अनुसंधान क्रियाविधि

अनुसन्धान विज्ञप्ति | प्रतिवेदन से आशय | प्रतिवदेन की विषय-सामग्री | प्रतिवदेन की अन्तर्वस्तु

अनुसन्धान विज्ञप्ति | प्रतिवेदन से आशय | प्रतिवदेन की विषय-सामग्री | प्रतिवदेन की अन्तर्वस्तु | Research Releases in Hindi | Meaning of report in Hindi | Contents of the report in Hindi

अनुसन्धान विज्ञप्ति या प्रतिवेदन से आशय

(Meaning of Investigation Report)

विज्ञप्ति या प्रतिवदेन सर्वेक्षण या अनुसन्धान का अन्तिम परिणाम है। अनुसन्धान प्रक्रिया के प्रत्येक चरण का संयुक्त परिणाम प्रतिवेदन में निहित रहता है। प्रतिवेदन को समस्त अनुसन्धान का लिखित विवरण कहा जा सकता है। प्रतिवेदन ही सर्वेक्षण की सफलता या असफलता का आधार है। यदि सर्वेक्षण का प्रतिवेदन आकर्षक तथा तथ्यपूर्ण है तो सम्बन्धित व्यक्ति उसका उपयोग करेंगे। सर्वेक्षण का सारा परिश्रम प्रतिवेदन में सिमट जाता है।

प्रतिवदेन की विषय-सामग्री या अन्तर्वस्तु

(The subject-matter of Report)

एक प्रतिवेदन में क्या-क्या विषय-सामग्री आनी चाहिये, इसके बारे में सामाजिक वैज्ञानिक एकमत नहीं है। कोई किसी एक बिन्दु को महत्व देता है तो कोई किसी दूसरे बिन्दु को। फिर भी सामान्यतः जिन विषयों को प्रतिवेदन में स्थान दिया जाता है, वे निम्नांकित हैं-

(1) प्रस्तावना (Introduction)- प्रायः समस्त प्रतिवेदन में सर्वप्रथम प्रस्तावना को सम्मिलित किया जाता है। प्रस्तावना में शोध के महत्व और इसकी योजना पर संक्षेप में प्रकाश डाला जाता है। इसमें अनुसन्धान कराने वाली सरकारी या गैर सरकारी संस्था, दूसरों के सहयोग व समर्थन की विवेचना होती है। प्रस्तावना में वह इस बात को भी स्पष्ट रूप से लिख सकते हैं कि उसको किन-किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा एवं उनको किस प्रकार दूर किया। संक्षेप में वह सम्पूर्ण बातों का वर्णन करता है।

(2) समस्या का वर्णन (Statement of the Problem)- प्रस्तावना के पश्चात् अनुसन्धानकर्ता समस्या के बारे में परिचय देता है। वह प्रतिवेदन में समस्या की आवश्यकता एवं उसके आधारों पर जानकारी प्रदान करता है। अध्ययन विषय से सम्बन्धित सीमाओं का निर्धारण करता है। उसके विषय से सम्बन्धित अन्य विषयों तथा समस्याओं का भी संक्षेप में वर्णन करता है। जिस कारण उसने समस्या विशेषको चुना है, उसका विवरण भी वह अपने प्रतिवेदन में देगा। समस्या का वर्णन से यह लाभ है कि हमें उसके समस्त पहलुओं का ज्ञान हो जाता है। हम उसकी प्रकृति को तुरन्त समझ सकते हैं।

(3) अध्ययन का उद्देश्य (Purpose of the Study)- जिस उद्देश्य से अनुसन्धान किया जा रहा है उसका उल्लेख वह अपने प्रतिवेदन में करता है। अनुसन्धान उद्देश्य के पक्ष पर प्रकाश डालना आवश्यक होता है, अतः वह स्पष्टतया इस बात का जिक्र करेगा कि क्या उसके अनुसन्धान का उद्देश्य ख्याति, भौतिक लाभ, नए तथ्यों की खोज व ज्ञान की प्राप्ति करना है। यदि अनुसन्धान को संचालित कराने के लिए कोई सरकारी संस्था दिलचस्पी रखती हो तोbअनुसंधानकर्ता उस अनुसंधान का उद्देश्य को भी बता देता है।

(4) अनुसन्धान प्रणालियाँ (The Research Procedures) – अनुसंधान में तथ्यों को एकत्र करने के लिए विभिन्न प्रणालियों को अपनाया जाता है। अनुसंधानकर्ता अपने प्रतिवेदन में उन प्रणालियों का उल्लेख करता है जिनके द्वारा तथ्यों का संकलन किया गया है। तथ्यों को प्राप्त करने के लिये प्राथमिक और द्वैतीयक स्रोतों का भी जिक्र करता है। प्रतिवेदन में इस बात को भी लिखा जाता है कि अनुसन्धानकर्ता ने उन प्रणालियों का प्रयोग क्यों किया एवं उनका तथ्यों से क्या सम्बन्ध था। उदाहरणार्थ, यदि तथ्यों का संकलन प्रश्नावलियों या साक्षत्कारों द्वारा किया गया है तो क्या-क्या प्रश्न पूछे गए, इनकी सूची परिशिष्ट (Appendix) में दी जाती है। साक्षात्कारकर्त्ता का साक्षात्कार लेते समय क्या-क्या अनुभव हुए, उसे अनुभव कैसे लगे, क्या वह इन अनुभवों से लाभान्वित हुआ था। कड़े अनुभवों के कारण निरुत्साहित हुआ, इत्यादि बातों का उल्लेख किया जाता है। यदि अनुसन्धानकर्त्ता ने अनुमाप प्रणाली (Scaling Process) या निर्देशांकों का उपयोग किया है तो उसका विवेचन भी प्रतिवेदन में किया जाता है। इसके अतिरिक्त अनुसंधानकर्त्ता ने यदि प्रकाशित स्रोतों से तथ्यों का संकलन किया है तो उनको भी अपने प्रतिवेदन में स्थान देगा।

