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बाजार खण्डीयकरण | एक सक्षम खण्डीय कार्यनीति का चुनाव | बाजार खण्डीयकरण के प्रमुख आधार

बाजार खण्डीयकरण | एक सक्षम खण्डीय कार्यनीति का चुनाव | बाजार खण्डीयकरण के प्रमुख आधार | Market Segmentation in Hindi | Selection of an efficient segmental strategy in Hindi | Main Basis of Market Segmentation  in Hindi 

बाजार खण्डीयकरण

बाजार खण्डीयकरण से आशय किसी वस्तु के बाजार को विभिन्न बाजारों अथवा खण्डों एवं उप बाजारों अथवा उपखण्डों में विभाजित किये जाने से है। यह कार्य ग्राहकों की समान प्रकृति, रुचियों, गुणों, और आवश्यकताओं के अनुरूप किया जाता है।

विलियम जे० स्टेण्टन के अनुसार, “बाजार खण्डीयकरण से आशय किसी उत्पाद के सम्पूर्ण विजातीय बाजार को अनेक उप-बाजारों या उपखण्डों में इस प्रकार विभाजित करने से है कि प्रत्येक उप-बजार उपखण्ड में सभी महत्वपूर्ण पहलुओं में समाजातीयता हो।”

ए०राबर्ट के अनुसार, “बाजार खण्डीयकरण बाजारों को टुकड़ों में बाँटने की रीति- नीति है, ताकि उस पर विजय प्राप्त की जा सके।”

एक सक्षम खण्डीय कार्यनीति का चुनाव-

एक फर्म की विपणन रीति-नीति के चुनाव को निम्नांकित महत्वपूर्ण घटक प्रभावित करते हैं-

  1. कम्पनी संसाधान- निःसन्देह कम्पनी संसाधन विपणन रीति-नीति के चुनाव को प्रभावित करते हैं। उदाहरण के लिए, यदि कम्पनी के साधन सीमित हैं तो उनके लिए संकेन्द्रित विपणन रीति-नीति का प्रयोग ही अधिक वांछनीय है। विशाल वित्तीय साधनों की अवस्था में कम्पनी भेदित या अभेदित विपणन रीति-नीति का प्रयोग कर सकती है।
  2. प्रतिस्पर्धी विपणन रीति- नीतियाँ- प्रतिस्पर्द्धा निर्माताओं द्वारा प्रयुक्त विपणन रीति-नीतियाँ भी फर्म के विपणन रीति-नीति के चुनाव को प्रभावित करती है। उदाहरण के लिए यदि प्रतिस्पर्द्धा भेदित विपणन रीति-नीति का प्रयोग कर रहे हैं अर्थात् उन्होंने बाजार को अनेक खण्डों में विभक्त किया है तो ऐसी स्थिति में फर्म को भी भेदित विपणन रीति-नीति का ही प्रयोग करना पड़ेगा। यदि वह अभेदित विपणन का प्रयोग करती है तो उसे प्रतिस्पर्द्धा का सामना करने में काफी कठिनाई का सामना करना पड़ेगा। बाजार में तीव्र प्रतिस्पर्द्धा की अवस्था में भेदित या संकेन्द्रित विपणन रीति- नीति (Strategy) अधिक उपयुक्त है। इसके विपरीत, प्रतिस्पर्द्धा के अभाव में अभेदित विपणन रीति-नीति का भी प्रयोग किया जा सकता है।
  3. उत्पादक एकरूपता- विभिन्न निर्माताओं द्वारा बनायी जाने वाली वस्तुओं में पायी जाने वाली एकरूपता या भिन्नता भी विपणन रीति-रीति के चुनाव को प्रभावित करते हैं। उदाहरण के लिए यदि सभी निर्माताओं के उत्पाद में समानता या एकरूपता है तो फर्म द्वारा अभेदित विपणन रीति-नीति का प्रयोग किया जाता है, जैसे- नमक। इसके विपरीत, कैमरा, घड़ी, कार, पंखे आदि उत्पादों की अवस्था में भेदित या संकेन्द्रित रीति-नीति का प्रयोग ही अधिक उपयुक्त है।
  4. बाजार एकरूपता- इसे अन्य शब्दों में ग्राहक एकरूपता भी कहा जा सकता है। विपणन रीति का चुनाव इस बात पर निर्भर करता है कि ग्राहकों में कितनी समानताएँ है? यदि वस्तु का प्रयोग करने वाले ग्राहकों की आवश्यकताओं, रुचियों, प्रेरणाओं आदि में समानता है तो फर्म द्वारा अमेदित या भेदभावहीन विपणन रीति-नीति का प्रयोग किया जाना अधिक उपयुक्त है। इसके विपरीत, ग्राहक का बाजार एकरूपता के अभाव में भेदित या संकेन्द्रित विपणन रीति-नीति द्वारा बाजार प्रवेश में अधिक सुविधा रहती है।
  5. जीवनचक्र में उत्पाद की अवस्था या स्थिति- एक व्यक्ति के समान ही उत्पाद का भी एक जीवनचक्र होता है। प्रत्येक उत्पाद सामान्यतः प्रस्तुतीकरण, विकास, परिपक्वता, संतृप्ति, पतन तथा अप्रचलन की अवस्थाओं से गुजरता है। विपणन रीति-नीति का चुनाव इस बात पर निर्भर करता है कि उत्पाद उस समय अपने जीवन चक्र की किस अवस्था से गुजर रहा है। उदाहरण के लिए, प्रस्तुतीकरण की अवस्था में अमेदित विपणन रीति-नीति का प्रयोग अधिक उपयुक्त रहा है। इसके विपरीत, विकास अवस्था में संकेन्द्रित विपणन रीति-नीति का संतृप्ति की अवस्था में भेदित विपणन रीति-नीति का प्रयोग अच्छा रहता है। अपेक्षाकृत नये उत्पाद के लिए अभेदित या संकेन्द्रित विपणन रीति नीति और पुराने उत्पाद के लिए मंदित विपणन रीति-नीति अधिक उपयुक्त रहती है।
  6. सरकारी नीति- सरकारी नीति भी विपणन रीति-नीति के चुनाव को प्रभावित करती है। उदारण के लिए यदि सरकार ने किसी उत्पाद के वितरण के विषय में कुछ निर्देश निर्गमित किया है तो निर्माता का उक्त निर्देश के अनुसार ही उस उत्पादक के विपणन रीति-नीति का निर्धारण करना होगा अन्यथा सरकार उसके विरुद्ध कार्यवाही कर सकती है।

