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औद्योगिक विवाद से आशय | औद्योगिक विवादों के प्रभाव | औद्योगिक विवादों के दुष्परिणाम | औद्योगिक विवादों के सुपरिणाम | भारत में औद्योगिक विवादों के प्रमुख कारण

औद्योगिक विवाद से आशय | औद्योगिक विवादों के प्रभाव | औद्योगिक विवादों के दुष्परिणाम | औद्योगिक विवादों के सुपरिणाम | भारत में औद्योगिक विवादों के प्रमुख कारण | Meaning of industrial dispute in Hindi | Effects of Industrial Disputes in Hindi | Consequences of Industrial Disputes in Hindi | Consequences of Industrial Disputes in Hindi | Major causes of industrial disputes in India in Hindi

औद्योगिक विवाद से आशय

(Meaning of Industrial Disputes)

औद्योगिक विवाद से तात्पर्य उपक्रमों में उत्पन्न होने वाले ऐसे विवादों या मतभेदों से हैं जो धीरे-धीरे बढ़कर औद्योगिक विवाद का रूप धारण कर लेते हैं।

औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 2(K) के अनुसार, “औद्योगिक विवाद या विवाद से आशय सेवायोजकों एवं सेवायोजकों के मध्य या सेवायोजकों एवं श्रमिकों के मध्य या श्रमिकों एवं श्रमिकों के मध्य उत्पन्न किसी विवाद या मतभेद से है जो किसी भी व्यक्ति के रोजगार या रोजगार की भर्ती या कार्य की दशाओं से सम्बन्धित है।”

डेल योडर ने औद्योगिक विवाद को परिभाषित करते हुये लिखा है कि “औद्योगिक विवाद या विवाद से आशय कर्मचारियों के ऐसे व्यवहार से है जो कार्य के प्रति विद्यमान असन्तोष को व्यक्त करता है तथा यह एक ऐसी भावना है जो रोजगार सम्बन्धी व्यक्तिगत तथा सामाजिक आवश्यकताओं तथा कर्मचारियों की आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर रहे हैं।”

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि, औद्योगिक विवाद से आशय श्रमिकों एवं सेवायोजकों के मध्य उत्पन्न ऐसा असन्तोष या मतभेद है जिसमें दोनों पक्षों द्वारा परस्पर विरोधी भावनायें रखी जाती है। इसमें हड़ताल, तालाबन्दी, घेराव, धीरे काम करो आदि बातों को सम्मिलित किया जाता है।

औद्योगिक विवादों के प्रभाव अथवा दुष्परिणाम

औद्योगिक विवाद का प्रत्यक्ष परिणाम हड़ताल तथा तालाबन्दी होता है। हड़ताल एवं तालाबन्दी से उत्पादक, श्रमिक तथा राष्ट्र सभी वर्गों को हानि होती है, जैसा कि निम्नलिखित विवरण से स्पष्ट होता है –

(क) उत्पादकों को हानि

(1) उत्पादनों की मात्रा में-कमी जब किसी उद्योग में हड़ताल या तालाबन्दी हो जाती है तो उत्पादन कार्य में रुकावट आती है, जिससे उत्पादन की मात्रा में कमी आ जाती है और राष्ट्रीय आय और प्रति व्यक्ति का आय स्तर गिर जाता है।

(2) अनुशासनहीनता- हड़तालग्रस्त उद्योग में अनुशासन व्यवस्था समाप्त हो जाती है। हड़ताल द्वारा उत्पन्न अनिश्चित वातावरण में अनैतिकता को प्रोत्साहन मिलता है।

(3) सहायक खर्चों की कमी- औद्योगिक विवादों के कारण उत्पादन को एक ओर तो सम्भावित लाभ से वंचित रहना पड़ता है और दूसरी ओर सहायक खर्चे, जैसे- कारखाने का किराया, पूँजी का ब्याज, उच्च पद पर कार्य करने वाले कर्मचारियों का वेतन आदि भी देना पड़ता है।

(ख) श्रमिकों के लिये हानि

(1) मजदूरी की कमी- श्रमिकों को हड़ताल अथवा तालाबन्दी की अवधि में मजदूरी नहीं दी जाती है, जिससे उनकी मजदूरी में कमी आ जाती है।

