अर्थशास्त्र

औद्योगिक एवं लाइसेसिंग नीति 1999 में संशोधन | भारत सरकार की औद्योगिक नीति में संशोधन तथा उदारीकरण के प्रभाव | जुलाई, 1991 में औद्योगिक नीति को बदलने की आवश्यकता | नवीन औद्योगिक नीति का आलोचनात्मक मूल्यांकन

औद्योगिक एवं लाइसेसिंग नीति 1999 में संशोधन | भारत सरकार की औद्योगिक नीति में संशोधन तथा उदारीकरण के प्रभाव | जुलाई, 1991 में औद्योगिक नीति को बदलने की आवश्यकता | नवीन औद्योगिक नीति का आलोचनात्मक मूल्यांकन

औद्योगिक एवं लाइसेसिंग नीति 1999 में संशोधन

जुलाई, 1991 में औद्योगिक नीति को बदलने की आवश्यकता

(Rationale for Change in Industrial Policy in July, 1991)

भारत सरकार का 1992-93 में औद्योगिक उदारीकरण का रुख (Industrial Liberalisation Approach in 1992-93 of Govt. of India)- देश में औद्योगिक विकास में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए भारत सरकार ने 1991 में घोषित नवीन औद्योगिक नीति में वर्ष 1992-93 में और भी उदारीकरण का रुख अपनाया अर्थात् उद्योगपतियों को निम्नलिखित सुविधायें और प्रदान की हैं-

(1) औद्योगिक एल्कोहल निर्माण को लाइसेंस व्यवस्था से मुक्त कर दिया गया है।

(2) खनिज तेल के सम्बन्ध में खोज एवं शोधन सम्बन्धी कार्य जो सार्वजनिक क्षेत्र के लिए ही आरक्षित थे उन्हें निजी क्षेत्र के विनियोग के लिए छूट दे दी गयी है।

(3) ऊर्जा क्षेत्र को इस उदारीकरण नीति में देशी व विदेशी विनियोगकर्ताओं के विनियोग के लिए खोल दिया गया है।

(4) अनिवार्य लाइसेंस उद्योगों के अलावा अन्य उद्योगों के लिए क्षमता विस्तार के सम्बन्ध में छूट प्रदान की गयी है।

(5) विदेशी विनियोग को अधिक उधार एवं सरलीकरण करने के साथ-साथ फेरा नियमन एवं फेरा कम्पनियों के विनियोगों पर अंकुश को कम किया गया है।

(6) खनिज नीति में आवश्यक संशोधन कर 6 मार्च, 1993 को खनिज क्षेत्र को निजी एवं सार्वजनिक विनियोग के लिए खुला छोड़ दिया गया है।

(7) भारतीय पूँजी बाजार पर सरकारी नियन्त्रण को समाप्त करने के लिए पूँजी निर्गमन नियन्त्रक व्यवस्था को समाप्त कर नवीन व्यवस्था को प्रारम्भ किया गया है।

1993 से 1998 तक औद्योगिक नीति में और सुधार-

भारत सरकार ने अपनी औद्योगिक नीति को और अधिक उदार बनाने के लिए वर्ष 1993 से 1998 तक और अधिक सुधार किये, जिनका विवेचन निम्न प्रकार है-

(1) सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित 13 खनिजों को निजी क्षेत्र के लिए खोला गया- भारत सरकार ने 26 मार्च, 1993 को सार्वजनिक क्षेत्र के लिये आरक्षित 13 खनिजों को अब निजी क्षेत्र के लिए और खोल दिया है जिसके फलस्वरूप अब सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित उद्योगों की संख्या घटकर केवल 6 रह गयी है जिनमें (1) सुरक्षा उत्पाद (2) अणु शक्ति (3) कोयला तथा लिग्नाइट (4) खनिज तेल (5) रेल परिवहन (6) अणु शक्ति आदेश 1953 में अनुसूचित खनिज सम्मिलित आते हैं। परन्तु वर्तमान के कोयला तथा ग्रेनाइट और खनिज तेल को भी निजी क्षेत्र के लिये खोल दिया गया है अबकेवल 4 उद्योग ही सार्वजनिक क्षेत्र के लिये आरक्षित रह गये हैं।

