इतिहास

अशोक का धम्म क्या था ? | अशोक की धार्मिक सहिष्णुता | अशोक के धर्म के सिद्धान्त | अशोक के धर्म की विशेषतायें | बौद्ध धर्म के प्रचार एवं प्रसार के लिए उपाय

अशोक का धम्म क्या था ? | अशोक की धार्मिक सहिष्णुता | अशोक के धर्म के सिद्धान्त | अशोक के धर्म की विशेषतायें | बौद्ध धर्म के प्रचार एवं प्रसार के लिए उपाय

अशोक का धम्म क्या था ?

भगवान बुद्ध की शिक्षाओं की व्याख्या आदि की दृष्टि से उसने मोग्गल्लपुत्ततिस्य की अध्यक्षता में बौद्ध धर्म की तीसरी संगीति को निमन्त्रित किया।

इसके अतिरिक्त अहिंसा का प्रचार, बौद्ध तीर्थों का भ्रमण आदि कितनी ही बातें उसके बौद्ध धर्म मतावलम्बी होने की ओर इंगित करती हैं। कलिंग युद्ध के पश्चात् अशोक ने भविष्य में युद्ध न करने तथा प्राणिमात्र पर दया करने का निश्चय कर लिया। भारत में अहिंसा का प्रचार करने वाले दो धर्म थे जैन धर्म और बौद्ध धर्म। अशोक इन दो धर्मों में से किसी एक धर्म का अनुयायी हो सकता था। जैन धर्म के कठिन नियम थे तथा कठिन तपस्या-विधान था। अतः उसने सरल एवं व्यावहारिक बौद्ध धर्म को अपनाने का निश्चय कर लिया। ऐसा निश्चित है कि अपने राज्याभिषेक के नवें वर्ष में वह बौद्ध धर्म में दीक्षित हो गया। इसके पश्चात् भी अशोक ने अन्य धर्मावलम्बियों के प्रति उदारता, सहिष्णुता तथा सहयोग की नीति का अनुसरण किया

अशोक की धार्मिक सहिष्णुता-

अशोक बौद्ध अवश्य हो गया था, किन्तु उसमें धार्मिक कट्टरता छू तक नहीं गई थी। वह बड़ा ही सहिष्णु था। देव या ब्राह्मण किसी के प्रति उसके हृदय में विरोध की भावना नहीं थी। अपने जीवन के अन्त तक वह अपने को ‘देवानांप्रिय’ कहलाने में अपना गौरव समझता था। उसके 12वें शिलालेख से यह सिद्ध हो जाता है कि वह सभी धर्मों और सम्प्रदायों का समान रूप से आदर करता था। उसने धार्मिक सहिष्णुता के इस सिद्धान्त को मात्र सिद्धन्त ही नहीं रखा, बल्कि उसे एक क्रियात्मक रूप प्रदान किया। ब्राह्मणों, श्रमणों तथा निग्रंथों आदि को आपस में प्रेम से रहने का उपदेश दिया।

अशोक के धर्म के सिद्धान्त

अशोक का धर्म किसी एक धार्मिक विश्वास के अन्तर्गत नहीं था। उसके उपदेश व्यापक और नैतिक नियमों के रूप में थे। जहाँ तक उसके व्यक्तिगत धर्म का सम्बन्ध है, अशोक बौद्ध था किन्तु उसने कभी व्यक्तिगत धार्मिक विचारों को जनता पर लादने का प्रयास नहीं किया। उसके अभिलेखों में कहीं भी हमें बौद्ध धर्म के ‘चार आर्य सत्य’, ‘अष्टांगिक मार्ग’ या ‘निर्वाण’ का उल्लेख नहीं मिलता। उसका उद्देश्य तो व्यक्ति का सम्यक् नैतिक विकास करना, था। इसके लिए उसने लोगों के सम्मुख कुछ ऐसे नैतिक नियमों को रखा, जो व्यक्ति के आन्तरिक गुणों का प्रकाशन करते हुए उसे सच्चे सुख और शान्ति की ओर अग्रसर करें। ये नैतिक नियम इस प्रकार थे-(1) साधुता या बहुकल्याण, (2) दया, (3) दान, (4) सत्य, (5) शौच तथा (6) मार्दव या माधुर्य।

अशोक के धर्म के सिद्धान्तों को निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत स्पष्ट किया गया है।