(2) स्वास्थ्य पर कुप्रभाव- श्रमिकों को मजदूरी के अभाव में भरपेट खुराक नहीं मिल पाती है, जिससे उनके स्वास्थ्य एवं कार्यक्षमता पर कुप्रभाव पड़ता है।

(3) हड़ताल की असफलता के भयानक परिणाम- जब कभी श्रमिकों की हड़ताल असफल हो जाती है, तो उन्हें इसके भयानक परिणाम भुगतने होते हैं। सेवायोजक अधिक मनमानी करने लगते है।

(ग) समाज व राष्ट्र के लिये हानि

(1) सामाजिक अव्यवस्था- हड़तालों व तालाबन्दियों के परिणामस्वरूप सामाजिक वातावरण दूषित होता है और समाज में अनिश्चितता तथा असुरक्षा की भावना का उदय हो जाता है।

(2) जनसाधारण के लिये संकट- जब कभी जनोपयोगी सेवा, जैसे रेल, डाक, तार, पानी, बिजली आदि संस्थाओं में हड़ताल अथवा तालाबन्दी की स्थिति उत्पन्न हो जाती है, तो इससे जनसाधारण को बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, क्योंकि ये जीवन की आवश्यक सेवायें हैं, इनके बिना मनुष्य का जीवन सामान्य गति से नहीं चल सकता।

औद्योगिक विवादों के सुपरिणाम

औद्योगिक विवादों के उपुर्यक्त दुष्परिणामों के अतिरिक्त कुछ अच्छे परिणाम भी सामने आते हैं, जैसे – औद्योगिक विवादों से श्रमिकों में पारस्परिक सहयोग एवं एकता की भावना का विकास होता है, श्रमिकों को आवश्यक मजदूरी, बोनस व अन्य सुविधायें प्राप्त हो जाती हैं, उनकी कार्य सम्बन्धी दशाओं में सुधार हो जाता है आदि।

भारत में औद्योगिक विवादों के प्रमुख कारण

भारत में औद्योगिक संघर्षो के इतिहास से स्पष्ट है कि वे यहाँ पर बहुत ही सामान्य होते है। इनका मुख्य कारण उद्योगपतियों व श्रमिकों के बीच पाये जाने वाले आपसी मतभेद हैं। इन मतभेदों के बहुत से कारण हैं, जिनमें से कुछ आर्थिक, कुछ मनोवैज्ञानिक, कुछ राजनैतिक व सामाजिक और कुछ प्रबन्ध सम्बन्धी है। औद्योगिक विवाद के निम्नलिखित मुख्य कारण हैं-

(1) कम मजदूरी – भारतीय उद्योगों में श्रमिक की मजदूरी की दर बहुत ही कम है। यह दर इतनी कम रही है कि इससे श्रमिक अपनी जीवन सम्बन्धी आवश्यकता की भी पूर्ति करने में असमर्थ रहे हैं। फलस्वरूप वे अपनी मजदूरी को बढ़वाने के लिये हड़तालें करते हैं। यही उनके पास एक महत्वपूर्ण हथियार है।

(2) काम करने के घण्टे- कुछ औद्योगिक संघर्षों का कारण काम करने के घण्टे भी हैं। बहुत से उद्योगपतियों की धारणा है कि अधिक घण्टों तक काम से लाभ होता है। लाभ होता है या नहीं यह तो दूसरा प्रश्न है, परन्तु इस बात से श्रमिकों के बीच असंतोष फैलता है और वे काम के घण्टे कम करने के लिये हड़ताल करते हैं।

(3) काम की दशा- बहुत से औद्योगिक विवाद काम करने की दशाओं से सम्बन्धित होते हैं। प्रायः देखने में आता है कि कारखानों के अन्दर इतनी गन्दगी रहती है कि श्रमिकों का स्वास्थ्य खराब होने का भय रहता है। कारखाने के अन्दर न विश्रामगृह का उचित प्रबन्ध रहता है और न कैन्टीन, पाखाना, पेशाबघर तथा स्नानघर आदि का। ऐसी परिस्थिति में श्रमिक उचित माँग करते हैं और उन्हें यह काम हड़तालों की सहायता से करना पड़ता है।