बाजार खण्डीयकरण के प्रमुख आधार

बाजार की कई विधियों से अनेक आधारों पर विभक्त किया जा सकता है। इन्हें विभक्त करने के लिए प्रायः विभिन्न मापदण्डों का प्रयोग किया जाता है। विभिन्न वस्तुओं के बाजार विभाजन के भिन्न-भिन्न प्रकार के मापदण्ड प्रयुक्त होते हैं। ये मुख्य रूप से आर्थिक एंव समाजिक होते हैं। जैसे आयु, लिंग, आय स्तर, शिक्षा, व्यवसाय आदि। आदि। विभक्तीकरण के विभिन्न आधारों को इस प्रकार समझा जा सकता है-

(अ) सामाजिक व आर्थिक तत्व- बाजार में महत्वपूर्ण खण्डों की स्थापना के लिए सामाजिक-आर्थिक आधार सबसे अधिक प्रचलित आधार रहे हैं, क्योंकि एक तो, ये चल अनेक उत्पादों के विक्रय के साथ अच्छी तरह सम्बन्धित होते हैं, दूसरे, इन्हें पहचानना सरल है तथा तीसरे अन्य अनेक चलों की अपेक्षा इनका माप अधिक सरलता से हो जाता है। इनमें आय, आयु, लिंग, शिक्षा, परिवार का आकार, धर्म जातीयता, राष्ट्रीयता तथा पेशा आदि तत्व उल्लेखनीय हैं।

(1) उपभोक्ता की आय- बाजार विभक्तीकरण का एक प्रमुख एवं आर्थिक मापदण्ड व्यक्तियों की आय है। एक उत्पादक को अपनी विक्रय नीति तय करने से पहले इस बात पर विचार कर लेना चाहिए कि वह जिन व्यक्तियों के लिए वस्तु बना रहा है उनकी आय क्या है?.

(2) उपभोक्ता की आयु- क्रेताओं की आयु के आधार पर भी बाजार विभक्तीकरण किया जा सकता है?