(2) कई नये उद्योग लाइसेंस व्यवस्था से मुक्त- केन्द्रीय सरकार ने मोटर कार और श्वेत माल (White Goods) उद्योगों को 28 अप्रैल, 1993 से अपनी लाइसेंस व्यवस्था से मुक्त कर दिया है। इसी तरह कच्ची हड्डियाँ, चमड़ा और पेटेन्ट चमड़ा इत्यादि उद्योगों को भी लाइसेंस व्यवस्था से मुक्त कर दिया गया है। वर्तमान में केवल 15 उद्योगों के लिए ही लाइसेंस प्राप्त करना अनिवार्य रह गया है।

(3) रेडीमेड गारमेण्ट उत्पादन को बड़े उद्योगों के लिए खोल दिया गया है- यह उद्योग 29 जुलाई, 1993 तक सहायक तथा लघु उद्योगों के लिए आरक्षित था, लेकिन बड़े उद्योगों पर 50 प्रतिशत निर्यात करने की जिम्मेदारी डाली गयी है। इसके साथ ही यह शर्त रखी गयी है कि उनकी स्थायी प्लान्ट तथा मशीनरी 3 करोड़ रुपये से अधिक रकम की नहीं होनी चाहिए।

(4) सार्वजनिक क्षेत्र के 9 प्रतिष्ठानों को स्वायत्तता- भारत सरकार ने इन संशोधन में सार्वजनिक क्षेत्र के 9 प्रतिष्ठानों को स्वायत्तता प्रदान करके उन्हें सार्वभौमिक अधिकार प्रदान कर दिये गये हैं।

(5) तेल की खोज तथा औद्योगिक पार्की को आधारभूत संरचना का दर्जा- भारत सरकार ने अपनी औद्योगिक नीति को और अधिक उदार बनाने के लिए देश में तेल की खोज तथा औद्योगिक पार्की को आधारभूत संरचना का दर्जा दे दिया है।

(6) लघु उद्योगों की आरक्षित सूची से 14 मदों को निकालना- भारत सरकार ने वर्ष 1997-98 के बजट में लघु उद्योगों की आरक्षित सूची में से 14 मदों को निकाल दिया है। वर्तमान में अब 822 मदें रह गयी हैं।

(7) लघु उद्योगों की मशीनरी एवं संयंत्र में पूँजी सीमा में वृद्धि– भारत सरकार ने 1 मार्च, 1997 से लघु उद्योगों की मशीनरी तथा संयंत्र में पूंजी विनियोग सीमा 60 लाख रूपये और 75 लाख रुपये से बढ़ाकर 3 करोड़ रुपये कर दी हैं। इसी प्रकार अति लघु उद्योगों में पूँजी विनियोग सीमा 5 लाख रुपये से बढ़ाकर 25 लाख रुपये कर दी हैं।

भारत सरकार की औद्योगिक नीति में संशोधन तथा उदारीकरण के प्रभाव

(Effect of Amendments and Liberalisation in Industrial Policy of Government of India)

भारत सरकार के द्वारा औद्योगिक नीति में वर्ष 1991 से लेकर 1993-94 तक जो आवश्यक संशोधन एवं आर्थिक सुधार लागू किये गये हैं, उनका संक्षिप्त विवेचन अग्रलिखित है-

(1) सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित उद्योगों की संख्या 17 से घट करके मात्र अब 6 रह गयी है- (i) अणु शक्ति (ii) कोयला एवं लिग्नाइट (iii) सुरक्षा उत्पाद (iv) रेल परिवहन, (v) खनिज तेल (vi) अणु शक्ति आदेश 1953 में अनुसूचित खनिज सम्मिलित हैं।

(2) लाइसेंस की अनिवार्यता अब 9 उद्योगों के लिए- भारत सरकार ने आवश्यक संशोधनों एवं परिवर्तनों के तहत अब केवल 9 उद्योगों के लिए लाइसेंस की अनिवार्यता रखी है तथा बाकी समस्त उद्योगों को लाइसेंस से मुक्त कर दिया गया है।