(4) श्रमिकों की छंटनी (Retrenchment) – विवेकीकरण (Rationalisation) या किसी भी कारण से प्रभावित होकर जब कभी उद्योगपति श्रमिकों की छंटनी करने लगते हैं, तो इस बेरोजगारी के युग में श्रमिकों को बड़ी कठिनाई हो जाती है। फलस्वरूप वे अपनी रक्षा के हेतु हड़ताल रूपी शस्त्र को गहण करते हैं और उद्योगपतियों को बाध्य करते हैं कि वे उन्हें काम से न निकालें।

(5) प्रबन्धकों का व्यवहार- भारतीय प्रबन्धक, जिनमें निरीक्षक आदि सम्मिलित हैं, श्रमिकों को सदैव निम्न स्तर के समझते रहे हैं। उनसे सम्मान के साथ बात करना या सहृदयता के साथ किसी प्रकार के सुझाव देना अपना अपमान समझते हैं। छोटी-छोटी बातों में श्रमिकों को परेशान करना या बुरे शब्दों का प्रयोग करना तथा इस व्यवहार पर शिकायत करने पर उनके साथ दुर्व्यवहार करना, उनके ऊपर जुर्माना करना आदि के परिणामस्वरूप श्रमिकों को इन व्यवहारों से बचने के लिये हड़तालरूपी अस्त्र ग्रहण करना पड़ता है।

(6) श्रमिकों की भर्ती की पद्धति- औद्योगिक विवाद का एक अन्य महत्वपूर्ण कारण कारखानों तथा अन्य उद्योगों में श्रमिकों की भर्ती करने की अत्यन्त दोषपूर्ण पद्धति है। श्रमिकों की भर्ती ठेकेदार, मिस्त्रियों और जमींदारों आदि मध्यस्थों द्वारा होती है। ये श्रमिकों से घूस आदि लेते हैं और उनका मनचाहे ढंग से शोषण करना चाहते हैं। इनके दुर्व्यवहारों तथा शोषण की प्रवृति से परेशान होकर श्रमिक हड़ताल करते हैं और औद्योगिक शान्ति भंग हो जाती है।

(7) श्रमिकों की अशिक्षा एवं अज्ञानता- भारतीय श्रमिक अधिकतर अशिक्षित एवं अनभिज्ञ होते हैं। वे अपनी अच्छाई-बुराई को स्वयं नहीं सोच सकते हैं। वे दूसरों के द्वारा बतलाये हुये मार्ग को ही अपना लेते हैं। उनकी दशा का अनुचित लाभ उठाते हुये कुछ स्वार्थी व्यक्तियों ने उनमें कटुता व वैमनस्य की भावना जागृत कर दी है। इससे विवाद को बढ़ावा मिलता है।

(8) असन्तोषजनक भावना- कम अवकाश या विश्राम के कम अवसर मिलने के कारण श्रमिकों में असन्तोष की भावना उत्पन्न हो जाती है। इस असन्तोष की भावना को उद्योगपतियों के अनेक निन्दनीय व्यवहार; जैसे महीने में केवल दो ही हफ्ते कार्य देना, श्रमिकों की नौकरी में अस्थिरता बनाये रखना इत्यादि और अधिक बढ़ा देते हैं। परिणामतः विवाद इस असन्तोष के कारण हो जाया करते हैं।

(9) श्रम संघ- औद्योगिक अशान्ति का एक मुख्य कारण श्रम संघों की स्थापना तथा उनका विकास है। श्रम संघों को उसके लिये उत्तरदायी बताया जाता है, क्योंकि इनकी स्थापना तथा विकास के पूर्व औद्योगिक विवाद केवल नाममात्र के थे। उद्योगपति इनको अपने अधिकारों के प्रति चुनौती समझते हैं। इसलिये वे इनके विकास में बाधा उपस्थित करने का प्रयत्न करते हैं और परिणामस्वरूप विवाद होता है।

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Pankaja Singh

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