष ऋण रियायती दर पर देने की रणनीति बनाई है। भारतीय रिजर्व बैंक में आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि व्यापारिक बैंकों के पास जमाओं का 79.9 प्रतिशत भाग सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के पास तथा शेष स्टेट बैंक और उनके सहयोगी बैंकों के पास है।

बैंकिंग सुधार में सरकार द्वारा निर्णय

(Decisions Taken by Government for Banking Reforms)

बैंकिंग सुधार हेतु उपयुक्त समितियों के परिप्रेक्ष्य में भारत सरकार और रिजर्व बैंक ने बैंकिंग एवं वित्तीय क्षेत्र के सुदृणीकरण की दिशा में कार्य प्रारम्भ कर दिया। इस दिशा में निम्नलिखित निर्णय लिये गये- घोषित मौद्रिक एवं साख नीति में सरकारी प्रतिभूतियों के सम्पूर्ण पोर्टफोलियो बाजार को चिन्हित किया गया है।

गैर निष्पादनकारी परिसम्पत्तियों को 5 प्रतिशत के स्तर पर लाने के लिए ऋण वसूली न्यायाधिकरणों को मजबूत किया गया है। साथ ही परिसम्पत्तियों के वर्गीकरण, आय निर्धारण, जोखिम आदि के सम्बन्ध में विवेकपूर्ण उपायों की घोषणा भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा की जायेगी।

इसके अलावा बैंकिंग कानूनों को अधिक प्रभावी बनाने हेतु उनमें संशोधन करने के सुझाव दिये गये हैं। घोषित मौद्रिक एवं साख नीति के अन्तर्गत बैंकों एवं वित्तीय संस्थाओं को पूर्ण पारदर्शिता तथा खुलेपन के साथ कार्य करने के लिए पूँजी पर्याप्तता को सुदृढ़ किया जाना आवश्यक समझा गया। नई मौद्रिक नीति में बैंकिंग सुधार हेतु जोखिम आस्तियों से न्यूनतम आस्तियों का अनुपात वर्तमान में 8 प्रतिशत के स्थान पर 9 प्रतिशत किया जायेगा।

इसी प्रकार बैंकों को परामर्श दिया जा रहा है कि वे साख जोखिम, बाजार जोखिम, भाकर व्यवस्था अब लागू नहीं होगी किन्तु प्रतिमानों में छूट दी गई है। इस प्रकार अधिकांश बैंकों ने अपना ध्यान देश के महानगणे पर केन्द्रित किया है। यह बैंक अपनी सीमित शाखाओं में नवीनतम प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करते हैं।

अतः निष्कर्ष के रूप कहा जा सकता है कि यद्यपि हमारी अर्थव्यवस्था वैश्वीकरण की दिशा में अग्रसर हो चुकी है परन्तु इस दिशा में किये गये बैंकिंग सुधारों की रणनीति में कहीं न कहीं प्रयासों की सफलता में संदेह होता है। हमारे दृष्टिकोण से भारत में वित्तीय सुधारों के अन्तर्गत संरचनात्मक परिवर्तन होना चाहिए साथ ही वित्तीय उदारीकरण में सांख उपयोग एवं ब्याज दरों पर लगे नियंत्रणों को हटाना भी आवश्यक होगा।

चूँकि आर्थिक उदारीकरण की इसी प्रक्रिया के दौरान देश में सामाजिक आर्थिक परिदृश्य में मध्यम वर्ग परिमाणात्मक रूप से बढ़ा है एवं उनकी आकांक्षाओं में वृद्धि हुई है। वित्तीय सुधारों के दौर में भारतीय अर्थव्यवस्था के साथ-साथ देश की बैंकिंग प्रणाली भी संक्रमणकाल से गुजर रही है एवं अपने विकास के मोड़ पर खड़ी है।

चूँकि भारतीय बैंकिंग क्षेत्र ने लोगों की आवश्यकताओं के अनुरूप इस दौर में प्रतिकूल आर्थिक मंदी के बावजूद अपनी वित्तीय स्थिति एवं प्रबन्ध स्तर में सुधार के प्रति गहरी प्रतिबद्धता का परिचय दिया है।

अन्ततः निष्कर्ष स्वरूप यही कहा जा सकता है कि बैंकिंग क्षेत्र में पूर्ण पारदर्शिता एवं दक्षता के साथ स्वयं को पुर्नसंगठित करना होगा। उच्च लाभप्रदता के साथ तेजी से विकसित हो रहे व्यवसाय को सम्भालने में आमूल-चूल परिवर्तन की महती आवश्यकता है।

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Pankaja Singh

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