(3) अनेक उद्योगों को विदेशी पूँजी विनियोग में छूट- सरकार ने अनेक उद्योगों की विदेशी पूँजी विनियोग में छूट प्रदान की है जिससे उनमें पर्याप्त पूंजी विनियोग होने के साथ- साथ सम्बन्धित क्षेत्र के विकास को बढ़ावा मिल सके।

(4) सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में पूँजी विनिवेश की सुविधा- भारत सरकार ने औद्योगिक नीति में संशोधनों एवं उदारीकरण के तहत सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में पूँजी विनिवेश की सुविधा प्रदान की है और वित्त वर्ष 1998-99 में लगभग 5000 करोड़ रुपये के विनिवेश की बजट में व्यवस्था की गयी है।

(5) फिल्म निर्माण को उद्योग का दर्जा- सरकार ने अब फिल्म निर्माण को उद्योग का दर्जा प्रदान कर दिया है जिससे यह उद्योग देश में तेजी से प्रगति कर सके।

(6) 3 खनिज उद्योग क्षेत्रों में भी अप्रवासी भारतीयों तथा समुद्र पार निगमों को शत प्रतिशत अंशपूजी में विनियोग की छूट- भारत सरकार ने अपनी उदारीकरण की नीति में 3 खनिज उद्योग क्षेत्रों में भी अप्रवासी भारतीयों और समुद्र पार निगमों को शत-प्रतिशत अंशपूंजी में विनियोग की छूट प्रदान की गयी हैं।

(7) आधारभूत संरचना विकास के लिए प्रमुख क्षेत्रों में निजी क्षेत्र को छूट एवं सुविधायें- भारत सरकार ने औद्योगिक नीति में उदारीकरण के फलस्वरूप आधारभूत संरचना के तीव्र विकास के लिए निजी क्षेत्र को प्रमुख क्षेत्रों में सड़क, विद्युत शक्ति, जहाजरानी एवं बन्दरगाह, टेलीकॉम्युनिकेशन, हवाई अड्डों तथा वायु सेवा में विनियोग तथा संचालन सम्बन्धी छूट प्रदान की है।

(8) उद्योगों में विदेशी पूँजी विनियोग में वृद्धि- सरकार की औद्योगिक नीति में संशोधन एवं उदारीकरण के फलस्वरूप प्रत्यक्ष पूँजी विनियोगों को बढ़ावा देने के लिए अनेक छूट एवं रियायतों की समय-समय पर घोषणा की है।

(9) स्वतंत्र प्रशुल्क आयोग- सरकार की उदारीकरण की नीति में प्रशुल्क सम्बन्धी मामलों की देखरेख करने के लिए एक स्वतंत्र प्रशुल्क आयोग की स्थापना देश में की गयी है।

(10) निर्यात सम्बर्द्धन बोर्ड की स्थापना- भारत सरकार ने देश की औद्योगिक नीति में आवश्यक संशोधन कर निर्यातों को प्रोत्साहन देने के लिए एक उच्च अधिकार प्राप्त निर्यात सम्वर्द्धन बोर्ड की स्थापना की है।

(11) व्यक्तिगत आयकर तथा निगम कर दरों में कमी- भारत सरकार ने वर्ष 1997-98 के बजट में व्यक्तिगत आयकर तथा निगम कर की दरों में काफी कमी की है। इस बजट में व्यक्तिगत आयकर की सीमा 40 हजार रुपये से बढ़ाकर 50 हजार रुपये कर दी गयी है। ऐसा करने का मुख्य उद्देश्य सरकार के द्वारा व्यक्तिगत बचतों को प्रोत्साहन करना है इससे प्राथमिक पूँजी बाजार को प्रोत्साहन मिलेगा।

(12) लाभांश पर लगने वाला आयकर समाप्त- भारत सरकार ने अपने बजट वर्ष 1997-98 में अंशधारियों को प्राप्त होने वाले लाभांश पर आयकर को समाप्त कर दिया है। ऐसा करने से देश में उद्योगों में अंशपत्रों में पूँजी विनियोग को प्रोत्साहन मिलेगा।

(13) नौ चुने हुए सार्वजनिक उपक्रमों को नवरत्नकी संज्ञा- भारत सरकार ने अपनी उदारीकरण की नीति में नौ चुने हुए सार्वजनिक उपक्रमों को ‘नवरत्न’ की श्रेणी में रखा है तथा उन्हें स्वायत्तता प्रदान की है। इसी श्रेणी में भारत सरकार के द्वारा GAIL और MTNL को भी सम्मिलित किया गया है।