(1) प्रजा द्वारा पालन करने के लिए अशोक द्वारा बताये गये दस नियम- इन सिद्धान्तों को कार्य रूप में परिणत करने हेतु उसने प्रजा को निम्नलिखित नियमों का पालन करने के लिए प्रेरित किया-(i) पशुवध का त्याग, (ii) अहिंसा, (iii) माता-पिता एवं गुरुजनों के प्रति आदर रखना, (iv) ब्राह्मणों, श्रमणों, मित्र, भाई-बन्धुओं, सेवक और श्रमिकों के साथ समुचित व्यवहार करना, (v) थोड़ा व्यय तथा थोड़ा संग्रह करना, (vi) सत्य, संयम, कृतज्ञता आदि गुणों को व्यवहार में उतारना, (vii) अपने से छोटों तथा श्रमिकों के प्रति दया का व्यवहार करना,(viii) काम, क्रोध, लोभ-मोह, ईर्ष्या आदि दुर्गुणों से दूर रहना, (ix) धार्मिक सहिष्णुता को अपनाना और (x) अपनी भावनाओं को पवित्र रखते हुए मन को हमेशा शुद्ध रखना।

(2) प्रजा द्वारा चार कुविचारों से बचने के लिए अशोक के निर्देश- अशोक ने तृतीय स्तम्भ लेख में कुछ दुर्भावनाओं से बचने का आदेश भी प्रजा को दिया था। ये दुर्भावनायें मुख्यतः इस प्रकार हैं-(i) चण्डता, (ii) निष्ठुरता, (iii) क्रोध, (iv) अभिमान और (v) ईर्ष्या। अशोक अपने धर्म की इस कल्पना को कर्मकाण्डयुक्त पूजा-पाठ व दान-पुण्य आदि से श्रेष्ठ समझता था।

(3) आत्म-निरीक्षण पर बल देना- अशोक ने अपने धर्म के अन्तर्गत इस बात पर बल दिया कि प्रत्येक मनुष्य को समय-समय पर आत्म-निरीक्षण करना चाहिए तथा अच्छे एवं बुरे कार्यों का मूल्यांकन करना चाहिए। अशोक ने एक अभिलेख में उच्च नैतिक जीवन के लिए आत्म-निरीक्षण पर बल दिया।

(4) धर्म-मंगल- अशोक ने झूठे रीति-रिवाजों, कर्मकाण्डों का खण्डन किया तथा धर्म- मंगल का अनुसरण किया। धर्म-मंगल के अन्तर्गत अशोक ने सत्य बोलना, बड़ों का सम्मान करना, दान देना, किसी भी जीव को कष्ट न देना आदि पर बल दिया।

(5) धर्म-दान पर बल- अशोक धर्म-दान को सभी दानों से श्रेष्ठ मानता था। अशोक ने आदेश दिया था कि मनुष्य को विद्वानों, ऋषियों एवं निर्धन व्यक्तियों को दान देना चाहिए।

(6) सभी धर्मों का आदर- अशोक ने धार्मिक सहिष्णुता पर बल दिया और सभी धर्मों का आदर करने का उपदेश दिया।

(7) अहिंसा- अशोक ने अहिंसा के पालन पर अत्यधिक बल दिया। उसने प्राणि मात्र के प्रति दया, प्रेम और सहानुभूति का बर्ताव करने पर बल दिया। उसने हिंसात्मक यज्ञों पर प्रतिबन्ध लगा दिया।

(8) धर्म विजय- अशोक ने धर्म-विजय का पालन करने पर बल दिया। धर्म-विजय, दया, परोपकार, त्याग आदि से प्राप्त होती है। अशोक ने धर्म-विजय के लिए अधिक से अधिक भलाई करने पर बल दिया।

(9) धर्म-सहिष्णुता- अशोक ने धार्मिक सहिष्णुता के सिद्धान्त पर बल दिया। उसने इस बात पर बल दिया कि मनुष्य को सभी धर्मों का आदर करना चाहिए तथा दूसरे धर्मों की निन्दा नहीं करनी चाहिए।

अशोक के धर्म के उपर्युक्त सिद्धान्तों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि अशोक का धर्म सभी धर्मों का सार है। उपर्युक्त सभी सिद्धान्त प्रायः सभी धर्मों में पाये जाते हैं।

अशोक के धर्म की विशेषतायें

अशोक के धर्म का उद्देश्य बाहरी रूप से मनुष्य के आचरण को पवित्र बनाना और आन्तरिक रूप से उसकी आत्मा को शुद्ध करना था। अशोक के धार्मिक सिद्धान्तों का विश्लेषण करने पर हमें उसके अन्तर्गत निम्नलिखित विशेषतायें दृष्टिगत होती हैं-

(1) सार्वभौमिकता- उसका धर्म सार्वभौम था। उसमें साम्प्रदायिकता या अन्य किसी प्रकार के संकीर्ण विचारों को जरा भी स्थान प्राप्त नहीं था। उसके ये नियम सभी धर्मों को समान रूप से मान्य थे। वह समस्त विश्व को एक कुटुम्ब मानता था और सम्पूर्ण मानव जाति की भलाई के लिए प्रयलशील रहता था।