(3) उपभोक्ता का लिंग – लिंग भेद भी बाजार विभक्तीकरण का महत्वपूर्ण सामाजिक आधार है। स्त्री एवं पुरुषों की आवश्यकताएँ एवं मानसिक प्रवृत्ति भिन्न भिन्न होती है।

(4) उपभोक्ता की शिक्षा- शैक्षणिक योग्यता के आधार पर भी क्रेताओं का वर्गीकरण किया जा सकता है।

(5) उपभोक्ता का धन्धा या पेशा- धन्धा या पेशा भी बाजार विभक्तीकरण का एक महत्वपूर्ण आर्थिक मापदण्ड है।

(6) उपभोक्ता में नगरीकरण की स्थिति- नगरीकरण के आधार पर बाजार को निम्न भागों में बाँटा जा सकता है-शहर बाजार भाग, ग्रामीण बाजार भाग तथा मेट्रोपोलियन बाजार भाग आदि।

(7) उपभोक्ता की जाति- अपने उत्पादों के लिए विपणन कार्यक्रम निर्धारित करते समय विपणन प्रबन्धक को जातीयता के आधार पर बाजार विभक्तीकरण कर लेना चाहिए।

(8) उपभोक्ता का धर्म- जातीयता की तरह धर्म के आधार पर भी बाजार का विभक्तीकरण किया जा सकता है। विभिन्न जातियाँ भिन्न-भिन्न धर्मों का पालन करती हैं तथा उनके धार्मिक विचार, उनके रहन-सहन के स्तर तथा खान-पान को प्रभावित करते हैं। इस प्रकार धर्म के आधार पर बाजार का विभक्तीकरण करना विपणन प्रबन्ध के लिए सहायक सिद्ध होता है।

(ब) भौगोलिक तत्व- अनेक विक्रेता अपने बाजार के भीतर भौगोलिक विभिन्नताओं की मान्यता देते हैं। उदाहरणार्थ, एक फुटकर विक्रेता अपने पड़ोसी ग्राहकों और अधिक दूर के ग्राहकों में एक स्थानीय खाद विक्रेता शहरी ग्राहकों और ग्रामीण ग्राहकों में, एक प्रान्तीय निर्माता ठण्डे, गर्म एवं शीतोष्ण प्रदेश के ग्राहको में, एक राष्ट्रीय निर्माता विभिन्न प्रान्तों में भेद कर सकता है। इन समस्त दशाओं में भौगोलिक इकाइयाँ विपणन प्रयासों की भिन्नता का आधार बनायी गयी है।

(स) व्यक्तित्व सम्बन्धी तत्व- कुछ वस्तुओं के सम्बन्ध में यह देखा गया है कि क्रेता -व्यवहार की भिन्नताओं के पीछे व्यक्तित्व तत्व भी प्रभावशाली भूमिका अदा करते हैं। उदाहरणार्थ, उच्च और विशिष्ट श्रेणी के व्यक्ति कैपस्टन सिगरेट ही पसन्द करते हैं। इसी प्रकार लोग कहते हैं कि फोर्ड खरीदने वाले ग्राहक शिवरलैट खरीदने वाले ग्राहकों से एक भिन्न प्रकार का व्यक्तित्व रखते हैं।

(द) क्रेता व्यवहार सम्बन्धी तत्व- क्रेता व्यवहार सम्बन्धी तत्वों का तात्पर्य उन तत्वों से है जो एक उत्पाद के साथ क्रय के सम्बन्ध में एक या दूसरे पहलू को व्यक्त करते हैं। ऐसे तत्वों में प्रयोग दर, ग्राहक, अभिप्रेरणा, ब्राण्ड-निष्ठा आदि आते हैं।

(य) प्रयोक्ता आकारप्रौद्योगिक बाजार प्रयोक्ताओं के आधार पर विभाजित किया जा सकता है। औद्योगिक प्रयोक्ता से आशय उस ग्राहक से होता है जो वस्तुओं एवं सेवाओं को आगे उत्पादन कार्य के लिए खरीदता है। औद्योगिक प्रयोक्ता आकार में भिन्न हो सकते हैं, क्योंकि कुछ के पास बहुत कम कर्मचारी होते हैं और कुछ के पास हजारों कर्मचारी होते हैं।

(र) मात्रा- इसमें वस्तु के क्रेताओं की क्रय मात्रा के आधार पर बाजार का विभक्तीकरण हो सकता है।

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