(14) लाभ कमाने वाले 97 सार्वजनिक उपक्रमों को अपने कार्यों में अधिक स्वायत्तता- भारत सरकार ने औद्योगिक नीति में आवश्यक संशोधन कर लाभ कमाने वाले देश के 97 सार्वजनिक उपक्रमों को अपने कार्यों में अधिक स्वायत्तता प्रदान की है। ऐसा होने से ये उपक्रम अपने नीति निर्धारण तथा क्रियान्वयन सम्बन्धी कार्यों में अधिक स्वतन्त्रता से कार्य कर सकेगे।

(15) लघु उद्योगों के लिए आरक्षित मदों में कमी- भारत सरकार के द्वारा अपनी औद्योगिक नीति में समय-समय पर अनेक बार आवश्यक संशोधन किये गये है तथा इनमें उदारीकरण की नीति अपनायी गयी है जिनमें लघु उद्योगों के लिए आरक्षित कई मदों को कम कर दिया गया है। वर्ष 1997-98 के बजट में 15 मदों को आरक्षित सूची से निकाल दिया गया है तथा बड़े उद्योगों के निर्माण की छूट प्रदान कर दी गयी है। सरकार के द्वारा जहाँ वर्ष 1997 तक 873 मदों को लघु उद्योगों के लिए आरक्षित किया गया था अब यह आरक्षित मदों की संख्या घटकर मात्र 820 रह गयी हैं।

(16) वित्तीय संस्थानों की ब्याज दरों में कमी तथा तरल कोषों में वृद्धि- भारतीय रिजर्व बैंक के द्वारा 12 प्रतिशत से कम करके 9 प्रतिशत, नकद कोषानुपात दर को 15 प्रतिशत से कम करके 10 प्रतिशत तथा तरल कोषानुपात की दर को 381/2 प्रतिशत से कम करके 25 प्रतिशत कर दिया गया है जिसके फलस्वरूप देश में वित्तीय संस्थानों की ब्याज दरों में कमी तथा तरल कोषों में वृद्धि संभव हुई है। ऐसा करने से उधार देय कोषों में भी आवश्यक वृद्धि संभव हुई है।

(17) अप्रवासी भारतीयों तथा समुद्रपार निगमों की पोर्टफोलियों विनियोग की अधिकतम सीमा में वृद्धि- भारत सरकार ने अपनी उदारीकरण की नीति में अप्रवासी भारतीयों तथा समुद्रपार निगमों की पोर्टफोलियों विनियोग की अधिकतम सीमा कम्पनी की प्रदत्त पूँजी के 24 प्रतिशत से बढ़ाकर 30 प्रतिशत तक करने की व्यवस्था कर दी है। ऐसा करने के लिए कम्पनी के निदेशक मण्डल की अनुमति तथा आम सभा में विशेष प्रस्ताव पारित कराना आवश्यक होगा।

(18) अप्रवासी भारतीयों तथा समुद्रपार निगमों द्वारा उद्योगों की सूची का विस्तार- सरकार ने उदारीकरण तथा संशोधन की नीति में अप्रवासी भारतीयों और समुद्र पार निगमों के द्वारा प्रत्यक्ष विदेशी अंश विनियोग से सम्बन्धित सूची का विकास एवं विस्तार किया है। जिसमें भारतीय रिजर्व बैंक के द्वारा स्वयं अनुमति में अंशपूँजी विनियोग का प्रावधान रखा गया है।

(19) लघु उद्योगों एवं एनसीलियरी उद्योगों में विनियोग की अधिकतम सीमा में वृद्धि- भारत सरकार ने अपनी उदारीकरण की नीति में देश के लघु उद्योगों तथा एनसीलियरी उद्योगों में संयंत्रों तथा मशीनों में विनियोग की अधिकतम सीमा क्रमशः 60 लाख रुपये और 75 लाख रुपये से बढ़ाकर 3 करोड़ रुपये कर दी है। ऐसे ही अति लघु उद्योगों की अधिकतम सीमा को भी 5 लाख रुपये से बढ़कर 25 लाख रुपये तक कर दिया गया है। भारत सरकार की इस उदारीकरण की नीति से जहाँ एक ओर इनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ेगी वहीं दूसरी ओर उन्हें अपना आर्थिक आकार बढ़ाने में सहायता प्राप्त होगी।