(2) सभी धर्मों का सार- उसके धर्म में केवल सभी धर्मों के सार पर जोर दिया गया था। उसने बाहरी आडम्बर, थोथे क्रिया-कलापों तथा दार्शनिक सिद्धान्तों के जाल से दूर रखने का प्रयास किया था।

(13) नैतिकता पर बल-अशोक का धर्म पूर्णतया शुद्ध नैतिक धर्म था। इसमें व्यक्ति के आचरण पर विशेष जोर दिया गया था। इसका एकमात्र सम्बन्ध मनुष्यों के आचरण से था।

(4) धार्मिक सहिष्णुता- यह धर्म पूर्णतया उदार था। अन्य सभी धर्मों के अनुयायी अपने- अपने धर्मों का पालन करते हुए भी इस धर्म को स्वीकार कर सकते थे।

(5) अहिंसा- अशोक ने अहिंसा के सिद्धान्त के पालन पर अत्यधिक बल दिया। उसने पशु-पक्षियों के वध पर प्रतिबन्ध लगा दिया और हिंसात्मक यज्ञ बन्द करवा दिया।

(6) धार्मिक पाखण्डों और आडम्बरों का अभाव- अशोक के धम्म में कर्मकाण्डों, धार्मिक पाखण्डों तथा आडम्बरों का अभाव था। उसने जन्म, मृत्यु, विवाह आदि के अवसरों पर धार्मिक अनुष्ठान किये जाने की निन्दा की तथा धर्म-मंगल अर्थात् सच्चे रीति-रिवाजों पर बल दिया।

डॉ० आर० एस० त्रिपाठी ने अशोक के धर्म को सब धर्मों की अच्छी बातों का सार बताया है, जिसका उद्देश्य जीवन को पवित्र और सुखी बनाना था।

बौद्ध धर्म के प्रचार एवं प्रसार के लिए उपाय

कलिंग युद्ध के पश्चात् अशोक ने यह निश्चय किया कि सार्वभौम नैतिक धर्म भारत का ही नहीं अपितु समस्त विश्व का हित करेगा। अशोक का विश्वहित का कार्य ही अशोक की ‘धर्म विजय’ के नाम से जाना जाता है। इस धर्म विजय से विश्व का कल्याण तो हुआ ही साथ ही उसको बौद्ध धर्म के प्रचार से बड़ा सहयोग मिला। उसे अपने कार्य में अद्भुत सफलता मिली। अशोक ने अपनी धर्म विजय के लिए या विश्व में अपने धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए निम्नलिखित कार्य किए-

(1) धर्म विभाग की स्थापना- अशोक ने एक धर्म विभाग की स्थापना की, जिसके मुख्य अधिकारी महामात्र कहलाते थे। इन अधिकारियों का उद्देश्य जनता का भौतिक एवं नैतिक कल्याण करना था।

(2) बौद्ध धर्म को राजधर्म घोषित करना- अशोक ने बौद्ध धर्म को राजधर्म घोषित कर दिया। इसाक फल यह हुआ कि अशोक की प्रजा भी बौद्ध धर्म स्वीकार करने को प्रेरित हुई। अशोक के उत्तराधिकारियों ने भी इसे अपना पैतृक धर्म समझकर स्वीकार किया, जिससे यह धर्म बहुत दिनों तक राजधर्म बना रहा। लेकिन अशोक ने अन्य धर्मावलम्बियों को बौद्ध धर्म स्वीकार करने के लिए बाध्य कभी नहीं किया।

(3) धार्मिक प्रदर्शन- अशोक ने लोगों को धर्म की ओर आकर्षित करने के लिए स्वर्ग के अनेक प्रदर्शनों या दृश्यों को रूपक के रूप में जनता के सम्मुख रखा। विमान प्रदर्शन, अग्नि-कुन्दुक-प्रदर्शन, गज-प्रदर्शन आदि ऐसे रूपकों में से थे।

(4) धर्म यात्रा- अशोक ने आमोद-प्रमोद यात्रा के स्थान पर धर्म-यात्रा का श्रीगणेश किया। पहले लोग आमोद-प्रमोद के लिए जाते और मृगया द्वारा आमोद-प्रमोद किया करते थे। अशोक ने स्वयं मृगया त्याग दी और राज्य की ओर से धर्म यात्रा की प्रथा चलाई। धर्म यात्रा में ब्राह्मणों तथा श्रमणों का दर्शन, दान, वृद्धों का दर्शन तथा उनके लिए स्वर्ण दान, धर्म का अनुशासन और धर्म की जिज्ञासा सम्मिलित थी। अशोक एवं उसके मुख्य अधिकारीगण धार्मिक स्थानों की यात्रा करने जाते थे।