(5) निदर्शन-चयन (Selection of Samples) – अध्ययनकर्त्ता अपने प्रतिवेदन में निदर्शन-चयन प्रणाली का भी उल्लेख करता है। निदर्शनों के चयन के लिए जिस पद्धति को अपनाया है, उसके कारणों का भी उल्लेख अपनी रिपोर्ट में करता है। जिन निदर्शकों को चुना गया है, वे समूह का सही प्रतिनिधित्व करते हैं अथवा नहीं, निदर्शन का आकार एवं समग्र निदर्शन प्रणाली के अन्तर्गत (Universe) में उसका अनुपात जैसी बातों को प्रतिवेदन में स्पष्ट किया जाता है।

(6) विश्लेषण (Analysis)- प्रतिवदेन का यह सबसे महत्वपूर्ण चरण हैं। संकलित तथ्यों को व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत किया जाता है एवम् उन्हें ग्राफ, चार्ट, सारिणियों एवम् अन्य चित्रों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। तथ्यों के व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुतीकरण के बाद उनका  विश्लेषण किया जाता है। कोरे तथ्यों को एकत्र करने से कोई विशेष प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। अतः उनका विश्लेषण करना आवश्यक है। विश्लेषण करके, अनुसन्धानकर्त्ता किन-किन निष्कर्षो पर पहुंचा है, उसका उल्लेख प्रतिवदेन में किया जाता है। निष्किर्षों के आधार का भी स्पष्टीकरण प्रतिवेदन में प्राप्त होता है। यदि द्वैतीयक सामग्री को काम में लाया गया है तो उनके स्रोतों का भी संक्षेप में उल्लेख कर दिया जाता है।

(7) परिणाम (Results) – तथ्यों के विश्लेषण के आधार पर प्रमुख परिणामों और निष्कर्षों को प्रतिवेदन में स्थान दिया जाता है। परिणामों एवं निष्कर्षो का उल्लेख अनुसन्धानकर्ता को निष्पक्ष तरीके से करना चाहिये। उसे इस बात की परवाह नहीं करनी चाहिए कि वे उसके विचारों या दृष्टिकोण के साथ मेल खाते हैं या नहीं। रिपोर्ट के इस चरण में निष्कर्षों में सार का उल्लेख किया जाता है जो शोध के परिणामों का संतोषजनक ढंग से स्पष्ट कर देता है।

(8) सुझाव (Suggestions) – अनुसन्धान में सुझावों का बड़ा महत्व है। रिपोर्ट के अन्त में अनुसन्धानकर्त्ता अपनी ओर से सुझावों का भी उल्लेख करता है। यदि कोई अनुसन्धान किसी विशेष प्रयोजन से करवाया गया है तो रिपोर्ट के अन्त में सुझाव अवश्य दिये जाने चाहिए। उदाहरणार्थ-देश में तेज गति से बढ़ती हुई जनसंख्या एवं उत्पादन के सम्बन्धों पर यदि कोई अनुसन्धान कार्य किया गया हो तो अनुसन्धानकर्ता अपनी रिपोर्ट में यह सुझाव दे सकता है कि या तो उत्पादन (Production) इतना बढ़ाया जाये कि वह सम्स्त जनसंख्या की आवश्यकताओं को पूरा कर सके या यह भी सुझाव दे सकता है कि उत्पादन पर जोर दिया जाना चाहिए, परन्तु जनसंख्या वृद्धि पर भी रोक लगाने के लिए तुरन्त ही प्रभावशाली कदम उठाए जाने चाहिये नहीं तो भविष्य में स्थिति नियन्त्रण के बाहर हो सकती है। इन सुझावों को वह अपने अनुभव और वस्तु स्थिति के आधार पर दे सकता है।

(9) संलग्न सूचना (Appendixes) – अनुसन्धानकर्ता जब अपने प्रतिवेदन में सुझाव दे देता है तो प्रायः यही समझा जाता है कि इसका कार्य पूर्ण हो गया है। फिर भी कुछ तालिकाएँ, चार्ट एवं पत्र अनुसन्धान की सत्यापनशीलता के लिये आवश्यक होते हैं, जिनका उपयोग सम्बन्धित पाठकगण कर सकते हैं। इन सबकों प्रतिवेदन के अन्त में जोड़ दिया जाता है।

उपर्युक्त विवरण देने के पश्चात् प्रतिवेदन के लिखने या तैयार करने का कार्य समाप्त हो जाता है। जहाँ तक प्रतिवेदन में क्रम का प्रश्न है, इस सम्बन्ध में कोई एक निश्चित क्रम नहीं होता। यह रिपोर्ट-कार्य स्वयं पर निर्भर करता है कि वह किस क्रम से प्रतिवेदन लिखे ताकि वह उपयोगी, आकर्षक व अनुकरण योग्य हो।

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Pankaja Singh

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