(20) 22 उच्च प्राथमिकता प्राप्त उद्योगों में अप्रवासी भारतीयों तथा समुद्रपार निगमों के अंशपूँजी विनियोग पर शत-प्रतिशत छूट- भारत सरकार द्वारा अपनी उदारीकरण की नीति में 22 उच्च प्राथमिकता प्राप्त उद्योगों में अप्रवासी भारतीय और समुद्रपार निगमों के अंशपूंजी विनियोग पर शत-प्रतिशत की छूट प्रदान की गयी है। इन उद्योगों में 9 उच्च प्राथमिकता प्राप्त उद्योग मेटरलॉजिकल और इन्फ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र के तथा 13 अन्य प्राथमिकता क्षेत्र के उद्योग सम्मिलित हैं जिनमें अभी तक क्रमशः 74 प्रतिशत और 51 प्रतिशत अंशपूँजी विनियोग की छूट थी।

नवीन औद्योगिक नीति का आलोचनात्मक मूल्यांकन

(Critical Evaluation of New Industrial Policy)

भारत सरकार के द्वारा 1991 में जो उपर्युक्त नवीन औद्योगिक नीति घोषित की गयी वह बहुत ही सरल, सादगी और साहसिक कदम को प्रदर्शित करती है। इसमें 18 बड़े उद्योगों के अलावा सभी बड़े व लघु एवं कुटीर उद्योगों को लाइसेंस से मुक्त किया गया, सार्वजनिक क्षेत्र के महत्त्व को कम करके निजीकरण को बढ़ावा दिया गया, विदेशी निवेश को प्रोत्साहित किया गया, साथ ही विदेशी तकनीकी सेवाओं के आयात को भी प्रोत्साहित किया गया। वर्ष 1992- 93 में औद्योगिक उदारीकरण का रुख देश में औद्योगिक विकास के लिए पूरी तरह सराहनीय रहा। लगभग सभी बड़े-बड़े उद्योगपतियों के द्वारा इस नीति का स्वागत किया गया। इससे स्वदेशी व अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा मिलेगा, उत्पादन व रोजगार में स्वतः वृद्धि होगी।

फिक्की के अध्यक्ष एस० के० विड़ला ने इस नई नीति पर सन्तोष व्यक्त करते हुए इसे उन्मुक्त बाजार प्रणाली एवं अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के लिए उपयोगी बताया है। एशोचेम के अध्यक्ष मजूमदार ने भारतीय अर्थव्यवस्था को उन्मुक्त करने की दिशा में एक सार्थक कदम बताया है। पी0एच0डी0 चेम्बर ऑफ कामर्स के अध्यक्ष के अनुसार नई नीति से न केवल विदेशी विनियोजन आकर्षित होगा बल्कि औद्योगिक उत्पादन व प्रतिस्पर्द्धा को भी बढ़ावा मिलेगा। लाइसेंस प्रणाली की समाप्ति से भ्रष्टाचार समाप्त होगा। नौकरशाही व राजनैतिक हस्तक्षेप पर लगाम मिलेगी। ए0आई0एम0ओ0 के अध्यक्ष श्री कालान्जी के अनुसार लाइसेंसिंग से मुक्ति तथा नियन्त्रणों का समापन औद्योगिक उत्पादन को बढ़ावा देने वाला सही कदम है।

दूसरी ओर इस नीति के आलोचकों का यह कहना है कि इस नीति से पूँजीवाद को प्रोत्साहन मिलेगा, अन्तर्राष्ट्रीय वित्त संस्थाओं का हस्तक्षेप बढ़ेगा और स्वदेशी उद्योगों की स्वतन्त्रता समाप्त होगी। निष्कर्ष के रूप में हम यह कह सकते हैं कि यह नीति भारतीय अर्थव्यवस्था में औद्योगिक विकास में प्रत्यक्ष योगदान देगी।

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Pankaja Singh

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