(5) धर्म श्रवण- धर्म श्रवण के अन्तर्गत धार्मिक विषयों के ऊपर भाषण तथा कथायें होती थीं। अशोक ने इसकी बड़ी सुन्दर व्यवस्था की थी। राजुक, व्युष्ट, प्रादेशिक, युक्त आदि अधिकारी इस कार्य में लगे रहते थे।

(6) दान- राजधानी और अन्य सभी प्रमुख स्थानों पर रोगियों, भूखों व दीन-दुखियों आदि को राज्य की ओर से दान दिया जाता था । वह स्वयं तो दान देता ही था, साथ ही अपने भाई-बन्धुओं व सम्बन्धियों से भी दान दिलवाता था। सप्तम स्तंभ लेख से स्पष्ट होता है कि उसने दान विभाग की देख-रेख के लिए कर्मचारियों की नियुक्ति की जो दान का पूरा विवरण रखते थे। इस लेख से हमें अशोक के दान काट्य को स्पष्ट होता है। इस लेख में यह निर्देश है कि, ‘मैने यह इस उद्देश्य से किया है कि लोक-धाम का यथानुसार सभी पालन करें।’

(7) धर्म-मंगल- अशोक ने जन्म, area अवसरों पर होने वाले अनुष्ठानों को निरर्थक घोषित कर जनता को नैतिक आचरणों द्वारा धर्म पालन की ओर प्रोत्साहित किया। अशोक का विचार था कि वास्तविक मगलतिक आचरण व आन्तरिक गुणों में निहित है।

(8) धर्म लिपि- अशोक ने धर्म के सिद्धान्तों और नियमों को पर्वतीय चट्टानों, प्रस्तर स्तम्भों एवं गुफाओं में लिखवाकर सबके लिए उन्हें सुलभ और स्थायी कर दिया।

(9) लोक हितकारी कार्य- अशोक ने इन नैतिक सिद्धान्तों के प्रचार के साथ ही साथ जनकल्याण के कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण कार्य किये। उसने यात्रियों की सुविधा के लिए सार्वजनिक पथों का निर्माण कराया, उसके किनारे छायादार वृक्ष लगवाये, कुएँ खुदवाये, विश्रामगृह बनवाये व मनुष्य और पशुओं के लिए औषधालय और चिकित्सालय स्थापित किये।

(10) निरीक्षकों की नियुक्ति- अशोक ने कुछ निरीक्षक नियुक्त किये, जिनका कार्य यह देखना था कि शिलाओं, स्तम्भों और गुफाओं पर अंकित शिक्षाओं और आदेशों का पालन हो रहा है या नहीं। वे यह भी देखते थे कि धर्म-प्रचार का कार्य सुचारु रूप से हो रहा है या नहीं?

(11) बौद्ध संगीति का आयोजन- अशोक ने पाटलिपुत्र में तीसरी बौद्ध संगीति का आयोजन किया। इस संगीति में बौद्ध धर्म के ग्रन्थों का संशोधन किया गया और बौद्ध संघ में जो दोष आ गये थे उन्हें दूर करने का प्रयास किया गया। इससे धर्म-प्रचार में जो शिथिलता आ गई थी, वह दूर हुई और धर्म-प्रचार का कार्य अधिक वेग से होने लगा।

(12) विदेशों में बौद्ध धर्म का प्रचार- अशोक ने बौद्ध धर्म का प्रचार करने के लिए संसार के विभिन्न भागों में प्रचारकों को भेजा। उसने मज्झन्तिक को काश्मीर ओर, गान्धार की ओर, महारक्षिन को यूनान की ओर, मज्झिम को हिमालय प्रदेश की ओर, धर्मरक्षिन को महाराष्ट्र की ओर, महादेव को मैसूर की और, रक्षिन को वाराणसी व उत्तर कनारा की ओर, सोना व उत्तरा को पीगू और मौलमीन की ओर तथा राजकुमार महेन्द्रा को लंका की ओर भेजा। इसके अतिरिक्त उसने मिस्त्र, साईरीन, मकदूनिया और एपीरस की ओर भी प्रचारक भेजे। आज विदेशों में करोड़ों लोगों के बौद्ध अनुयायी होने का श्रेय काफी सीमा तक अशोक को ही जाता है।

(13) पालि भाषा में बौद्ध ग्रन्थों के लिखने की व्यवस्था- अशोक ने जनभाषा पालि में बौद्ध ग्रन्थों को लिखवाकर बौद्ध धर्म के प्रचार में काफी योग दिया।

(14) मठों का निर्माण- अशोक ने अपने राज्य के विभिन्न भागों में मठों का निर्माण कराया तथा पुराने मठों की आर्थिक सहायता की। इन मठों में बहुत अधिक भिक्षु तथा भिक्षुणियाँ रहा करते थे।

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Pankaja Singh

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